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Saturday, 21 April 2018

सर्वाइवल ऑफ़ द रेपिस्ट

(पिछला हिस्सा)



मंदिर में बलात्कार हुआ, इसमें हैरानी की क्या बात है !?
गाना नहीं सुना आपने-ःभगवान के घर देर है अंधेर नहीं है.....’
और कहावत-‘भगवान जो भी करता है अच्छा ही करता है......’
एक और कहावत-‘जैसी भगवान की मर्ज़ी’

मानता हूं तो लगता है कि कहावतें बुद्धिमानों ने बनाईं हैं। सोचता हूं तो लगता है कहीं बलात्कारियों ने तो नहीं बनाईं !?

ऐसी कहावतों से फ़ायदा आखि़र किसका है ? 

मंदिरों में आखि़र होगा क्या ? वहां ज़बरदस्ती के अलावा और हो भी क्या सकता है !?

बच्चों को बचपन से अगर डराया न जाए तो वो क्या झांकेंगे भी वहां जाके !?

आप क्या सोचते हैं कि बलात्कारी भगवान को नहीं मानते !?

सच तो यह है कि भगवान को माने बिना ऐसी ठसबुद्धि की हरक़तें, ऐसी ज़बरदस्ती संभव ही नहीं लगती। भगवान वह पहला हथौड़ा है जो बच्चे की बुद्धि को कमज़ोर करने के लिए चलाया जाता है। उसके बाद तो बस छोटी-मोटी चोटें ही करनी होतीं हैं।

धर्म, कर्मकांड और रीति-रिवाज ही ऐसी ज़बरदस्ती का आधार हैं। आप भारतीय शादी को देख लीजिए, पूरा कांड एकतरफ़ा ज़बरदस्ती पर आधारित है। आप बच्चे के ऊपर लादे जाने वाले जाति, धर्म, वाद, विचारधारा, स्टेटस आदि को देख लीजिए। सबमें मां-बाप और उनके पीछे छुपे खड़े समाजों की ज़बरदस्ती है। डरे हुए लोगों की अंतहीन दौड़-मां-बाप-बच्चे-शादी-नौकरी-दुकान-मकान..... मां-बाप-बच्चे-शादी-नौकरी-दुकान-मकान..... मां-बाप-बच्चे-शादी-नौकरी-दुकान-मकान.....
इसके अलावा और क्या करते देखा है आपने इन लोगों को !?

आपने भारतीय बारातें तो देखी होंगीं। इसमें बलात्कार से अलग क्या चीज़ है !? ये जहां से शुरु होतीं हैं उसका अंत बलात्कार में नहीं होगा तो कहां होगा ? इसमें सबसे अजीब बात तो यह है कि मैंने आज तक किसी लड़की को यह आवाज़ उठाते नहीं देखा कि शादी के बाद हमें ही घर क्यों छोड़ना पड़ता है, लड़कों को क्यों नहीं ? इतनी भारी असमानताओं पर जिन्हें कभी संदेह तक नहीं उठता, ज़ाहिर है कि उनके साथ क़दम-क़दम पर ज़बरदस्ती होती है। 

