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Thursday, 31 December 2015

रंगो और प्रतीकों का चालू खेल-1

शाहरुख़ खान की फ़िल्म ‘दिलवाले’ का ‘रंग दे तू मोहे गेरुआ’ देखकर मुझे आमिर खान की ‘रंग दे बसंती’ याद आ गई (आप कहेंगे निर्देशकों के नाम क्यों नहीं लिखे तो मैं कहूंगा कि फ़िल्म के प्रोमोज़ में हीरो-हीरोइन को जिस तरह आगे किया जाता है और बातचीत की जाती है कि लगता है फ़िल्म उन्हींने बनाई है, सो निर्देशक याद ही नहीं रह पाता)। फ़िल्म में बसंती रंग से जुड़े किन्हीं दबंगों की ख़बर ली गई थी और साथ में फ़िल्म के नाम और कथ्य में इसी रंग को महिमामंडित भी किया गया था। इसीसे मुझे याद आया कि तथाकथित भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ रामदेव से शुरु होकर अन्ना हज़ारे तक पहुंचे तथाकथित आंदोलन के इंटरवल के दौरान आमिर खान ने ही मंच पर आकर, बाक़ायदा टोपी लगाए हुए अपना रोज़ा खोला था और अन्ना हज़ारे को जूस वगैरह पिलाकर अनशन वगैरह ख़त्म कराया था। बाद में इन्हीं आमिर की ‘पीके’ आ गई जिसमें धार्मिक प्रतीकों की हंसी उड़ाई गई थी। 

ऐसे विरोधाभास हमारे जीवन में कोई एक दिन की नहीं, बल्कि आए दिन की बात है। 

बाद में यह भी कहा गया कि अन्ना हज़ारे बीजेपी के आदमी हैं और केजरीवाल प्रगतिशील हैं। और तथाकथित प्रगतिशीलों की एक पूरी की पूरी फ़ौज केजरीवाल के पीछे खड़ी दिखाई देने लगी। मैं बहुत चक्कर में पड़ गया। भगवान-भगवान, अनशन-अनशन, चमत्कार-चमत्कार रामदेव भी कर रहे थे, अन्ना भी कर रहे थे और केजरीवाल भी कर रहे थे। फिर इनमें से कोई कट्टर, कोई मध्यमार्गी और कोई प्रगतिशील कैसे हो गया !? इस हिसाब से तो आमिर खान बीजेपी के आदमी हुए! या वे किसी ग़लतफ़हमी में अन्ना का अनशन तुड़वा आए थे!? या यह कोई फ़िल्म चल रही थी जिसमें सबके जुड़वां और डुप्लीकेट काम कर रहे थे इसलिए कुछ मालूम नहीं हो पा रहा था कि कौन क्या है, किसके लिए काम कर रहा है, काम कर रहा है या काम का नाम करके अपना नाम कर रहा है !?

ख़ैर मुझे इन आंदोलनों से यह लाभ हुआ कि कई उलझी पहेलियां सुलझ गईं। 

रंगों, प्रतीकों, धर्मों, धारणाओं, जातियों, कर्मकांडों...... आदि का मिला-जुला प्रभाव ही ऐसा है कि जब तक आप इनके ज़रिए आदमी को समझने की कोशिश करते रहते हैं, बार-बार धोखा खाते हैं। यह हमारी मूर्खता है कि हमें कोई आदमी सीधे ही समझ में आ रहा होता है फिर भी हम उसे किसी गमछे, टोपी, मफ़लर, टाई, नाम, डिग्री, प्रोफेशन, सलाम, नमस्ते....यानि किन्हीं मान्यताओं और परिभाषाओं में बांध-बांधकर समझने में लगे रहते हैं। हमारी आंखों देखी बात होती है कि भगतसिंह, कबीरदास, विवेकानंद जैसे नामों का इस्तेमाल कई परस्पर विरोधी विचारधाराओं के लोग एक साथ कर रहे होते हैं, फिर भी हम अपनी पसंद या मजबूरी के हिसाब से उनमें से किसी एक को संबंधित महापुरुष का सच्चा अनुयाई, समर्थक या उत्तराधिकारी मान लेते हैं तो दूसरे को उस नाम का नाजायज़ फ़ायदा उठानेवाला चालू आदमी कह लेते हैं। 

क्या रंगों और प्रतीकों को उस तरह बांटा जाना चाहिए जैसे बांट लिया जाता है ? कौन है जो इन्हें बांटने का अधिकारी है, इनका मालिक है ? कौन है जो कहता है कि गाय मैं फलाने के नाम करता हूं, भैंस आज से ढिमकाने की हुई, तोता चमकानेलाल का हुआ और सांप धमकानेप्रसाद का हुआ ? कौन है जो लाल-पीला-नीला-हरा रंग लोगों को अलॉट कर रहा है ? किसने उसे ये अधिकार दिए हैं ? अगर रंगों और प्रतीकों को कुछ लोगों और समूहों को आवंटित कर दिया गया है तो बाक़ी लोग उनका इस्तेमाल करना छोड़ दें क्या!? मसलन मुझे अगर किसी दिन नारंगी रंग का इस्तेमाल करना हो तो पहले तो मैं यह पता लगाने जाऊं कि किसीने इसपर क़ब्ज़ा तो नहीं कर रखा ? और जब मुझे मालिक़ का पता चल जाए तो में ऐप्लीकेशन भेजूं कि भाईसाहब, आज ज़रा नारंगी शर्ट पहनने का मन हो रहा था, आप कहें तो पहन लूं, वरना क्या ऐसे ही निकल जाऊं ? हरा रंग इस्तेमाल करना हो तो उसके मालिक़ के पास जाऊं कि भाईसाहब ढाई सौ ग्राम हरा रंग चाहिए था ज़रा, अकेले आप की ही दुकान है जिसे इस रंग का ठेका मिला हुआ है, इसलिए आपको परेशान किया वरना कहीं और से ले लेता ! रंगों और प्रतीकों पर जिस हास्यास्पद गंभीरता के साथ तरह-तरह की विचारधाराओं ने क़ब्ज़ा कर रखा है उससे नतीजा यह निकलता दिखाई देता है कि भारत में शादी के दिन ज़्यादातर लड़कियां कम्युनिस्ट हो जातीं हैं क्योंकि ज़्यादातर ने उस दिन लाल जोड़ा पहन रखा होता है। 

कम्युनिस्टों के तो मज़े हो गए, उन्हें तो कुछ करने की ज़रुरत ही नहीं रही।


(बचा-ख़ुचा)

-संजय ग्रोवर
31-12-2015


Wednesday, 23 December 2015

मनुवाद, इलीटवाद और न्याय


जो लोग अपेक्षा को अपेक्षा बोलते रहे, उनका भी रिकॉर्ड देखना चाहिए था। क्या अपेक्षा को अपेक्षा बोलते ही फ़्लाईओवर अपने-आप बन जाते हैं, सड़क के गड़ढे ख़त्म हो जाते हैं, किसान आत्महत्या बंद कर देते हैं ? उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश से आनेवाले कितने ही बुद्धिजीवियों को मैंने श को स, व को ब, क्ष को च्छ बोलते सुना है। फ़िल्मकार और ऐडगुरु अकसर ग़लत हिंदी बोलते हैं। मगर भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ चले सरकसनुमां आंदोलन के बाद जिन लोगों को सारे भारत में अकेले लालूप्रसाद ही भ्रष्टाचारी, और चुनाव न लडने लायक भ्रष्टाचारी नेता नज़र आए (और किसी बड़े(?) नेता के चुनाव लड़ने पर पाबंदी हो तो बताएं) उनके घर से कोई अपेक्षा को उपेक्षा बोल दे तो इनके लिए तो बम ही फटा समझो।

फिर राजेंद्र यादव को भी याद करें, जिन्होंने स्त्रियों और वंचितों के संदर्भ में हिंदी साहित्य का परिदृश्य ही बदल डाला, उन्हें भी कई महानात्माएं तरह-तरह से स्त्री-विरोधी साबित करने में लग गई। अंतिम दिनों में तो कई महापुरुष और महामहिलाएं मिल-जुलकर उन्हें हिंदूवादी ही साबित करने में लगे हुए थे। वे तो निकल लिए वरना इन्होंने कर ही देना था। अपने अनुसार न होने वाले व्यक्ति को सभी अच्छे बदलावों का विरोधी घोषित करने में इन अति-ऐक्सपर्ट, छुपे हुए मनुवादियों को महारत हासिल है जिसमें दूसरों की मूर्खता का भी क़ाबिले-ज़िक्र योगदान है। वरना सोचने की बात यह है कि जो लोग पूरे प्राणपण से राजेंद्र यादव को स्त्रीविरोधी और देहवादी साबित करने में लगे रहे उन्होंने इससे पहले और बाद में ऐसे अन्य कितने साहित्यिक मर्दों के खि़लाफ़ आंदोलन चलाए !? देशकाल डॉटकॉम पर मैंने राजेंद्र यादव से इस संदर्भ में पूछा था और उन्होंने धर्मवीर भारती और कमलेश्वर के ऐसे प्रसंग बताए थे कि किस तरह उनसे स्त्रियां/पत्नियां पीड़ित थीं मगर उनका ज़िक़्र कोई नहीं करता था। मनुवादी व्यवस्था का यह चेहरा भी समझने जैसा है कि अगर पुरुष अपना है तो पुरुष का सब कुछ ठीक है और अगर स्त्री अपनी है तो फिर सामनेवाला पुरुष दोषी है। दरअसल किसने क्या किया, वो सब जाए भाड़ में!


(यह स्तंभ अब इस साइट से ग़ायब है, मेरी अन्य कई रचनाएं भी ग़ायब हैं। एक व्यंग्य मौजूद है लेकिन उसमें से भी नाम ग़ायब है। यह मेरे साथ किसी न किसी रुप में चलता ही रहता है। इस बारे में अलग से लिखूंगा। बहरहाल, मैंने जो स्क्रीन शॉट लिये थे, आप उसमें पढ़ सकते हैं। 16-02-2017)

अब कुछ लोग इस लड़के पर अपना सारा न्याय और स्नेह उड़ेले दे रहे हैं। लगता है कि भारत में बलात्कार इसी लड़के की वजह से शुरु हुए और यह बाहर रहा तो देश में तबाही आ जाएगी। जिन लोगों के आस-पास रोज़ इस या उस वर्ग के हाथ-पांव सरेआम काट देने के भाषण चलते रहे हों, उन्हें सारा ख़तरा इसी लड़के में दिखाई देने लगे, तो यह अजीब बात है। जैसे कि बाहर सड़क पर, इससे पहले और इसके बाद सब पवित्र और महान आत्माएं ही घूमती रहीं हों!


लड़के को और समाज को ठीक करना है तो पहले तो यह पता लगाना चाहिए कि वह ऐसा बना क्यों आखि़र ? उसके मां-बाप कैसे थे, उसके टीचर क्या सिखाते थे, दोस्त किस तरह की बातें करते थे, भाई-चाचा-मामा किस तरह के पुरुष को बेहतर मानते थे ; भाभियां, चाचियां, बहिनें, मांएं क्या बतातीं थीं कि स्त्रियां किस तरह के पुरुष को पसंद करतीं हैं ; वो जो अख़बार पढ़ता था, वो क्या-क्या छापते थे और उसे क्या अच्छा लगता था ; जो फ़िल्में वो देखता था, क्यों देखता था, उनसे क्या प्रेरणा उसे मिलती थी ; जो कॉमेडी शो उसे पसंद थे उनके कॉमेडी-प्रमुख स्त्रियों की किन बातों की हंसी उड़ाते थे ; जो न्यूज़-चैनल उसे पसंद थे, वहां काम करनेवाले पुरुष और स्त्रियां हास्यकवियों की किस तरह की कविताओं पर ज़्यादा हंसते थे.......


क्या उस लड़के ने सब कुछ ख़ुद-ब-ख़ुद सीख लिया था ? क्या वह यही सोचकर पैदा हुआ था ? संजय दत्त, सलमान ख़ान, शाइनी आहूजा, मधुर भंडारकर, सूरज पंचोली के क़िस्से हम देखते रहे हैं। एक बात तो पक्की है कि इनमें से कोई भी नाबालिग नहीं था।


लड़के को किसी ऐसी जगह भी तो रखा जा सकता हैं जहां वह क़ैद भी न हो और लगातार मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों, समाजविज्ञानियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, चिंतकों की नज़र और असर में रहे। जो उसके ज़रिए यह पता लगाने की कोशिश करें कि इतनी कम उम्र में बच्चों में ऐसी प्रवृत्ति कैसे विकसित हो जाती है !?


अब यह तथ्य लोग जानने लगे हैं कि किसी केस पर पब्लिक का रिएक्शन कैसा हो, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि मीडिया उसे कैसे पेश करता है।


वंचित वर्गों की स्त्रियों से आए दिन बलात्कार होते हैं। कोई पूछने भी नहीं जाता।


-संजय ग्रोवर
23-12-2015



Sunday, 20 December 2015

धर्म

लघुव्यंग्य

एक बच्चे को, पैदा होते ही, उसके घरवालों ने पैजामा पहना दिया, और उसे पैजामा-पैजामा बुलाने लगे।

बड़ा होता बच्चा इससे परेशान होने लगा तो ऐतराज़ करने लगा कि सर से पांव तक पैजामा चढ़े होने की वजह से खाने-पीने-पहनने-बात करने, हर काम में परेशानी होती है।

मां-बाप बोले कि ये पैजामा नहीं है, ये तुम हो, इसके बिना तुम्हारा कोई मतलब नहीं है, दूसरे बच्चों को देखो-वो भी तो कोई चड़ढी है, कोई पतलून है, कोई शर्ट है, कोई लुंगी है, कोई धोती है, कोई ब्लाउज़ है......

बच्चे ने देखा, चारों तरफ़ आदमक़द चड्ढियां, साड़ियां, धोतियां, ब्लेज़र, ट्राउज़र्स वग़ैरह कांए-कांए करते घूम रहे थे।

बच्चा घबरा गया, या कहने को कह सकते हैं कि प्रभावित हो गया, समझ गया और उसने समर्पण कर दिया।

अब चारों तरफ़ प्रभावित पैजामे हैं, चड्ढियां हैं, बनियाने हैं......

