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Friday, 15 January 2016

रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-3

(रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-2)


रंगो और प्रतीकों का खेल एक चालाक़ खेल है। इसमें नफ़रत फैलानेवाले शख़्स के लिए प्रेम का कोई प्रतीक चुनकर लोगों को झांसा देने की मज़ेदार सुविधा है, इसमें वंचितों को वंचित बनाए रखकर उनका मसीहा बन जाने का पूरा जुगाड़ है, इसमें स्त्रीविरोधी होते हुए भी स्त्रियों का पसंदीदा बन जाने के अच्छे चांसेज़ हैं।

मुझे याद आता है कि फ़ेसबुक के मेरे दो ग्रुपों में ऐसी कई घटनाएं हुईं। ‘नास्तिक’ ग्रुप में कुछ लोगों ने कहा कि यहां स्त्रियां नहीं हैं। हालांकि ऐसा नहीं था कि ग्रुप में स्त्रियां बिलकुल नहीं थीं, मगर काफ़ी वक़्त तक मैं चुपचाप सुनता और देखता रहा। जब ठीक लगा, इसपर स्टेटस लिखा। हंसी यह देखकर आती है कि लोग कैसी-कैसी बेतुकी बातों में ख़ुद भी उलझे हुए हैं और दूसरों को भी बहका रहे हैं। कलको आप कहेंगे कि ग्रुप में मुसलमान कितने हैं, अगर कम हैं तो आप मुस्लिम-विरोधी हैं, बच्चे कम हैं तो आप बच्चा-विरोधी हैं, ग्रुप में अगर कोई लैस्बियन नहीं है तो आप लैस्बियन-विरोधी हैं, ग्रुप में अगर सांवले लोग नहीं हैं तो आप उनके खि़लाफ़ हैं.........। हैरानी होती है कि कैसे-कैसे लोग यहां चिंतक और प्रगतिशील बने बैठे हैं। अगर किसी ग्रुप में हम नास्तिकता पर विचार करने बैठे हैं और वहां सभी आमंत्रित हैं तो जो भी बात करना चाहे, करे। हम क्या हर तरह की वैराइटी ज़बरदस्ती पकड़-पकड़कर जमा करेंगे ? हम विचार करने बैठे हैं या मिठाई की दुकान खोलकर बैठे हैं, या हम कोई फ़रमाइशी रेडियो-कार्यक्रम चला रहे हैं !? भारत में नास्तिक वैसे ही ढूंढे से मिलते हैं तिसपर भी महिलाएं !? और महिलाएं जहां चाहें वहां नास्तिक बनें, हमारा कोई ठेका है कि हर किसीको हम ही बनाएंगे!! 

और इस दृष्टि से सोचें तो बुद्ध (जैसाकि सुना है उनके यहां स्त्रियों की मौजूदगी नहीं थीं) स्त्रीविरोधी हुए, राजेंद्र यादव (चूंकि दूसरी शादी किए बिना सहायक के साथ रहते थे) स्त्रीविरोधी हुए और वे सब ज़मींदार, राजा-महाराजा और गैंगस्टर नारीवादी हुए जो अपने घरों-महलों-अड्डों में स्त्रियां जमा करके रखते थे। एक पुराने काल्पनिक नायक जो नदी-किनारे, कहानीनुसार, स्त्रियों के कपड़े ले-लेकर भाग जाते थे फिर भी स्त्रियां उनके आसपास मंडरातीं थीं, तो क्या फ़ॉर्मूलानुसार स्त्रियों को लुभाने के लिए हर कोई यही करता फिरे !? क्या रोज़ाना हर किसीकी पसंदानुसार उल्टे-सीधे कामकर उसे लुभाना ही ज़िंदगी है ? आदमी को दूसरा कोई काम नहीं क्या ? 

