BookShelf

Tuesday, 15 March 2016

छोड़ो स्कूल-फिस्कूल, ज्ञान बाबा आते होंगे

कई बार पढ़ने-सुनने को मिलता है कि फ़लां चीज़ खाने से ढिकाने को ज्ञान मिला या वैसे पेड़ के नीचे बैठे-बैठे ऐसे को ज्ञानप्राप्ति हो गई।

सोचता हूं कि आखि़र यह ज्ञान किस टाइप की चीज़ होती थी !? अगर कुछ खाने से किसीको ज्ञान मिलता हो तो उस खाद्य को बनानेवाले या खिलानेवाले के पास तो बहुत ज्ञान होना चाहिए था ! मगर क्या ऐसा था ? 

आप लोग तो क़ाफ़ी क़िताबें पढ़ते होंगे, फ़िल्में देखते होंगे, टीवी देखते होंगे, इंटरनेट पर झक मारतें होंगे, तब जाकर कुछ पल्ले पड़ता होगा। 

आपके दिमाग़ में कभी यह क्यों नहीं आया कि इतनी मेहनत करने से बेहतर है कि किसी पेड़-वेड़ के नीचे आराम से बैठा जाए, कभी न कभी तो कोई आएगा, ज़्यादा नहीं तो दो-चार गाने गा चुकने के बाद आएगा, कोई तो लाएगा, कैसे तो लाएगा, ले आया तो कैसा मज़ा आएगा! न कोई क्लास अटैंड की न कोई  चैप्टर पढ़ा, मगर रिज़ल्ट आया तो पता चला कि यूनिवर्सिटी क्या ‘ब्रहमांड’ टॉप कर गए। छूटते ही गोल्ड मैडल।

मैं सोचता हूं जिन्हें ज्ञान मिला उनकी तो कई उपलब्धियां बताई जातीं हैं, पर जिन्होंने ज्ञान दिया उनके प्रोफ़ाइल में ज्ञान की दृष्टि से उल्लेखनीय कुछ नहीं दिखाई देता! यह अजीब नहीं कि बैंक ख़ुद तो कंगाल हो मगर उपभोक्ताओं को लाखों रुपए कर्ज़ा बांटे चला जा रहा हो !?

यह ज्ञान दिया किस विधि से, किस रुप में जाता होगा !? कोई पुढ़िया वगैरह या खाने-पीने की आयटम में कोई कैमिकल मिलाया जाता होगा ? जितनी तत्परता से ज्ञान एक से दूसरे को शिफ़्ट हो जाता था, उतनी जल्दी तो संक्रामक बीमारियां जैसे जुकाम, आई फ़्लू, टीबी आदि ही होते पाए जाते रहे हैं। इतने मामूली लम्हे में मिले ज्ञान में कितना स्लैबस संभव है, क्या-क्या इसके दायरे में आता होगा !? लोग तो ऐसे ज्ञानियों को सर्वज्ञानी से कम नहीं मानते थे! तो क्या इस ज्ञान में पायजामा काटने और मिठाई बनाने से लेकर अच्छा सेल्समैन बनने के नुस्ख़ों तक सब कुछ शामिल रहता होगा !?

तो आजकल लोग क्यों स्कूलों और यूनिवर्सिटियों में डोनेशन ले-लेके भागे फिरते हैं !? 

भाईयो! किसी पेड़-वेड़ के नीचे डेरा जमाओ, देखो ज़रुर कोई तुम्हारे वास्ते कटोरा, थाली, पत्तल, क़ाग़ज़ की प्लेट या प्लास्टिक के दोनें में कुछ लेकर आता होगा। पांच-दस साल भी लग जाएं तो क्या दिक़्क़त है!? 20-30 साल धक्के खाकर आधा-पूधा अज्ञानी होने से तो बेहतर है। हैं कि नहीं ! 

