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Saturday, 16 July 2016

‎प्रगतिशीलता‬ !?

कई महीनें पहले मित्र नीलांबुज ने एक पोस्ट लगाई थी जिसमें ‪‎निराला‬ की प्रगतिशीलता का ज़िक्र यूं आया था कि उन्होंने अपनी ‪‎बेटी‬ की ‎शादी‬ में पंडित को नहीं बुलाया था, ‪‎मंत्र‬ ख़ुद ही पढ़ लिए थे। मैंने तभी कहा था मुझे तो इसमें कहीं प्रगतिशीलता नहीं नज़र आती।

क्या प्रगतिशीलता इतनी ही आसान चीज़ है!?

फ़िर तो ऐसा हो जाएगा कि यार मैं पहले सोमवार को अंधविश्वासी होता था, अब मैंने क्रांति कर दी है, परंपरा तोड़ डाली है अब मैं बुधवार को अंधविश्वासी होता हूं।

क्या प्रगतिशीलता मज़ाक़ है!?

प्रगतिशीलता के नाम पर अपने यहां यही सब चलता है कि अब ‎स्त्रियां‬ भी ‎अंतिम संस्कार‬ में जाने लगीं हैं, ग्रंथ पढ़ने लगीं हैं! कुछ स्त्रियां और कुछ पुरुष इसपर ख़ुश हो सकते हैं, मगर संपूर्णता में देखें तो यह रुढ़िवाद का विस्तार है, रुढ़िवादियों की जीत है। स्त्री सचमुच प्रगतिशील और साहसी होती तो कहती कि ये बेमतलब के कर्मकांड न तो मैं करुंगी और न, हे पुरुष, तुम्हे करने दूंगी।

'इतनी सारी प्रगतिशीलता' के बावज़ूद भारत में ‎दहेज‬ तक न बंद हो सका !!! असलियत जानने के लिए किसी विवाह समारोह में जा देखें। पुरुष तो क्या, किसी स्त्री को भी वहां चल रहे लेन-देन पर नाराज़ होता न पाएंगे। हो सकता है कोई मजबूरी हो बोल न पाने की मगर नाराज़गी हो तो चेहरे पर तो दिखाई देती है। चेहरे के भाव छुपा लो तो आंखें फ़िर भी बोल पड़तीं हैं। मगर कहां!! वहां तो सब ऐसे प्रसन्न दिखाई देते हैं जैसे दुनिया की सारी समस्याएं ख़त्म हो गईं हों!

और कोई क्यों ऐसे लोगों को प्रगतिशील कहेगा जो हर किसीको भगवान बनाने में लगे रहते हों!? पुराने भगवानों से छुटकारा हुआ नहीं और ये रोज़ाना नए खड़े किए जा रहे हैं! निराला पर कुछ न कहो, गुलज़ार पर मत बोलो, जावेद अख़्तर पर क्यों बोले.......

ये प्रगतिशील लोग हैं!? ये कहते हैं कि ‎मशहूर‬ आदमी की ‎आलोचना‬ करना ‎चांद‬ पर थूकना है!! कौन तय करेगा कौन चांद है!? यू तो ‎साइंस‬ ने बता दिया है कि चांद में गड्ढों के सिवाय कुछ नहीं है, चमकता भी ‪‎सूरज‬ की रोशनी से है। चलो झूठ-मूठ मान लिया कि चांद की रोशनी बड़ा चमत्कार है, फिर भी आदमी को चांद होने की क्या ज़रुरत है!? और ‪‎मार्क्सवादी‬ कहे कि ‘बड़े आदमी की छोटे लोग इसलिए आलोचना करते हैं कि इस बहाने उनका भी नाम हो जाता है’! ये ठहरे मार्क्सवादी! साम्यवादी! समानतावादी! बड़ा-छोटा कर रहे हैं!?