मगर प्रतीकात्मकता-पसंद लोगों के मानदण्ड इतने ही हास्यास्पद हैं। अगर कोई मर्द अपने घर में बिना किसी दूसरे मर्द/मानव के रहता हो तो इनके हिसाब से तो वो भी मर्द या मानवविरोधी हुआ!! यह तो ऐसे हुआ कि जब तक आप कोट-टाई पहने हैं तब तक पढ़े-लिखे हैं, रात को जैसे ही आप पायजामा पहनेंगे, अनपढ़ हो जाएंगे!! इन र्खों की तथाकथित बुद्धि के अनुसार तो होगा यही कि आदमी जिन-जिन मूल्यों का समर्थक है उनकी एक-एक निशानी चौबीस घंटे अपने शरीर पर, घर में, दफ़्तर में, रास्ते में.....हर जगह प्रदर्शित करे वरना ये उसको विरोधी घोषित कर डालेंगे। अब सोचिए कि आदमी इनकी बुद्धि से चला तो उसका दिन कैसे गुज़रेगा और रातों की क्या गत बनेगी !?

निशानियां पाखंडियों को चाहिएं होतीं हैं, करनेवाले चुपचाप अपना काम करते हैं, अपने स्वभाव को जीते हैं। 

इनकी मेधा तो ऐसी है कि जब तक आप दुनिया के सारे धर्मों, देशों के लोगों के साथ उनके त्यौहार नहीं मनाएंगे, उनकी मिठाईयां नहीं खाएंगे, उनके साथ उनके त्यौहार पर नाचेंगे नहीं...तब तक ये आपको उनका दुश्मन मानेंगे। अगर आपका कोई क्रिश्चियन दोस्त नहीं है तो आपको इनकी वजह से बनाना पड़ेगा या किराए पर लाना पड़ेगा। अगर आपका कोई रशियन दोस्त नहीं है तो आप वहां जाकर कुछ रशियन दोस्त बनाईए, किराया-ख़र्चा ये उठाएंगे। दुनिया में अगर एक भी आदमी ऐसा है जिससे कभी आप मिले नहीं, उसके साथ कभी खाया-पिया नहीं, सलाम-नमस्ते-गुड मॉर्निंग इत्यादि नहीं की तो इनके अनुसार आप उसके दुश्मन हुए। कर लीजिए क्या करेंगे ?

कई लोग समय-समय पर अपने परिवारों की भी प्रदर्शनी लगाते हैं कि देखिए मैं हिंदू हूं, पत्नी मुस्लिम है, बेटा क्रिश्चियन है, फ़लां ये है, ढिकां वो है....और हम पचास/पांच सौ साल से एक साथ रहते हैं। मैं सोचता हूं कि पचास/पांच सौ साल तक साथ रहकर भी हिंदू हिंदू रहा, क्रिश्चियन क्रिश्चियन और मुस्लिम मुस्लिम ; आदमी कोई भी न हो सका तो यह ख़ुश होने की बात है या रोने की, माथा फोड़ने की बात है !? 

इनकी ज़िंदगी है कि चलता-फिरता शोकेस है !?

(ज़रुरी हुआ तो आगे भी)
-संजय ग्रोवर
15-01-2016

Monday, 11 January 2016

रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-2

(रंगो और प्रतीकों का चालू खेल-1)

रंगों और प्रतीकों के खेल में आदमी किस तरह उलझ जाता है इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण याद आता है। एक प्रसिद्ध खिलाड़ी के रिटायरमेंट पर उसके एक फ़ैन को पूरे स्टेडियम में एक प्रतीक को हाथ में उठाकर चक्कर लगाने का मौक़ा दिया गया। पता नहीं ईमानदारी, अनुशासन और सुरक्षा-व्यवस्था के कौन-से नियमों के तहत यह करने दिया गया। सोने पर सुहागा यह कि उस फ़ैन का पूरा गेटअप जाति या वर्णविशेष को चिन्हित कर रहा था। कोई दूसरा यह करता तो पूरी संभावना थी कि इसे जातिवाद और सांप्रदायिकता कहा जाता मगर वर्णविशेष की सुविधानुसार यह श्रेष्ठता और महानता का सूचक कहलाया। पूरा मीडिया इस ‘महानता’ में हाथ बंटा रहा था। इस घटना को कईयों ने लाइव देखा। इसके वीडियोज़ में फ़ैन की बातें सुनकर यही समझ में आता है कि सारी मानसिकता वही है जो किसी कट्टरपंथी भक्त की अपने भगवान के प्रति होती है। लेकिन यहां सांप्रदायिकता और प्रगतिशीलता व्यवहार और मानसिकता से नहीं बल्कि प्रतीकों और बैनरों से तय की जाती है।

