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Saturday, 20 August 2016

असलियत से भागने के सम्मानित उपाय-2


(असलियत से भागने के सम्मानित उपाय-1)

कल सुबह तीन-चार बजे के बीच नींद खुल गई। एफ़एम सुनने लगा। एक कार्यक्रम में कृष्ण और ‘कर्म करो, फल की इच्छा छोड़ दो’ का ज़िक्र आया तो दूसरे में गीता की तारीफ़ सुनने को मिल गई। जब भी सुनता हूं कि कई बड़े(!), मशहूर और बुद्विमान(!) लोग गीता के उपदेश को पसंद करते रहे हैं, हैरानी में पड़ जाता हूं। मैंने गीता नहीं पढ़ी, लेकिन कुछ वाक्य/उपदेश जगह-जगह दुकानों/दीवारों पर लिखे देखे हैं या लोगों से सुने हैं जो निम्न आशय के हैं-

⃝    शरीर के मरने से आत्मा नहीं मरती।

⃝    हम तो कठपुतलियां हैं, हमारे करने से कुछ नहीं होता, जो वह चाहता है वही हमसे/सबसे करवा लेता है। जो वह चाहता है वही होता है।

⃝    जीवन तो अभिनय है, नाटक है, हमें तो एक पात्र की तरह अपना ‘रोल’ ‘प्ले’ करना होता है।

एक ईमानदार और संवेदनशील इंसान की दृष्टि से मुझे उक्त सभी बातें चकित करतीं हैं।

04-08-2016 

कभी कहीं मैंने सुना या पढ़ा, शेक्यपियर ने भी कहा है कि ‘शो मस्ट गो ऑन...’; मैंने इंटरनेट पर थोड़ी देर ढूंढा, स्पष्ट नहीं हो सका कि उन्होंने यह ख़ुद कहा या यह उनका पसंदीदा जुमला था। बहरहाल, ओशो को कहीं पढ़ा, उन्होंने कहा है, ‘जिओ ऐसे, जैसे अभिनय कर रहे हो और अभिनय ऐसे करो जैसे जी रहे हो।’ निश्चय ही, अभिनय कोई ऐसे कर पाए जैसे जी रहा हो तो इससे ज़्यादा ख़ूबसूरत और यथार्थवादी अभिनय क्या हो सकता है लेकिन जियो ऐसे जैसे अभिनय कर रहे हो, यह बात पल्ले नहीं पड़ती।

इस तरह तो अफ़वाहबाज़ों, बलात्कारियों, पाखंडियों, धूर्त्तों, बेईमानों और मौक़ापरस्तों के लिए बड़ी आसानी हो रहेगी। वे कहेंगे ज़रा बलात्कार का अभिनय ही तो किया है, इतना शोर क्यों मचा रहे हो ?  यह तो गंदा-सा काम करने के लिए ‘अच्छा-सा’(!) बहाना ढूंढ लेने जैसा है। और कौन तय करेगा कि किस बात का अभिनय ठीक है और किस बात का ग़लत ? और इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक़ सच यह है कि यह कौन तय करेगा कि कौन अभिनय करेगा और कौन अभिनय करवाएगा ? कौन रोल लिखेगा और देगा और कौन खोपड़ी गिरवी रखकर चुपचाप रोल करता चला जाएगा ? मेरी समझ में इंसान के द्वारा इंसान का इससे ज़्यादा शर्मनाक़ इस्तेमाल कोई हो नहीं सकता। अगर दूूसरे के कहने पर रोल ही करना है तो फ़िर अपने दिमाग़ का रोल तो ख़त्म ही समझिए। फिर व्यक्ति की आज़ादी का अर्थ भी ख़त्म समझिए। हां, कायरों और कमज़ोरों के लिए जो बहादुर और महान भी दिखना चाहते हैं, यह बहुत अच्छा बहाना है। 