भारतीय बारातें। घोड़ी पर लड़का। क्यों ? एक मजबूर लड़की, पैसों, अंधविश्वासों और गंदे रीति-रिवाजों की वजह से जिसकी कहीं शादी नहीं हो पा रही थी, उससे इस लड़के ने शादी कर ली। क्या रीति-रिवाज तोड़के शादी की ? क्या लेन-देन छोड़ के शादी की ? बिलकुल भी नहीं। फिर यह घोड़े पर क्यों बैठा है ? घोड़ा इसे कहां तक ले जाएगा ? यह आदमी जब हर बेईमानी से एडजस्ट करने को तैयार हो ही गया तो अब अकड़ किस बात की दिखा रहा है ? वरना शादी से पहले सौ बार सोचता। एक ही ऑप्शन दिया था मां-बाप ने-बस शादी। दूसरा तो कोई आप्शन था ही नहीं। यह पहले ही आप्शन पे राज़ी हो गया। अब किराए की घोड़ी पर इतनी अकड़। सही बात यह है कि यह अकड़ भी ज़बरदस्ती की है। अभी बारात आधे रास्ते पहुंची हो और कोई सूचना दे दे कि रीति-रिवाज बदल गए हैं, दहेज का क़ानून लागू हो गया है, पोलिस रास्ते में खड़ी है......बस फिर देखना ज़रा...यह लड़का अभी घोड़ी से उलट जाए, अपनी ज़ुबान से पलट जाए, आधे रास्ते से छूट भागे। और घोड़ा किस बात का प्रतीक है ? हम लोग सड़क पर प्रतीकों का इतना प्रदर्शन क्यों करते हैं ? क्या हमारे पास प्रतीकों और रीति-रिवाजों के अलावा बाक़ी कुछ नहीं बचा !? असल में यह लड़का पहले तो ख़ुद दूसरों की ज़बरदस्ती में आ गया, अब उसी ज़बरदस्ती के साये में लड़की और उसके घरवालों से ज़बरदस्ती करेगा ?

इस बेचारे से भी ज़बरदस्ती हुई। जब यह कमज़ोर था, छोटा था, दूध-पानी, कपड़े-लत्ते के लिए मां-बाप पर निर्भर था तभी इससे कहा गया कि भगवान को मानो। फिर कहा गया कि मां-बाप को भगवान मानो। अब ज़रा सोचिए कि मां-बाप ही अगर बलात्कार में शामिल हों तो ? अब यह उनको भगवान माने कि बलात्कारी माने ? ज़्यादातर बलात्कारी या तो मां-बाप बन चुके होते हैं या बननेवाले होते हैं  और मां-बाप की पैदाइश तो सभी होते हैं।

इस लड़के को ज़बरदस्ती का स्वाद लग चुका है ? और यह उन्हीं रीति-रिवाजों, परंपराओं, संस्कृतियों की बदौलत लगा है जिन्हें आपने बहुत महान घोषित कर रखा है। 

 -संजय ग्रोवर
21-04-2018
(अगला हिस्सा)

Monday, 16 April 2018

बलात्कार का स्वाद



मंदिर में बच्ची से बलात्कार की ख़बर क्या कुछ लोगों को चौंका सकती है ? क्या उन लोगों को भी जो कहते हैं ‘भगवान की मरज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता’! क्या उन लोगों को भी जो कहते हैं ‘बच्चे ईश्वर का रुप होते हैं’ ! लेकिन वही लोग यह भी कहते है कि ‘कण-कण में भगवान है’, ‘भगवान हर जगह मौजूद है
’, ‘भगवान की लाठी में आवाज़ नहीं होती’, ‘भगवान जो चाहता है वही होता है’.....  

सही बात यह है कि अगर हम मान भी लें कि भगवान होता है तो भी यह मानना पड़ेगा कि वह फ़िल्मों, कहानियों और कविताओं में ही कमज़ोरों के काम आता है। कमज़ोरों और ग़रीबों को वास्तविकता में उससे कभी कोई फ़ायदा नहीं हुआ। हम थोड़ी अक़्ल लगाने को तैयार हों तो यह सोचने में क्या बुराई है कि भगवान ने स्त्रियों को ऐसा क्यों नहीं बनाया कि कोई उनसे बलात्कार की सोच ही न सके ? उसने बलात्कारियों को ऐसा क्यों नहीं बनाया कि बलात्कार की बात उनके दिल में आए ही नहीं ? जब-जब बलात्कार और अत्याचार होता है, भगवान छुट्टी पर क्यों चला जाता है ?

विचार के नाम पर हम कब तक रट्टा मारते रहेंगे ? कोई कह रहा है कि मेरे घर में भी स्त्रियां हैं इस नाते मैं बलात्कार का विरोध करता हूं। अरे भैया बलात्कारी के घर में भी स्त्रियां हैं। कोई कहता है कि जिनके घर में बेटियां हैं उनको बलात्कार का विरोध करना चाहिए। और जिनके घर में नहीं है उनको क्या समर्थन करना चाहिए ? 

