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Saturday, 27 June 2015

कमज़ोर और दयनीय

सोचिए ज़रा-वह कैसा आदमी रहा होगा जिसने-

पहले आदमी को छोटा-बड़ा, ऊंचा-नीचा बनाया। और तय कर दिया कि ऊंचा मैं हूं।

फ़िर कहा कि चूंकि मैं बड़ा हूं इसलिए खेल के सारे नियम मैं तय करुंगा। फ़िर उसने कहा कि आसमान में कोई ऐसी शक्ति है जिसका धरती पर प्रतिनिधित्व मैं करता हूं। फ़िर उसने एक काल्पनिक शक्ति के आधार पर वास्तविक दुनिया के लिए नियम बना दिए। वे सारे नियम उसे फ़ायदा पहुंचाते थे, उसे कुछ भी करने की आज़ादी थी। वही काम जब वह ख़ुलेआम करता तो वह काम पवित्र कहलाता, दूसरा उस काम का नाम भी लेता तो भ्रष्टाचारी और अपराधी ठहरा दिया जाता।

उसके बनाए सारे नियम उसके बनाए छोटे या नीचे लोगों पर लागू होते थे, ख़ुद पर कोई नियम लागू नहीं होता था। जब-जब उसके बनाए छोटे या नीचे लोग शक़ करते कि यार हैं तो हम भी बिलकुल इसीके जैसे, बल्कि कई मामलों में इससे भी बेहतर हैं तो वह भांप जाता और नक़ली प्रतियोगिताएं खड़ी करता। उन प्रतियोगिताओं में सारे नियम-क़ानून उसके होते, जगह उसकी होती, दर्शक और अनुयाई उसके होते, तालियों से लेकर जैजैकार तक उसीके प्रभाव, दबाव और मान्यताओं के तहत होती, ईमानदारियों और बेईमानियों की परिभाषाएं उसीकी तय की हुई होतीं, प्रतियोगियों का खाना-पीना और ट्रेनिंग भी उसीकी सुविधानुसार होतीं, न्यायकर्त्ता, रैफ़्री या अम्पायर उसीके मनोनुकूल, उसीके द्वारा नियुक्त किए हुए होते, कई बार तो वह जिससे लड़ रहा होता वह भी उसीका आदमी होता। कई बार, जब वह ख़ुद मैदान में न उतरता, सभी प्रतियोगी उसीके तय किए होते.....

.....फ़िर भी कसर रह जाती तो आधी रात जाकर लड़ाई के मैदान के गड़ढों और उभारों को अपने अनुकूल कर या करवा लेता....

अंततः हर बार ‘जीत’ जाता.......


मेरे लिए इसमें सबसे हैरानी की बात यह है कि डरे हुए, उसकी मान्यताओं के मारे हुए, उसके भय से भकुआए हुए, उसके प्रभाव में पगलाए हुए, उसकी जोड़-गांठ से अनजान लोग उसे विजेता(!) मान लें, यह तो समझ में आता है मगर अपनी सारी असलियत जानने के बावजूद भी वह ख़ुद कैसे ख़ुदको विजेता(?) मान सकता था !!??

दरअसल कितना खोखला, पाखंडी, घटिया, कमज़ोर और दयनीय आदमी होगा यह !!

-संजय ग्रोवर
26-05-2014

(यह पोस्ट काल्पनिक है ठीक वैसे ही जैसे किसी तथाकथित दर्शन के मुताबिक जगत मिथ्या है)

Friday, 26 June 2015

उनका भागना प्रेरणास्पद तो इनका घृणास्पद क्यों !?

आप बचपन में स्कूल से भाग जाते थे!

यह अच्छी बात है या बुरी ?

यह कैसे तय होगा ?

लोग इसे कैसे तय करते हैं ?

एक आदमी भागता है और भागकर फ़िल्मनगरी पहुंच जाता है। न सिर्फ़ पहुंच जाता है बल्कि कामयाब हो जाता है, क़ामयाब नायक, नायिका, शायर, निर्देशक.......बन जाता है। अब देखिए ज़रा, उसके भागने को पत्र-पत्रिकाएं, टीवी चैनल किस तरह लगभग एक शौर्यगाथा या एक अनुकरणीय, उदाहरणीय घटना की तरह पेश करते हैं, वे कह सकते हैं कि इनमें बचपन से ख़तरे उठाने की, निर्णय लेने की, भीड़ के, मान्यताओं के खि़लाफ़ जाने की हिम्मत थी........

ज़रा सोचिए, यही आदमी या ऐसा ही कोई दूसरा आदमी भागता है और जाकर कहीं खो जाता है, नाकाम हो जाता है, स्मगलर बन जाता है, नाकाम होकर वापस लौट आता है। अब वही लोग इसके भागने को क्या कहेंगे !? साला बचपन से ही निकम्मा है, स्कूल से भी भागता था, यहां से भी भाग आया, हर जगह से भागेगा, बचपन से ही कमीना था, स्कूल से भागता था तो स्मगलर न बनता तो क्या बनता......

लोग परिणाम से साधनों या रास्तों का सही या ग़लत होना तय करते हैं......

