BookShelf

Friday, 16 October 2015

नास्तिकता और पुरस्कार से याद आया कि......


पिताजी सुबह चार बजे उठ जाते और किसी न किसी काम में लग जाते, कभी दरवाज़ों की चौखटों में तारपीन का तेल लगाते तो कभी बहियां लिखने बैठ जाते। वहां से उठते तो दूध लेने चले जाते और सब्ज़ी भी ले आते। बच्चों की क़िताबे, कपड़े लाने से लेकर लोगों के शादी समारोहों और शवयात्राओं में जाने तक बस वे काम, काम और काम ही करते रहते। न सिगरेट न शराब, न गाली न लड़ाई, न फ़िल्म न कोई और मनोरंजन। रात को भी कई बार ग्यारह-बारह बजे तक काम करते। लोग अकसर उनकी तारीफ़ करते कि कितने भले और नेक आदमी हैं ; कितने दुनियादार और कितने समझदार हैं। हम बच्चे भी बड़े ख़ुश होते और सोचते कि आदमी को ऐसा ही होना चाहिए।

मगर एक हक़ीकत और भी थी। वे दूसरों के इतना ज़्यादा काम आते कि हम चिढ़ जाते। हमें लगता कि लोग उन्हें उल्लू बनाकर अपना काम निकाल लेते हैं। उनकी तमाम दुनियादार कुशलता और सफ़लता के बावज़ूद हमारे काम कहीं न कहीं अटके रहते। हमारी बिजली ख़राब होती तो कई बार एक-एक हफ़्ते तक ख़राब रहती। पिताजी को टाइम न मिलता और पैसे देकर या हाथ-पैर जोड़कर काम कराने के लिए ख़ुदको तैयार न कर पाता। आज तो मुझे इस बात का कोई अफ़सोस नहीं है मगर उस वक़्त अपराधबोध और तनाव से भरा बैठा रहता। हर तरफ़ से डांट पड़ती कि एक दूसरों के लड़के हैं और एक यह है, किस काम का है ? मैं सोचता कि पिताजी की इतनी दुनियादार सफ़लता आखि़र किस काम की है किवे सालों तक अपने घर तक चुंगी के नल की पाइप तक न डलवा सके! 


आज तो मैं जानता हूं कि पिताजी और हमारे जैसे लोगों को हमेशा मर-मर कर ही जीना होता है, कोई मौसम आए, कोई सरकार आए, हमारे जैसे लोगों के लिए कुछ भी नहीं होता। हमें हमेशा धक्के खाने होते हैं और ताने सुनने होते हैं।

बहुत शर्मीला, चुप्पा और डरपोक होने के बावजूद मैं कई बार ख़तरे उठा लेता। एक बार मेरे दो दोस्तों, जो आपस में चचेरे भाई थे, का आर एस एस के एक लड़के से परिचय हो गया। अब वो रोज़ सुबह-सुबह उन्हें बुलाने आ जाता। वे परेशान हो गए और वह उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं था। उन्होंने मुझे बताया। मैंने किसी झोंक में आकर कहा कि मुझे मिलवाओ मैं बात करता हूं। उन्होंने मिलवा दिया। उस वक्त जैसी भी मुझे समझ थी, जितनी भी हिम्मत थी, मैंने उससे बहस की। उसके बाद शायद दो-चार बार और वह उनके पास आया और अंततः उनका छुटकारा उससे हो गया।

अच्छा संयोग था कि पिताजी और माताजी, दोनों की ही पूजापाठ में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हां, त्यौहारों और दूसरे कर्मकांडों में आने-जाने की दुनियादारी दोनों ही पूरी निभाते। मेरी दिलचस्पी उसमें भी बहुत ज़्यादा नहीं थी। पिछले 5-7 सालों से तो मैंने इन सब चीज़ों से पूरी तरह छुटकारा पा लिया है और इस मामले में बहुत सुक़ून से हूं।