लग जाओ। लगे रहो।

-संजय ग्रोवर
16-03-2016

Saturday, 12 March 2016

लड़कियां

लड़कियों को लेकर भारतीय समाज में अकसर एक ऊहापोह सा बना रहता है। लड़कियां क्या खाती हैं, क्या पीती हैं, क्या सोचतीं हैं आदि-आदि से लेकर ‘लड़कियां किस तरह के पुरुषों को पसंद करतीं हैं’ जैसे विस्फ़ोटक मसलों में कई मर्दों की जान और ज़िंदगी अटकी रहती है। मज़े की बात यह है कि कट्टरपंथी परंपरावादी राजा-महाराजाओं से लेकर तथाकथित प्रगतिशीलों तक सभी अपने आसपास रहनेवाली लड़कियों या महिलाओं की संख्या से अपनी महानता नापने की कोशिश में लगे पाए गए हैं। ऐसा लगता है कि जैसे लड़कियां पुरुषों की छाती पर टांगे जाने वाले मैडल/तमग़े हैं, जैसे लड़कियां पुरुषों को मिलनेवाले पुरस्कार हैं, जैसे वे सत्संग के बाद बंटनेवाला प्रसाद हैं, जैसे वे मर्दों को देखकर गश खाने और क्रश आने के लिए ही पैदा हुई हैं। एक पुरानी और प्रसिद्ध कहानी में कृष्ण नामक एक नायक का ज़िक्र मैंने सुना है जो नदी-किनारे से नहाती हुई लड़कियों के कपड़े वगैरह चुराकर पेड़ पर चढ़ जाते थे और तिसपर भी लड़कियां आ-आकर उनकी गोपियां हुई जातीं थीं। और कहानी के यह कृष्ण शादीशुदा भी हैं और इनकी पत्नियों की भी अच्छी-ख़ासी संख्या गिनाई जाती है।

अभी एक विश्वविद्यालय में कथित रुप से पाए जानेवाले कंडोमों की संख्या किसीने गिनाई तो कुछ लोग उसपर गर्व करते दिखे तो उन्हीं में से कुछ लोग इस चिंता में परेशान दिखे कि वहां पढ़नेवाली लड़कियों के मां-बाप क्या सोचेंगे ? वहां पढ़नेवाले लड़कों के मां-बाप क्या सोचेंगे, इसकी चिंता किसीको भी नहीं हुई। साफ़ है कि इस समाज में अभी लड़कियों की वह स्थिति नहीं बन पाई कि आप उनके साथ अपने संबंधों को जैसे हैं वैसे बता भी सकें। मेरी समझ में पत्नी, प्रेमिका, गोपिकाएं और श्रद्धालु प्रशंसिकाएं एक साथ रखने के लिए इस तरह की विरोधाभासी बातों के पाखंड के अलावा और कोई चारा भी नहीं है। इसको प्रगतिशीलता तो कतई नहीं माना जा सकता। प्रगतिशीलता के लिए बहुत साहस चाहिए जो कि लोगों में अकसर नहीं होता, इसलिए यहां प्रगतिशील कहे जानेवाले या ख़ुदको प्रगतिशील समझने का भ्रम पालनेवाले लोग भी चार तरह की बातें एक साथ कह देते हैं। पाखंडी संस्कृति में लड़कियों को भी ऐसे ही लोग सूट करते हैं जो दिखाने और करने के फ़र्क़ की तथाकथित सभ्यता को बड़ी होशियारी और चालाक़ी से बरतने के आदी हों। अब या तो आप लड़कियों/लड़कों से स्पष्ट संबंध रख लीजिए या फिर यह चिंता कर लीजिए कि उनके घरवाले क्या सोचेंगे। दोनों चीज़ें एक साथ साधेंगे तो झूठ और अभिनय के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। फिर अपनेआप को कट्टरपंथियों और पाखंडियों से अलग और प्रगतिशील समझना एक झूठी तसल्ली से ज़्यादा कुछ नहीं है।

कोई हैरान हो सकता है कि लड़कियां, वो भी प्रगतिशील लड़कियां, कैसे किसी शादीशुदा की गोपियां बनने को तैयार हो जातीं हैं ? सीधा कारण समझ में आता है कि बचपन से रटाई सामाजिक मान्यताएं इसमें बड़ा काम करतीं हैं। उसके बाद का काम हमारा साहित्य और फ़िल्में पूरा करते आए हैं।
प्रगतिशील लड़कियां कैसे किसी प्रगतिशील लड़के पर मरनेवाली लड़कियों की गिनती बढ़ाकर अपने जीवन को सार्थक मान सकतीं हैं ? कोई प्रगतिशील मर्द कैसे महिलाओं को मैडल की तरह अपनी छाती पर टांक कर ख़ुश हो सकता है !? यह मानसिकता किसी नेता की रैली में आई या  जैसे-तैसे-कैसे भी जुटाई भीड़ को देखकर ख़ुश होने की मानसिकता से कैसे अलग है ? कैसे कोई शादीशुदा कृष्णकन्हैया इतनी स्त्रियों के प्रेमनिवेदन से ख़ुश हो सकता है जबकि उसके अपने घर में उसकी कई रानिया-महारानियां क़ैदी की तरह रह रहीं हों। कल्पना कीजिए कि उन रानियों के पास भी इतनी-इतनी संख्या में प्रेमनिवेदन और फिर प्रेमनिवेदन की स्वीकृति के बाद पुरुष-गोपक दिन-रात प्रेमलीला रचाते-मचाते नज़र आने लगें तो इन तथाकथित प्रगतिशील महाराज की क्या स्थिति हो रहेगी ? उसके बाद फिर बच्चे भी यही लीला करने लगें तो एक यमुना तट तो घर में बनाना पड़ जाएगा। ऊपर से एक समस्या यह भी रहेगी किन लोगों को इन संबंधों को गर्व की तरह दिखाना है और किन लोगों से इसलिए छुपाना है कि उनके घरवाले क्या सोचेंगे, इसका भी पूरा हिसाब-क़िताब रखना पड़ेगा। सही बात यह है कि ऐसे संबंध आसानी से वही लोग निभा सकते हैं जो रात-दिन पाखंड के आदी हों। दूसरा तरीक़ा है कि इन संबंधों को जैसे हैं वैसा ही बताओ, किसीके घरवाले क्या सोचेंगे इसकी चिंता छोड़ दो। मगर उसके लिए साहस चाहिए, कई तरह के नुकसान उठाने की तैयारी चाहिए, पहलक़दमी की हिम्मत चाहिए, जिसकी हमारे समाज को आदत नहीं है, इसलिए उसमें अभी भी वक़्त लगनेवाला है।