और ‪अध्यात्मवादी‬ !? महाविनम्र!! ईश्वर या किसी अध्यात्मिक शक्ति के सामने ख़ुदको तिनके समान मानते हैं!! इन्हें चांद बनने की क्या ज़रुरत पड़ गई!? अपने समय के सबसे ज़्यादा प्रगतिशील प्रेमचंद की लानत-मलामत हो सकती है, मार्क्स की दाढ़ी खींची जा सकती है, अंबेडकर को गलियाआ जा सकता हैं, नेहरु-गांधी पर बौछार हो सकती है तो निराला और प्रसाद उससे बाहर कैसे रह सकते हैं!? उदयप्रकाश जीतेजी रोज़ाना हड़काए जा सकते हैं तो गुलज़ार क्यों बचे रहें!?

कोई चांद-पांद नहीं है, जिसको चांद बनने का शौक हो उसे चांद पर ही जाकर रहना चाहिए। यह अजीब तमाशा है अपने यहां कि एक ही आदमी को ‎ज़मीन से जुड़ा‬ भी बताया जाता है फ़िर उसे चांद भी बताया जाता है। उसे ‪‎समानता‬ का ‪‎पक्षधर‬ भी बताया जाता है फ़िर उसीको इतना बड़ा भी बताया जाता है कि कोई उंगली भी न उठा सके!!

‎विचित्र‬ प्रगतिशीलता है!!

मुझे तो कतई भी नहीं चाहिए चांद।

जिन्हें चाहिए उन्हें भी उसके गड़ढों की हक़ीकत समझने के लिए तैयार रहना चाहिए।

-‎संजय ग्रोवर‬

16 जुलाई 2013

(अपना एक फ़ेसबुक स्टेटस)




Friday, 15 January 2016

रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-3

(रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-2)


रंगो और प्रतीकों का खेल एक चालाक़ खेल है। इसमें नफ़रत फैलानेवाले शख़्स के लिए प्रेम का कोई प्रतीक चुनकर लोगों को झांसा देने की मज़ेदार सुविधा है, इसमें वंचितों को वंचित बनाए रखकर उनका मसीहा बन जाने का पूरा जुगाड़ है, इसमें स्त्रीविरोधी होते हुए भी स्त्रियों का पसंदीदा बन जाने के अच्छे चांसेज़ हैं।

मुझे याद आता है कि फ़ेसबुक के मेरे दो ग्रुपों में ऐसी कई घटनाएं हुईं। ‘नास्तिक’ ग्रुप में कुछ लोगों ने कहा कि यहां स्त्रियां नहीं हैं। हालांकि ऐसा नहीं था कि ग्रुप में स्त्रियां बिलकुल नहीं थीं, मगर काफ़ी वक़्त तक मैं चुपचाप सुनता और देखता रहा। जब ठीक लगा, इसपर स्टेटस लिखा। हंसी यह देखकर आती है कि लोग कैसी-कैसी बेतुकी बातों में ख़ुद भी उलझे हुए हैं और दूसरों को भी बहका रहे हैं। कलको आप कहेंगे कि ग्रुप में मुसलमान कितने हैं, अगर कम हैं तो आप मुस्लिम-विरोधी हैं, बच्चे कम हैं तो आप बच्चा-विरोधी हैं, ग्रुप में अगर कोई लैस्बियन नहीं है तो आप लैस्बियन-विरोधी हैं, ग्रुप में अगर सांवले लोग नहीं हैं तो आप उनके खि़लाफ़ हैं.........। हैरानी होती है कि कैसे-कैसे लोग यहां चिंतक और प्रगतिशील बने बैठे हैं। अगर किसी ग्रुप में हम नास्तिकता पर विचार करने बैठे हैं और वहां सभी आमंत्रित हैं तो जो भी बात करना चाहे, करे। हम क्या हर तरह की वैराइटी ज़बरदस्ती पकड़-पकड़कर जमा करेंगे ? हम विचार करने बैठे हैं या मिठाई की दुकान खोलकर बैठे हैं, या हम कोई फ़रमाइशी रेडियो-कार्यक्रम चला रहे हैं !? भारत में नास्तिक वैसे ही ढूंढे से मिलते हैं तिसपर भी महिलाएं !? और महिलाएं जहां चाहें वहां नास्तिक बनें, हमारा कोई ठेका है कि हर किसीको हम ही बनाएंगे!! 