इनमें से किसीको भी नहीं मालूम कि जब ये पैदा हुए थे तब ये सब इंसान थे।

-संजय ग्रोवर
20-12-2015

Monday, 14 December 2015

भगवान के दूत

व्यंग्य

राजधानी का एक संपन्न इलाक़ा जहां कुछ ग़रीबों को भी ‘बिज़नेस’ करने की अनुमति है। बिज़नेस मायने ग़ुब्बारे बेचना, मिट्टी के सस्ते खि़लौने बेचना, भीख मांगना या कुछ ऐसे ही और छोटे-मोटे काम करना।

एक बड़ी और सुंदर गाड़ी। एक हृष्ट-पुष्ट लड़का उतरता है। उसके हाथ में 500-500 रु. के कुछ नोट हैं। उतरकर फ़ुटपाथ पर जाता है जहां एक फ़टेहाल पगली खड़ी आसमान से बातें कर रही है।
‘आप भगवान को मानतीं हैं?’ हृष्ट-पुष्ट लड़का पूछता है।
‘.............’
‘‘मुझे भगवान ने भेजा है, यह लो‘‘, वह 500रु. का एक नोट पगली के हाथ में थमा देता है।
पगली ख़ुशी से नाचने लगती है। उसके कपड़े फ़टे हैं, फ़ुटपाथ पर, और उससे पहले न जाने क्या-क्या सहती आई है मगर नाच रही है। पगली जो है।
हृष्ट-पुष्ट लड़का मन ही मन नाच रहा है। इसने पगली जैसा कुछ नहीं सहा, यूं भी अकसर नाचता ही रहता है। दोनों भगवान को मानते हैं।

यह लड़का एक ग़रीब ग़ुब्बारेवाले के पास पहुंचता है-
‘‘आप भगवान को मानते हैं?’’
‘‘हां, मानता हूं, बहुत मानता हूं।’’
‘‘यह लो 500रु., मुझे भगवान ने भेजा है।’’
ग़ुब्बारेवाला पल-भर सकुचाता है, फिर स्वीकृति के भाव से नोट ग्रहण करता है।

हृष्ट-पुष्ट लड़का इसी तरह कुछ और नोट भगवान को माननेवाले ग़रीबों को बांटता है।

एक फ़टेहाल लड़का अख़बार बेच रहा है।
हृष्ट-लड़का उसके भी पास पहुंच गया है-
‘‘आप भगवान को मानते हैं?’’
अख़बारवाला लड़का उसका मुंह देखने लगता है।
हृष्ट-पुष्ट थोड़ी अड़चन में है। पहली बार उसे अपना सवाल दोहराना पड़ रहा है।
‘‘आप भगवान को मानते हैं ?’’
‘‘.....मानता हूं...तो ?’’
‘‘यह लीजिए, मुझे भगवान ने भेजा है।’’
‘‘ओह! अच्छा! भगवान ने आपको क्यों भेजा!? वह ख़ुद क्यों नहीं आया ?’’
‘‘.............’’
‘‘मुझे भगवान से मिलना है...सुनिए...रुकिए तो सही...मुझे भगवान से मिलना है..’’
‘‘भगवान हर जगह ख़ुद नहीं जा सकते, उन्होंने तुम्हारे लिए मुझे भेजा है।’’
‘‘क्यों, तुम्हारे पास आ सकते हैं तो मेरे पास क्यों नहीं आ सकते?’’
‘‘देखिए आप यह हज़ार रुपए रखिए, मुझे औरों के पास भी जाना है, मैं चलता हूं...’’
‘‘नहीं...मैं आपको ऐसे नहीं जाने दूंगा....यहां राजधानी में ऐसे भी फ्रॉड बहुत होते हैं...आपको सबूत देना होगा कि आपको भगवान ने भेजा है...’’
‘‘..........मगर मैं ऐसा क्यों करुंगा...मैं कुछ दे ही रहा हूं, कुछ ले तो नहीं रहा?’’
‘‘क्या पता तुमने कहीं छुपा कैमरा लगा रखा हो ? बाद में इसे इधर-उधर अपलोड करके हीरो बनते फिरोगे। अपने-आपको श्रेष्ठ साबित करोगे। लड़कियों को इम्प्रैस करोगे। पांच-दस हज़ार रुपए ख़र्च करना तुम जैसों के लिए मामूली बात है......’’
‘‘......................’’
‘‘तुम तो एकदम चुप हो गए?’’
‘‘आप मेरा हाथ छोड़िए....देखिए हम सब एक ही भगवान के बनाए हुए हैं.....उन्होंने मुझे देने के लिए चुना है और तुम्हे लेने के लिए......’’
‘‘पर मुझे तो भगवान बताने आया नहीं कि उसने मुझे पैसे लेने के लिए चुना है !?’’
‘‘...........’’
‘‘तुम जवाब क्यों नहीं दे रहे? ठहरो! तुम्हारी शक़्ल तो उस आदमी से मिलती है जो टीवी पर कह रहा था कि कोई नेता अगर ग़रीब जनता से रुपए या दारु देकर वोट मांगे तो बिलकुल मत देना......कमाल है! अगर तुम वही हो तो ख़ुद कितना गिरा हुआ काम कर रहे हो!?’’
‘‘देखिए......’’
‘‘मुझे भगवान से पूछना है कि इन हज़ार रुपयों से मेरा क्या काम हो सकता है, बाक़ी सारी ज़िंदगी मैं क्या करुंगा? सुनो, तुमने कहा हम दोनों तो एक ही भगवान के बनाए हुए हैं। ऐसा करो, तुम अपना गाड़ी और घर मुझे दे दो, मैं वहां रहूंगा, तुम यहां अख़बार बेचो......’’
‘‘नहीं, मैं अख़बार नहीं बेच सकता, मुझे अपना काम पूरा करना है......’’
‘‘लेकिन मुझसे भगवान ने कहा है कि जो लड़का तुम्हे पांच सौ रुपए देने आएगा उसके गाड़ी और घर तुम ले लेना, और उसे यहां अख़बार बेचने को खड़ा कर देना......’’
‘‘..........’’
‘‘कमाल है! तुम कुछ बोल ही नहीं रहे....मैं तो तुम्हारे भगवान की इच्छा मान रहा हूं, तुम मेरे भगवान की इच्छा क्यों नहीं मान रहे......मैं पुलिस को बुलाऊं क्या?’’
‘‘................................’’

अख़बार वाले लड़के ने हृष्ट-पुष्ट लड़के का हाथ पकड़ा हुआ है और बात-चीत जारी है.......

(मजबूर लोगों में पैसे बांटकर भगवान को सिद्ध करने की चेष्टा करने का एक हास्यास्पद वीडियो देखने के बाद लिखा गया)

-संजय ग्रोवर
23-09-2014

('पागलख़ाना' से साभार)


Sunday, 13 December 2015

महत्वाकांक्षा और आतंक

1-दीवारों के कान महान!

कुछ लोग दूसरों को इतना डराते क्यों हैं !?


ज़रा आप किसी मशहूर(), सफ़ल(), बड़े() आदमी का नाम लेकर कुछ कह दो, लिख दो, ये आपकी जान को पड़ जाते हैं कि ‘तुम्हारी औक़ात क्या है, तुम उसके सामने बेचते क्या हो, तुमने चांद पर पत्थर मार दिया, आसमान पर थूक दिया.....

कोई किसी पढ़े-लिखे आदमी से कुछ कह दे तो भी यही कि अबे! तुम जानते क्या हो, जानते नहीं कितना ज्ञानी आदमी है, यहां भाषण देता है, वहां सेमिनार में जाता है, कितनी नॉलेज है अगले की...

आप किसी लेखक के कहे पर कुछ कह दो, किसी फ़िल्मस्टार की कोई ग़लती बता दो, किसी पुराने-धुराने कवि की धूल झाड़ दो, किसी महापुरुष की महानता को अगरबत्ती की जगह मोमबत्ती दिखा दो, किसी आयकन-फ़ायकन को सर-वर कहकर संबोधित न करो....ये एकदम से सांड की तरह भड़क जाते हैं (सही बात यह है कि सांड को भड़कते तो मैंने कभी देखा ही नहीं, इन्हीं को देखकर अंदाज़ा लगा लेता हूं)। इनमें कुछ बिचौलिए टाइप के लोग होते हैं जो एकदम तड़पने लगते हैं कि तुम अपना नाम करने के लिए ‘बड़े’ नामों का इस्तेमाल करते हो.....

दिलचस्प तथ्य यह है कि यही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्ति की समानता के भी चाचा-मामा बने बैठे रहते हैं। भईया या तो समानता ही ले आओ या फिर चमचई ही निपटा लो.....। समानता बड़ा-छोटा नहीं देखती, इसमें सब इंसानों को एक से अधिकार होते हैं, समानता में बड़ा-छोटा होना भी क्यों चाहिए!? अज्ञात शायर का शे‘र है कि-

इश्क़ में ज़ख़्म सब बराबर हैं,
इसमें छोटा-बड़ा नहीं होता.  

जहां तक मेरी बात है, मैं अमूमन लोगों के नामों के ज़िक़्र से बचता हूं, बहुत ज़रुरी लगने पर ही नाम लेता हूं, मेरा उद्देश्य व्यक्तियों पर कम और प्रवृत्तिओं पर बात करने का ज़्यादा रहता है। दूसरे, मुझे यह भी लगता है कि किसीका नाम लेने से उसे फ़ायदा ही होता है, हमें हो न हो। जब मैं छोटा-बड़ा मानता ही नही तो किसीका नाम लेकर ख़ामख़्वाह उसे ‘बड़े’ होने की ग़लतफ़हमी या ख़ुशफ़हमी क्यों गिफ़्ट करुं ? जो लोग नाम के लिए कुछ भी करते फिरते हैं, उनमें से बहुत-से लोग तो कहीं भी, कैसे भी नाम लिए जाने पर ख़ुश ही होते होंगे ; हम मुफ़्त में उनका नाम क्यों करते फिरें !?

आप अपनी फ़िल्मों, कहानियों, कार्टूनों, अन्य रचनाओं के ज़रिए समाज और व्यक्तिओं पर तरह-तरह की टिप्पणियां करते हैं, बदले में कोई आप पर अपनी राय व्यक्त कर देता है तो उसमें इतना घबराने की क्या बात है !? 

और आप इतना डराते क्यों हैं लोगों को !? कि इस क़िताब में दस ‘बड़ेे’ लोगों ने भूमिका लिखी है इसलिए इसपर किसीको बोलने का हक़ नहीं है। इस फ़िल्म की पहले दिन की कलैक्शन इतने करोड़ है इसलिए सब चुप रहो। यह आदमी कई विदेश-यात्राएं कर चुका है इसलिए चुप! उस आदमी के ढाई करोड़ फ़ैन हैं इसलिए चुप! उस आदमी को पच्चीस पुरस्कार मिल चुके हैं इसलिए चुप! 

चुप! चुप! चुप! चुप रहो बे!

समझ में नहीं आता कि आप लोग लेखक, कलाकार और मशहूर आदमी हैं या डरावने और आतंकवादी टाइप के आदमी हैं !? 

लोगों को इतना डरा-डरा कर नाम करने में और बड़ा बनने में आखि़र अच्छा और बड़ा बचता क्या है !?

-संजय ग्रोवर
13-12-2015


  

दीवारों के कान महान!

कहते हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं।

किसने यह मुहावरा बनाया होगा !?

यही लोग तो संवेदनहीन आदमी की तुलना दीवारों और पत्थरों से करते हैं। दीवार और पत्थर ठोस हैं, ठस हैं, उनमें कहीं नरमी नहीं है। संभवतः इसीलिए अमानवीयता के बारे में बताने के लिए उनका उदाहरण दिया जाता है। 

उनके कान कैसे हो सकते हैं!?

फिर ये कान किसके हैं!?

लगता है यह कहावत उन लोगों ने गढ़ी है जो इमेज में जीते हैं, जो नाम के लिए जीते हैं, मशहूरी के लिए जीते हैं, ‘बड़े’ कहलाने के लिए जीते हैं। वे लोग जानते हैं कि हमेशा एक जैसा रहना मुमक़िन नहीं है; अच्छा और महान दिखना आसान है, होना आसान नहीं है। सच तो यह है कि महानता की कोई स्पष्ट परिभाषा ही नहीं है, पता नहीं कौन-से इंचटेप से लोग इसे नाप लेते हैं ! लेकिन तथाकथित महान लोग शायद जानते हैं कि महानता जो कुछ भी होती हो, चौबीस घंटे संभव ही नहीं है इसलिए महान आदमी की इमेज बनाओ, जब भी हम नॉन-महान यानि गंदी हरक़तें करेंगे, यह इमेज हमारी रक्षा करेगी।

यथार्थवादी व्यक्ति किसी काल्पनिक महानता की चिंता में कैसे जी सकता है !?

इमेज में जीनेवाले को स्वभावतः इमेज टूटने का ख़तरा हर पल सताएगा, क्योंकि उसका सब कुछ इमेज में बंधा है। इमेज गई तो सब गया। नाम बिगड़ जाएगा तो ज़िंदगी बिगड़ जाएगी। ज़ाहिर है कि उसे ऐसे एक-एक आदमी से डर लगेगा जो उसकी इमेज के लिए ख़तरा हो सकता है। ऐसा आदमी हर पल असुरक्षा की भावना में जिएगा। कहीं दूरदराज़ किसी कोने में कोई आदमी कोई ऐसी बात कह रहा है जो उसकी इमेज के लिए, नाम के लिए नुकसानदायक है, असुरक्षा की भावना से ग्रस्त आदमी के कान खड़े हो जाएंगे, उसे डर लगने लगेगा। यह डरा हुआ आदमी हर जगह अपने कान लगाए बैठा रहेगा, यह दीवारों, खिड़कियों और रोशनदानों में लटका रहेगा क्योंकि इसे अपनी नक़ली महानता की रक्षा करनी है। यह तरह-तरह से लोगों को डराएगा, उन्हें डराने के लिए मुहावरे गढ़ेगा, कुछ भी करेगा क्योंकि इसकी सारी महानता लोगों के डर से पैदा हो रही है, इसकी या इसके जैसे लोगों की बनाई मान्यताओं से पैदा हो रही है।

वरना ‘दीवारों के कान’ की अन्य वजह या अन्य अर्थ क्या हो सकते हैं ?

(जारी)

2-महत्वाकांक्षा और आतंक

-संजय ग्रोवर
13-12-2015

  

Friday, 4 December 2015

उस ज़हर का क्या करें.....

ग़ज़ल

इस सदी की आस्था को देखकर मैं डर गया
बच्चे प्यासे मर गए और दूध पी पत्थर गया

माना अमृत हो गया दो दिन समंदर का बदन
उस ज़हर का क्या करें जो आदमी में भर गया

हिंदू भी नाराज़ मुझसे और मुसलमां भी ख़फ़ा
होके इंसा यार मेरे! जीतेजी मैं मर गया

दर्द को इतना जिया कि दर्द मुझसे डर गया
और फिर हंस कर के बोला, यार मैं तो मर गया

-संजय ग्रोवर


Friday, 27 November 2015

अब यह धर्मनिरपेक्षता क्या है ?

पता नहीं शब्दकोषों में धर्मनिरपेक्षता के क्या मायने बताए गए हैं मगर जैसा समाज को, अख़बारों को, पत्रिकाओं को, टीवी चैनलों को देखा है, सुना है और समझा है उससे यही पता लगता है कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब है कि सभी धर्मों और उनके माननेवालों को समान आदर देना, उनमें फ़र्क़ न करना। और एक जो बात समझ में आती है वो यह है कि धर्मनिरपेक्षता को एक बहुत ऊंचे, महान, मानवीय, उदार और संवेदनशील मूल्य की तरह स्थापित किया गया। मगर सोचने की बात यह है कि सभी धर्मों को समान आदर देने की बात तो सभी धर्म भी करते रहे हैं! आपने कभी किसी टीवी चैनल पर या पत्र-पत्रिका में या वास्तविक ज़िंदगी में कोई ऐसा धर्मगुरु, धर्मविवेचक/विश्लेषक या धर्मानुयाई/धर्मावलंबी देखा है जो सार्वजनिक तौर यह न कहता हो कि हम सभी धर्मों का एक जैसा आदर करते हैं। सभी तो यही कहते हैं कि हमारी धार्मिक पुस्तकों में भी यही लिखा है कि सभी धर्मों का समान आदर करो। ऐसे में, इतने सारे धर्मों के होते, अलग से एक धर्मनिरपेक्षता की क्या ज़रुरत पड़ गई!? जबकि बात तो धर्म और धर्मपिरपेक्षता, दोनों ही एक जैसी बोल रहे हैं !

