BookShelf

Sunday, 25 December 2016

भगवान की पहचान

भगवान आजकल-1
(भगवान के नाम पर आजकल जो भी होता है, का चर्चा)


रात मैंने देखा, पता नहीं सपना था या सच था, एक प्रसिद्ध आदमी से एक लड़की ने कह दिया कि आप मेरे लिए भगवान के समान हो, मेरे भगवान हो.....’

बस वह मेरा दोस्त काफ़ी देर तक भावुक होता रहा, कई कोणों से दिलचस्प मुद्राएं दिखाता रहा।

मैंने सोचा क्या इस मेरे दोस्त को पूरा मालूम है कि भगवान कैसा है, किधर है, क्या काम करता है !? क्या यह बचपन से भगवान बनना चाहता था !? आज इसकी ‘तपस्या’ पूरी हुई, इस लड़की ने घोषित किया कि यही है भगवान, आज से यह भगवान हुआ!

कौन है यह लड़की !? लगता है कई भगवान देख चुकी है, कईयों को भगवान बता चुकी है, भगवान बना चुकी है!

इस लड़की को पूरा आयडिया है कि भगवान कैसा होता है, किधर रहता है, क्या काम करता है। जब भी बताएगी, यही बताएगी, कि यह लो, आ गया तुम्हारा भगवान। भगवान को आज तक ख़ुद पता नहीं था कि मैं भगवान हूं, इस लड़की ने बताया कि तुम भगवान हो, और मेरे भाई ने तुरंत मान भी लिया।

यह तो बड़ी क़ाबिल लड़की है। कल यह किसीको बताएगी कि तुम एमए हो तब उसे पता लगेगा कि मैं एमए हूं। ज़ाहिर ही है कि एमए होना भगवान होने से तो बहुत छोटा ही माना गया है। जब इस लड़की का दिया भगवत्ता का सर्टीफ़िकेट मान्य है तो एमए, बीए क्या बेचते हैं !?

लेकिन फिर मैंने देखा कि वही लड़की भगवान से अपने लिए चांस मांग रही है, अपने बारे में भगवान से पूछ रही है जो काम आप कई सालों से कर रहे हो, मैं उसे शुरु करने लायक हूं या नहीं !? मैं देखता आया हूं कि चांस चाहनेवाले किसीको भी भगवान बता देते हैं। भगवान को पहचानती है तो ख़ुद कहां और क्यों भटक रही है!?

हे भगवान! हे लड़की! हे दोस्तो! पहले आपस में फ़ायनल कर लो कि कौन क्या है फिर मैं भी अपना सपना तोड़कर हक़ीक़त में आ जाऊं।

तब तक कोई गाना सुन लेता हूं।

-संजय ग्रोवर
25-12-2016

Saturday, 24 December 2016

भद्दे सरलीकरण के भौंडे देवता

अगर गांधी गांधीवाद के बिना, अंबेडकर अंबेडकरवाद के बिना, मार्क्स मार्क्सवाद, नेहरु जेएनयू के बिना पैदा हो सकते हैं और महत्वपूर्ण काम कर सकते हैं (वैसे मेरी कोई गारंटी नहीं है कि इन्होंने जो भी किया अच्छा ही किया, मैं इनमें से किसीसे भी नहीं मिला, बस क़िताबों, फ़िल्मों, रिकॉर्डेड भाषणों आदि के ज़रिए ही जानता हूं) तो जो लोग इनके अनुयाई मात्र हैं वे वादों आदि पर इतना ज़ोर क्यों देते हैं, स्कूलों और यूनिवर्सिटियों पर इतना गर्व/फ़ख़्र क्यों करते हैं !? किसने इस समाज में मूल्यों और सोच का ऐसा भद्दा सरलीकरण किया है कि लोगों को सामने होती चीज़ें दिखाई नहीं पड़ती और काल्पनिक चीज़ों के लिए लोग अपनी और कई बार दूसरों की भी ज़िंदगियां बर्बाद कर देते हैं ? क्यों लोग किसी भी मुद्दे पर बारीक़ी से सोचने में असमर्थ हो जाते हैं और सतही बातों से सतही समाधान लेकर संतुष्ट हो जाते हैं ? 

क्या आपने कभी सोचा है कि समाज को सतही बातों में उलझाए रखनेवाले अक्सर वही लोग हैं जो बहुत गंभीर चिंतक होने का दावा करते हैं। जब भ्रष्टाचार विरोधी तथाकथित आंदोलन चल रहे थे तो वे कौन लोग थे जो इस तरह का माहौल बनाकर लोगों को धमका रहे थे कि जो रामदेव/केजरीवाल/अन्ना का समर्थक नहीं है वह भ्रष्टाचार का समर्थक है ? पूछिए कि जब रामदेव/केजरीवाल/अन्ना दुनिया में नहीं थे तो क्या कोई ईमानदार नहीं होता था ? अमेरिका, जर्मनी, जापान, फ़्रांस, चाइना में तो कोई रामदेव/केजरीवाल/अन्ना नहीं हुए, भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन तक नहीं हुए, तो क्या इन देशों की स्थिति ईमानदारी में भारत से कमज़ोर है ? जिस देश में और जिस समय में भाजपा/कांग्रेस/आमआदमीपाटी न हो तो उस देश और समय के लोगों को आत्महत्या कर लेनी चाहिए क्या !?