और इस दृष्टि से सोचें तो बुद्ध (जैसाकि सुना है उनके यहां स्त्रियों की मौजूदगी नहीं थीं) स्त्रीविरोधी हुए, राजेंद्र यादव (चूंकि दूसरी शादी किए बिना सहायक के साथ रहते थे) स्त्रीविरोधी हुए और वे सब ज़मींदार, राजा-महाराजा और गैंगस्टर नारीवादी हुए जो अपने घरों-महलों-अड्डों में स्त्रियां जमा करके रखते थे। एक पुराने काल्पनिक नायक जो नदी-किनारे, कहानीनुसार, स्त्रियों के कपड़े ले-लेकर भाग जाते थे फिर भी स्त्रियां उनके आसपास मंडरातीं थीं, तो क्या फ़ॉर्मूलानुसार स्त्रियों को लुभाने के लिए हर कोई यही करता फिरे !? क्या रोज़ाना हर किसीकी पसंदानुसार उल्टे-सीधे कामकर उसे लुभाना ही ज़िंदगी है ? आदमी को दूसरा कोई काम नहीं क्या ? 

मगर प्रतीकात्मकता-पसंद लोगों के मानदण्ड इतने ही हास्यास्पद हैं। अगर कोई मर्द अपने घर में बिना किसी दूसरे मर्द/मानव के रहता हो तो इनके हिसाब से तो वो भी मर्द या मानवविरोधी हुआ!! यह तो ऐसे हुआ कि जब तक आप कोट-टाई पहने हैं तब तक पढ़े-लिखे हैं, रात को जैसे ही आप पायजामा पहनेंगे, अनपढ़ हो जाएंगे!! इन र्खों की तथाकथित बुद्धि के अनुसार तो होगा यही कि आदमी जिन-जिन मूल्यों का समर्थक है उनकी एक-एक निशानी चौबीस घंटे अपने शरीर पर, घर में, दफ़्तर में, रास्ते में.....हर जगह प्रदर्शित करे वरना ये उसको विरोधी घोषित कर डालेंगे। अब सोचिए कि आदमी इनकी बुद्धि से चला तो उसका दिन कैसे गुज़रेगा और रातों की क्या गत बनेगी !?

निशानियां पाखंडियों को चाहिएं होतीं हैं, करनेवाले चुपचाप अपना काम करते हैं, अपने स्वभाव को जीते हैं। 

इनकी मेधा तो ऐसी है कि जब तक आप दुनिया के सारे धर्मों, देशों के लोगों के साथ उनके त्यौहार नहीं मनाएंगे, उनकी मिठाईयां नहीं खाएंगे, उनके साथ उनके त्यौहार पर नाचेंगे नहीं...तब तक ये आपको उनका दुश्मन मानेंगे। अगर आपका कोई क्रिश्चियन दोस्त नहीं है तो आपको इनकी वजह से बनाना पड़ेगा या किराए पर लाना पड़ेगा। अगर आपका कोई रशियन दोस्त नहीं है तो आप वहां जाकर कुछ रशियन दोस्त बनाईए, किराया-ख़र्चा ये उठाएंगे। दुनिया में अगर एक भी आदमी ऐसा है जिससे कभी आप मिले नहीं, उसके साथ कभी खाया-पिया नहीं, सलाम-नमस्ते-गुड मॉर्निंग इत्यादि नहीं की तो इनके अनुसार आप उसके दुश्मन हुए। कर लीजिए क्या करेंगे ?

कई लोग समय-समय पर अपने परिवारों की भी प्रदर्शनी लगाते हैं कि देखिए मैं हिंदू हूं, पत्नी मुस्लिम है, बेटा क्रिश्चियन है, फ़लां ये है, ढिकां वो है....और हम पचास/पांच सौ साल से एक साथ रहते हैं। मैं सोचता हूं कि पचास/पांच सौ साल तक साथ रहकर भी हिंदू हिंदू रहा, क्रिश्चियन क्रिश्चियन और मुस्लिम मुस्लिम ; आदमी कोई भी न हो सका तो यह ख़ुश होने की बात है या रोने की, माथा फोड़ने की बात है !? 