पिछले कई सालों में विपक्ष के एक प्रमुख नेता ने एक और शब्द को मशहूर किया-‘स्यूडो सेकुलरिज़्म’ यानि कि ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’। उनका कहना था कि इसकी जगह ‘पंथनिरपेक्षता’ होना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि इससे कोई बहुत फ़र्क़ पड़ता है। क्योंकि दुनिया-भर के सभी समूह, चाहे वे किन्हीं भी आधारों पर बनें हों, सार्वजनिक रुप से तो बाक़ी सभी समूहों के आदर की या उनसे समानता बरतने की बात करते ही करते हैं। कुछ आतंकवादी या अपराधी गिरोह ज़रुर इसका अपवाद हो सकते हैं। मेरी समझ में सबसे ज़रुरी है व्यक्ति निरपेक्षता। समाज में सभी तरह के व्यक्तियों को अपनी तरह से सोचने, खाने-पीने, लिखने-बोलने की आज़ादी होनी चाहिए जब तक कि वे किसी दूसरे की ज़िंदगी में नाजायज़ और व्यक्तिगत हस्तक्षेप, ऊंगलीबाज़ी, ताका-झांकी, शोषण या उत्पीड़न न कर रहे हों।
फ़ेसबुक के अपने नास्तिकTheAtheist ग्रुप से एक स्टेटस

धर्मनिरपेक्ष शब्द तथाकथित प्रगतिशीलों और वामपंथियों में काफ़ी पसंद और इस्तेमाल किया जाता रहा है। मुझे यह और अजीब लगता है। क्योंकि वामपंथिओं को और उनके द्वारा दूसरों को बताया जाता रहा है कि मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम का नशा कहा है। यानि कि एक ख़तरनाक़ सामाजिक बुराई की तरह चिन्हित किया है। समझा जा सकता है कि मार्क्स ने ऐसा किसी एक धर्म के बारे में तो कहा नहीं होगा। अगर धर्म की तुलना बुराई से की जा रही है तो वहां निरपेक्षता का क्या काम है !? या फिर ऐसी निरपेक्षता हमें सभी बुराईयों के साथ बरतनी चाहिए। फिर एक गुंडई-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक बलात्कार-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक छेड़खानी-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक दंगा-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक लूटपाट-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक चोरी-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक शोषण-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक वर्णव्यवस्था-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक ब्राहमणवाद-निरपेक्षता भी होनी चाहिए.......

लेकिन एक बात स्पष्ट कर देना ज़रुरी है कि मेरे लिए जितनी अजीब धर्मनिरपेक्षता है, उससे कहीं ज़्यादा अजीब धर्म रहा है। अगर आप मेरी या मेरे लिखे की तुलना उन लोगों से करेंगे जो धर्मनिरपेक्षता के पीछे तो पड़े हैं पर धर्म पर कोई बहस नहीं चला रहे, तो यह आपकी समस्या है, आपकी समझ है, आपकी नीयत है। मैंने कई बार लोगों को ऐसे उल्टे-सीधे निष्कर्ष निकालते देखा है। 

ऐसा वे जानबूझकर करते हैं या उनकी बौद्विक क्षमता ही इतनी होती है, यह तो वही जानते होंगे।     

-संजय ग्रोवर
27-11-2015

Thursday, 26 November 2015

भगवानों को भगवानों से बचाएं

लघुव्यंग्य

सुना है जिस दिन भी दो(या तीन-चार-पांच भी हो सकते हैं) भगवान/ख़ुदा/गॉड आपस में लड़ पड़ते हैं, बहुत-से भक्तों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है।

इसलिए कभी भी दो (तथाकथित) ईश्वरों/ख़ुदाओं/गॉडों को आमने-सामने न पड़ने दें वरना वही होने की पूरी संभावना है जो होता आया है-कोई कहा-सुनी, कोई झगड़ा-फ़साद, कोई मार-पीट, कोई लफ़ड़ा-दंगा.....

हालांकि यह बहुत ही मुश्क़िल काम है क्योंकि तथाकथित माननेवालों का कहना है कि तथाकथित ईश्वर/ख़ुदा/गॉड इत्यादि-इत्यादि हर कहीं मौजूद हैं, ज़र्रे-ज़र्रे और आदमी-आदमी तक में मौजूद है....

इंसान बचाए इन माननेवालों से और इनके (तथाकथित) ईश्वरों/ख़ुदाओं/गॉडों से....हमें भी बचाए और इन्हें भी बचाए...

-संजय ग्रोवर
26-11-2015


Saturday, 21 November 2015

लोगों को क्यों समझ में नहीं आया !?

जो होता आया है वही हो रहा है।

आज भी कई लोग कह रहे हैं कि धर्म तो महान है, ग्रंथ तो ग़ज़ब के हैं मगर लोगों ने उन्हें ठीक से समझा नहीं है इसलिए वे हत्याएं कर रहे हैं।


कितना अजीब है कि अभी भी हमें चिंता लोगों, बच्चों या इंसानियत को बचाने की नहीं, धर्म और ग्रंथ को बचाने की लगी है!


अगर धर्म और ग्रंथ को लोगों ने ठीक से समझा नहीं है और वे सदियों से इनके लिए या इनके नाम पर हत्याएं, बलात्कार और लूटपाट करते चले आ रहे हैं तो वह ग़लती भी किसकी है? साफ़ है कि हम अपनी बात ठीक से नहीं कह पाए, हमारी भाषा कुछ गड़बड़ रही होगी, बात ठीक से लोगों तक पहुंची नहीं होगी ? तो हम इतना तो स्वीकार करें कि हम ठीक से लिख नहीं पाए, कह नहीं पाए, इसमें बदलाव होना चाहिए, इसे ठीक करके ऐसी भाषा में लिखा जाए कि लोगों को वही समझ में आए जो आप/हम समझाना चाह रहे हैं।


मगर धर्म आदमी को और कुछ दे न दे, इतना अहंकार ज़रुर दे देता है कि वह इस बात को स्वीकार करने को भी तैयार नहीं होता कि उसके धर्म में कोई कमी हो सकती है।


दूसरी दिलचस्प बात यह है कि हममें से जो लोग हत्या करनेवालों को यह कहकर दोष दे रहे हैं कि उन्होंने धर्म या ग्रंथ को ठीक से समझा नहीं है, उन(हम)में से अधिकांश ‘धर्म को ठीक से समझनेवाले’ क्या करते आए हैं ? लूटपाट और बलात्कार करनेवाले, माल और टैक्स चुरानेवाले, इमारतों और खाद्य-पदार्थों में मिलावट करने वाले, ऊंच-नीच और छोटा-बड़ा बनानेवाले कौन लोग हैं ? वे ज़्यादातर वही लोग हैं जो धर्म को ‘ठीक से समझ’ गए हैं। ‘धर्म को ठीेक से समझनेवाले’ वे लोग भी हैं जिन्होंने जाति, ऊंच-नीच और छुआछूत बनाकर लोगों की अनगिनत पीढ़ियों का जीतेजी मार डाला है। शारीरिक हिंसा से एक व्यक्ति एक बार मरता है, लेकिन इस मानसिक-मनोवैज्ञानिक-मनोविकृत-रणनीतिक हिंसा से लोगों की आनेवाली पीड़ियां भी पैदा होने से पहले मर जातीं हैं।


सवाल धर्म और ग्रंथ को ठीक से समझने का नहीं, अपनी नीयत को ठीक से समझने का है।


-‎संजयग्रोवर‬
18-12-2015
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Sunday, 15 November 2015

सांप्रदायिकता आखि़र है क्या ?

आपको अपने उस धर्म पर गर्व है जिसे चुनने में आपका कोई हाथ नहीं।

आप अपने उस इतिहास पर इतराते फिरते हैं जिसे बनाने में आपका कोई हाथ नहीं। बनाना तो छोड़िए, उसमें कितना सही है कितना ग़लत है, यह भी आप ठीक से पता नहीं लगा सकते।

आपको अपने पुरख़ों पर गर्व है जिन्हें भी आपने नहीं बनाया। न सिर्फ़ गर्व है, बल्कि बिना किसी डी एन ए टैस्ट के गर्व है।

आपको अपने माता-पिता पर गर्व है क्योंकि वे आपके माता-पिता हैं, भले आप यह पता नही लगा सकते कि उनके आपके माता-पिता होने में आपका भी कोई हाथ है या नहीं। 

आपको अपने देश/प्रांत/शहर पर अभिमान है जिनमें आप जब पैदा हुए तो आपको अपनी चड्ढी संभालना भी नहीं आता था, यानि यह सवाल ही नहीं पैदा होता था कि आप अपनी मर्ज़ी से उन्हें चुन सकें। 

यानि कि आपको उन सब चीज़ों/परंपराओं/रिश्तों/मूल्यों पर गर्व है जिन्हें बनाने में आपका रत्ती-भर भी हाथ नहीं है, जिनकी प्रामाणिकता का भी ठीक-ठाक पता नहीं है।

तो फिर आपको उन चीज़ों/मूल्यों/रिश्तों पर तो भयानक गर्व होगा जिन्हें बनाने या चुनने में आपका भी थोड़ा-सा या ज़्यादा-सा हाथ होगा! मसलन आपका स्कूल, आपका कॉलेज, आपका प्रेमी, आपकी प्रेमिका, आपका पति, आपकी पत्नी, आपके बच्चे, आपकी नौकरी, आपका मकान, आपकी दुकान, आपके.......

अभी थोड़ी ही देर बाद आपको उदारता, सहिष्णुता, ख़ुलेपन...आदि-आदि पर भाषण देने जाना है।

पर उस भाषण में आप किसे संबोधित करेंगे !? जितने भी लोग वहां बैठे हैं सबके मां-बाप महान हैं, सबके बच्चे महान हैं, सबके धर्म महान हैं, सबके इतिहास गौरवशाली हैं, सब दुनिया के बैस्ट स्कूल में पढ़े हैं, दुनिया के सबसे अच्छे दोस्त सबको मिले हैं.... और ठीक यही स्थिति आपकी भी है।

अगर सबका सब कुछ महान है तो फिर ख़राब कौन है ? बुरा कौन है ? दुष्ट कौन है ? आप लेक्चर किसको देने जा रहे हैं !? वे सब तो ऑलरेडी महान हैं! और आपका तो कहना ही क्या ?

क्या आपको यह बात कभी भी अजीब नहीं लगी कि दुनिया का हर आदमी, अंधों की तरह, बिना किसी तर्क और प्रमाण के, ख़ुदको और ख़ुदसे जुड़ी हर चीज़ को महान और श्रेष्ठ बताएगा और फिर भी वह दूसरों को नीची नज़र से नहीं देखेगा ?

आप हर किसी पर महानता और पवित्रता की झूठी चाशनी चढ़ाने से भी बाज़ नहीं आएंगे और दुनिया में असमानता, भेदभाव और ऊंच-नीच पर भाषण भी करेंगे !?

छोड़ क्यों नहीं देते इस पोपली पवित्रता और मज़ाक़िया महानता का ढोल पीटना !?

कब तक पैदा करते रहेंगे सीज़ोफ्रीनिक/विभाजित व्यक्तित्वों की पीढ़ियां दर पीढ़ियां !?

सही बात तो यह है कि अपने धर्म, अपने वर्ण, अपनी जाति, अपने इतिहास, अपने पुरख़ों, अपने वंश, अपने स्कूल, कॉलेज, शहर, यूनिवर्सिटी, प्रांत, देश, राष्ट्र, वाद, दल.....आदि-आदि पर अंधों की तरह, बिना किसी वजह, तर्क और प्रमाण के गर्व करनेवाला एक-एक आदमी सांप्रदायिक है। 

फ़र्क़ इतना ही है कि किसकी सांप्रदायिकता किस रुप में प्रकट होती/फूटती है? कौन सामने आकर हिंसा करता है और कौन छुपकर ? कौन अपने नाम से काम करता है और कौन दूसरों के कंधों पर रखकर बंदूक चलाता है ?

कम से कम मैं तो ऐसे लोगों में शामिल नहीं हो सकता।

मेरा न कोई इतिहास है, न वंश-परंपरा है, न ख़ानदान-पानदान है, न कोई जाति है, न धर्म है।

न मुझे किसीपर कोई गर्व है, न इनके न होने की कोई शर्म है।

-संजय ग्रोवर
15-11-2015

Tuesday, 10 November 2015

पक्षधरता और वक़ालत

पक्षधरता‬ कोई बुरी चीज़ नहीं बशर्त्ते कि पक्ष लेनेवाले व्यक्ति में अपनी दृष्टि हो, संवेदना हो, तार्किकता हो। अंधी पक्षधरता अंधी धार्मिकता या सांप्रदायिकता की ही तरह हो जाती है। अंधी पक्षधरता कहती है कि अगर आप किसी वंचित और पिछड़े समुदाय से संबंध रखते हैं तो हर हाल में वंचित और पिछड़े व्यक्ति का समर्थन करें। मगर ‎तार्किकता‬, ‎प्रगतिशीलता‬ और ‎निष्पक्षता‬ आपको जगाती हैं कि वह कथित पिछड़ा व्यक्ति अगर सिर्फ़ देखने में पिछड़ा है, दरअसल सांप्रदायिक है और कथित अगड़े यथास्थितिवादियों के हाथ का खि़लौना है तो उसका समर्थन पिछड़ों के लिए ही सबसे ज़्यादा ख़तरनाक़ साबित हो सकता है। निष्पक्षता और तार्किकता ही आपको चेतातीं हैं कि ‎स्त्री‬ के समर्थन के नाम पर किसी कथित ‎धर्मगुरु‬ का समर्थन कर रही किसी भी स्त्री का समर्थन नहीं किया जा सकता, बहू को जलानेवाली सास का समर्थन नहीं किया जा सकता, स्त्रियों से ज़बरदस्ती धंधा करानेवाली का समर्थन नहीं किया जा सकता।

मगर कथित ‎धर्म‬, ‎जाति‬ और ‪‎गुटपरस्ती‬ की तरह वाद और पक्षधरताएं भी कई सुविधाएं देतीं हैं। आदमी को पता होता है कि अब मैं कुछ भी बोलूंगा, हज़ार, पांच सौ, तीन सौ या डेढ़ सौ आदमी तो मेरी तरफ़ बोलेंगे ही बोलेंगे। बिना सही-ग़लत देखे मेरी तरफ़ से बहस में उतर जाएंगे। मुश्क़िल यह है कि कई कथित वादी या कथित पक्षधर कहने को कथित धर्म के खि़लाफ़ खड़े होते हैं, मगर मानसिकता और आदतें बिलकुल उनकी वैसी ही होतीं हैं। जिस तरह कि कथित धार्मिक आदमी को विश्वास नहीं होता अगर आप कहें कि मैं न तो हिंदू हूं न मुसलमान हूं न ऐसा ही कुछ और हूं। पहले तो उसकी दुनिया इतनी संकीर्ण है, समझ इतनी तंग है कि उसे विश्वास ही नहीं होता कि ऐसा भी हो सकता है। दूसरे, अगर कथित हिंदू, कथित मुसलमान या ऐसा ही कोई और नहीं होगा तो वो लड़ेगा किससे !? उसकी ज़िंदगी का आधा चार्म, आधा ऐडवेंचर तो गया! ज़िंदगी में अच्छाई के नाम पर कईयों ने तो सिर्फ़ यही किया होता है।

ऐसा कथित धार्मिक आदमी, आप हिंदू या मुस्लिम हों कि न हों, पर वह आपको सिद्ध करके छोड़ेगा। इसमें उसकी अपनी सुविधा है। मगर कई वादी या पक्षधर जो हिंदू-मुस्लिम और उनकी कथित बुराईयों से ऊपर उठ गए होने का दावा कर रहे होते हैं, बिलकुल यही करते नज़र आते हैं। पहली आसानी तो बहस में ही हो जाती है कि ‘तुम तो क़ौमनष्ट(कम्युनिस्ट) आदमी हो, तुम्हारा कोई धर्म-ईमान तो है नहीं, तुमसे क्या बात करनीै’ या ‘तुम तो संघी हो, तुम्हारे परदादा के लकड़दादा ने फ़लां आदमी के पक्ष या विपक्ष में गवाही दी थी, तुमसे बात करना ही बेकार है’। संभवतः इसीलिए ऐसे लोग अपने सारे ‎ख़ानदान‬, तमाम पीढ़ियों, पूरे ‎इतिहास‬ को धो-पौंछ-चमकाकर पवित्र-वीर-मानवीय वगैरह सिद्ध करने में लगे रहते हैं। क्योंकि उन्हें मालूम रहता है कि हम जब बहस करेंगे बात तर्क पर कम और ख़ानदान और इतिहास (यानि कि एक अर्थ में व्यक्तिगत) पर ज़्यादा जा ठहरेगी। पक्षधरता में दूसरी बड़ी सुविधा यह है कि वहां ईमानदारी और बेईमानी प्राथमिक मूल्य नहीं रह जाते, वहां इस पार्टी या उस पार्टी को जड़ से उखाड़ देने के ज़ोरदार हल्ले में बाक़ी सब कुछ स्वीकृत और कई दफ़ा तो प्रशंसनीय भी हो जाता है। बाक़ी जो सुविधाएं प्लस पर्कस् प्लस बोनस वगैरह गुटवादियों को मिलते होंगे, उनके बारे में कहना क्या और बताना क्या। अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है।