क्योंकि मान्यताएं ऐसी ही हैं।

वरना इसके कुछ दूसरे मतलब भी हो सकते थे। सौ प्रतिशत तो नहीं मगर संभावना पूरी है कि जो आदमी स्कूल से भाग सकता है वह सफ़लता के दूसरे उल्टे-सीधे रास्ते क्यों नहीं अपना सकता ? एक मतलब यह भी होता है कि कथित सफ़लता ऐसे ही लोगों को मिलती है, ऐसे ही रास्तों से मिलती है....

मान्यताएं पुरानी हैं मगर मस्तिष्क हमारे पास है तो हमारी क्या मजबूरी है कि ख़ामख़्वाह उन्हें मानें !?

-संजय ग्रोवर
03-06-2014
On FaceBook

Monday, 22 June 2015

बेटा, थोड़ा-सा धन्यवाद होगा क्या ?

लोग अकसर कहते पाए जाते हैं कि सूरज का धन्यवाद करो, तुम्हे धूप देता है ; भगवान की पूजा करो, उसने तुम्हे बनाया है, मां-बाप का अहसान मानो कि वे तुम्हे इस ख़ूबसूरत दुनिया में लाए.....

सुनने में ये बातें बहुत भली लगतीं हैं, मगर इनके पीछे का सच क्या है ?
सूरज क्या किसी व्यक्ति या व्यक्तिविशेष के लिए धूप देता है ? अगर ऐसा होता तो सूरज बंद घरों की दीवारें भेदकर बीमार बूढ़ों और कमज़ोर बच्चों तक न पहुंच जाता ? सूरज तो उन जंगलों और पहाड़ों पर भी धूप बरसाता है जहां आदमी के बच्चे का नामो-निशान तक नहीं पाया जाता! वहां उसको ‘थैंक्यू अंकल’ बोलनेवाला या आर्चीज़ के ग्रीटिंग कार्ड भेजनेवाला कौन बैठा है ? और हम समझ रहे हैं कि सूरज हमारे थोथे कर्मकांडों और खोखली औपचारिकताओं की वजह से ही रोज़ाना ढाई टन प्रति गांव के हिसाब से धूप सप्लाई कर रहा है। 

हम बड़े मज़ेदार लोग हैं। 

मां-बाप का, भगवान का अहसान मानो कि वे तुम्हे दुनिया में लाए! 

मानने में हम काफ़ी होशियार हैं, क्या-क्या नहीं माने बैठे! पर यह भी तो सोचने की बात है कि मां-बाप बच्चों को दुनिया में किसलिए लाते हैं ? क्या बच्चों के लिए ? क़तई नहीं ? कोई बच्चा किन्हीं मां-बाप के पास अर्ज़ी नहीं डालता कि हे मेरे होनेवाले माता-पिता, मिस्टर एंड मिसेज़ अल्फ़ा-बीटा, आपसे अनुरोध है कि कृपया मुझे जल्दी से जल्दी इस दुनिया में लाएं। 


जो है ही नहीं उसकी न तो मर्ज़ी का कोई स्कोप है न अर्ज़ी की कोई संभावना।

बच्चे की चाहत बड़ों को होती है। कोई दादी, पोते (आजकल कहीं-कहीं पोती ) का मुंह देखना चाहती है तो कोई नाना, नातिन से खेलना चाहते हैं। किसीको वंश बढ़ाने की चिंता है तो किसीको बच्चा किसी बाबा को देना है। बच्चे न हुए जैसे रेवड़ियां हो गईं। होनेवाले बच्चे को बेचारे को मालूम ही नहीं है कि मुझे लेकर क्या-क्या योजनाएं बनाई जा चुकी हैं। मालूम पड़ जाए तो हो सकता है बहुत-से बच्चे पिछली गली से ही निकल लिया करें कि अंकल, हमीं पर सारी नींव जमाई जा रही है और हमसे पूछा तक नहीं!! अपने पास रखो ऐसी तानाशाह दुनिया! हम जहां हैं, वहीं ठीक हैं। नहीं हैं, तो नहीं ठीक हैं। 

कुछ बच्चे, सुना है, लापरवाही में ही पैदा हो जाते हैं। अहसान तो उनपर भी उतना ही लादा जाता होगा। कौन उन बच्चों से कहता होगा कि बेटे तुम तो यूंही भूल-चूक लेनी-देनी के खाते में चढ़ गए, हमसे ग़लती हुई, हमें माफ़ करो। सुना है क्या कभी ? उल्टे उनसे भी जमकर काम लिया जाता होगा।


कई लोग बच्चे इसलिए पैदा करके बैठ जाते हैं वे हमारा नाम करेंगे। नाम अव्वल तो होता नहीं, हो जाए तो भी उससे कुछ होता नहीं। आप ही बताईए, भारत में किसीको राजेश खन्ना के मम्मी-पापा का नाम मालूम है क्या ? कितने लोग दिलीप कुमार के माता-पिता का नाम जानते हैं ? चलो रतन टाटा के मम्मी-पापा का नाम ही बता दो ज़रा ?