सही बात यह है कि हमको ज़बरदस्ती का स्वाद लग चुका है ? 


(जारी)

(अगला हिस्सा)


-संजय ग्रोवर
16-04-2018

Saturday, 7 April 2018

असमानता और अत्याचार का नृत्य

(पिछला हिस्सा)




आप चीज़ों को जब दूसरी या नई दृष्टि से देखते हैं तो कई बार पूरे के पूरे अर्थ बदले दिखाई देते हैं। बारात जब लड़कीवालों के द्वार पर पहुंचती थी तभी मुझे एक उदासी या अपराधबोध महसूस होने लगता था। गुलाबी पगड़ियों में पीले चेहरे लिए बारात के स्वागत लिए तैयार लोग कुछ घबराए-घबराए से लगते थे। जयमाला के लिए चलती हुई लड़की के साथ दाएं-बाएं दो सहेलियां बैसाखियों जैसी दिखाई पड़ती। नथनी-गहने-घूंघट आदि के बीच समझना मुश्क़िल था कि दुलहिन उदास है, परेशान है या ख़ुश है।
 


दो वजह से, ख़ासकर, बारात मुझे कोई सामाजिक कृत्य कभी लग नहीं पाया। पहली बात कि लड़कापक्ष और लड़कीपक्ष में गहरी असमानता या भेदभाव जो इन्हीं पक्षों ने आपस में मिल-जुलकर बनाए हैं, बनाए रखना चाहते हैं। समझ में नहीं आता कि ऐसे दो पक्ष एक साथ मिलकर ख़ुशी कैसे मना सकते हैं जिनमें से एक की हालत लगभग देनदार, कर्ज़दार, दास, ग़ुलाम जैसी है और दूसरे की मालिक़, लेनदार, बॉस, सर जैसी हो ! इन संबंधों में किसको क्या-क्या लेना-देना पड़ता है और किसकी हैसियत अपने संबंधी के समक्ष कैसी हो जाती है, ज़्यादातर भारतीय लोगों को पता ही होगा।

दूसरी बात, बारातें अकसर सड़क के नियमों का उल्लंघन करके निकाली जातीं जिसकी हमें आदत पड़ चुकी होती है। मैं जब ख़ुद बारात में नहीं होता था और साइकिल के सामने कोई बारात पड़ जाती थी तो कई बार सर नीचा करके भुनभुनाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता था। आए दिन सड़कों पर होने वाले गड़ढों और झगड़ों में भी बारातों और उत्सवों का अच्छा-ख़ासा योगदान होता है।

जब मैं पूरी नयी और व्यंग्य-दृष्टि से बारात को देखता हूं तो अजीब-अजीब चीज़ें दिखाई देने लगतीं हैं। मुझे नहीं समझ में आता कि आजकल की बारात में घोड़े का क्या महत्व है ? क्या शादीवाले दिन दूल्हा ज़्यादा थका हुआ होता है ? या उसे कहीं युद्ध करने जाना होता है ? अगर जाना ही होता है तो वो बारात में सबसे पीछे-पीछे क्यों चलता है ? फिर बारात में बच्चों और औरतों का क्या काम ? फिर माला और मिलनी का भी क्या काम ? दुश्मन भी भला कभी मिलते हैं ? लेने-देने, नाचने-झूमने, मुख-मुद्राओं के परस्पर विरोधी अंदाज़ में ये एक-दूसरे के दोस्त तो कतई नहीं लगते। जिससे सारा खर्चा लिया हो उसीके दरवाज़े पर जाकर उछल-उछलकर, कूद-कूदकर नाचना बहादुरी भी कतई नहीं लगती। मुझे कई बार लगता है कि जो लोग ज़िंदगी में हर मोर्चे पर एडजस्ट कर चुके हों, हर बेईमानी के सामने सर झुका चुके हों, सभी तरह के बहुरुपिएपन को अंगीकार कर चुके हों ; उनके सामने किसी कर्मकांड, किसी त्यौहार, किसी कविता, किसी फ़िल्म, किसी बारात में नक़ली बहादुरी का प्रदर्शन करने के अलावा चारा भी क्या है ?