इस संदर्भ में मेरे अनुभव भी दिलचस्प हैं। जब किसी कट्टर इस्लामपरस्त से बहस हुई तो उसने तर्क से ज़्यादा जान मुझे संघी सिद्ध करने में लगा दी। जब नास्तिकता पर बहस चली तो अकसर मुझे मुस्लिमों और दलितों का अंधा पक्षधर ठहराने की कोशिश की गई। तकरीबन बीस साल पहले जब स्त्रियों के पक्ष में ख़ुलकर लिखा तो अपवाद छोड़ दे तो स्त्रियां पढ़कर या तो डरतीं थी या हंसतीं थीं(पुरुषों की तो बात क्या करें), मेरे घर पर ‪‎टट्टी‬ तक फ़ेंकी गई (मिलती-जुलती हरकतें यदा-कदा आज भी होतीं हैं)। टट्टी भी जिस घर से फेंकी जाती थी उसकी सर्वेसर्वा और सबसे ‘ऐक्टिव’ सदस्य भी एक स्त्री थी। ‘पक्षधरता का सिद्धांत’ कहता है कि मुझे उसी दिन स्त्रियों के विरुद्ध हो जाना चाहिए था। मगर नहीं, उसीके बाद ही, स्त्रियों ने मेरे लिए और मैंने स्त्रियों के लिए काफ़ी कुछ किया। आज स्त्रियों के पक्ष में कुछ हवा बनी है, मगर मुझे कोई बात अजीब लगे तो ‪‎हवा की परवाह किए बिना‬ कहता हूं। कोई चाहे तो ‎स्त्री विरोधी‬ कहे, मैं चिंता नहीं करता।

अगर कोई कहे कि फ़लां आदमी सांप्रदायिक है इसलिए उसे देश का प्रमुख नहीं बनाना चाहिए तो मैं बिलकुल समर्थन करुंगा। मगर वही आदमी कहे कि उसी आदमी को प्रमुख इसनिए नहीं बनाना चाहिए कि वह अंग्रेज़ी नहीं जानता तो मैं विरोध करुंगा क्योंकि अंग्रेज़ी का संवेदनशील, विकासशील, मानवीय या समानता का इच्छुक होने से कोई सीधा संबंध नहीं है।

तार्किकता और निष्पक्षता का इतना फ़ायदा तो मिलता ही है।

बाक़ी फ़ायदे जो भी जानना चाहता है, सचमुच तार्किक और निष्पक्ष होके देख सकता है। जानने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है कि ख़ुद करके देख लिया जाए।

-‎संजयग्रोवर
10-10-2013

(अपनी फ़ेसबुक वॉल से)

पक्षधरता जब वक़ालत जैसी हो जाती है यानि जब आप अपने पक्ष के पक्ष में झूठे गवाह खड़े करने से लेकर धमकियां देने और ब्लैकमेल करने तक तक को सामान्य समझने लगते हैं, तो आप या तो तानाशाह बन चुके होते हैं, या बन रहे होते हैं या पहले से ही होते हैं।
10-11-2015

Friday, 16 October 2015

नास्तिकता और पुरस्कार से याद आया कि......


पिताजी सुबह चार बजे उठ जाते और किसी न किसी काम में लग जाते, कभी दरवाज़ों की चौखटों में तारपीन का तेल लगाते तो कभी बहियां लिखने बैठ जाते। वहां से उठते तो दूध लेने चले जाते और सब्ज़ी भी ले आते। बच्चों की क़िताबे, कपड़े लाने से लेकर लोगों के शादी समारोहों और शवयात्राओं में जाने तक बस वे काम, काम और काम ही करते रहते। न सिगरेट न शराब, न गाली न लड़ाई, न फ़िल्म न कोई और मनोरंजन। रात को भी कई बार ग्यारह-बारह बजे तक काम करते। लोग अकसर उनकी तारीफ़ करते कि कितने भले और नेक आदमी हैं ; कितने दुनियादार और कितने समझदार हैं। हम बच्चे भी बड़े ख़ुश होते और सोचते कि आदमी को ऐसा ही होना चाहिए।

मगर एक हक़ीकत और भी थी। वे दूसरों के इतना ज़्यादा काम आते कि हम चिढ़ जाते। हमें लगता कि लोग उन्हें उल्लू बनाकर अपना काम निकाल लेते हैं। उनकी तमाम दुनियादार कुशलता और सफ़लता के बावज़ूद हमारे काम कहीं न कहीं अटके रहते। हमारी बिजली ख़राब होती तो कई बार एक-एक हफ़्ते तक ख़राब रहती। पिताजी को टाइम न मिलता और पैसे देकर या हाथ-पैर जोड़कर काम कराने के लिए ख़ुदको तैयार न कर पाता। आज तो मुझे इस बात का कोई अफ़सोस नहीं है मगर उस वक़्त अपराधबोध और तनाव से भरा बैठा रहता। हर तरफ़ से डांट पड़ती कि एक दूसरों के लड़के हैं और एक यह है, किस काम का है ? मैं सोचता कि पिताजी की इतनी दुनियादार सफ़लता आखि़र किस काम की है किवे सालों तक अपने घर तक चुंगी के नल की पाइप तक न डलवा सके! 


आज तो मैं जानता हूं कि पिताजी और हमारे जैसे लोगों को हमेशा मर-मर कर ही जीना होता है, कोई मौसम आए, कोई सरकार आए, हमारे जैसे लोगों के लिए कुछ भी नहीं होता। हमें हमेशा धक्के खाने होते हैं और ताने सुनने होते हैं।

बहुत शर्मीला, चुप्पा और डरपोक होने के बावजूद मैं कई बार ख़तरे उठा लेता। एक बार मेरे दो दोस्तों, जो आपस में चचेरे भाई थे, का आर एस एस के एक लड़के से परिचय हो गया। अब वो रोज़ सुबह-सुबह उन्हें बुलाने आ जाता। वे परेशान हो गए और वह उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं था। उन्होंने मुझे बताया। मैंने किसी झोंक में आकर कहा कि मुझे मिलवाओ मैं बात करता हूं। उन्होंने मिलवा दिया। उस वक्त जैसी भी मुझे समझ थी, जितनी भी हिम्मत थी, मैंने उससे बहस की। उसके बाद शायद दो-चार बार और वह उनके पास आया और अंततः उनका छुटकारा उससे हो गया।

अच्छा संयोग था कि पिताजी और माताजी, दोनों की ही पूजापाठ में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हां, त्यौहारों और दूसरे कर्मकांडों में आने-जाने की दुनियादारी दोनों ही पूरी निभाते। मेरी दिलचस्पी उसमें भी बहुत ज़्यादा नहीं थी। पिछले 5-7 सालों से तो मैंने इन सब चीज़ों से पूरी तरह छुटकारा पा लिया है और इस मामले में बहुत सुक़ून से हूं।

राजनीति में मेरी दिलचस्पी कभी नहीं रही, यहां तक कि आम लोग घरों, दुकानों, समारोहों में आपस में जो छोटी-बड़ी राजनीति करते हैं, मुझे उससे भी कोफ़्त होती है। मगर जब इंमरजेंसी हटी और अत्याचारों की कहानियां फैली तो मुझपर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा। मेरा सीधे-सीधे किसीसे कोई लेना-देना नहीं था मगर फिर भी मैंने अपने एक दोस्त की दुकान पर उपलब्ध बड़े-बड़े गत्ते लेकर अपने हाथों से जनता पार्टी के चुनावचिन्ह हलधर के कुछ कटआउट भी बनाए जिन्हें दोस्त की मदद से खंबों पर टंगवाया। इस चक्कर में एक-दो पारंपरिक कांग्रेसियों से छुटपुट झगड़े भी हुए। मैंने अपने दोस्तों के साथ आपस में चंदा भी किया और जनता पार्टी के स्थानीय दफ़तर में देने पहुंच गए। चूंकि मैं झिझकता था सो मैंने एक दोस्त को अंदर भेजा। दोस्त ने वापस आकर बताया कि वे कह रहे हैं कि इन पैसों के बिल्ले ख़रीद कर बांट दो। ज़ाहिर है कि बहुत छोटी राशि रही होगी।
कांग्रेस और जनता पार्टी के उस पूरे चुनावकाल के दौरान और उसके बाद भी मैं काफ़ी उद्वेलित रहा। फिर जनता पार्टी की सरकार भी बन गई। और प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में उसमें आए दिन झगड़े होने लगे। साल-दो साल में सरकार लुढ़क गई। उसके बाद राजनीति में मेरी जो रुचि ख़त्म हुई, आज तक नहीं बन पाई।   

इन्हीं किन्हीं दिनों के बीच, उन्हीं में से एक दोस्त शाखा में जाने लगा। सुबह कभी-कभी मैं भी घूमने जाता था, तो एक बार दोस्तों ने दूर से शाखा दिखाई थी कि देख, वह है शाखा जहां हमारा दोस्त जाता है। फिर एक दिन पता चला कि शाखा में किसी खेल के दौरान हुई छोटी-सी ग़लती की सज़ा के तौर पर उस दोस्त को दूसरे कई लड़कों से थप्पड़ पड़वाए गए और वह घंटो रोता रहा। बहुत दुख हुआ मगर करते क्या, हमारी हैसियत भी क्या थी!

शाखा से पहले हमने जिन लोगों का दबदबा देखा था, जिनके मारे हमारी जान निकली रहती थी, अकसर कांग्रेसी होते थे। उस वक़्त तो मैं जाति-वर्ण नहीं जानता था, पर आज जितना जानता हूं, उनमें दबंग कर्मकांडी ब्राहमण भी होते थे। इमर्जेंसी के बाद भी कांग्रेस कई साल वहां कथित उच्चवर्णीय आतंक की तरह स्थापित रही। 

ख़ैर! जिंदगी में वही एक-दो बार थी जब दूर से शाखा देखी थी। एक-दो बार संभवतः कोई कांग्रेस की एक-दो रुपए की रसीद काट गया। जब अख़बार में छपने लगा तो तरह-तरह की संस्थाओं की चिट्ठियां आ जातीं थीं। उनमें से किसीसे छोटा तो किसीसे लंबा पत्र-व्यवहार हो जाता। कई लोग लेख छापते तो पैसे के बदले प्रेसकार्ड बनाकर भेज देते जो कि कभी इस्तेमाल न होते। एक दो-बार दिल्ली में किन्हीं छोटे-मोटे कामों (जैसे कोई सर्टीफ़िकेट आदि बनवाना) से किसी तीसरे के साथ एक-दो छोटे-बड़े नेताओं के पास गया। एक बार किसीने शादी-वादी के चक्कर में किसी बिरादरी के किसी रजिस्टर में नाम लिखवा दिया। यानि सारी ज़िंदगी में दल, जाति, संस्था, वर्ण, बिरादरी, राजनीति वगैरह से कुल इतना ही संबंध रहा।

लिखने को चुना तो पाया कि छपने की दुनिया में भी पूरी तरह से वही सब गंदगी भरी है जिसे छोड़कर लिखना चुना है। बहरहाल, फिर भी, दिल्ली आने से पहले अच्छा-ख़ासा छप चुका था। दिल्ली आकर यथास्थिति को और क़रीब से देखा। धीरे-धीरे समझ में आया कि विचारधाराओं के फ़र्क़ कहने के लिए हैं, 'काम करने' के अंदाज़ सबके एक जैसे हैं। एक दिन किसीने बताया कि एक जगह कविसम्मेलन है, हज़ार रु का चैक़ मिलेगा लेकिन पहले पांच सौ रु. कैश देना होगा, चलोगे क्या? मैंने कहा चला तो जाऊंगा मगर बाक़ी पांच सौ रु भी वहीं घोषणा करके दान कर दूंगा। 

हालांकि वे सज्जन विश्वसनीय थे पर पता नहीं किस तरह, बात शायद वहां पहुंच गई और उसके बाद मेरे पास वह ‘ऐक्सचेंज ऑफ़र’ नहीं आया।
उसके बाद से आज तक मिले-जुले तमाशे आए दिन देखने को मिलते रहते हैं।


-संजय ग्रोवर
16-10-2015
(जारी)

Thursday, 24 September 2015

भगवान करे!

व्यंग्य/कविता



भगवान करे कि आपको बीमारी न हो
अगर हो जाए तो भगवान करे कि ठीक हो जाए

भगवान करे कि आपके घर में आटा आ जाए
भगवान करे कि आपके घर में घी आ जाए
भगवान करे कि उसका परांठा बन जाए

भगवान करे कि आपको खाना हज़म हो जाए
अगर न हो तो भगवान करे कि आपको क़ब्ज़ न हो 
अगर हो जाए तो भगवान करे कि खुल जाए

भगवान करे कि आज कहीं लूटमार न हो
भगवान करे कि आज कहीं भ्रष्टाचार न हो
भगवान करे कि आज कहीं बलात्कार न हो

क्योंकि भगवान ही तो सब कुछ करता है
हे भगवान फिर हम किसलिए हैं
भगवान करे हम हुआ ही न करें

और जब हम ही न हों तो कौन बीमार होगा और कौन ठीक होगा
किसको ठीक करेगा भगवान किसकी ज़िंदगी से खेलेगा भगवान

फिर भगवान भी क्यों हुआ करे ?

भगवान दरअस्ल है भी कहां ?

मैं भी तो भगवान से ज़रा-सा टाइमपास कर रहा था

-संजय ग्रोवर
25-09-2015



Sunday, 20 September 2015

फ़ोटोकॉपियों का ‘वैचारिक’ द्वंद :-)


अगर कोई सेठ किसी मजदूर से कहे कि भईया ज़रा एक दीवार खड़ी कर दो मैं तुम्हे इतनी मज़दूरी दूंगा और मजदूर थोड़ी देर हवा में खुरपी चलाए, सर पर नक़ली तसला रखे, थोड़ी देर दीवार बनाने का अभिनय करे फिर कहे कि लो बन गई दीवार, अब दो मेरे पैसे! तो सेठ दे देगा क्या ?