क्या हुआ ?


नाम से होना बस यही है कि जुगाड़ से किसीको अस्पताल में बैड दिलवा दोगे। सिफ़ारिश से किसीकी नौकरी लगवा दोगे। किसीका ट्रांसफ़र रुकवा दोगे। यानि सारे काम इम्प्रोपर चैनल से करोगे। क़ायदे से कुछ नहीं करोगे। देश में सही सभ्यता हो, ईमानदारी हो तो जेनुइन काम तो सबके यूंही हो जाया करेंगे, किसी जुगाड़ की, सिफ़ारिश की ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी। मगर ऐसा हुआ तो फिर आपको कौन पूछेगा, आपका नाम कैसे होगा!? इसलिए भैया अपने चार अक्षर के नाम के लिए देश में गंदगी मेंटेन करो, और करो, करते ही रहो।

पिछले बरसों तक तो कई लोगों को यही डर लगा रहता था कि शादी के दस-बारह महीने में बच्चा न हुआ तो कहीं कोई नामर्द न कह दे! अब बताईए, मर्दानगी का ढोल किसीको पीटना है और भुगतेगा कोई और। यह पवित्र भावना अभी भी बहुत जगह जारी होगी। यहां तो प्रगतिशील भी तरह-तरह की परंपराएं पकड़े बैठे हैं फिर दूसरों का क्या दोष!

वैसे धन्यवाद करने को दुनिया में और भी बहुत लोग हैं-कूड़ा उठानेवाले हैं जो एक हफ़्ते न आएं तो हमारी सारी प्लानिंग बिगड़ जाती है। रिक्शेवाले हैं जो हमसे उम्र में बड़े हों तो भी हमें बाऊजी-बाऊजी कहते हैं। वैज्ञानिक हैं जो घरबार छोड़कर, दिन-रात प्रयोगशालाओं में बैठे-बैठे हमारे लिए सुविधाएं पैदा करते हैं। बच्चों का भी धन्यवाद किया जा सकता है कि हम तुम्हारी मर्ज़ी पूछे बिना तुम्हे इस दुनिया में ले आए और तुमने बुरा न माना, जो भी हमने कहा मानते चले गए, कभी कोई सवाल न उठाया।


चांद-सूरज को हम धन्यवाद न भी दे  तो उनका कुछ बिगड़ नहीं जाएगा। वे हमारे धन्यवाद से नहीं चलते।


-संजय ग्रोवर
23-06-2015

Saturday, 20 June 2015

नास्तिक के लिए ईश्वर भी रिश्वत और बलात्कार की तरह है

‪इंटरनेट‬ का प्रसार और ‪‎नास्तिकता‬ पर बहसें बढ़ने के बाद से एक नया ‎तर्क‬ प्रचलन में आया है कि ये ‪धर्मग्रंथ‬, ये क़िताबें और ये ‎कहानियां‬ झूठी हैं, तुम नास्तिक इसपर बहस क्यों करते हो ? पहला सवाल तो यह है कि जो लोग यहां यह क़बूल कर रहे हैं कि यह सब झूठ है क्या उन्होंने अपने जीवन में इन क़िताबों-कहानियों पर आधारित सब ‎रीति‬-रिवाज, कर्मकांड इत्यादि छोड़ दिए हैं या यह सिर्फ़ क़िताबों की आलोचना से बचने की रणनीति है? क्या इन्हें मालूम नहीं कि ऐसी (इन्हीं के क़बूलनामें के अनुसार) झूठी कहानियों पर अरबों रुपए ख़र्च करके सीरियल और फ़िल्में बन रहीं हैं जिनमें पारिवारिक कलह और प्रॉपर्टी के झगड़े से उपजी मार-काट तक को सत्य, आदर्श और अनुकरणीय की तरह दिखाया जाता है। क्या इन्होंने कभी उनका विरोध किया ? लेकिन इन्हें एक छोटे-से वर्चुअल ग्रुप में चल रही तार्किक बहस के विरोध का कितना ध्यान है, कितना वक़्त है, कितनी चिंता है !!

ऐसे लोग कहते हैं कि जब कहानियां झूठी हैं तो आलोचना किसलिए ? ऐसा ही तर्क तथाकथित ‪‎ईश्वर‬ को लेकर भी दिया जाता है कि जब वह है ही नही तो उसपर बात क्यों ? 