मैं एक बहुत ही मज़ेदार बात शेयर करना चाहूंगा जो कि प्रतीकात्मता को गंभीरता से लेनेवालों और उसे चालाक़ी से इस्तेमाल करनेवालों, दोनों की हास्यास्पद मानसिकता के बारे में बताती है। मेरे एक मुस्लिम मित्र दूसरों के साथ अपनी बातचीत में अकसर जी शब्द का इस्तेमाल किया करते। एक तो उनके बोलने का अंदाज़ अच्छा था दूसरे, मुझे यह शब्द इसलिए जम गया कि मैं रिश्तों में इंसानियत, ईमानदारी, दोस्ती, प्रेम जैसे मूल्यों का तो महत्व चाहता हूं मगर थुपे हुए रिश्ते और थुपे हुए संबोधन आसानी से हज़म नहीं कर पाता। जैसे दूसरे लोग तपाक से किसीको मामा, चाचा, भईया, दीदी, भाभी, जीजा कहना शुरु कर देते हैं, मुझसे नहीं हो पाता। मुझे लगा कि यह ‘जी’ शब्द तो बड़े काम का है, आदर भी हो जाता है और बात-बात में किसीको बाऊजी-ताऊजी बनाने की भी ज़रुरत भी नहीं पड़ती। धीरे-धीरे यह मेरे व्यवहार में आ गया। बाद में मैंने देखा कि कई लोग इस शब्द की वजह से आपको किसी संघ या सांप्रदायिकता से जोड़ना शुरु कर देते हैं। ये कोई ढंग के लोग होते तो भी बात थी मगर मैंने दूर से भी और क़रीब से भी ख़ूब देखा कि ख़ुद ये लोग क़तई भी विश्वसनीय नहीं हैं। ख़ुद ये आंगरन-जांगरन, हंडिया टुडे-झंडिया टुडे, द हिंदू-द बिंदू...किसी भी पत्र-पत्रिका में काम करते हुए भी प्रगतिशील, उदार, एकपक्षीय, धर्मनिरपेक्ष(?) वगैरह बने रहते हैं और दूसरे को एक-दो शब्दों या प्रतीकों के आधार पर कुछ भी घोषित कर डालते हैं। मुझे समझ में आया कि ग़लती मेरी भी है कि ऐसे फ़ालतू और अविश्वसनीय लोगों की बातों पर कान और ध्यान दे देता हूं। इस तरह के हल्के लोगों की बातों पर ध्यान देने का मतलब है कि मेरे आत्मविश्वास में भी कहीं न कहीं, कुछ कमी है।

काफ़ी वक़्त से मैं यूट्यूब पर उमर शरीफ़ के कॉमेडी शो और अन्य पाक़िस्तानी कार्यक्रम देख रहा हूं। पता चल रहा है कि वहां जी शब्द का इस्तेमाल बहुतायत में होता है। इस दृष्टि से तो पूरा पाक़िस्तान ही संघी साबित होता है। ख़ैर! यह न भी हो तो भी मैं, जब तक मुझे अच्छा लगेगा, जी का इस्तेमाल करता रहूंगा। मेरे लिए आत्मविश्वास का यही मतलब है।


राहत इंदौरी के एक शेर की एक पंक्ति है कि ‘किसीके बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है........’
शेर की भाषा पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है। अन्य संदर्भ में स्त्रीवादी और मातावादी लोग कह सकते हैं कि ‘किसीकी मां का हिंदोस्तान थोड़ी है....’ कहना चाहिए था। मगर शेर का साधारण अर्थ भी ठीक-ठाक हैं। जैसा कि इस लेख में पहले भी कहा और इस शेर में जोड़ते हुए भी कहूंगा कि इस पूरी दुनिया का कोई भी रंग, शब्द, प्रतीक...आदि-आदि किसीके मां, बाप, भाई, बहिन, चाचा, मामा, जीजा, साले का नहीं है। उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी रंग, शब्द, प्रतीक, भाषा, शिल्प, कपड़ों....से किसीके चरित्र और मानसिकता का कुछ पता नहीं चलता। और उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि चालाक, बेईमान और मौक़ापरस्त लोग रंग और प्रतीक बदलने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगाते। वे देखते हैं कि कब कौन-सी चीज़ भीड़ में स्वीकृत हो गई है और तुरंत वही करना शुरु कर देते हैं। 

यहां तक कि इनके व्यवहार को देखकर कई लोग समझ बैठते हैं कि समय के साथ बदलना और मौक़ापरस्त होना एक ही बात होती है। 


मज़े की बात देखिए कि 2-4 साल पहले हमें बज़रिए प्रगतिशील बौद्धिकता यह पता चला कि केजरीवाल प्रगतिशील हैं। अब मैं यह याद करने की कोशिश कर रहा हूं कि वो कौन विद्वान थे जिन्होंने यह बताया था कि केजरीवाल और ‘यूथ फ़ॉर इक्वैलिटी’ आरक्षण-विरोधी हैं!?