लेकिन मज़ेदार बात यह है कि धर्म और कर्मकांड के नाम पर यही बचकाना अभिनय घर-घर में चलता है। कोई किसी एक दिन किसीको एक धागा बांध देता है और सोचता है कि हो गई उसकी रक्षा। अब यह बहिन बाज़ार में छेड़ी जाए कि ससुराल में पीटी जाए, भाई ख़बर लेने भी न जाए, पर यह काल्पनिक रक्षा हवा में चलती रहती है। कई लोग साल में एक दिन कहीं कुछ दिया-बत्ती जला देते हैं और सोचते हैं कि फ़ैल गया ज्ञान का प्रकाश। कोई किसी दिन एक डंडे में झंडा लटका लेता है और सारे घिनौने काम बेफ़िक्री से जारी रखता है और वो राष्ट्रप्रेमी कहलाता है।

मज़े की बात यह है कि इन बचकाने लोगों का ‘आत्मविश्वास’ इतने ग़ज़ब का होता है कि जो लोग ये बचकानी हरक़तें न करतें हों, उन्हें ये ‘सुधारना’ चाहते हैं, ‘ऐक्सपोज़’ करना चाहते हैं। क्या ग़ज़ब है !? और इनमें सभी तरह की विचारधाराओं, धर्मों, लिंगों, पेशों के लोग होते हैं।

ये मज़ेदार लोग प्रगतिशीलता की चिंघाड़ लगाते-लगाते एक ऐसे आदमी के पीछे खड़े हो जाते हैं जो बड़े-बड़े पाखंडियों से भी ज़्यादा ऊंची आवाज़ में भगवान-भगवान, चमत्कार-चमत्कार चिल्ला रहा होता है। जिसके ऑडियो-वीडियो सारी दुनिया के देशों और चैनलों में/पर मौजूद होते हैं फिर भी इन्हें यह ख़ुशफ़हमी होती है कि ये ऐक्सपोज़ नहीं हुए, कोई दूसरा ऐक्सपोज़ हो गया है!! ये चाहते हैं कि इन्हें सिर्फ़ इसलिए प्रगतिशील मान लिया जाए कि इन्हींके ‘दर्शन’ और ‘थ्येरी’ से बनी किसी कट्टरपंथी राजनीतिक या सामाजिक संस्था को ये नियमित अंतराल के बाद ग़ालियां बकते रहने का कर्मकांड करते हैं। ये ख़ुद कबीरदास की लाश में से फूल निकाल लेते हैं और दूसरों को मूर्ति को दूध पिलाने पर डांटते हैं।

ऐसे आत्ममुग्ध और बेहोश लोगों को कोई सुधार सकता है क्या ? इन्हें तो होश में लाना भी मुश्क़िल है।

ऐसे, तथाकथित ‘परस्पर-विरोधी’, लोग एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं, एक ही पायजामे के दो पायचे होते हैं, एक ही कट्टरता के दो चेहरे होते हैं।

इनके कर्मकांडो से कुछ नहीं बदलता, अकसर ये किसी दूसरे के किए का मज़ा ले रहे होते हैं।

-संजयग्रोवर
20-09-2015

Tuesday, 15 September 2015

कौन मरा ?


मशहूर डायलॉग है-

जो डर गया समझो मर गया।

भारत में यह डायलॉग बहुत कामयाब हुआ, घर-घर में बच्चे इसे बोलते दिखाई दिये।

यह बात अलग है कि यहां बच्चा पैदा होते ही उसके साथ किए जानेवाले कुछ शुरुआती कामों में से एक ज़रुरी काम यह होता है कि बच्चे को कई चीज़ों से डराया जाता है, सबसे ज़्यादा भगवान से डराया जाता है।

ऐसे डरे हुए बच्चे जीते होंगे या डरते होंगे या कि बस .......

और आप ही तो गली-गली कहते फिरते हैं-

जो डर गया समझो मर गया।

-संजय ग्रोवर
15-09-2015

Labels : Moving Dead Bodies , Child-Victimization , Terror Of God , Forced Virtue , Dead-Live

Monday, 31 August 2015

भगवान है तो उसके पास जाते क्यों नहीं !?

व्यंग्य

मेरे लिए यह मानना मुश्क़िल है कि लोग भगवान और स्वर्ग इत्यादि में विश्वास करते हैं। 

लगभग हर तथाकथित धार्मिक आदमी कहता है कि आखि़रकार तो हमें भगवान के पास जाना है। हर कोई बताता है कि स्वर्ग में बढ़िया शराब है, जिसे सुंदर महिलाएं सर्व करतीं हैं। वहां कोई जादुई पेड़ है जो इच्छाएं पूरी करता है। वहां रहने का कोई किराया नहीं लगता, मकान या प्लॉट नहीं ख़रीदना पड़ता, वहां जाने तक के सफ़र में भी कोई पैसे नहीं लगते। इसके अलावा मैं देखता हूं, आप भी देखते होंगे कि तथाकथित धार्मिक आदमी जो भी करता है, स्वर्ग और भगवान को ध्यान में रखकर करता है।

लेकिन मुझे एक बात क़तई समझ में नहीं आती, जो आपकी निगाह में दुनिया की सबसे सुंदर जगह है, जहां जाने के लिए ही आप सब कुछ कर रहे हैं, वहां जाने की जल्दी किसीको भी नहीं है!? क्यों !? इतनी अच्छी जगह को छोड़कर आप इस सड़ी-गली-पापी दुनिया में क्यों रह रहे हैं !? क्या मजबूरी है !? भगवान के पास जाना तो बहुत ही आसान है। कोई किराया भी नहीं लगता। थोड़ी-सी नींद की गोलियां, एक रस्सी का फंदा, एक माचिस की तीली, एक ऊंची छत......ऐसा कोई एक विकल्प चाहिए बस। और तो कुछ करना नहीं है।

स्वर्ग से अच्छी कॉलोनी कहां मिलेगी ?भगवान जैसा सर्वगुणसंपन्न, सर्वशक्तिमान पड़ोसी भी कहां मिलेगा ? मगर किसीको जल्दी नहीं है !? आदमी को जनता फ्लैट छोड़कर एल आई जी लेने का मन आ जाए, तब तो वह उधार ले-लेकर भी वहां पहुंच जाता है। मगर जो फ़ाइनल डेस्टीनेशन है, वहां पहुंचने की कोई जल्दी नहीं !? अस्सी-अस्सी साल तक यहीं पड़े हैं !! दवाईयां खा-खाके खाट से चिपटे हैं !! टट्टी-पेशाब भी बिस्तर में ही किए जा रहे हैं। दूसरे साफ़ कर रहे हैं। इंजेक्शन और ड्रिप घुसा-घुसाके किसी तरह ज़िंदा हैं। मगर दुनिया छोड़ने को राजी नहीं है !! अरे भई, जाओ अपनी पसंदीदा जगह, जल्दी से जल्दी जाओ। कौन रोक रहा है ? कोई रोके तो शिकायत करो। तमाम एन जी ओ हैं, समाजसेवी संस्थाएं हैं, दानी सज्जन हैं.....सब आपकी मदद करेंगे। वे भी तो वहीं जाना चाहते हैं। सब पीछे-पीछे आएंगे। आप शुरुआत तो करो अच्छे काम की।

क्यों दोस्तों की, परिचितों की, रिश्तेदारों की चिंता करते हो ? एक बार ख़ुद पहुंच जाओ, फिर उन्हें भी बुला लेना। इतनी अच्छी जगह हर किसीको जाना चाहिए, जल्दी से जल्दी जाना चाहिए। 

मगर ये तथाकथित धार्मिक लोग ख़ुद तो जाते नहीं, दूसरों को भेजना चाहते हैं। वो भी उनको जो भगवान-स्वर्ग-नरक को मानते ही नहीं। अरे भाई अगर तुम्हे वाक़ई भगवान और स्वर्ग में विश्वास है तो पहले ख़ुद जाना चाहिए। तभी तो लोगों को विश्वास आएगा। तब वे ख़ुद ही पीछे-पीछे आएंगे।

जिस दिन मैं तथाकथित धार्मिक लोगों को किरोसिन तेल, नींद की गोलियों, रस्सी के फंदे, चाकू या ब्लेड वगैरह के साथ एडवांस में डैथ सर्टीफिकेट के लिए एप्लाई करते देखूंगा, मुझे भी थोड़ा-थोड़ा विश्वास आएगा कि वाक़ई तथाकथित धार्मिक लोग स्वर्ग और भगवान इत्यादि में विश्वास करते हैं।

-संजय ग्रोवर
01-09-2015


Thursday, 20 August 2015

मां-बाप और पूजा

कभी कहीं कह दो कि पूजा ख़तरनाक़ है चाहे पत्थर की हो, चाहे गुरु की हो, चाहे मां-बाप की हो तो ज़ाहिर है कि कई तरह के लोगों को, कई तरह के आदियों-वादियों को बुरा लगता होगा। लेकिन यह भी तो समझना चाहिए कि पूजा आखि़र है क्या ? पूजा किसीको ख़ुश करने का सबसे आसान तरीक़ा है। पूजा एकतरफ़ा बातचीत है। मज़े की बात तो यह है कि जिसकी पूजा की जाती है उसकी तो स्वीकृति/अस्वीकृति भी नहीं पूछी जाती। पूजा एकतरफ़ा बातचीत है। जिसका आदर करने का दावा किया जा रहा है उसकी पसंद/नापसंद की भी चिंता नहीं की जाती। पूजा एक असमानता का संबंध है। कुछ कर्मकांड हैं जिन्हें करने में किसी तरह का कोई सामाजिक ख़तरा नहीं है। बल्कि मु्फ्त की तारीफ़ ज़रुर मिलती है।

और पूजा से मां-बाप की ज़रुरतें पूरी हो जाएंगी क्या !? करके देखना चाहिए। सुबह चार बजे उठकर मां-बाप की आरती वगैरह उतारें और दिन-भर उन्हें पूछें नहीं, न खाने को दें न पीने को, न बात करें, न पास बैठें। यही तो पूजा है। इससे मां-बाप का काम चल जाएगा क्या ?

आप पूरे देश में पूछते घूमिए, दस-पचास लोग भी मिल जाएं जो कहते हों कि मां-बाप की बात नहीं माननी चाहिए, मां-बाप महान नहीं होते, मां-बाप को घर से निकाल देना चाहिए........ऐसा कहता है क्या कोई ? उसके बाद सुबह-शाम आप ज़रा पार्कों में चले जाईए, वृद्धाश्रमों में चले जाईए-वहां बूढ़े-बूढ़ियां बैठे अपने बहू-बेटों को रो रहे होते हैं। ये कौन लोग हैं ? ये क्या स्विटज़रलैंड से आए हैं !? या फ्रांस ने हमारी संस्कृति को बदनाम करने को भेज दिए हैं !? भारत में तो कोई मां-बाप का अनादर करता नहीं। फिर ये बूढ़े-बूढ़ियां कहां से टपकते चले जाते हैं ? सही बात यह है कि हम लोग झूठा सम्मान करने में अति-ऐक्सपर्ट लोग हैं।

एक बात और समझ से बाहर है। एकाएक, बैठे-बिठाए किसी दिन आप मां-बाप बनते हैं और महान हो जाते हैं!! कैसे!? दुनिया-भर में गुंडे हैं, बदमाश हैं, स्मगलर हैं, दंगाई हैं, बलात्कारी हैं, आतंकवादी हैं और पता नहीं क्या-क्या हैं.........उनमें से भी ज़्यादातर लोग किसी न किसीके मां-बाप हैं। वे क्यों महान नहीं हैं ? अगर महानता की यही कसौटी है तो उनका भी आदर कीजिए। उन्हें तो आप ग़ालियां भी दे देते हैं!! वे तथाकथित ऊंची जातियां जिन्होंने किन्ही तथाकथित नीची जातियों को ग़ुलाम बनाया, वे भी तो किसीके मां-बाप हैं। वे महान क्यों नहीं हैं ? ये क्या कसौटी हुई कि सिर्फ़ आपके ही मां-बाप महान हैं !? समझ में नहीं आता कि आदमी में ऐसी कौन-सी प्रोग्रामिंग हो रखी है कि इधर उसका बच्चा पैदा होना शुरु होगा और उधर मम्मी-पापा महान होना शुरु हो जाएंगे !?

और हैरानी होती है कि ऐसी अतार्किक बातें वे लोग भी करते हैं जो अपना या अपने समाज का जीवन बदलने के लिए कुछ भी बदलने को तैयार हैं मगर मां-बाप की बात आते ही फिर परंपरा को पकड़कर लटक जाते हैं ? अगर तुम्हे परंपरा में इतनी दिलचस्पी है तो परंपरानुसार ग़ुलामों की तरह रहो फिर। यहां तो सब परंपराएं ग़ुलामी की ही परंपराएं हैं।

तो मैं यह कह रहा था कि पूजा में विचार का, बुद्धि का, सवाल उठाने का कोई स्थान नहीं है। पूजा न करने का यह मतलब नहीं है कि मां-बाप से बदतमीज़ी करें, उन्हें परेशान करें, उनका तिरस्कार करें, उन्हें खाने-पीने को न दें। वैसे यह सब तो पूजा के साथ-साथ भी किया जा सकता है। होता भी होगा। पूजा न करने का मतलब है बराबरी के स्तर पर बातचीत। न कोई छोटा है न बड़ा। न कोई ऊंचा है न नीचा। ऐसे संबंध में बात का और तर्क का महत्व है, व्यक्ति की हैसियत या उम्र का नहीं। जिसकी भी बात जायज़ है, मान ली जाएगी।

वरना तो पूजा करने वाले यही करेंगे कि बाप कहेगा कि जाओ बेटा मां का सर काट लाओ, और ये चल पड़ेंगे सर काटने। लो श्रद्धेय पिताजी, श्रद्धेय माताजी का सर हाज़िर है।

और बाद में सर काटने वालों की भी पूजा होगी।


-संजय ग्रोवर
20-08-2015



Monday, 17 August 2015

स्त्री के कपड़े और धर्म के लफड़े

कोई राधे मां हैं जिनके स्कर्ट पहनने पर कई दिनों से चर्चा है। सोनू निगम को तो आजकल बहुत लोग जानते हैं। उन्होंने ट्वीट किए बताते हैं कि काली मां तो इससे भी कम कपड़े पहनतीं थीं और स्त्रियों पर कपड़ों के लिए मुकदमे करना अच्छी बात नहीं है। सोनू निगम से बहुत-से लोग सहमत होंगे, इतना परिवर्तन तो आया ही है कि लोग समझ रहे हैं कि दूसरे के शरीर के लिए कपड़े आप तय नहीं कर सकते, जिसका शरीर है, जिसके कपड़े हैं, जिसका पैसा है, वही अपने लिए उसका उपयोग भी तय करेगा।

लेकिन दो-तीन बातें समझ में ज़रा कम आ रही हैं। पहली बात है कि हम हर बात के लिए अतीत से उदाहरण क्यों लेते हैं !? अगर काली मां (?) न हुई हों, उन्होंने ऐसे कपड़े न पहने हों तो ? यह कहीं न कहीं, अपने दम पर बात न कह पाने को, परंपरा की ग़ुलामी को और आत्मविश्वास की कमी को ही दर्शाता है।

दूसरी बात यह है कि काली मां का उदाहरण देने का एक अर्थ यह भी निकलता है कि हम परिवर्तनों या स्त्री-मुक्ति को धर्म के दायरे से बाहर नहीं जाने देना चाहते और यही सबसे ख़तरनाक़ है। धर्म के नाम पर थोड़ा-सा फ़ायदा, बाद में बहुत-सी तक़लीफ़ें भी खड़ी कर सकता है।

तीसरी बात, यह कहना कि पुरुष भी कम कपड़े पहनता है, इसलिए स्त्रियां भी कम पहनें तो दिक़्क़त क्या है ? हमें ऐसे तर्कों से थोड़ा आगे जाना चाहिए। जिन घरों में पुरुष ऐसे कपड़े नहीं पहनता, ढंका-मुंदा रहता है, उन घरों की स्त्रियों के लिए दिक़्क़त खड़ी हो जाएगी। उन्हें मन मारके ढंका-मुंदा रहना पड़ेगा।

यहां यह भी प्रासंगिक है कि सोनू निगम का कैरियर ‘माता की चौकियों-जागरनों’ से शुरु हुआ बताते हैं, संभवतः वे अभी भी धार्मिक हैं और इसीलिए काली मां के उदाहरण तक ही जाते हैं।

राधे मां दहेज़-उत्पीड़न के किसी केस से भी जुड़ी बताई जा रहीं हैं। समझने की बात यह है कि धार्मिक लोग अकसर दहेज़ को बुराई की तरह नहीं देखते। भारत का आमजन भी दहेज़ और घरेलू हिंसा की बात पर बेचैनी से पहलू बदलने लगता है।

हममें से कई लोग इसके कारण जानते हैं।

-संजय ग्रोवर
17-08-2015

Saturday, 15 August 2015

भगवान के होते देश आज़ाद कैसे !?