इस सबके साथ यह भी समझना ज़रुरी है कि जो किसीको रोल दे रहा है, उस अहंकारी को इसके लिए चुना किसने है !? यह सिवाय अहंकार और मक्कारी के और क्या है कि आप ख़ुद ही ख़ुदको ऐसे काम के लिए श्रेष्ठ मान लें जिसमें आपका तो फ़ायदा ही फ़ायदा होगा मगर दूसरे कईयों का जीवन दांव पर लग जाएगा या बर्बाद हो जाएगा ? और ऐसी बातें कहनेवाले इन्हें कहने से पहले पर्याप्त समझदारी से इन्हें समझे हों या उनकी नीयत बिलकुल ठीक हो, यह पता कैसे लगाईएगा ? अभी दो-तीन दिन पहले ही मैंने एक नवोदित कलाकार का इंटरव्यू देखा ; वे कह रहे थे कि ज़िंदग़ी को ज़्यादा गंभीरता से मत लो, बस मौज-मज़ा लो, छोटी-सी तो ज़िंदगी है। मैंने सोचा कि फ़िर आप भी अपने कैरियर को हंसी-मज़ाक़ में उड़ा दो, यह भी तो अगंभीर ज़िंदगी का मामूली-सा हिस्सा है, मज़ाकिया-सा क़िस्सा है। मुझे लगता है उन्होंने हाल ही में कहीं पढ़ा या सुना होगा, अपने मतलब का लगा होगा सो बोल दिया होगा।  

कल्पना कीजिए कि ईमानदारी बेईमानों के हाथ लग जाए, प्रगतिशीलता मौक़ापरस्तों के हाथ लग जाए,  तो क्या-क्या संभव है! और यह बहुत आसान है अगर ज़िंदगी के सारे मूल्य, मान्यताएं और जीवनशैली बनाने का काम बेईमानों, पाखंडियों, खोखलों और कायरों के हाथ लग जाए तो वे कुछ भी कर सकते हैं। और ये काम क्या-क्या हो सकते हैं ? ये काम हो सकते हैं क़िताबें लिखना, फ़िल्में बनाना, आंदोलन करना, वक्त्व्य देना, भाषण देना, शिक्षा देना, संपादन करना....। इन सबके सहारे एक पूरे समाज को चंद व्यक्तियों की सहूलियत के अनुसार गढ़ना और गढ़ते चले जाना कोई बहुत मुश्क़िल काम नहीं है।

ज़िंदगी को अभिनय मानने के कई ख़तरे हैं ; अभिनय करनेवाला झूठी माफ़ी मांग सकता है, झूठी दोस्ती कर सकता है, झूठा प्रेम कर सकता है, सही बात तो यह है कि इस बहाने से वह गंदी से गंदी हरक़त पर उतर सकता है। कोई अपनी ज़िंदगी को अभिनय मान भी ले मगर दूसरे की ज़िंदगी को अपने द्वारा किए जा रहे नाटक का हिस्सा कैसे मान सकता है !? जबकि दूसरे को इस बात का अंदाज़ा तक नहीं है, उसके लिए ज़िंदगी बिलकुल वास्तविक और गंभीर कृत्य है। मुझे नहीं समझ में आता कि धर्म, आध्यात्मिकता या सामाजिकता के नाम पर इस तरह की क्रूरता कोई समझदार या संवेदनशील व्यक्ति सोच भी कैसे सकता है!?

लोग राष्ट्रप्रेम और ज्ञान के विस्तार जैसे मूल्यों का, झंडा लगाने या दिए जलाने जैसे कर्मकांडों के ज़रिए, अभिनय करते हैं लेकिन इमारतों में रेत और घटिया सामान लगाकर पैसे कमाने(!) जैसे कामों को असलियत में करते हैं। प्रतीकात्मकता, कर्मकांडों और रिवाजों से हमें क्या मिला, इसीसे पता लगता है। पाखंडियों ने धर्म, भगवान, ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, जाति, सफ़लता जैसी नक़ली और गढ़ी गई चीज़ों को वास्तविक ज़रुरत की तरह स्थापित कर दिया और भूख, प्रेम, सैक्स, इंसानियत जैसी वास्तविक चीज़ों को पीछे धकेल दिया।

जो लोग ज़िंदगी को अभिनय मानते हैं, उन्हें मकान छोड़ देने चाहिए और पेड़ के नीचे जाकर मकान में रहने का अभिनय करना चाहिए। क्यों नहीं वे खाना-पीना छोड़कर खाने-पीने का अभिनय करके काम चलाते ? क्यों नहीं वे अपने कपड़े ग़रीबों को देकर ख़ुद कपड़े पहनने के अभिनय भर से काम चलाते ? क्यों वे दूसरों से सचमुच के पैसे ले लेते हैं, जबकि पैसे ले लेने के अभिनय से भी तो काम चल सकता है!