इन तथाकथित महान लोगों ने चीज़ों का ऐसा बेहूदा सरलीकरण किया है कि लोग अपनी आधी से ज़्यादा ज़िंदगी बेमतलब की बातों में ग़ुज़ार देते हैं ऊपर से तुर्रा यह कि दूसरों को ज्ञान बांटते फिरते हैं। मैं बड़ा हैरान होता था जब किसी सामूहिक ‘पवित्रता’ में जाकर देखता था कि बीच में आग जल रही है और आसपास लोग सर पर रुमाल डाले ऐसी गंभीर मुद्राएं बनाए बैठे हैं जैसे कोई बहुत ज़रुरी और सार्थक काम चल चल रहा हो। अजीब बात है, क्या कमरे की छत टपक रही है जो रुमाल डाले बैठे हो ? अगर गर्मी भी लग रही है तो पहले यह आग बुझाओ, रुमाल में क्या एसी लगा है ? अगर बरसात आ रही है तो छाता लगाओ, रुमाल किस मर्ज़ की दवा है ? अगर तुम बाज़ार में बेईमानी और रिश्तों में लिफ़ाफ़ेबाज़ी नहीं छोड़ सकते तो रुमाल और आग से कैसे पवित्र हो जाओगे ? यह अच्छी ज़बरदस्ती है कि न तो सच बोलेंगे, न ईमानदार रहेंगे, न लड़के-लड़कियों के एवज में पैसे का लेन-देन बंद करेंगे, न छुआछूत, छोटा-बड़ा, ऊंचा-नीचा करना छोड़ेंगे मगर फिर भी हमें महान और पवित्र मानो क्योंकि हम आए दिन कहीं आग लगाकर बैठ जाते हैं, किसीको धागा बांधकर मरने के लिए छोड़ जाते हैं, कहीं बिजली चुराकर दिए से प्रकाश फैलाने का नाटक रचाते है। 

ये कौन लोग थे जिन्होंने कहा कि खाना हमें खिला दो तो समझो तुम्हारे मरे हुए पिताजी तक पहुंच जाएगा ? और किसीने भी नहीं पूछा कि अगर तुम हमारे पिताजी का खाना खा सकते हो तो उनकी जगह मर क्यों नहीं सकते ? हमारे पिताजी तो फिर भी कुछ काम कर रहे थे, वे थोड़ा और जिएं तो कुछ और काम आगे चलेगा, तुम तो बस खाने और झूठी श्रेष्ठता का भ्रम बनाए रखने के लिए ही घटिया सरलीकरण और प्रतीकीकरण से लोगों को बुद्धू बनाए जा रहे हो! 

(जारी)

-संजय ग्रोवर
24-12-2016

Wednesday, 21 December 2016

रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-4

(पिछला हिस्सा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


सुना था, आज देख भी लिया कि एन डी टी वी ने गोरे रंग की क्रीम के विज्ञापनों पर बैन लगा दिया है। कुछ महीने पहले रामदेव और मैगी नूडल्स् के बीच इसी तरह का रिश्ता देखने में आया था। बाद में जो हुआ वह भी सामने ही है।

रामदेव तो ख़ैर रामदेव ही हैं, वे आधुनिकता के लिए जाने भी नहीं जाते मगर एन डी टी वी जैसे ‘मानवीय’ और ‘प्रगतिशील’ चैनल को गोरेपन की क्रीम के नुकसान समझने में इतने साल क्यों लग गए ? गोरेपन की क्रीम तो शराब भी नहीं है कि ग़रीब लोग उसे लगाकर अपने घर में मारपीट करते हों। इस क्रीम से ऐसा क्या नुकसान हो जाएगा ? सही बात यह है कि दहेज नहीं मिटाना, करवाचौथ बनाए रखना है, अपने रीति-रिवाजों पर उंगली नहीं उठानी, नास्तिकता और ईमानदारी पर बात करने में न जाने क्या ख़तरा है, सो सबसे आसान रास्ता यही है कि लोगों को प्रतीकबाज़ी और त्यौहारबाज़ी में उलझाए रखो। यहां याद रखने योग्य बात यह है कि लगभग दो महीने पहले एन डी टी वी पर एक दिन के बैन की घोषणा हुई थी, अभी बैन का दिन आया भी नहीं था कि कई भक्तों ने एन डी टी वी को शहीद घोषित कर डाला था, दूसरी तरफ़ कुछ लोगों ने इसकी विश्वसनीयता पर संदेह भी किया था। ज़ाहिर है कि एक दिन के बैन का अर्थ प्रतीकात्मक या अचानक मिली छुट्टी से ज़्यादा क्या हो सकता है।