व्यंग्य

हैरानी होती है कि भगवान को माननेवाले बहुत सारे लोग भी आज़ादी का दिन मनाते हैं!!

उनको भी लगता होगा कि देश कभी ग़ुलाम था। उनके भगवान के होते हुए भी देश ग़ुलाम था। जैसा कि धार्मिक लोग बार-बार घोषणा करते हैं कि भगवान की मर्ज़ी के बिना पट्ठा भी नहीं हिलता ; तो ज़ाहिर है कि भगवान की मर्ज़ी से ही देश ग़ुलाम हुआ होगा।


मगर मैंने कहीं नहीं पढ़ा कि भक्त लोग देश को आज़ाद कराने के लिए भगवान के पास गए। लेकिन अंग्रेज़ो से वे, जैसा कि इतिहास में लिखा बताते हैं, बहुत लड़े, लड़ते ही रहे। इससे कभी-कभी यह लगता है कि या तो वे अंग्रेजों को ही भगवान मानते थे या उन्हें भगवान से बड़ा मानते थे। वरना अंग्रेजो से लड़ने की क्या तुक थी ? जिस दर्ज़ी ने आपका पाजामा ख़राब सिल दिया हो आप लड़ने को सीधे उसके पास न जाकर उसके किसी कारीगर के पास पहुंच जाएं तो आप ख़ुद ही, ख़ुदको अजीब लगने लगेंगे। लेकिन भगवान के मामले में हम सारी हरक़तें अजीब-अजीब-सी करते हैं।


जब भगवान ने देश को ग़ुलाम बनाया या बनवाया तो कुछ सोचकर ही ऐसा किया होगा ! मगर भक्त लोग अजीब हैं, निकल पड़े देश को आज़ाद कराने। ये लोग दूसरों को हमेशा समझाते हैं कि भगवान की मर्ज़ी के खि़लाफ़ कुछ नहीं करना चाहिए मगर ख़ुद सारे काम उसकी मर्ज़ी के खि़लाफ़ करते हैं। 

भगवान कौन-सा कम है !? चलो, ग़ुलाम बनाया तो बनाया, जब लोगों को आदत पड़ ही गई थी, उन्हें मज़ा आने लगा ग़ुलामी में तो उसे आज़ादी सूझने लगी। तब उसने पत्ता हिलाया और आज़ादी की जंग छिड़वा दी ! पट्ठे भी तो भगवान के अपने ही हैं, जब चाहे हिला सकता है।


अब मुझे यह लगता है कि भगवान ने आदमी को मज़े लेने के लिए, अपना टाइम पास करने के लिए बनाया है तो क्या ग़लत लगता है ? 

मैं छोटा ही था और छत पर धूप सेंक रहा था कि पड़ोस की छत पर नज़र चली गई। वहां एक बिल्ली, चूहे से खेल रही थी। बार-बार उसे छोड़ देती। चूहा किसी सुरक्षित जगह की तलाश में भागता और जैसे ही वह उस जगह में प्रवेश करने को होता, ऐन उसी जगह जाकर वह उसे फिर दबोच लेती । चूहे का जो हुआ होगा सो हुआ होगा, मैं बुरी तरह घबरा गया। लेकिन धार्मिक दृष्टि से देखें तो बिल्ली चूहे के साथ इस बेदर्दी से खेल रही थी तो भगवान की मर्ज़ी से खेल रही थी। भगवान ख़ुद ही आदमी के साथ यही खेल कर रहा है। ख़ुद ही ग़ुलाम बनाता है, ख़ुद ही आज़ाद करा देता है। 


अब तो देश में मनोचिकित्सक भी भगवान की कृपा से अच्छी-ख़ासी मात्रा में हो गए हैं ; अपने ही बनाए मनोचिकित्सकों से कंसल्ट करने में दिक़्क़त क्या है !? या हो सकता है कि भगवान जानता ही हो कि मेरे बनाए लोग मुझसे अलग कैसे हो सकते हैं, इसलिए डरता हो !! 

लोग अभी भी आज़ादी की वार्षिक गांठे मनाते हैं!! बताओ, एक तो भगवान की मर्ज़ी के खि़लाफ़ आपने देश को आज़ाद कराया, अब त्यौहार भी मना रहे हो!! भगवान को चिढ़ा रहे हो क्या !?


न न, मैं भगवान को नहीं चिढ़ा रहा। मैं भगवान को मानता ही नहीं।


आपको ज़रुर मानता हूं।

-संजय ग्रोवर
15-08-2015


Thursday, 13 August 2015

रख़ैल और पुरुष

रख़ैल नामक शब्द से यूं तो सिर्फ़ स्त्री को ही ‘सम्मानित’ किया गया है, जिसका अर्थ मोटे तौर पर यह है कि जो स्त्री पैसे या अन्य ज़रुरतों के लिए शादी के बंधन के बिना ही ज़ाहिरा तौर पर या छुपे तौर पर ख़ुदको किसी पुरुष के हाथ सौंप देतीं है-या तो जीवन-भर के लिए या पुरुष का मन भर जाने तक। यहां एक सवाल यह भी है कि क्या शादी कर लेने भर से स्त्री की स्थिति भिन्न हो जाती है ?

असली सवाल यह भी है कि शारीरिक या भौतिक अर्थों में रखैल होना ज़्यादा बुरी स्थिति है या मानसिक या वैचारिक रुप से !? शारीरिक रुप से आप फिर भी मुक्त हो सकते हैं मगर आप एक बार मानसिक ग़ुलाम हो गए तो शारीरिक रुप से आप मुक्त दिखाई भी दें मगर मानसिक ग़ुलामी, धरती के किसी भी कोने पर आप चले जाएं, आसानी से आपका पीछा नहीं छोड़ेगी। 

मेरी समझ में जिन पुरुषों के अपने कोई विचार नहीं, जो दूसरों का कहा करते रहे, जो दूसरों की तरह जीते रहे, जिन्होंने अपना दिमाग़ किसी मूरत, किसी क़िताब, किसी गुरु, किसी कथित धर्म, किसी कथित जाति, किसी कथित दर्शन, किसी कथित वाद के पास गिरवी रख दिया है, जिनकी पूरी जीवन शैली, पूरी जीवन दृष्टि में अपना कुछ भी नहीं है, उन्हें स्त्री को रखैल कहने से पहले एक बार अपने बारे में भी सोचना चाहिए।

-संजय ग्रोवर
06-09-2014

Wednesday, 12 August 2015

तस्वीरों का मलबा, अंत में पूड़ी-हलवा

07-08-2015

स्पेन में एक खेल चलता रहा है-बुलफ़ाइट। जिसमें हज़ारों-लाखों दर्शकों के सामने एक सांड और एक आदमी की लड़ाई दिखाई जाती थी/है। इस ख़तरनाक़ खेल में सांड और आदमी दोनों बिलकुल असली होते थे/ हैं और इनमें से किसीकी भी जान जा सकती थी/है। मनोरंजन और कमाई के अलावा इस खेल की कोई तीसरी वजह समझ में नहीं आती। समझने को कोई इसे उत्सव समझ सकता है, आंदोलन समझ सकता है, तरह-तरह से महिमा-मंडित कर सकता है ; अपने-अपने शौक़ हैं, अपनी-अपनी समझ है, जीवन में ‘कुछ करने’ के अपने-अपने मतलब हैं। यहां भी, पढ़ा है कि (समर्थ !) लोग-बाग़ तीतर वग़ैरह लड़ाकर अपना टाइम पास करते रहे हैं। 

क्या इसे हम ‘कुछ करना’ कह सकते हैं ? मेहनत तो इन कामों में भी लगती ही है, कई बार जान का ख़तरा भी रहता है। क्या सिर्फ़ इन्हीं कारणों से इन गतिविधियों को महानताओं में शुमार कर लेना चाहिए !? कई लोग होते हैं जिन्हें शादियों में सबसे आगे, घुस-घुसकर फ़ोटो खिंचाने का शौक़ होता है। इसके लिए भी मेहनत तो लगती है। थोड़ा धक्का मारना पड़ता है, थोड़ा ‘ऐक्सक्यूज़ मी‘ वग़ैरह सीखना-बोलना पड़ता है, थोड़ा ‘जीजाजी’, ‘भाभीजी’ करना पड़ता है, ऐन फ़्लैश चमकने या कैमरा चालू होने के साथ ही एक ख़ास तरह की मुद्रा चेहरे पर सजा लेनी होती है। मगर जिसको यह शौक़ है, इतना तो उसे करना ही पड़ेगा।

इसी तरह देखने में आता है कि कुछ लोग आंदोलनों के बड़े शौक़ीन होते हैं। जब देखो आंदोलित-आंदोलित से रहते हैं। वे हरदम कुछ क्रांति टाइप करना चाहते हैं-इस क्रांति टाइप में भाषण देने, एनजीओ बनाने, फ़ोटो-वीडियो खिंचाने-बनाने, अख़बार-टीवी में आने से लेकर पूड़ी-हलवा खाने तक कई ख़तरनाक़ बाधाएं पार करनी पड़तीं हैं। लोग एक-दूसरे को माला वग़ैरह पहनाते हैं, बधाई देते हैं, शाबासी देते हैं, तालियां मारते हैं, चाय नाश्ता होता है। इसके बाद सबको लगता है कि मैंने कुछ किया, मैंने भी कुछ किया, मैंने तो काफ़ी कुछ किया और फ़िर हम सबने मिलकर बहुत कुछ किया। इन सबको लगता है कि इसीसे सब हो रहा है और बदल रहा है। सच अकसर यह होता है कि इस तरह के जमावड़ों में लोगों को व्यक्तिगत फ़ायदे ज़रुर होते हैं, प्रसिद्धि मिलती है, जान-पहचान बढ़ती है और आगे कुछ और कार्यक्रमों में आने का निमंत्रण या निमंत्रण की उम्मीद मिलती है। भारत में लोग इस जान-पहचान का उपयोग अकसर व्यक्तिगत फ़ायदों और कामों के लिए करते हैं, मगर उन्हें यह ग़लतफ़हमी भी रहती है कि उनमें ‘मैं’ बिलकुल नहीं है, वे बड़े निस्वार्थी और सामाजिक हैं। सामाजिक बदलावों के संदर्भों में इन समारोहों का असर ताली बजाती, गदगद दिखती भीड़ पर उतना ही होता है जितना धार्मिक सत्संगो में जानेवाली महिलायों व अन्यों पर बाबा के प्रवचन का होता है। ये लोग सत्संग के ठीक बाद भी बिलकुल वैसे के वैसे रहते हैं जैसे दो घंटे पहले सत्संग में जाते समय थे।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जो लोग ऐन वक़्त पर (अकसर) बदलाव के आगे खड़े दिखते हैं वे दरअसल भीड़ के पीछे, नज़र जमाए चल रहे होते हैं, जब भी इन्हें भीड़ का मूड बदलता दिखता है, ये भीड़ के आगे जा खड़े होते हैं। यह तथ्य ग़ौरतलब है कि ‘ओह माय गॉड’, ‘पीके’, ‘पीकू’, ‘क्वीन’ जैसी फ़िल्में भारत में तब देखने में आई हैं जब इंटरनेट का प्रसार बढ़ा और सभी विषयों पर खुली बहसें होने लगी, दूर-दूर देशों, शहरों, क़स्बों के लोग आपस में सीधी बात करने लगे। ‘पीकू’ से पहले कभी मैंने अमिताभ बच्चन को सैक्स शब्द का उच्चारण करते देखा हो, याद नहीं आता। अगर इस क़िस्म के आंदोलनों से वास्तविक बदलाव आता होता तो भारत शायद वह देश है जहां हर गली-मोहल्ले में दस-दस आंदोलनकारी बैठे हैं और दहेज, डायन, ज्योतिष, तांत्रिक, ओझा से लेकर अस्पृश्यता तक सब ज्यों का त्यों चलता चला जा रहा है।

पिछले तीन-चार सालों में हमने ऐसे आंदोलन ख़ूब देखे जिनका नब्बे-पिच्यानवें प्रतिशत हिस्सा टीवी पर विज़ुअल्स और पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया में तस्वीरों से बना था। ईमानदार से ईमानदार माने जानेवाले बुद्धिजीवी(!), एंकरादि कम-अज़-कम दो साल तक इन्हें स्वतःस्फ़ूर्त आंदोलन बताते रहे। इन आंदोलनों का चरित्र/मंतव्य इसीसे समझा जा सकता है कि एक तरफ़ इन आंदोलनों के प्रमुख वक्ता मंच पर ख़ुदको चमत्कारी और किसी तथाकथित भगवान के प्रतिनिधि की तरह बता रहे थे तो दूसरी तरफ़ इनके वॉलंटियर्स सोशल मीडिया पर, कई ग्रुपों में घुस-घुसकर ख़ुदको प्रगतिशील और नास्तिक की तरह पेश कर रहे थे।

ऐसे आंदोलनों से व्यक्तिगत फ़ायदों, लोकप्रियता और पूड़ी-हलवे के अलावा और कुछ भी निष्कर्ष निकलता होगा, समझ में आना मुश्क़िल है। 

शुक्र है कि तक़नीक और विज्ञान लगातार आगे बढ़ रहे हैं वरना क्या पता हम सतीप्रथा और वर्णव्यवस्था की तरफ़ लौट रहे होते!

-संजय ग्रोवर
12-08-2015

Saturday, 8 August 2015

विचारों से डरते हैं, सुबहो-शाम मरते हैं

विचारों पर रोक लगाने के कई तरीके होते हैं। कई लोग बाहुबल/पॉवर का इस्तेमाल करते हैं जो कि दिख जाता है और उससे बचा भी जा सकता है। लेकिन जो ज़्यादा शातिर लोग होते हैं वे ऐसा नहीं करते। वे अफ़वाहें फ़ैलाते हैं, झूठी शिकायतें करते हैं, सबसे बड़ी बात वे जिन रहस्यों के ख़ुलने या जिन मूल्यों के फ़ैलने से घबराए होते हैं, उन मूल्यों के वाहक दिखनेवाले नक़ली लोग खड़े कर देते हैं, या पहले ही तैयार किए होते हैं। और जब असली सफ़ल होता दिखता है तो फिर नक़ली को फुलाने और असली को छुपाने/दबाने/ग़ायब करने का खेल शुरु होता है। असली के विचारों को भोंथरा और अपने मनोनुकूल बनाकर नक़ली के नाम से प्रचारित करने का पुराना कायर तरीका काम आता है।

इसमें वे लोग भी काम आते हैं जो इन नक़लिओं के स्थायी शिकार होते हैं। आदमी के डर और लालच पर आधारित यह दुश्चक्र ही इस तरह रचा गया है कि किसी न किसी ख़ामख्वाह की हीनभावना, व्यर्थ के अपराधबोध, इतिहास में नाम करने के अजीबो-ग़रीब (लगभग ‘स्वर्ग’ में ही जाने जैसे) लालच, प्रतिष्ठा-पैसा-पुरस्कार-सेमिनार-सफ़लता से सामाजिक बदलाव के अप्रमाणिक और झूठे संतोष आदि-आदि से डरे-घबराए-ललचाए लोग इसमें शामिल होकर ख़ुदको कृतज्ञ महसूस करते हैं।

लेकिन असली आदमी के लिए इस बात का कोई महत्व नहीं होता कि इस तीतर-युद्व में किसने, किसको गिरा दिया, किसने किसकी टांग खींच ली, कौन किसे चपत मारकर भाग गया, कौन बहुरुपिया बनकर आया और असलियत ख़ुलते ही बात बदलने लगा......वैचारिक बदलाव के मामले में इन बचकानी बातों का क्या अर्थ हो सकता है ? जिसके पास विचार है, उसके पास शारीरिक बल भी हो, समूह भी हो, गुंडे भी हों, डंडे भी हों......यह कैसे संभव है!?