यह सब लिखना इसलिए भी ज़रुरी है कि जब तक हम असफ़लता को सफ़लता, कमज़ोर को शक्तिशाली, कायर को साहसी कहते रहेंगे, ऐसे लोगों का फ़ायदा कराते रहेंगे। दरअसल ‘ज़िंदगी अभिनय है’ जैसी बातें करनेवाले लोग ख़ुद ही बता रहे होते हैं कि वे असली ज़िंदगी का सामना करने में असफ़ल हो गए हैं, घबरा गए हैं इसलिए उन्होंने ‘दिलके ख़ुश रखने को....’ यह ’अच्छा ख़्याल’ ढूंढ लिया है।  

ऐसी क़िताबें जो लोगों को समझातीं हों कि तुम कठपुतली हो, तुम अभिनेता हो, करनेवाला तो कोई और है, से आज़ादी, लोकतंत्र, उदारता, अहिंसा आदि को समझने की उम्मीद सिवाय नासमझी के क्या हो सकती है ?


-संजय ग्रोवर
20-08-2016

Wednesday, 3 August 2016

असलियत से भागने के सम्मानित उपाय

कभी क़िताब या कॉपी ज़मीन पर गिर जाती तो बच्चे झट से उठाते और ‘हाय! विद्या गिर गई!’ कहकर माथे से लगाने लगते। नहीं समझ पाता था कि ऐसा करने से क्या होगा? मेरी अपनी क़िताब-कॉपी गिरती तो मैं तो बस यही देखता कि फ़ट तो नहीं गई या मिट्टी तो नहीं लगी। लगी हो तो साफ़ करके बस्ते (स्कूल बैग) में रख लेता। प्रतीकात्मकता, कर्मकांड और रस्मो-रिवाज़ मेरी समझ में कभी नहीं आए। मैं यह भी जानता था कि क़िताब माथे से लगाने वाले कई बच्चे इम्तिहान के वक़्त नक़ल करने में कतई नहीं हिचकिचाते। उस वक़्त विरोध का साहस कम था, आत्मविश्वास का मतलब न तो पुरानी परिभाषाओं से समझ में आया था न ही उसको लेकर अपनी कोई समझ पैदा हुई थी, कई सालों तक बीच में लटकने जैसी स्थिति बनी रही।

दूसरे देशों का पता नहीं पर अपने यहां लगता है कि लोगों की आदत और दिलचस्पी असली काम करने या असली ज़िंदगी जीने से ज़्यादा रस्मों, कर्मकांडों और अभिनय में है। पता नहीं भारत में बहिनों की सचमुच रक्षा करनेवाले भाईयों का असली आंकड़ा क्या है मगर देखा है कि बहुत-से लोग धागों की रक्षा जमकर करते हैं। कई लोग रात को सोते समय या दिन में नहाते समय भी धागा अपने-से अलग नहीं करते। कई लोग हर साल रावण को मारकर बुराई का ख़ात्मा कर देते हैं तो कई लोग बीएसपी, कांग्रेस, आरएसएस, वामपंथ आदि को ग़ाली देकर बाक़ी समाज को भारमुक्त कर देते हैं। इस देश में तो, सुनने में आया है कि, शायरी और दर्ज़ीगिरी में भी काम सिखाने के पहले या बाद में उस्ताद और शागिर्द आपस में कुछ धागों की बांधा-बूंधी करते हैं। ऐसी जगह पर प्रगतिशीलता को समझ पाना या समझा पाना वाक़ई टेढ़ी खीर और कलेजे का काम है। कई लोग कपड़ों से प्रगतिशीलता और पढ़ाई-लिखाई नापा करते हैं। भारत में आठ महीने पड़नेवाली सड़ी गर्मी में कोट-टाई-जूते-जुराबें पहनकर पसीने-पसीने होते हुए, गिरते-पड़ते हुए भी ख़ुदको पढ़ा-लिखा और मॉडर्न कहलवा ले जाना मज़ाक़ कैसे हो सकता है !? प्रतीकात्मकता क्या कोई मज़ाक़ है!? कोई बोलके तो दिखाए! कई साल तक तो हम लोग छुरी-कांटों की ‘हाईजेनिकता’ समझने के बजाय उन्हें स्टेटस सिम्बल के तौर पर इस्तेमाल करते रहे।  