ख़ैर! प्रगतिशीलता, कट्टरपंथ, ईमानदारी, सांप्रदायिकता आदि को लेकर अपने पास बहुत-सारे अनुभव भी हैं और बहुत-सारी समझ भी है। जिसके चलते यह तो बिलकुल साफ़ हो चुका है कि इन मूल्यों के प्रतिनिधि बने बैठे बहुत-सारे लोग क़तई अविश्वसनीय, प्रायोजित और नाटकबाज़ लोग हैं। वे दूसरों को इन मूल्यों के बहाने बांट रहे हैं और ख़ुद हर तरफ़ मज़े ले रहे हैं। 


हम जैसे लोग जिन्हें न किसीसे कुछ लेना है न खाना-पीना है, ऐसे बेसिर-पैर लोगों की परवाह करेंगे तो अपना वक़्त भी बरबाद करेंगे और ज़िंदगी भी।


(रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-3)

-संजय ग्रोवर
11-01-2016

Saturday, 8 August 2015

विचारों से डरते हैं, सुबहो-शाम मरते हैं

विचारों पर रोक लगाने के कई तरीके होते हैं। कई लोग बाहुबल/पॉवर का इस्तेमाल करते हैं जो कि दिख जाता है और उससे बचा भी जा सकता है। लेकिन जो ज़्यादा शातिर लोग होते हैं वे ऐसा नहीं करते। वे अफ़वाहें फ़ैलाते हैं, झूठी शिकायतें करते हैं, सबसे बड़ी बात वे जिन रहस्यों के ख़ुलने या जिन मूल्यों के फ़ैलने से घबराए होते हैं, उन मूल्यों के वाहक दिखनेवाले नक़ली लोग खड़े कर देते हैं, या पहले ही तैयार किए होते हैं। और जब असली सफ़ल होता दिखता है तो फिर नक़ली को फुलाने और असली को छुपाने/दबाने/ग़ायब करने का खेल शुरु होता है। असली के विचारों को भोंथरा और अपने मनोनुकूल बनाकर नक़ली के नाम से प्रचारित करने का पुराना कायर तरीका काम आता है।

इसमें वे लोग भी काम आते हैं जो इन नक़लिओं के स्थायी शिकार होते हैं। आदमी के डर और लालच पर आधारित यह दुश्चक्र ही इस तरह रचा गया है कि किसी न किसी ख़ामख्वाह की हीनभावना, व्यर्थ के अपराधबोध, इतिहास में नाम करने के अजीबो-ग़रीब (लगभग ‘स्वर्ग’ में ही जाने जैसे) लालच, प्रतिष्ठा-पैसा-पुरस्कार-सेमिनार-सफ़लता से सामाजिक बदलाव के अप्रमाणिक और झूठे संतोष आदि-आदि से डरे-घबराए-ललचाए लोग इसमें शामिल होकर ख़ुदको कृतज्ञ महसूस करते हैं।

लेकिन असली आदमी के लिए इस बात का कोई महत्व नहीं होता कि इस तीतर-युद्व में किसने, किसको गिरा दिया, किसने किसकी टांग खींच ली, कौन किसे चपत मारकर भाग गया, कौन बहुरुपिया बनकर आया और असलियत ख़ुलते ही बात बदलने लगा......वैचारिक बदलाव के मामले में इन बचकानी बातों का क्या अर्थ हो सकता है ? जिसके पास विचार है, उसके पास शारीरिक बल भी हो, समूह भी हो, गुंडे भी हों, डंडे भी हों......यह कैसे संभव है!?