लेकिन सच्चे आदमी के पास/साथ एक चीज़ हमेशा रहती है-वह ख़ुद। वह जानता है कि  वह अपने साथ हमेशा खड़ा है, उसे उसकी सोच से कोई अलग नहीं कर सकता। झूठे आदमी के साथ हज़ारों लोग खड़े दिख सकते हैं पर असलियत में वह ख़ुद भी अपने साथ नहीं होता। वह इतना कमज़ोर और कन्फ़्यूज़्ड होता है कि उसे ख़ुद भी नहीं मालूम होता कि वह किस पल अपना रंग बदल लेगा। इसलिए वह चौबीस घंटे घबराया रहता है, हर जगह नज़र रखना चाहता है कि कहीं कुछ ऐसा तो नहीं हो रहा जिससे उसे कुछ नुकसान हो जाए, उसकी प्रतिष्ठा वगैरह का असली रंग दिखने लगे। ऐसे ही घबराए हुए लोग समय-समय पर ऐसी घोषणा करते दिखते हैं कि ‘फ़लां तरह के आदमी की बातें मत सुनो’, ‘ढिकां तरह के लोगों की सोच नकारात्मक है, उनके पास मत जाओ’......। ये किसीके विचारों को बैन करने के ज़्यादा शातिर तरीके हैं। तिसपर और मज़ेदार बात यह है कि ख़ुद हर जगह घुस-घुसकर, बिन बुलाए घुसकर, भेस (आजकल आईडी) बदल-बदलकर हर जगह, हर किसीकी बात सुनने में लगा रहता है। न बेचारा दिन में चैन पाता है, न रात में आराम।

यही पाखंडियों और षड्यंत्रबुद्धियों की सज़ा है जिसका इंतज़ाम उन्होंने ख़ुद ही कर रखा है। जब तक ये झूठी ज़िंदगी जिएंगे, इस सज़ा से बच नहीं पाएंगे।  

-संजय ग्रोवर
08-08-2015

( ये मेरे व्यक्तिगत विचार और अनुभव हैं, कोई इन्हें मानने को बाध्य नहीं है.)

Wednesday, 22 July 2015

न तो क़िताब मूर्ति है न लेखक भगवान

बचपन से लेकर काफ़ी बाद तक कितने ही पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ा कि हमारा समाज बहुत भावुक है और पश्चिम बहुत भौतिकतावादी है। मगर व्यवहार में देखा कि हमारे यहां नये, पवित्र कहे जानेवाले, और जनम-जनम के कहे जानेवाले रिश्तों की नींव भी पैसे के आधार पर रखी जाती है, बाक़ी कोई भी रीति-रिवाज-त्यौहार लिफ़ाफ़ो के लेन-देन के बिना ज़रा-सा भी आगे नहीं सरकता।

और आगे चलकर जैसे-जैसे अपना सोचने, ख़ुदको ही डरानेवाले ख़्यालों पर ख़ुलकर विश्लेषण करने का होश और हिम्मत आते गए तो लगने लगा कि हमारी क़िताबों में लोगों ने अपनी आज़माई बातों के साथ सुनी-सुनाई और पढ़ी-पढ़ाई बातें भी अच्छी-ख़ासी मात्रा में लिख रखीं हैं। ऐसे और भी कुछ कारण रहे कि क़िताबों में पहले जैसी रुचि नहीं रह गई।

क़िताबों के प्रति भगवान-भक्त जैसी आस्था और श्रद्धा पैदा करने की कोशिशें अब ज़रा नहीं सुहातीं। क़िताब को लगभग मूर्ति, लेखक को लगभग भगवान बनाने और बिक्री को चढ़ौती की तरह हासिल करने की मानसिकता अजीब लगती है। क़िताबें ज़रुरी हैं, उपयोगी हैं, मगर लेखक कोई पवित्रता (?) की लाँड्री में से निकला मसीहा नहीं है कि उसके लिखे को पढ़ने के बजाय चरनामृत की तरह खोपड़े पर उड़ेलकर यह सोचा जाए कि इसमें से जो निकलेगा सब अंदर घुसकर अपने-आप कोई रास्ता बनाएगा और हमारे दिल-दिमाग़ को सिर्फ़ सच्चाई की ओर ही ले जाएगा। जैसा मैंने समाज को देखा है, मुझे तो बिलकुल भी नहीं लगता कि लेखक सिर्फ़ सच ही लिखता है। लेकिन हम अगर हिंदू-मुस्लिम या वाम-दक्षिण जैसे खानों में बंटे हो तो हमारे झूठ और सच को समझने के पैमाने पूर्वाग्रही हो ही जाते हैं।

अगर समाज की जड़ों तक पाखंड पसरा हो तो पाठक भी झूठ को सच की तरह ही पढ़ता है। जो लेखक शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाई जानेवाली क़िताबों में शामिल होने के लिए सर के बल हो जाते हैं उनके द्वारा लिखे गए स्वाभिमान के निबंध में कितना दम और कितनी सच्चाई हो सकती है !?

तुलसीदास और मनुमहाराज के महाग्रंथ किसीके लिए छाती से लगाए रखने के क़ाबिल हैं तो दूसरे कई लोगों के लिए क़ाबिले-बर्दाश्त भी नहीं हैं।

क़िताबों के प्रति जागरुकता पैदा करनी चाहिए, श्रद्धा, आस्था और अंधभक्ति नहीं।

-संजय ग्रोवर
03-09-2014

Tuesday, 21 July 2015

वफ़ा और ग़ुलामी

नास्तिकों और प्रगतिशीलों ने ‘आस्था’ और ‘श्रद्धा’ की अच्छी-ख़ासी आलोचना की है। ऐसा ही एक और शब्द है-‪वफ़ादारी‬। ‪आस्था‬ और ‪श्रद्धा‬ शब्द किसी तथाकथित ऊपरी शक्ति से संबंध के संदर्भ में इस्तेमाल होते हैं तो ’वफ़ादारी’ पशु और इंसान या इंसान और इंसान के संबंधों के संदर्भ में। वफ़ादारी को क़िताबों और फ़िल्मों तक में बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है। पर मुझे लगता है कि एक हद के बाद वफ़ादारी भी (ख़ासकर इंसानी संबंधों में) आस्था और श्रद्धा की तरह मूढ़तापूर्ण हो जाती है और ‪‎ग़ुलामी‬ में बदल जाती है। एक मजबूर आदमी जिसने कई हफ्तों से कुछ नहीं खाया, आप उसे एक थाली भोजन भी दे देंगे तो वह ख़ुदको आपका अहसानमंद महसूस करेगा। एक आदमी जिसे समाज चारों चरफ़ से सता रहा है, आप उसके पास जाकर दो घड़ी बैठ भी जाएंगे तो वह कृतज्ञ महसूस करेगा। अब यह मदद करनेवाले के ऊपर है कि वह कब तक इस अहसान का बदला लेता रहगा!

कई बार तो लोग मदद भी बिना कहे या ज़बरदस्ती करते हैं। फिर भी बदला चाहते हैं! फ़िल्मों में तो ख़ूब दिखाया गया है कि मुसीबत का मारा आदमी किसी छोटी-सी मदद के एवज में अपनी पूरी ज़िंदगी गिरवी रख देता है। मैं इसे बिलकुल भी मानवीय नहीं मानता। यह तो एक तरह की ‪‎बंधुआ‬ मज़दूरी या दासत्व है। ख़ुदको चिंतक या बौद्धिक माननेवाले लोगों को तो इस तरह की कोशिशें बिलकुल शोभा नहीं देतीं कि किसीको अपनी वैचारिक बंधुआगिरी पर मजबूर करें।

पशुओं के बारे में तो जानना मुश्क़िल है कि वे वफ़ादारी पर क्या सोचते हैं मगर इंसानी संबंधों को हद से ज़्यादा वफ़ादारी, शायद दोनों ही पक्षों को, पशुता के ही स्तर पर ले जाती है। किसी संगठन के प्रति वफ़ादारी का तो सीधा मतलब ही यह है कि या तो आप सच बोल लें या वफ़ादारी निभा लें। वहां सच और झूठ का कोई महत्व नहीं होता, संगठन का पक्ष ही आपका पक्ष होता है। आपको सच के पक्ष में नहीं, संगठन के विचार/धारा/रुख़ के पक्ष में तर्क जुटाने होते हैं। यहां थोड़ा विषय से भटककर कहना चाहूंगा कि संगठनों के काम करने के तरीक़ों, सफ़लता के मानकों, संख्या बढ़ाने की कोशिशों, अपने संगठन के व्यक्ति को नायक की तरह स्थापित करने की तिकड़मों और विरोधी को गिराने के हथकंडों में उन्नीस-बीस से ज़्यादा का अंतर नहीं होता, उनके बैनरों में परस्पर चाहे जितना कड़ा विरोध दर्शाया जा रहा हो।

बहरहाल, वफ़ादारी जब इंसानियत के खि़लाफ़ जाती हुई दिखने लगे तो उसपर एक बार ज़रुर सोचना चाहिए।

‪-‎संजयग्रोवर‬
24-09-2014

(ये मेरे ‪व्यक्तिगत‬ ‎विचार‬ हैं, कोई इन्हें मानने को बाध्य नहीं है ; ठीक वैसे ही जैसे मैं अपनी बुद्धि, कार्यक्षेत्र और स्वतंत्रता के दायरे में किसीको मानने को बाध्य नहीं हूं।)

Saturday, 18 July 2015

झूठ से पैदा समस्याएं झूठ से हल कैसे होंगी !?

आंकड़े हमेशा ज़रुरी नहीं होते, कई तथ्य ऐसे होते हैं जो हम अकसर अपनी आंखों से देखते हैं मगर समाज में फ़ैली कुछ मान्यताओं या परंपराओं, क़िताबें पढ़-पढ़कर बनी कुछ धारणाओं के डर से ख़ुदसे भी छुपाते रहते हैं। कई लोग कहते हैं कि समलैंगिकता जैसी चीज़ भारत में बाहर/यूरोप से आ गई है, हम तो बड़े अध्यात्मिक लोग हैं......

मुझे यह जानने के लिए क़तई आंकड़ों की ज़रुरत नहीं है कि यह चीज़ भारत में बहुत पहले से मौजूद है। मैं जिस कस्बे में पैदा हुआ वह पुरुष समलैंगिकता के लिए मशहूर था। वहां मेरे जैसे लड़के बिलकुल उसी तरह डरे रहते थे जैसे लड़कियां डरी रहती थीं। कई लोग इसी दृष्टि से घूरते भी थे, या मुझे लगता होगा कि ऐसा है। जैसे डरी हुई लड़कियां किसी भी पुरुष का विश्वास आसानी से नहीं कर पातीं, अगर मेरे जैसे लड़कों को भी यह लगता था तो इसमें असामान्य क्या है! इस तथ्य(पुरुष समलैंगिकता की वजह से हमारे कस्बे की मशहूरी) की पुष्टि उस दिन हुई जब दूसरे शहर के हॉस्टल के कुछ सीनियर लड़कों ने रैगिंग के दौरान मेरा परिचय जानने के बाद अपने हाथ पीछे ले जाते हुए कहा कि भई, इससे तो डर लग रहा है, हाथरस से आया है।

मैं समझता हूं कि हमारी समलैंगिकता से उनकी बेहतर इसलिए है क्योंकि वे ज़बरदस्ती नहीं करते, सहमति से संबंध बनाते हैं, छुपाते नहीं हैं। भारत के लोगों को बहुत कुछ इसलिए छुपाना पड़ता है क्योंकि यहां के लोगों ने अपनी महानता(?) और पवित्रता(?) को लेकर दुनिया-भर में बड़ी-बड़ी डींगें हांक रखीं हैं कि तुम सब भौतिकतावादी हो इसलिए बड़े ख़राब हो, चरित्रहीन हो।

इसी तरह जानवरों के साथ संबंधों के क़िस्से भी मैंने तभी सुन लिए थे। इसमें कितनी नमक-मिर्च थी, कितनी ‘आंखिन-देखी’ थी यह तो मैं नहीं बता सकता मगर आज मुझे इसमें कोई हैरानी भी नहीं होती। अगर हम मनुष्य के साथ बिना सहमति के कोई संबंध बना सकते हैं, ऊंच-नीच कर सकते हैं तो पशुत्व की तरफ़ क़दम तो हम पहले ही बढ़ा चुके हैं।

इस्मत चुगताई की कहानी ‘लिहाफ़’ पहले ही इशारा कर रही थी कि स्त्री-समलैंगिकता भी अपने यहां कहीं न कहीं मौजूद है। हमारे पास कुछ है तो बस यही कि हर चीज़ को छुपाओ, किसीको भी, ख़ासकर विदेशियों को कुछ पता न लगने दो। मगर सोचने की बात यह है कि छुपाने से दूसरी बहुत सारी (मानसिक) समस्याएं/बीमारियां पैदा हो जातीं हैं। मैंने जो थोड़ा-बहुत मनोविज्ञान पढ़ा या सुना है और ख़ुद भी अनुभव किया है उससे तो यही पता चलता है कि मनुष्य की बहुत-सी मानसिक समस्याओं/बीमारियों की वजह उसका दोहरा व्यवहार/'छुपाओ' यानि ‘करो कुछ बताओ कुछ’ का रवैय्या है। तिस पर एक और बड़ी मुसीबत यह है कि यही लोग आए दिन दूसरों को, ख़ासकर उन लोगों को पागल/सनकी/विकृत करार देते और नुकसान पहुंचाते रहते हैं जो एक साफ़-सुथरी और स्पष्ट ज़िंदगी जीने की कोशिश कर रहे हैं।

झूठ समझने और बताने के लिए हमेशा आंकड़ों और सर्वे की ज़रुरत नहीं होती, दोहरी ज़िंदगी जीने वाले समाजों में या अतीत में घट चुकी घटनाओं के मामले में हमेशा यह संभव भी नहीं हैं। लेकिन कुछ बातें सहज समझ और अनुभवों से भी समझी जा सकती हैं। एक-दो ऐसे उदाहरण बताता हूं। जैसे कि बीच में कहा गया कि चाउमिन की वजह से छेड़छाड़ या बलात्कार होते हैं। इसका मतलब क्या हुआ ? इसके अलावा और क्या कि चाउमिन पुरुषों की किसी क्षमता या उत्तेजना में वृद्धि करते हैं। मगर सोचने की बात यह है कि तब क्या चाउमिन इतने सस्ते मिलते !? तब लोग महंगे शिलाजीत और महामहंगे वियाग्रा की तरफ़ क्यों भागते !? तब इनपर भी बैन क्यों नहीं होना चाहिए ? जब आदमी का कोई भरोसा ही नहीं है तो वह कुछ भी खाकर कहीं भी कुछ भी कर सकता है। सही बात यह है कि ज़्यादातर घटनाएं इन सब कारकों की अनुपस्थिति में होतीं हैं। दूसरे उदाहरण में, जो राजा हज़ार-हज़ार और पांच-पांच सौ रानियां रखते थे उनमें से कई अपने हरमों में उन रानियों की सेवा के लिए हिजड़ो (आज की सभ्य भाषा में लैंगिक विकलांग) की नियुक्ति करते थे। इससे तो यही समझ में आता है कि वे भी मर्द की सीमित क्षमताओं को जानते थे और अपनी अनुपस्थिति में घट सकने वाली सहज-संभाव्य घटनाओं से बचने की फ़ौरी जुगाड़ करते थे। यानि कि मर्दों की वास्तविक/सीमित क्षमता पर परदा डालने का प्रयत्न करते थे। एक झूठे अहंकार की रक्षा करते थे।

इसमें सोचने की बात यही है कि ऐसे प्रयत्नों से समस्याएं सुलझेंगी कि बढ़ती जाएंगी !?   