अगर इन लोगों ने सचमुच अपने सामाजिक दायरे में यह घोषणा करके कि यह कहानियां झूठी हैं, रीति-रिवाज, कर्मकांड छोड़े होते तो इन्हें अच्छी तरह मालूम होता कि हमारे छोड़ते ही दुनिया से किसी चीज़ या परंपरा का प्रचलन एक दिन में समाप्त नहीं हो जाता। आज की तारीख़ में बहुत-सी स्त्रियां मुक्ति चाहतीं हैं, लेकिन यह सिर्फ़ स्त्रियों पर निर्भर नहीं है ; जब तक समाज का बड़ा हिस्सा नहीं बदल जाता, स्त्रियों को परेशानियां आती रहेंगीं। कौन ‎स्त्री‬ चाहेगी कि ‪‎बलात्कार‬ हो!? मगर होते हैं। होते हैं तो उनपर बात भी करनी पड़ती है। बहुत-से लोग हैं जो ‪‎रिश्वत‬ नहीं देना चाहते ; मगर जब वे कोई काम कराने जाते हैं तो रिश्वत मांगी जाती है। मांगी जाती है और आप नहीं देते तो आपको तर्क-वितर्क करना पड़ता है। भले आप न करना चाहते हों पर करना पड़ता है। वरना किसके पास वक़्त फ़ालतू है ? पचास-सौ रुपए दे दें तो काम हो जाएगा और वक्त भी बचेगा मगर, अगर आपको लगता है कि रिश्वत देना ग़लत है और न देते तो ‪मानवता‬ के लिए कुछ कर पाते, तो इसे न करने की टीस आपको सताती रहेगी। नास्तिक के लिए ईश्वर भी रिश्वत और बलात्कार की तरह है, वह चाहे न चाहे, ‪सामाजिक‬ परिस्थितियों की वजह से उसे ईश्वर पर बात करनी पड़ती है।


मुझे हैरानी होती है कि तथाकथित ‎आस्तिक‬ इतनी मामूली बात भी नहीं जानते कि किसी भी ‎बच्चे‬ के पास अपनी मनपसंद स्थितियों में पैदा होने का विकल्प नहीं होता। अगर किसी बच्चे का जन्म ‪जेल‬ में हुआ है तो क्या उसे ज़िंदग़ी-भर जेल में ही रहना चाहिए ? क्या जेल में पैदा होना बच्चे का अपना अपराध है कि वह ज़िंदगी-भर इसकी सज़ा भुगतता रहे ? ईश्वर और ‪धर्म‬ के नाम पर बचपन से दी गई ‪धारणाएं‬, ‎मान्यताएं‬, मानसिकताएं, सामाजिक स्थितियां, ‪कर्मकांड‬, रीति-रिवाज आदि किसी विवेकवान नास्तिक के लिए काराग़ार की तरह हैं। जब तक वह इनसे मुक्त नहीं हो जाएगा, छटपटाता रहेगा और ‪‎मुक्ति‬ की कोशिश करता रहेगा।




‪-संजयग्रोवर‬

Thursday, 18 June 2015

तसलीमा नसरीन बनाम ‘आधुनिक टोटकेबाज़ी’

मैंने जब तसलीमा नसरीन को पढ़ा, दोबारा पढ़ा, अगली बार पढ़ा और मैं हैरान होता गया। वह महिला बिना किन्हीं इंबों-बिबों के, अलंकारों-झलंकारों के, अर्तीकों-प्रतीकों के, सीधे और साफ़ शब्दों में, हर धर्म और सभी धार्मिक किताबों पर वह कह रही थी जो साहित्य और पत्रकारिता की तथाकथित तोपों को बहुत पहले करना चाहिए था। और ऐसा वह कविता, उपन्यास, लेख सभी में कर रही थी। उसका नाम तेज़ी से फ़ैलने लगा। जल्दी ही वह दुनिया-भर में छा गईं। संभवतः उसके पीछे कोई विचारधारा, कोई दल, कोई समूह रहा होगा। लेकिन एक बात का फ़र्क़ साफ़ था कि धर्मों और मर्दों पर इतने साफ़ शब्दों में कोई पहली बार लिख रहा था। यह उन लोगों की आंखों में खटकना तो स्वाभाविक ही था जो प्रत्यक्ष रुप से, घोषित कट्टरपंथी थे ; धीरे-धीरे उन लोगों की भी मानसिकता सामने आने लगी जो अप्रत्यक्ष रुढ़िवादी या स्वघोषित प्रगतिशील थे।

फ़िर वही, पुराना शातिर सवाल उठाया गया कि तसलीमा की रचनाएं साहित्य की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। मेरी समझ से तब भी बाहर था और आज भी बाहर है कि हमारे लिए दुनिया की, इंसानियत की, महिलाओं की, वंचितों की, अलग पड़ गए या अलग कर दिए गए लोगों की भलाई महत्वपूर्ण है या साहित्य की कसौटी !? एक-एक आदमी दुखी हो, बरबाद हो तो हमें ऐसे साहित्य और उसकी कसौटी को क्या चाटना है जिसकी बिंबयुक्त, प्रतीकात्मक, उलझी हुई भाषा ग़रीब, मेहनतकश, साधारण और पीड़ित पाठक को और उलझा देती हो, भटका देती हो!? जिन लोगों ने कबीर जैसे प्रकट पाखंडविरोधी की लाश में से फूल पैदा कर दिए हों, जिन लोगों के रेडियो, टीवी और पत्र-पत्रिकाओं में कभी नास्तिक नाम का शब्द तक न पढ़ा-देखा-सुना गया हो, तसलीमा पर उनकी तक़लीफ़ समझना कम-अज़-कम मेरे लिए तो क़तई मुश्क़िल नहीं था। किसीने समझने की कोशिश नहीं की जिन लुल्लों ने अख़बार से लेकर सेमिनार तक और फ़िल्म से लेकर टीवी तक नक़ली प्रगतिशीलता की पटरियां बिछाई, वे किसी असली प्रगतिशील की असली रफ़्तार को बर्दाश्त कर भी कैसे सकते थे!?   