अपने ऊपर मरनेवाली लड़कियों की संख्या गिन-गिनकर ख़ुश होना, दोस्तों-यारों को बताना....लड़कियों को सामान समझने की मानसिकता से क़तई अलग नहीं है। सिर्फ़ लड़कियों की ही संख्या गिनते रहना उन्हें बाक़ी समाज से अलग करके, असामान्य बनाकर देखना भी है जिसमें नुकसान अकसर लड़कियों का ही होता आया है। आखि़र उस संख्या की उपयोगिता क्या है ? क्या आप उनसे किसी विशेष प्रकार का संबंध रखते हैं ? अगर रखते हैं तो क्या उसे सार्वजनिक रुप से स्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं ? या वे लड़कियां आप पर ठीक वैसी ही श्रद्धा रखतीं हैं जैसी किसी गुरु के प्रति रखने की हमारी परंपरा रही है ? जिस श्रद्धा में एकलव्य ने अपना ही अंगूठा काट लिया था ! यह श्रद्धा कतई ख़तरनाक़ है। मगर इसके बड़े फ़ायदे हैं और इसीलिए मुझे लगता है कि तथाकथित प्रगतिशील कहे जानेवाले लोग किसी न किसी तरह से पुरानी परंपराओं को बनाए रखने के बहाने ढूंढते रहते हैं।

यहां यह क़ाबिले-ग़ौर है कि फ़ेसबुक पर मेरे साथ 3-4 बार ऐसा हुआ कि कोई लड़की ख़ुदही बात करने आई और सामान्य बातें ही कर रही थी कि एकाएक बीच में कोई तथाकथित प्रगतिशील शख़्स प्रकट भए और लड़की को इशारों-इशारों में सावधान करने लगे, मेरी उम्र वगैरह के बारे में हिंट देने लगे। बड़ी हैरानी हुई क्योंकि ये लोग एक तो ख़ुदको प्रगतिशील कहते थे, दूसरे ख़ुद शादीशुदा होते हुए भी ट्राई मारते फिरते थे। जबकि मैं एक बैचलर हूं। और उम्र क्या बता रहे हो, जब लड़की साक्षात मुझसे मिलेगी तो देख ही लेगी, सब कुछ फ़ेसबुक पर तो नहीं हो जानेवाला! राजेंद्र यादव के मामले में देख ही चुका था, समझने में देर नहीं लगी कि इन तथाकथित प्रगतिशीलों की भी अपनी वानर-सेनाएं हैं और ये भी किसीसे कम नहीं हैं। ये भी तरह-तरह के डरों और आशंकाओं से घबराए हुए हैं और स्त्रियों को उनके हाल पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। फिर एक-दो दूसरी घटनाएं हुईं जिनमें लड़कियों ने पहले ख़ुद ही कोई बोल्ड क़िस्म का मज़ाक़ किया, बाद में प्रत्युत्तर में मैंने कुछ कह दिया तो उन्होंने उसे ग़लत ढंग से पेश करना शुरु कर दिया। समझ में आया कि मनुवाद अभी कितने-कितने रुपों में मौजूद है।

बहरहाल मैं तो करना कुछ और दिखाना कुछ को न तो प्रगतिशीलता मान सकता हूं न साहस। न ही लड़कियों को तमग़ों की तरह टांगने में कोई दिलचस्पी(कभी हुआ करती थी) बची है। अगर ‘मरनेवाली’ लड़कियों की संख्या से ही किसीकी महानता नापनी हो तो विजय माल्या, रविशंकर, शाहरुख़ खान, आमिर ख़ान, सलमान, अक्षय कुमार, चार्ल्स शोभराज, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, इमरान ख़ान, उमर शरीफ़, ओशो रजनीश आदि-आदि को सर्वाधिक महान लोगों में गिना जाना चाहिए।