-संजय ग्रोवर    
18-07-2015



Sunday, 12 July 2015

नास्तिकता क्या है

अगर मैं कहीं रास्ते से निकल रहा होऊं और वहां कहीं कीर्तन-जागरन होता दिख जाए और मैं पता लगाना शुरु कर दूं कि यह व्यक्ति किस राजनीतिक दल से जुड़ा है ; अगर यह किसी वामपंथ से जुड़ा है तो यह प्रगतिशील जागरन है, अगर कांग्रेसी है तो यह मॉडरेट कट्टरपंथी है, अगर यह संघी वगैरह है तो यह पूरी तरह रुढ़िवादी जागरन-कीर्तन है।

क्या यही नास्तिकता है ?

मेरे लिए तो बिलकुल भी नहीं। अगर जागरन कराना मेरी नज़र में फ़ालतू के कर्मकांडों को ढोना है तो मुझे उसके लिए यह पता लगाने की बिलकुल भी ज़रुरत नहीं है कि करानेवाला किस दल, किस गुट, किस बिरादरी, किस जाति से जुड़ा है। जो बात साफ़ समझ में आ रही हो उसके लिए ख़ामख़्वाह दीवारों से टकराने की क्या ज़रुरत है भला !?

जहां हर किसीके अपने बाबा हों, अपने भगवान हों, अपने कर्मकांड हों.....वहां किसी एक को निशाना बनाकर ख़ुदको नास्तिक और प्रगतिशील साबित करने की कोशिश मेरी समझ में  अजीबो-ग़रीब तो है ही, शायद कभी-कभार (या अकसर) एक सुविधा की स्थिति भी है। नास्तिकता को सिर्फ़ एक-दो समूहों या लोगों के विरोध तक संकुचित/रिड्यूस कर देने से नास्तिकता और इंसानियत का क्या भला हो सकता है ? यह तो जाने-अनजाने आप उन्हीं लोगों का काम कर रहे हैं जो नहीं चाहते कि लोग नास्तिकता को समझें। यह कुछ ऐसे ही हुआ कि बेईमानी के विरोध के नाम पर आप सिर्फ़ किसी तथाकथित ‘बेईमान दल’ को ग़ालियां देते रहें और समाज में चारों तरफ़ जो बेईमानियां चल रहीं है उनसे एडजस्ट किए चले जाएं! इस शौक़िया प्रगतिशीलता से कब तक काम चलेगा !?

मेरे लिए नास्तिकता सिर्फ़ भगवान और धर्म से जुड़ी चीज़ों को ही खोलना-परखना नहीं है। भगवान भी आखि़र एक मान्यता, विज्ञापन और धारणा से ज़्यादा क्या है ? भगवान और धर्म से जोड़कर या उन्हींकी तरह दुनिया-भर में कई उल्टी-सीधी कारग़ुज़ारियां चलती आ रही हैं जो कि इंसानियत के लिए कम नुकसानदेय नहीं हैं। इनमें सफ़लता है, पुरस्कार है, ट्रॉफ़ी है, प्रतिष्ठा है, रैंक है, नाम है, मशहूरी है.......। आदमी कुछ भी कहे मगर इन सबके पीछे दूसरों से ऊंचा होने का, दूसरों को डराने का, अपने काम प्रॉपर चैनल से करने में शरमाते हुए पिछली खिड़की से करवाकर गर्व करने का, विपरीत सैक्स के लोगों में लोकप्रियता हासिल कर उसका फ़ायदा उठाने का भाव या नीयत कहीं न कहीं रहते ही हैं। भगवान के पास भी आखि़र लोग और किन कारणों से जाते हैं !? अगर मैं किसी आदमी से इसलिए प्रभावित नहीं होता कि वह कुछ मूर्त्तियां सजाए बैठा है तो मैं किसी ऐसे आदमी से भी क्यों प्रभावित होऊं जो अपने ड्रॉइंगरुम में दस-बीस ट्रॉफ़ियां सजाए है ? मूर्त्ति सजानेवाला आदमी अगर बिना सोचे-समझे किसी व्यवस्था का हिस्सा बन गया है तो ट्रॉफ़ी सजानेवाले ने कब इस परंपरा को लेकर बहुत चिंतन-मनन किया है ? किन्हीं दस-बीस लोगों का पैनल किसीको महान और श्रेष्ठ बताता है और बाद में कुछ अख़बार और टीवी चैनल उसकी महिमा गाते हैं तो गाएं !! मेरी क्या मजबूरी है कि मैं यह मानूं कि यही देश और दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली लोग हैं!? ख़ासकर तब,जब मैंने होश संभालते से जोड़-जुगाड़-तिकड़म-मक्ख़नबाज़ी से मलाई खाते लोगों के झुंड के झुंड देखे हों !? मैं कैसे मान लूं कि इनकी नीयत और तौर-तरीक़े भगवान के विज्ञापनकर्त्ताओं और लाभार्थियों से अलग हैं ? आप मेरी कमी या ग़लती बताएं, मैं बहस के लिए तैयार हूं।

कोई भी चीज़ हम सिर्फ़ इसलिए करते चले जाएं कि वह होती चली आ रही है !? इसके अलावा हमें उसे करने का दूसरा कोई भी ढंग का कारण मालूम न हो, फिर भी हम ख़ुद तो करें ही करें, दूसरों को भी करने पर मजबूर करें! कितनी अजीब बात है!! वे सारे कर्मकांड जिनसे सिर्फ़ वक़्त की बर्बादी के अलावा जो भी होता हो वो सिर्फ़ हमारी ख़ामख़्याली और फ़ैंटसी के अलावा कुछ न हो, को सिरे से नकार देने में मैं तो कोई दिक़्क़त नहीं मानता।

मेरे लिए नास्तिकता का मतलब हैं हम एक-एक बात का कारण जानने की कोशिश करें, जिसे समाज ने ‘कुछ होना’ कहा है, उसके बारे में हम ख़ुद पता लगाएं कि इसमें वाक़ई होने जैसा क्या है ; हमें उसमें कुछ होने जैसा लगे तभी उसमें शामिल हों। मसलन जैसे किसीको पुरस्कार मिलता है तो लोग मानते हैं कि कुछ हुआ। जिसे पुरस्कार मिला उसके लिए ज़रुर कुछ हुआ होगा, थोड़ी व्यक्तिगत उपलब्धि, संतुष्टि उसे लगी होगी लेकिन समाज का इसमें क्या फ़ायदा है ? मुझे तो लगता है कि अगर उस व्यक्ति ने पुरस्कार के लिए कुछ जोड़-तोड़, मक्खनबाज़ी, जातिबाज़ी की तो उसने समाज को नुकसान पहुंचाया। उसने समाज में पहले से व्याप्त इस धारणा को बल दिया कि बेटा, बिना जान-पहचान के कुछ नहीं होता, कहीं न कहीं एडजस्ट तो करना ही पड़ता है। तिसपर यह तो और भी शर्मनाक़ है कि ऐसे चार लोग बैठकर परस्पर ईमानदारी पर बहस करें और टीवी दर्शक उनसे ‘ईमानदारी’ और ‘त्याग’ वगैरह की ‘प्रेरणा’ लें।

नास्तिकता का मतलब है हम सारी मान्यताओं, धारणाओं, परंपराओं, इतिहास, मशहूरी, प्रतिष्ठा, नाम, सफ़लता.....एक-एक चीज़ के महत्व, प्रासंगिकता और नुकसान को अपनी आंख से देखें। जहां तक मेरी बात है, अपनी नास्तिकता के हवाले से मैं इस बात पर शक़ कर सकता हूं कि भगतसिंह के द्वारा दो छोटे-छोटे, सिर्फ़ धुंआ छोड़नेवाले बम फेंक देने से उस अंग्रेजी साम्राज्य की चूलें हिल सकतीं हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने सारी दुनिया पर राज किया! मैं पूछ सकता हूं वे किस तरह के धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील लोग थे जिन्होंने हमारी पाठ्य-पुस्तकों में स्पष्ट अंधविश्वासविरोधी कबीर की लाश में से फूल निकाल दिए !? मैं अपने इस आश्चर्य और संदेह को प्रकट करने में कोई बुराई नहीं मानता कि भगवान को नकारने के लिए अरबों-ख़रबों रुपए लगा कर किए गए प्रयोग का नाम ‘गॉड पार्टीकिल’ रखना क्यों ज़रुरी समझा गया ? अहिंसा के पुजारी कहे जानेवाले महात्मा गांधी की प्रिय पुस्तक वह कैसे हो सकती थी जिसमें हिंसा और मारकाट के अलावा और कुछ है ही नहीं !? छुआछूत जैसी व्यवस्था बनानेवालों को सिर्फ़ इसलिए ‘अहिंसक’ कैसे कहा जा सकता है कि वे अपने हाथों से किसीको नहीं पीटते !? दरअसल तो उन्होंने लोगों की पीढ़ियों की पीढ़ियों को जीतेजी मार डाला है। मैं आराम से कह सकता हूं कि हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है।

मेरे लिए यही नास्तिकता है।

इस लेख में कई बार ‘मैं’ या ‘मेरे’ शब्द आए हैं जिनके लिए, अगर वे आपको बुरे लगे तो, मैं माफ़ी चाहूंगा, मगर चूंकि मैं नास्तिकता पर ‘अपने’ विचार रख रहा हूं तो इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था।

-संजय ग्रोवर
12/13-07-2015


Saturday, 11 July 2015

ग़ुम नास्तिक

व्यंग्य

समाज अकसर ग़ुम नास्तिकों को पसंद करता है।

किसी दुर्घटना के दौरान जब किसीको अंदरुनी चोट, जो कि बाहर से दिखाई नहीं देती, लग जाए तो कई लोग कहते हैं कि फ़लां व्यक्ति को गुम चोट पहुंची है। समानार्थी या निकटार्थी शब्दों में आप गुमसुम, लुल्ल, ग़ायब, ख़ामोश, अंतर्मुखी आदि शब्दों को शामिल कर सकते हैं।

गुम नास्तिक भी कुछ ऐसी ही चीज़ है। कई बार तो इसके अपने अलावा किसीको मालूम ही नहीं होता कि यह नास्तिक है।

पड़ोसी जागरन में बुलाए, यह बिलकुल दूसरों की तरह जाता है।

कोई दहेज़दार शादी में बुलाए, यह बिलकुल दूसरों की तरह मनोयोग के साथ लिफ़ाफ़ा तैयार करता है।

कोई इससे कहे कि धर्मस्थल में घुसने से पहले सर पर कपड़ा, रुमाल, तौलिया वगैरह डाल लो ; यह तत्परता से डाल लेता है।

कोई कुलबुलाहट, कोई ग़ुस्सा, कोई विरोध, कोई विद्रोह !? 

अजी, चेहरे पर एक चिन्ह तक दिखाई नहीं देता।

पूछो कि करवाचौथ की तैयारियां चल रहीं हैं, तुम कुछ बोलते क्यों नहीं !?

‘‘अरे, इतना तो चलता है,’’ यह कहता है।

कहो कि देखो उन्होंने कीर्तन के नाम पर रास्ता जाम कर दिया, हमें उन्हें समझाना चाहिए।

‘‘तो क्या सब तुम्हारी तरह जिएं ? ऐसे चलती है क्या ज़िंदग़ी ?’’ इसे ग़ुस्सा आने लगता है।

इससे कहो कि बच्चे की ख़ाल बहुत नाज़ुक है, उसे दर्द होगा, इन्फ़ेक्शन भी हो सकता है, मुंडन-वुंडन का लफ़ड़ा छोड़ क्यों नहीं देते ?

‘‘अरे बच्चे का मुंडन करा रहे हैं, तुम्हारा तो नहीं करा रहे, तुम्हारा क्यों ख़ून जल रहा है ?’’ इसके तर्क ‘प्रैक्टीकल’ होना शुरु हो जाते हैं। 

कहो कि आप श्राद्ध क्यों कर रहे हो, आप तो नास्तिक हो !?

‘‘ये प्रैक्टीकल लाइफ़ है। तुम्हे कुछ पता भी है!’’ यह डांटने पर उतर आता है। 

मगर जिन्हें डांटना चाहिए, उनके साथ खड़े होकर यह खी खी करेगा।

अब आप पूछेंगे कि यह नास्तिक किधर से है !?

मगर इनमें से कई होते हैं- किसी गोष्ठी में, किसी सेमिनार में, किसी मुशायरे में, किसी सम्मेलन में, दोस्तों के साथ किसी गपशप या बहस में, कभी-कभार होते हैं।

कभी-कभी किसी कविता में जिसमें ठीक-ठीक पता भी नहीं लगता कि यह कविता किसी ईश्वर के होने के संदर्भ में है या न होने के बारे में है, ये वहां नास्तिक होते हैं ; अगर आपको वह कविता ठीक से समझ में आ जाए। 

किसी मुशायरे में ग़ज़ल के पांचवे-छठे शेर में ये नास्तिक होते हैं जिसमें यह पता लगाना मुश्क़िल होता है कि ये ख़ुदा को डांट रहे हैं या उससे डांट खा रहे हैं। ये शेर* इस ‘कलात्मक’ ढंग से रचे गए होते हैं कि ख़ुदा के मानने वाले समझते हैं कि बंदा ख़ुदा की शान में क़सीदे पढ़ रहा है और न मानने वाले समझते हैं कि क्या हिम्मती आदमी है, सरे-आम ख़ुदा को नकार रहा है। 

जैसे कई लोग इंटरव्यू देते वक़्त पीछे दीवार पर भगतसिंह, विवेकानंद आदि का फ़ोटो टांग देते हैं। अच्छा है कि भगतसिंह ख़ुद मौजूद नहीं हैं वरना आप जानते ही हैं, टांगनेवाले कुछ भी टांग सकते हैं। भगतसिंह का फ़ोटो देखकर राष्ट्रवादी लोग समझते हैं कि इंटरव्यू देनेवाले सज्जन राष्ट्रवादी हैं और मानवतावादी नास्तिक समझते हैं कि बंदा नास्तिक है। अब भगतसिंह तो हैं नहीं जो आके बताएं कि वे क्या हैं और किस तरफ़ हैं। आकर करेंगे भी क्या ? आखि़र कितनी बार ख़ुदको टंगवाएंगे ? टांगनेवालों की तो टांगे भी नहीं थकती टांगते-टांगते!

तो ऐसा नास्तिक फिर भी न सिर्फ़ ख़ुदको नास्तिक मानता है बल्कि प्रगतिशील भी मानता है। और सिर्फ़ ख़ुद ही नहीं मानता, अगर मौक़ा और माहौल अनुकूल हों तो, दूसरों से भी मनवाता है।

कई ग़ुम नास्तिक नौकरी न लगने तक, कैरियर न बनने तक ग़ज़ब के बग़ावती, विद्रोही, रिबेल (तीनों का एक ही मतलब है) नास्तिक रहते हैं। नौकरी लगने या कैरियर बनने के बाद इनका पहला काम होता है 
नास्तिकता से पीछा छुड़ाना। उसके बाद इनमें से कई, ग़ुमों से भी ज़्यादा ग़ुम हो जाते हैं। 

पता ही नहीं लगता कि हैं या नहीं हैं।   

दुनियादार लोग ऐसे नास्तिकों को प्रेम से पास बिठाते हैं।


वे भी जानते हैं कि इनका होना न होना बराबर है।


-संजय ग्रोवर
11-07-2015


*ऐसे दो-चार शेर कभी इस ख़ाक़सार ने भी लिखे हैं।