कमअक़्ल, कमपढ़ लोगों को तसलीमा किसी धर्मविशेष की समर्थक या विरोधी लगे यह तो समझ में आता था, मगर तथाकथित पढ़े-लिखे और तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी तसलीमा में ऐसे ही खोट नज़र आएं, यह मामला संदेह के घेरे में क्यों नहीं होना चाहिए !?


फ़िर तिकड़मियों की तिकड़में शुरु हो गईं। जब तक तसलीमा अमेरिका में थीं तब तक वे ख़ूब छपतीं भी थीं और जानी भी जातीं थीं। इधर दुनिया-भर में अचानक विभिन्न मीडिया-माध्यमों पर कुछ इस क़िस्म की ‘आधुनिक’ महिलाएं ‘प्रकट’ होने लगीं जो ‘परदा करते हुए भी प्रगतिशील’ थीं और ‘अपने धर्मग्रंथों को पूरी श्रद्धा से मानते हुए भी’ स्त्रीमुक्ति की समर्थक थीं। आज भी इंटरनेट/फ़ेसबुक पर इस ‘टोटकेबाज़ी’ के ढंके-ख़ुले रुप आसानी से देखे भी जा सकते हैं और थोड़ी अक़्ल और सजगता हो तो पहचाने भी। अलावा इसके, पीके से पीकू तक और दीपिका पादुकोण के चर्चित वीडियो तक, यहां की कथित प्रगतिशील स्त्रियां धर्म और भगवान पर कितना चोट कर पा रहीं हैं, करना चाह रहीं हैं, इसका पता आप इन प्रयासों को बारीक़ी से परखकर लगा सकते हैं। धर्म/ब्राहमणवाद के विरोध के नाम पर ‘ओह माय गॉड’ और ‘पीके’ जैसी फ़िल्मों में भी उक्तवर्णित टोटकेबाज़ी ही की गई है।


कहते हैं कि तसलीमा कई सालों से भारत में है। पहले दो-एक कॉलमों और समारोंहों में यदा-कदा नज़र आतीं थीं, बाद में ट्वीट करतीं दिखाई देतीं थीं ; अब कहां क्या कर रहीं हैं, मालूम नहीं। पत्र-पत्रिकाएं मैं न के बराबर पढ़ता हूं, टीवी कभी-कभार देखता हूं इसलिए किसी भी बात को तथ्य की तरह पेश करना ग़लत होगा ; उम्मीद है तसलीमा अपने दोस्तों की देख-रेख में ख़ुश होंगी, कहीं छप रहीं होंगी, कहीं दिख रही होंगीं।


मैं कल भी उनका प्रशंसक था, आज भी हूं।


बाक़ी शिल्प-शैली, इंबो-बिंबों वाले लोग अपनी शिक्षा-संबंधी क़िताबों में भी बहुत पढ़े, उसके बाद भी बहुत पढ़े । इन लोगों को पुरस्कार वगैरह मिलें, ये मशहूर हों, पैसा कमाएं, अच्छे कपड़े पहनें, लोग इनसे ऑटोग्राफ़ लें, इनकी बातों पर भक्त की तरह विश्वास करें....ये सब हमारे जैसे समाजों में कोई बहुत हैरानी की बात नहीं लगती।


पर इनके लिखे से वाक़ई कुछ बदलता है, कुछ अच्छा होता है, इसपर आसानी से न तो मैं पहले विश्वास कर पाता था न आज कर पाता हूं।


-संजय ग्रोवर
18-06-2015


Wednesday, 10 June 2015

‘मैं’ किसमें है, यह तो ‘मैं’ ही बताऊंगा.....

लगभग होश संभालते से ही देखा है कि अपने यहां की सामाजिकता और मानसिकता में ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ या ‘चोरी और सीनाज़ोरी’ का तत्व प्रमुख रहता है। मैं देखता हूं कि यहां दूसरों में ‘मैं’ होने का आरोप लोग तब लगाते हैं जब चीज़ें उनके ‘मैं’ के हाथ से फ़िसलने लगतीं हैं। समाज जो चंद अहंकारियों की इच्छानुसार जी रहा होता है, जब अपनी मर्ज़ी और समझ से काम करने लगता है तो उन्हें समाज में ‘मैं’, ‘नकारात्मकता’, ‘स्वार्थवादिता’ वगैरह-वगैरह बढ़ती लगने लगती है। असल में ये ख़ुद हद दर्ज़े के पाखंडी, स्वार्थी और ‘मैं’वादी लोग होते हैं। इनकी बेशर्मी की हद यह होती है कि जिस चीज़ से सिर्फ़ इन्हें फ़ायदा होता है, करनेवाले तक को नुकसान होता है (जैसे कि भारत की परंपरागत सार्वजनिक सफ़ाई व्यवस्था), उसे ये नुकसान सहनेवाले के लिए भी सकारात्मक घोषित कर देते हैं। ये एक क़िस्म की सार्वजनिक, सरे-आम ठगी है जिसके लिए भारी सज़ा होनी चाहिए, मगर ऐसे लोग यहां समाज को दिशा देते पाए जाते हैं।