हां, स्पष्टवादी और बेबाक़ व्यक्ति के प्रति, थोड़ी देर के लिए ही सही, एक आदर का भाव ज़रुर उठता है, चाहे वह व्यक्ति लड़का हो चाहे लड़की।


-संजय ग्रोवर

12-03-2016

Tuesday, 8 March 2016

आज़ाद ग़ुलामों की शर्मनाक़ मुश्क़िलें

जब आप किसीको ग़ुलाम बनाते हैं तो आपकी अपनी आज़ादी भी ख़तरे में पड़ जाती है। क्योंकि दूसरे को ग़ुलाम बनाने के लिए कुछ न कुछ झूठ बोलना पड़ता है, कोई न कोई षड्यंत्र रचना पड़ना है। बेवजह कोई क्यों आपकी ग़ुलामी करेगा, क्यों ख़ुदको आपसे छोटा मानेगा, क्यों आपसे दबेगा !? सो आपको झूठ बोलना पड़ता है, किसी जाति को बड़ा बनाना पड़ाता है, किसी पद-प्रतिष्ठा से डराना पड़ता है, मां-बापके नाम का, वंश का ख़ौफ़ दिखाना पड़ता है, किसी संस्था, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना पड़ता है, किसीको तथाकथित स्वर्ग में पहुंचा देने का झूठा भरोसा देना पड़ता है, ऐसे ही तरह-तरह के अन्य उपाय करने पड़ते हैं।

आज की बदलती परिस्थितियों में ज़्यादातर लोग जानते लगते हैं कि ये सब भद्दी तरक़ीबें काम भी करतीं हैं। स्त्रियां तो शारीरिक रुप से थोड़ी हल्की थीं भी लेकिन बनानेवालों ने लैंगिक विकलांगों जो कि शारीरिक बल में अकसर पुरुषों से मजबूत दिखाई पड़ते हैं, को भी मानसिक रुप से कमज़ोर करके या तो ग़ुलाम बनाया या हाशिए पर पहुंचा दिया।

लेकिन जब आप षड्यंत्र करके दूसरों को ग़ुलाम/हीन/छोटा/नीच ठहराते या बनाते हैं तो आपके लिए यह मुश्क़िल खड़ी हो जाती है कि आपको आगे के लिए इन झूठों/बेईमानियों को छुपाए रखने का भी इंतेज़ाम करना पड़ता है। आपको बारह महीने चौबीस घंटे डर लगा रहता है कि कहीं पोल खुल न जाए। जितने बड़े दायरे में आपने झूठ फ़ैलाया है उतने ही बड़े स्तर पर उसे छुपाए रखने के भी जुगाड़ करने पड़ेंगे, नेटवर्क बनाना पड़ेगा, आदमी लगाने पड़ेंगे। आपको लोगों में फूट डाले रखने के नये-नये तरीक़े ढूंढने पड़ते हैं, अफ़वाहें फ़ैलाने के लिए आदमी चाहिए पड़ेंगे। इससे भी बड़ी बात कि क़दम-क़दम पर सतर्क रहना पड़ेगा, लोगों की निगरानी करनी या करवानी पड़ेगी क्योंकि आपसे ज़्यादा कौन जानता है कि ज़रा भी कोई व्यक्ति मानसिक रुप से जागृत हुआ, उसमें आत्मविश्वास आया कि आपकी नक़ली महानता और श्रेष्ठता की चूलें हिल जाएंगीं। मैं समझता हूं कि षड्यंत्रकारी को दूसरों के मुक़ाबले अतिरिक्त रुप से ऐक्टिव रहना पड़ता होगा। उसका दिन का चैन और रात की नींद आसान नहीं हो सकती। एक आंदोलन का नक़लीपन छुपाने के लिए उसे हज़ार तरह के नये नक़ली आंदोलन खड़े करने पड़ सकते हैं।


इस सबके मुक़ाबले वह आदमी जो न तो किसीका ग़ुलाम है, न किसीको ग़ुलाम बनाने का ख़्वाहिशमंद है, बेहतर ज़िंदगी बिता सकता है बशर्ते वह मौत के डर से मुक्त हो जाए और हवाई मान्यताओं (जैसे प्रतिष्ठा, जाति, वंश, बदनामी, लोकप्रियता, इज़्ज़त....आदि-आदि) की चिंता करना छोड़ दे।


-संजय ग्रोवर
08-03-2016


Google+ Followers