लेकिन सच्चे आदमी के पास/साथ एक चीज़ हमेशा रहती है-वह ख़ुद। वह जानता है कि  वह अपने साथ हमेशा खड़ा है, उसे उसकी सोच से कोई अलग नहीं कर सकता। झूठे आदमी के साथ हज़ारों लोग खड़े दिख सकते हैं पर असलियत में वह ख़ुद भी अपने साथ नहीं होता। वह इतना कमज़ोर और कन्फ़्यूज़्ड होता है कि उसे ख़ुद भी नहीं मालूम होता कि वह किस पल अपना रंग बदल लेगा। इसलिए वह चौबीस घंटे घबराया रहता है, हर जगह नज़र रखना चाहता है कि कहीं कुछ ऐसा तो नहीं हो रहा जिससे उसे कुछ नुकसान हो जाए, उसकी प्रतिष्ठा वगैरह का असली रंग दिखने लगे। ऐसे ही घबराए हुए लोग समय-समय पर ऐसी घोषणा करते दिखते हैं कि ‘फ़लां तरह के आदमी की बातें मत सुनो’, ‘ढिकां तरह के लोगों की सोच नकारात्मक है, उनके पास मत जाओ’......। ये किसीके विचारों को बैन करने के ज़्यादा शातिर तरीके हैं। तिसपर और मज़ेदार बात यह है कि ख़ुद हर जगह घुस-घुसकर, बिन बुलाए घुसकर, भेस (आजकल आईडी) बदल-बदलकर हर जगह, हर किसीकी बात सुनने में लगा रहता है। न बेचारा दिन में चैन पाता है, न रात में आराम।

यही पाखंडियों और षड्यंत्रबुद्धियों की सज़ा है जिसका इंतज़ाम उन्होंने ख़ुद ही कर रखा है। जब तक ये झूठी ज़िंदगी जिएंगे, इस सज़ा से बच नहीं पाएंगे।  

-संजय ग्रोवर
08-08-2015

( ये मेरे व्यक्तिगत विचार और अनुभव हैं, कोई इन्हें मानने को बाध्य नहीं है.)

Tuesday, 2 June 2015

पोंगों, शातिरों और मौक़ापरस्तों की ‘प्रगतिशीलता’

अगर कोई बार-बार आपसे कहे कि मैं ऊंच-नीच नहीं मानता, जात-पात नहीं मानता मगर थोड़ी ही देर बाद जब किसी बहस के दौरान उसे कोई तर्क न सूझे तो वह कहने लगे कि ‘अगर तुम आकाश पर थूकोगे तो वह लौटकर तुम पर ही गिरेगा’ तो इसका क्या मतलब हुआ? साफ़ ही है कि वह व्यक्ति न सिर्फ़ ऊंच-नीचवादी है बल्कि आत्ममुग्ध भी है। जो ख़ुदको आकाश बता रहा है वह सौ प्रतिशत ऊंच-नीचवादी है। वह आपको तो धोखा दे ही रहा है, हो सकता है जन्म से मिले अतिआत्मविश्वास और ‘ख़ानदानी’ ग़लतफ़हमियों के चलते ख़ुदको भी धोखा दे रहा हो।

प्रगतिशीलता का जिस तरह का इस्तेमाल यहां होता है वह भी किसी पोंगापंथ से कम नहीं है। प्रगतिशीलता की आड़ में चुन्नू-मुन्नूस्मृति यहां आज भी इस तरह से जारी है कि जो लोग ‘फ़ासीवाद आ गया’, ‘फ़ासीवाद आ गया’ का शोर मचा रहे होते हैं वही उस ‘फ़ासीवाद’ से फ़ायदे और पुरस्कार सरेआम ले रहे होते हैं। ‘चोरी और सीनाज़ोरी’ का आलम यह है कि इसपर भी उन्हें शर्म तो नहीं ही आती बल्कि वे ऐसे लोगों को फ़ासीवाद और कट्टरपंथ से जुड़ा साबित करने में लग जाते हैं जो एक स्वतंत्र जीवन जीने की ख़ातिर पुरस्कार, वज़ीफ़े, तथाकथित सफ़लता, कैरियर, शादी जैसी किसी भी बनावटी उपलब्धि या संस्था को नज़रअंदाज़ करते आए हों, उन्हें रत्ती-भर भाव न देते हों।