और भी मज़े की बात है कि यहां जब दस-बीस छिछले स्तर के ‘मैं’ जुड़कर एक साथ बैठ जाते हैं तो वे समझते हैं कि अब हम ‘हम’ हो गए हैं और बड़े ‘सामाजिक’ हो गए हैं। मगर कोई यथार्थवादी, व्यवहारिक और अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करनेवाला व्यक्ति आसानी से समझ सकता है जितने ज़्यादा ‘मैं’वादी इकट्ठे होंगे, उतना ‘मैं’ का विस्तार होगा और समाज के लिए ख़तरों और नुकसान की संभावनाएं बढ़ेंगीं।

आपने कविसम्मेलनों से लेकर अन्य सभाओं तक में आम देखा होगा कि किस तरह मंच पर उपस्थित एक ‘मैं’ दूसरे ‘मैं’ को भगवान(?)समान साबित करने में शब्दों, वाक्यों और भाषा की सारी सीमाएं पार कर जाने में भी नहीं चूकता। इसलिए नहीं चूकता कि थोड़ी देर बाद ही उसको भी ऐसी ही ‘प्राप्ति’ होनेवाली है। यह कोई सामाजिकता, समाजसेवा या परोपकार नहीं है बल्कि ‘मैं’ और ‘मैं’ का अवसरवादी गठजोड़ है, माफ़िया है, नेक्सस है।

‘मैं’वादी को समाज की ज़रुरत सबसे ज़्यादा होती है, क्योंकि जब तक दूसरा साथ नहीं होगा, अहंकार की पूर्ति संभव ही नहीं है। सिर्फ़ आईने की तारीफ़ के बल पर ज़्यादा दिन नहीं काटे जा सकते। जब तक कोई 'नीचा' सामने नहीं होगा, आप ऊंचे कहलाओगे कैसे!?

इसके अलावा भी, ‘मैं’वादी आदमी वह होता है जो चाहता है कि दुनिया में सभी लोग उसीकी तरह, या उसीके कहे अनुसार खाएं, वैसे ही बोलें, वैसे ही नाचें, वैसे ही जिएं। इसके लिए ऐसा अहंकारी आदमी कुछ भी करने, कहीं भी जाने, कहीं भी घुसने को तैयार रहता है।

सभी को अपनी तरह बना देने का यह मानसिक रोग है ही कुछ ऐसा।

-संजय ग्रोवर
10-06-2015

Monday, 8 June 2015

मुहावरे, कहावतें और अंधविश्वास

मुहावरे और कहावतें भी कई तरह के अंधविश्वासों का प्रचार-प्रसार करते हैं।

जैसे एक मुहावरा है-‘ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर होता है।’ सोचने की बात है कि आखि़र ख़ाली दिमाग़ का पता कैसे लगता है !? एक आदमी पूरे दिन लगा हो काम में मगर रुपए, महीने में 500 ही लेके आए, तो पूरी संभावना है कि उसके घर के लोग ही उसे ख़ाली घोषित कर दें। या कोई आदमी चिंतन आठ घंटे करे, क़िताबें पांच घंटे पढ़े और लिखने में एक घंटा लगाए तो लोग कह सकते हैं कि यह आदमी आठ घंटे ख़ाली रहता है। जो सिर्फ़ दूसरों को पढ़कर नहीं लिखते, अपना भी सोचते हैं, वे जानते हैं कि चिंतन या ‘सोचना’ कोई पार्ट टाइम जॉब नहीं है। दिन में चौबीस घंटे भी कम हैं। ‘ख़ाली’ रहने के ऐसे और भी उदाहरण आपको मिल जाएंगे, ये मेरे अनुभव और आसपास से आते हैं तो मैंने ये बता दिए।

दूसरी तरफ़ जिन्हें हम लोग बिज़ी कहते हैं, उनमें तरह-तरह के लोग हैं। मुझे याद है जब मैं किशोर था और किसी दफ़तर में काम कराने जाता था तो लोग अकसर अपनी सीटों पर नहीं मिलते थे। जो मिलते थे, काम नहीं करके देते थे, किन्हीं और ही चीज़ों में व्यस्त होते थे। ज़ाहिर है कि वे तनख़्वाह तो अच्छी-ख़ासी लेकर जाते होंगे घरों में, तो घर वाले, दोस्त-यार, परिचित, रिश्तेदार, काहे को कहेंगे कि हमारा आदमी पूरे दिन ख़ाली रहता है।

दरअसल ख़ाली का कुछ पता नहीं। ऐसे दुकानदार होते हैं कि अपनी दुकान से ग्राहक हटा नहीं कि इधर-उधर झांकने पहुंचे नहीं कि क्या चल रहा है। कहने को वे यह भी कह सकते हैं कि भाई हम तो जिसको झांक रहे थे वह ख़ाली रहता है, इसलिए झांकना ज़रुरी था। लेकिन तय कैसे हो कि ख़ाली कौन है!?