बारातें, ज़ाहिर है कि, परंपराओं का हिस्सा हैं। मगर क्या इनसे परंपराएं तोड़ी भी जा सकतीं हैं ?

कैसे ?

(जारी)

-संजय ग्रोवर
07-04-2018
(अगला हिस्सा)

Thursday, 5 April 2018

कुरीतियों का सर्कस



नाचने का मुझे शौक था। लेकिन शर्मीला बहुत था। कमरा बंद करके या ज़्यादा से ज़्यादा घरवालों के सामने नाच लेता था। उस वक़्त नाचने के लिए ज़्यादा मंच थे भी नहीं सो बारात एक अच्छा माध्यम था, समझिए कि बस खुला मंच था। एक किसी शादी का इनवीटेशन कार्ड आ जाए तो समझिए कि आपके लिए प्रतिष्ठा-प्रसिद्धि-पाँपुलैरिटी आदि का रास्ता खुल गया। बारात में सड़क पर नाचना अजीब तो लगता था पर एक प्रेरणा मिल गई थी-शराब। दो-चार पेग मारे कि झिझक मिट जाती थी। बस फिर क्या था-जितनी एनर्जी थी नहीं उससे काफ़ी ज़्यादा नाच जाता था। रास्ते में, सड़को पे, छज्जों पे खड़े लड़के-लड़कियां, औरतें-बच्चे उत्साह बढ़ा देते थे। उस समय रिएलिटी शोज़ जैसे जज वगैरह तो नहीं होते थे मगर कोई तथाकथित बड़ा, प्रतिष्ठित, स्टाइलिश आदमी तारीफ़ कर दे तो कहना ही क्या। अगली दो-चार और बारातों में नाचने के लिए ख़ुराक़ मिल जाती थी। हालांकि दहेज-वहेज, रीति-रिवाज शुरु से ही पसंद नहीं थे मगर नाचने में थोड़ा फ़ायदा लगता था। काफ़ी टाइम नाचते रहे। कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई।


आखि़र की दो बारातें दर्दनाक़ ग़ुज़री। जाने का मन भी नहीं था मगर पॉपुलैरिटी का लालच भी नहीं छूटता था। एक शादी की कॉकटेल में रात को नाचना शुरु किया था पर सुबह जब आंख खुली तो पाया कि रात को बेहोश हो गया था। बाद में एक दोस्त ने बताया कि दूसरे दोस्त ने मेरी शराब में काफ़ी ज़्यादा शराब मिला दी थी। क्यों मिला दी होगी ? वह आदमी भगवान के अस्तित्व पर बहस करते हुए अकसर तर्क में कम पड़ जाया करता था। दूसरी जगह भी कुछ ऐसा ही मामला निकला।

बाद में कोई समस्या भी नहीं हुई बल्कि आसानी ही हो गई क्योंकि नाचने और उससे मिलनेवाले फ़ायदे के अलावा बाक़ी सब रस्मो-रिवाजों से तो शुरु से ही परेशान रहता था। आज सोचता हूं कि शुरु से ही इतना साहस, तर्क, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास होता तो क्या इस तरह सड़क पर नाचना संभव होता ? 
HANS/Dec/2006

जवाब अकसर न में ही आता है।

वरना बाद में ऐसे शेर कैसे लिख पाता-

लड़केवाले नाच रहे थे, लड़कीवाले ग़ुमसुम थे
याद करो उस वारदात में अकसर शामिल हम-तुम थे 

उनपे हँसो जो बुद्ध कबीर के हश्र पे अकसर हँसते हैं

ईमाँ वाले लोगों को तो अपने नतीजे मालूम थे



(जारी)

-संजय ग्रोवर
06-04-2018

(अगला हिस्सा)






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