दिलचस्प है कि अपने यहां लोग अकसर कर्मकांड निभाने को ही बड़ी सामाजिक ज़िम्मेदारी मानते हैं। अकसर प्रगतिशील समझे जानेवाले पुरुष और स्त्रियां भी दहेज, लगन, तिलक, चूड़ा, भात आदि देने को सामाजिक ज़िम्मेदारी मानते हैं और इन्हें हटाने, बदलने या रोकने की बात या कोशिश करनेवालों को ही एक बुराई की तरह स्थापित करने में लग जाते हैं। ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ या ‘चोरी और सीनाज़ोरी’ यहां एक नितांत ‘सहज’ सामाजिक आदत या चलन है। मेरी समझ में ऐसे लोग इंसानियत के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों से भागे हुए लोग होते हैं। इनकी दिलचस्पी कमज़ोर पक्ष की स्थिति सुधारने के बजाय अमानवीय रीति-रिवाजों को निपटाकर तुरत-फु़रत महान बन जाने में होती है। ज़ाहिर है कि आज भी हमारे समाज में रिश्तों के नाम पर पैसे का अश्लील लेन-देन ख़ुलेआम चलता है और स्पष्टतः इस सारे आयोजन में कमज़ोर स्थिति स्त्रियों या लड़कीवालों की होती है। लेकिन यहां मर्दों के साथ तथाकथित प्रगतिशील स्त्रियां भी ख़ुशी-ख़ुशी भाग लेती दिखाई देतीं हैं। इन अवसरों पर होनेवाले रीति-रिवाजों और कर्मकांडों की उपयोगिता मैं कभी समझ नहीं पाया। इन रीति-रिवाजों और कर्मकांडों से न तो किसी काम के सफ़ल होने की गारंटी होती है न ही इनकी कोई ठोस वजह समझ में आती है। जो काम कोर्ट में आधे घंटे और मामूली ख़र्चे में हो सकता है उसके लिए इस तरह पैसा और वक़्त बर्बाद करना कतई समझ में नहीं आता।  

प्रतीकात्मकता में नाटकीयता या अभिनय का बड़ा रोल है। आप पूरे साल-भर सामाजिक बदलाव के लिए मामूली ख़तरा भी न उठाएं मगर दशहरे पर रावण के पुतले के दहन में ताली बजाकर समाज में सम्मानित बने रह सकते हैं। आप बहिन/स्त्री की रक्षा के वास्तविक काम को कभी न करते हुए भी मात्र धागा बंधाकर और कुछ धनराशि देकर अपने-आपको बहादुर, सामाजिक और मानवीय मान सकते हैं। लब्बो-लुआब यह कि प्रतीकात्मकता का ज़्यादातर खेल असली कामों को छोड़कर फ़ालतू के बचकाने रीति-रिवाजों से चलता है। जिस देश के लोग अपनी आधी से ज़्यादा ज़िंदगी बेमतलब के कर्मकांडों और (अपने ही बनाए अमानवीय रीति-रिवाजों के चलते) लड़के-लड़कियों के लिए रिश्ते देखने में लगा देते हों, उस देश का विज्ञान, विचार, आधुनिकता और मौलिकता में पिछड़ते चले जाना कोई हैरानी की बात नहीं मानी जानी चाहिए।


मैं रीति-रिवाजों में भाग लेने में बहुत उत्सुक तो कभी भी नहीं रहा और पिछले छः सात सालों से तो इस तरह के कामों से पूरी तरह छुटकारा पा चुका हूं। अब सिर्फ़ असली/वास्तविक और प्रामाणिक काम ही करता हूं। बेवजह, भीड़/समाज के डर से, वक़्त या पैसा बरबाद करनेवाला कोई काम नहीं करता। 


-संजय ग्रोवर
03-08-2016

(असलियत से भागने के सम्मानित उपाय-2)


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