और जिसके दिमाग़ में शैतानी भरी हो वह क्या बिज़ी होते ही एकदम संत बन जाएगा !? पहले तो वह उसी काम में कुछ गड़बड़ करेगा जिसमें बिज़ी है। फ़िर ख़ाली होगा तो फ़िर तो जो करना है करेगा ही।

ऐसे ही मुहावरा है-‘बेपैंदी का लोटा।’ मुहावरे कुलजमा एक पंक्ति के तो होते हैं, उसमें बात को कितना समेटा जा सकता है ! कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि हिंदू-मुसलमान से ऊपर उठो। पूछो कैसे उठो !? वे कहेंगे कि हमारी धारा, हमारा वाद पकड़ लो ; उठ जाओगे। उनका वाद पकड़े-पकड़े एक दिन किसीको लगा कि यार यहां भी वही सब हो रहा है, जो हिंदू-मुस्लिम में हो रहा था, तो वो सोचेगा ही कि यार, अब इससे भी ऊपर उठना चाहिए। अब ये वाद वाले लोग कहेंगे कि भई तुम तो ‘बेपैंदी के लोटे’ बनने जा रहे हो, न इधर के रहोगे, न उधर के'। तो इनसे पूछना बनता है कि पुरानी दुनिया और पुराने लोगों के हिसाब से तो हम ‘बेपैंदी के’ तब ही हो गए थे जब हमने हिंदू-मुसलमान होना छोड़ा था। अब हम इस मुहावरे को कहां सही लागू हुआ मानें !? 

फिर और कुछ लोग हैं ; उन्होंने वाद और धारा भी छोड़ दी। छोड़ दी, अच्छी बात है। मगर इन्होंने अपने गुट बना लिए। अब ये वही हरकतें कर रहें हैं जिन्हें वाद और धारा में छोड़कर आए थे। बल्कि वहां कोई कसर शेष थी तो इन्होंने उसे भी ख़त्म कर दिया। ये कहते हैं कि कोई आदमी अगर हमारे गुट का है तो उसने जो भी तर्क दिया, उसे चुपचाप मान लो, वरना हम हो-हुल्लड़ करेंगे, आक्षेप लगाएंगे, तरह-तरह से परेशान करेंगे।

यह लो जी ! ऐसे लोटे पैंदी के हों कि बेपैंदी के, फ़र्क क्या पड़ता है? जो समर्थ आदमी है, जिसके पीछे कोई गुट है, धारा है, भीड़ं है, अर्थतंत्र है ; उसका क्या !? वो चाहे तो रोज़ नई पैंदी लगवा सकता है।

मुहावरे बेचारे छोटे हैं और पूर्वाग्रहों, मान्यताओं, धारणाओं, अंधविश्वासों की भीड़ बहुत बड़ी है। मुहावरे इनके आगे क्या हैसियत रखते हैं (एक मुहावरा और ज़हन में घूम रहा था विश्लेषण समेत, मगर ऐन वक्त पर धोखा दे गया याद्दाश्त को! चलिए उसे अगली दफ़ा जोड़ लेंगे स्टेटस में)।

तो अंधाविश्वास तो गड़बड़ करेगा ही। और मुहावरे, लोकोक्तियां और कहावतें भी इसकी चपेट में आ ही जाते हैं।

-संजय ग्रोवर
21-08-2013

(on FaceBook)

Tuesday, 2 June 2015

पोंगों, शातिरों और मौक़ापरस्तों की ‘प्रगतिशीलता’

अगर कोई बार-बार आपसे कहे कि मैं ऊंच-नीच नहीं मानता, जात-पात नहीं मानता मगर थोड़ी ही देर बाद जब किसी बहस के दौरान उसे कोई तर्क न सूझे तो वह कहने लगे कि ‘अगर तुम आकाश पर थूकोगे तो वह लौटकर तुम पर ही गिरेगा’ तो इसका क्या मतलब हुआ? साफ़ ही है कि वह व्यक्ति न सिर्फ़ ऊंच-नीचवादी है बल्कि आत्ममुग्ध भी है। जो ख़ुदको आकाश बता रहा है वह सौ प्रतिशत ऊंच-नीचवादी है। वह आपको तो धोखा दे ही रहा है, हो सकता है जन्म से मिले अतिआत्मविश्वास और ‘ख़ानदानी’ ग़लतफ़हमियों के चलते ख़ुदको भी धोखा दे रहा हो।