इनकी ज़िंदगी है कि चलता-फिरता शोकेस है !?

(ज़रुरी हुआ तो आगे भी)
-संजय ग्रोवर
15-01-2016

Thursday, 7 May 2015

ईश्वर और उसके योजना-आयोग के सदस्य

जब कुछ नहीं बचता तो एक बहुत ही मज़ेदार दलील सुनने को मिलती है, 'ईश्वर को महसूस करो, जो महसूस करता है उसीको महसूस होता है।' पहली बात तो यह कि जब सब कुछ वही करता है तो यह महसूस करने का लफ़ड़ा हमारे सर क्यों!? वही करवाएगा ख़ुदको महसूस। दूसरी हास्यास्पद बात यह है कि इनमें बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं जिन्होंने कभी अपने आस-पास के इंसानों को महसूस नहीं किया और कथित ईश्वर को महसूस करने-करवाने का ठेका लिए बैठे हैं। इन्होंने कभी फुटपाथों पर पानी के लिए तरसते बच्चों को महसूस नहीं किया और टनों दूध पत्थरों पर उड़ेल आए। इनमें से कई अपने साथ उठती-बैठती औरतों को न महसूस कर सके, उन्हें आग़ में ज़िंदा फ़ेंक-फ़ेंक कर सती कर दिया। उन्हें महसूस करने को भारत में अंग्रेज बुलवाने पड़ गए। कईयों ने अपने ही जैसे इंसानों को नीचा बता दिया और उनसे वहशियाना सुलूक करते रहे। आज भी छोड़ने को तैयार नहीं।

आदमी के लिए जिसकी महसूसिंद्रियों का अता-पता न चलता हो कि किधर गयी, वो और किसे महसूस करेगा!?

कैसा भद्दा मज़ाक़ है!

उसी मज़ाक़ का विस्तार है  ईश्वर के नाम पर कुछ मान्यताओं को हवा देना, कुछ नयी मान्यताएं बनाना। ये समय-असमय घोषणाएं करते फिरते हैं कि 'ईश्वर की लाठी में आवाज़ नहीं होती', ' वह एक दिन अपनी शक्ति दिखा देता है'.....और पता नहीं क्या-क्या अल्लम-गल्लम।  पूछो, तुम्हे इतनी गारंटी कैसे है कि ईश्वर यह-यह करता है! क्या उसने तुम्हे कोई टाइम टेबल दे रखा है!  हंसी यह देखकर छूटती है कि ये लोग इन ‘महसूसियात’ को कुछ इस तरह बताते हैं जैसे ईश्वर अपने सारे मामले इन्हें अपने साथ डायनिंग टेबल पर बिठाकर डिस्कस करता हो। सुबह-शाम फ़ोन करके हाले-दिल बताता हो कि ‘यार, तुम्हारी कॉलोनी के टी ब्लॉक के 1355 डी के फ़र्स्ट फ्लोर वाला आदमी मेरी पूजा नहीं करता। आज शाम साढ़े पांच बजे ट्रक भेजकर चौराहे पर ही साले की टांगे तुड़वाने वाला हूं।'  वैसे आप ध्यान दे तो पायेंगे कि ऐसी हरकतें हिंदी फ़िल्मों के विलेन या तथाकथित प्रतिष्ठाओं के मालिक अहंकारी, थोथे और बनावटी विद्वान ही ज़्यादा करते हैं। 

और भी कुछ लिखना चाहता था कि एकाएक हंसी छूटना शुरु हो गयी। पहले हंस ही लेता हूं।

-संजय ग्रोवर
12 मई, 2013

(अपने फ़ेसबुक-ग्रुप ‘नास्तिकThe Atheist’ से)