शर्मनाक़ स्थिति यह है कि हम सारी गंदी परंपराओं को भी बनाए रखेंगे, उनसे मिलनेवाले सारे मज़े लूटेंगे, फिर भी हम प्रगतिशील और परोपकारी हैं, और तुमने इस बात पर उंगली भी उठाई तो हम तुम्हे कट्टरपंथी साबित कर देंगे, क्योंकि सारे भोंपू हमारे हिसाब से बजते हैं, सारे ढोल हमारी ताल, हमारे इशारे पर पिटते हैं।

एक और उदाहरण से बताता हूं, जब पीके फ़िल्म आई और भक्तगणों ने प्रशंसा और विरोध अभियान शुरु किए तो न तो किसी संघी ने यह सवाल उठाया, न किसी वामी ने, न किसी कांग्रेसी ने कि पीके नाम की इस तथाकथित महाक्रांतिकारी फ़िल्म के अवतारी नायक ने अंत में तो भगवान को स्वीकार कर ही लिया है तो इसकी क्रांतिकारिता का इतना शंख क्यों फूंका जा रहा है ?

एक और हास्यास्पद तथ्य यह है कि जब भी धर्म और अंधविश्वास के खि़लाफ़ आवाज़ उठती है तो प्रगतिशीलता का पोज़ बनाए बैठे लोग कुछ (सलेक्टेड)बाबाओं और दो-एक संस्थाओं को ग़ालियां देना शुरु कर देते हैं। लगता है जैसे इन बाबाओं और संस्थाओं का आविष्कार ही इसलिए किया गया कि लोगों का ध्यान इन्हीं तक सीमित हो जाए और असली अपराधी न सिर्फ़ लोगों की नज़रों से बचे रहें बल्कि बेख़ौफ़ अपना काम भी आगे बढ़ाते रहें। इन तथाकथित प्रगतिशीलों के न सिर्फ़ अपने ख़ास बाबा मौजूद हैं बल्कि इन्होंने खिलाड़ियों तक को भगवान घोषित कर रखा है। फिर भी ये प्रगतिशील बने बैठे हैं।

हमारी भी ग़लती है जो हम तुरत-फुरत ऐसे लोगों को प्रगतिशील मान लेते हैं जिनके आचार-विचार-व्यवहार, घटिया रीति-रिवाजों, अपने नायकों को साम-दाम-दंड-भेद-छल-बल से देवता/आयकन/भगवान/महापुरुष/पवित्र परंपरा बनाने, रुख़ बदलकर लहर पर सवार हो जाने की आदतें बिलकुल वैसी ही होतीं हैं, जैसी दूसरों की आदतों का विरोध दिखाकर वे ख़ुदको प्रगतिशील बताते हैं। बस उनके साइनबोर्ड की इबारत अलग होती है बाक़ी सब एक-सा होता है।

ऐसा शायद इसलिए होता है कि हम पहले साइनबोर्ड देखते हैं, बाद में व्यवहार या हरक़तें देखते हैं। चूंकि साइनबोर्ड को लेकर हमारे कुछ पूर्वाग्रह हैं(जिनमें से कुछेक सही भी हो सकते हैं)इसलिए हम उन्हीं पूर्वाग्रहों के अनुसार निर्णय ले लेते हैं, सही, ग़लत तय कर लेते हैं। और ऐसा संभवतः इसलिए भी होता है कि कभी-कभी उसमें एक पक्ष के साथ हम जुड़े होते हैं। फ़िर हम वही करते हैं जो गली-मोहल्लों की लड़ाईयों में होता है। भले हमारा अपना बच्चा किसीको चपत मारकर भाग आया हो, मगर हम यह इसलिए मानने को तैयार नहीं होते कि ‘हमारे ‘ख़ानदान’ में तो यह सिखाया ही नहीं जाता’ या ‘हमारा ‘ख़ानदान’ तो इसके लिए जाना ही नहीं जाता’। ऐसी अजीब, अतार्किक ज़िद या घोषणा की असल वजह अहंकार और ढिठाई के अलावा और क्या हो सकती है? किसी भी पक्ष के प्रति अंधा झुकाव रखने से और हो भी क्या सकता है ?

एक काम तो हम कर ही सकते हैं कि प्रगतिशीलता और रुढ़िवादिता को किसी(और किसी और के दिए) चश्मे से न देखें बल्कि नंगी आंखों से उनकी हरक़तों को परखें और पकड़ें।

-संजय ग्रोवर
02-06-2015