प्रगतिशीलता का जिस तरह का इस्तेमाल यहां होता है वह भी किसी पोंगापंथ से कम नहीं है। प्रगतिशीलता की आड़ में चुन्नू-मुन्नूस्मृति यहां आज भी इस तरह से जारी है कि जो लोग ‘फ़ासीवाद आ गया’, ‘फ़ासीवाद आ गया’ का शोर मचा रहे होते हैं वही उस ‘फ़ासीवाद’ से फ़ायदे और पुरस्कार सरेआम ले रहे होते हैं। ‘चोरी और सीनाज़ोरी’ का आलम यह है कि इसपर भी उन्हें शर्म तो नहीं ही आती बल्कि वे ऐसे लोगों को फ़ासीवाद और कट्टरपंथ से जुड़ा साबित करने में लग जाते हैं जो एक स्वतंत्र जीवन जीने की ख़ातिर पुरस्कार, वज़ीफ़े, तथाकथित सफ़लता, कैरियर, शादी जैसी किसी भी बनावटी उपलब्धि या संस्था को नज़रअंदाज़ करते आए हों, उन्हें रत्ती-भर भाव न देते हों।

शर्मनाक़ स्थिति यह है कि हम सारी गंदी परंपराओं को भी बनाए रखेंगे, उनसे मिलनेवाले सारे मज़े लूटेंगे, फिर भी हम प्रगतिशील और परोपकारी हैं, और तुमने इस बात पर उंगली भी उठाई तो हम तुम्हे कट्टरपंथी साबित कर देंगे, क्योंकि सारे भोंपू हमारे हिसाब से बजते हैं, सारे ढोल हमारी ताल, हमारे इशारे पर पिटते हैं।

एक और उदाहरण से बताता हूं, जब पीके फ़िल्म आई और भक्तगणों ने प्रशंसा और विरोध अभियान शुरु किए तो न तो किसी संघी ने यह सवाल उठाया, न किसी वामी ने, न किसी कांग्रेसी ने कि पीके नाम की इस तथाकथित महाक्रांतिकारी फ़िल्म के अवतारी नायक ने अंत में तो भगवान को स्वीकार कर ही लिया है तो इसकी क्रांतिकारिता का इतना शंख क्यों फूंका जा रहा है ?

एक और हास्यास्पद तथ्य यह है कि जब भी धर्म और अंधविश्वास के खि़लाफ़ आवाज़ उठती है तो प्रगतिशीलता का पोज़ बनाए बैठे लोग कुछ (सलेक्टेड)बाबाओं और दो-एक संस्थाओं को ग़ालियां देना शुरु कर देते हैं। लगता है जैसे इन बाबाओं और संस्थाओं का आविष्कार ही इसलिए किया गया कि लोगों का ध्यान इन्हीं तक सीमित हो जाए और असली अपराधी न सिर्फ़ लोगों की नज़रों से बचे रहें बल्कि बेख़ौफ़ अपना काम भी आगे बढ़ाते रहें। इन तथाकथित प्रगतिशीलों के न सिर्फ़ अपने ख़ास बाबा मौजूद हैं बल्कि इन्होंने खिलाड़ियों तक को भगवान घोषित कर रखा है। फिर भी ये प्रगतिशील बने बैठे हैं।

हमारी भी ग़लती है जो हम तुरत-फुरत ऐसे लोगों को प्रगतिशील मान लेते हैं जिनके आचार-विचार-व्यवहार, घटिया रीति-रिवाजों, अपने नायकों को साम-दाम-दंड-भेद-छल-बल से देवता/आयकन/भगवान/महापुरुष/पवित्र परंपरा बनाने, रुख़ बदलकर लहर पर सवार हो जाने की आदतें बिलकुल वैसी ही होतीं हैं, जैसी दूसरों की आदतों का विरोध दिखाकर वे ख़ुदको प्रगतिशील बताते हैं। बस उनके साइनबोर्ड की इबारत अलग होती है बाक़ी सब एक-सा होता है।

ऐसा शायद इसलिए होता है कि हम पहले साइनबोर्ड देखते हैं, बाद में व्यवहार या हरक़तें देखते हैं। चूंकि साइनबोर्ड को लेकर हमारे कुछ पूर्वाग्रह हैं(जिनमें से कुछेक सही भी हो सकते हैं)इसलिए हम उन्हीं पूर्वाग्रहों के अनुसार निर्णय ले लेते हैं, सही, ग़लत तय कर लेते हैं। और ऐसा संभवतः इसलिए भी होता है कि कभी-कभी उसमें एक पक्ष के साथ हम जुड़े होते हैं। फ़िर हम वही करते हैं जो गली-मोहल्लों की लड़ाईयों में होता है। भले हमारा अपना बच्चा किसीको चपत मारकर भाग आया हो, मगर हम यह इसलिए मानने को तैयार नहीं होते कि ‘हमारे ‘ख़ानदान’ में तो यह सिखाया ही नहीं जाता’ या ‘हमारा ‘ख़ानदान’ तो इसके लिए जाना ही नहीं जाता’। ऐसी अजीब, अतार्किक ज़िद या घोषणा की असल वजह अहंकार और ढिठाई के अलावा और क्या हो सकती है? किसी भी पक्ष के प्रति अंधा झुकाव रखने से और हो भी क्या सकता है ?

एक काम तो हम कर ही सकते हैं कि प्रगतिशीलता और रुढ़िवादिता को किसी(और किसी और के दिए) चश्मे से न देखें बल्कि नंगी आंखों से उनकी हरक़तों को परखें और पकड़ें।

-संजय ग्रोवर
02-06-2015