राजनीति में मेरी दिलचस्पी कभी नहीं रही, यहां तक कि आम लोग घरों, दुकानों, समारोहों में आपस में जो छोटी-बड़ी राजनीति करते हैं, मुझे उससे भी कोफ़्त होती है। मगर जब इंमरजेंसी हटी और अत्याचारों की कहानियां फैली तो मुझपर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा। मेरा सीधे-सीधे किसीसे कोई लेना-देना नहीं था मगर फिर भी मैंने अपने एक दोस्त की दुकान पर उपलब्ध बड़े-बड़े गत्ते लेकर अपने हाथों से जनता पार्टी के चुनावचिन्ह हलधर के कुछ कटआउट भी बनाए जिन्हें दोस्त की मदद से खंबों पर टंगवाया। इस चक्कर में एक-दो पारंपरिक कांग्रेसियों से छुटपुट झगड़े भी हुए। मैंने अपने दोस्तों के साथ आपस में चंदा भी किया और जनता पार्टी के स्थानीय दफ़तर में देने पहुंच गए। चूंकि मैं झिझकता था सो मैंने एक दोस्त को अंदर भेजा। दोस्त ने वापस आकर बताया कि वे कह रहे हैं कि इन पैसों के बिल्ले ख़रीद कर बांट दो। ज़ाहिर है कि बहुत छोटी राशि रही होगी।
कांग्रेस और जनता पार्टी के उस पूरे चुनावकाल के दौरान और उसके बाद भी मैं काफ़ी उद्वेलित रहा। फिर जनता पार्टी की सरकार भी बन गई। और प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में उसमें आए दिन झगड़े होने लगे। साल-दो साल में सरकार लुढ़क गई। उसके बाद राजनीति में मेरी जो रुचि ख़त्म हुई, आज तक नहीं बन पाई।   

इन्हीं किन्हीं दिनों के बीच, उन्हीं में से एक दोस्त शाखा में जाने लगा। सुबह कभी-कभी मैं भी घूमने जाता था, तो एक बार दोस्तों ने दूर से शाखा दिखाई थी कि देख, वह है शाखा जहां हमारा दोस्त जाता है। फिर एक दिन पता चला कि शाखा में किसी खेल के दौरान हुई छोटी-सी ग़लती की सज़ा के तौर पर उस दोस्त को दूसरे कई लड़कों से थप्पड़ पड़वाए गए और वह घंटो रोता रहा। बहुत दुख हुआ मगर करते क्या, हमारी हैसियत भी क्या थी!

शाखा से पहले हमने जिन लोगों का दबदबा देखा था, जिनके मारे हमारी जान निकली रहती थी, अकसर कांग्रेसी होते थे। उस वक़्त तो मैं जाति-वर्ण नहीं जानता था, पर आज जितना जानता हूं, उनमें दबंग कर्मकांडी ब्राहमण भी होते थे। इमर्जेंसी के बाद भी कांग्रेस कई साल वहां कथित उच्चवर्णीय आतंक की तरह स्थापित रही। 

ख़ैर! जिंदगी में वही एक-दो बार थी जब दूर से शाखा देखी थी। एक-दो बार संभवतः कोई कांग्रेस की एक-दो रुपए की रसीद काट गया। जब अख़बार में छपने लगा तो तरह-तरह की संस्थाओं की चिट्ठियां आ जातीं थीं। उनमें से किसीसे छोटा तो किसीसे लंबा पत्र-व्यवहार हो जाता। कई लोग लेख छापते तो पैसे के बदले प्रेसकार्ड बनाकर भेज देते जो कि कभी इस्तेमाल न होते। एक दो-बार दिल्ली में किन्हीं छोटे-मोटे कामों (जैसे कोई सर्टीफ़िकेट आदि बनवाना) से किसी तीसरे के साथ एक-दो छोटे-बड़े नेताओं के पास गया। एक बार किसीने शादी-वादी के चक्कर में किसी बिरादरी के किसी रजिस्टर में नाम लिखवा दिया। यानि सारी ज़िंदगी में दल, जाति, संस्था, वर्ण, बिरादरी, राजनीति वगैरह से कुल इतना ही संबंध रहा।

लिखने को चुना तो पाया कि छपने की दुनिया में भी पूरी तरह से वही सब गंदगी भरी है जिसे छोड़कर लिखना चुना है। बहरहाल, फिर भी, दिल्ली आने से पहले अच्छा-ख़ासा छप चुका था। दिल्ली आकर यथास्थिति को और क़रीब से देखा। धीरे-धीरे समझ में आया कि विचारधाराओं के फ़र्क़ कहने के लिए हैं, 'काम करने' के अंदाज़ सबके एक जैसे हैं। एक दिन किसीने बताया कि एक जगह कविसम्मेलन है, हज़ार रु का चैक़ मिलेगा लेकिन पहले पांच सौ रु. कैश देना होगा, चलोगे क्या? मैंने कहा चला तो जाऊंगा मगर बाक़ी पांच सौ रु भी वहीं घोषणा करके दान कर दूंगा। 

हालांकि वे सज्जन विश्वसनीय थे पर पता नहीं किस तरह, बात शायद वहां पहुंच गई और उसके बाद मेरे पास वह ‘ऐक्सचेंज ऑफ़र’ नहीं आया।
उसके बाद से आज तक मिले-जुले तमाशे आए दिन देखने को मिलते रहते हैं।


-संजय ग्रोवर
16-10-2015
(जारी)