सवाल यह भी है कि भारत में गोरे रंग की क्रीम कौन लोग ख़रीदते होंगे !? क्या गोरे लोग !? वे क्यों ख़रीदेंगे, वे तो पहले ही गोरे हैं! जब तक लगानेवालों की मानसिकता नहीं बदलेगी, बैन से क्या होगा ? वैसे भी बैन चाहे अभिव्यक्ति पर हो चाहे शराब-सिगरेट-गुटखे पर, यह कट्टरपंथ, पवित्रतावाद और एकतरफ़ा सोच के बारे में ही बताता है जिसे भारत के कई तथाकथित प्रगतिशील लोग आर एस एस की सोच मानते हैं।

बहरहाल जिस दिन एन डी टी वी पर फ़ायनली बैन लगना था, उसी दिन नोटबंदी की घोषणा हो गई। एन डी टी वी शहीद होते-होते रह गया। अभी-अभी आदरणीय राहुल गांधी जी ने इस संसद-सत्र की समाप्ति से एक-दो दिन पहले भूचाल लाने की बात की और दूसरे-तीसरे दिन उनका आदरणीय प्रधानमंत्री के साथ वार्ता करने का फ़ोटो आ गया। यह भी ख़बर आई कि राजनीतिक दलों को चंदा देने पर क्या-क्या छूटें मिल सकतीं हैं। आज कुछ डायरियों के हवाले से आदरणीय श्री मोदी पर आरोप लगाते आदरणीय श्री राहुल काफ़ी गोरे लग रहे थे। सिर्फ़ उनके गोरेपन के आधार पर उनके सही या ग़लत होने के बारे में कोई नतीजा निकाल लेना कोई समझदारी की बात नहीं लगती।

फिर से क्रीम पर आते हैं। क्या दुनिया में सभी गोरे, क्रीम की वजह से गोरे हैं ? क्या क्रीम लगाने से आदमी के अंदर कोई ऐसे परिवर्तन होते हैं कि वह अत्याचारी हो जाता है ? क्या क्रीम में कोई ऐसी चीज़ है जिससे आदमी को नशा हो जाता है ? मुझे याद आता है, बचपन में मैं काफ़ी दुबला-पतला था। कोई भी मेरे हाथ-पैर मरोड़ देता था। जिनके शरीर अच्छे थे, जो कसरत वग़ैरह करते थे उनमें से ज़्यादातर या तो दादागिरी करते थे, या उससे लड़कियों को प्रभावित करने में लगे रहते थे। मुझे तो एक भी याद नहीं आता जो लड़कियों की या ग़रीबों की रक्षा करता हो। अगर कलको मुझे कोई अधिकार/सत्ता/चैनल मिल जाए तो क्या यह ठीक होगा कि मैं सारे भारत के जिमों और पहलवानी पर बैन लगा दूं !?


(जारी)

-संजय ग्रोवर 
21-12-2016

(अगला हिस्सा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

Sunday, 20 November 2016

वाह रे मर्द!

व्यंग्य

अपने यहां मर्दानगी का शौक़ काफ़ी पुराना लगता है। यह बिलकुल असाध्य रोग की तरह लगता है क्योंकि 2011 से 2016 तक में भी मर्दानगी से संबंधित तरह-तरह की कहानियां, विज्ञापन, कविताएं आदि देखने को मिलते रहते हैं।

मैं अलग से किसी विज्ञापन या कविता (जहां तक तर्कहीनता की बात है कई बार ये दोनों  बिलकुल एक जैसे लगते हैं) का ज़िक़्र नहीं करना चाहता क्योंकि कई लोग इसमें भी अपनी प्रसिद्धि, महानता और शहादत आदि देखने या चाहने लगते हैं। कई लोग मर्दानगी की महानता का चर्चा अकसर औरतों और परिवार की सुरक्षा के संदर्भ में करते हैं। यह बात अलग है कि अपने यहां ऐसे मर्दों का आंकड़ा जुटाना मुश्क़िल है जो वास्तव में अपनी भी सुरक्षा ठीक से कर पाते हों। ज़्यादातर मर्द पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों के नाम पर जगह-जगह, तरह-तरह से एडजस्ट ही करते पकड़े जा सकते हैं।

चलिए, हम थोड़ी देर को मान लेते हैं कि मर्द वह है जो परिवार की सुरक्षा करता है। अब सवाल यह है कि जिसका परिवार नहीं वो क्या ख़ाली अपनी मर्दानगी साबित करने के परिवार पैदा करे ? उसके परिवार का खर्चा कौन उठाएगा ? अगर वह परिवार की आड़ में बेईमानी से एडजस्ट न करना चाहे तो ? देश में ऐसे बहुत सारे मर्द मशहूर होते रहे हैं जिनके परिवार नहीं थे। उनका अब आप क्या करेंगे ? उनको क्या बोलेंगे ?

आप परिवार की रक्षा किससे करेंगे ? आप शरीफ़ हैं तो दूसरे क्या बदमाश हैं ? उनके भी तो परिवार हैं। वे भी अपने परिवार की रक्षा के लिए तरह-तरह के क़रतब कर रहे हैं। कौन तय करेगा कि किसके क़रतब जायज़ हैं, किसके नाजायज़ ? बलात्कार कांड हुआ और एक-एक आदमी बोला कि हम बलात्कार के खि़लाफ़ हैं, औरतों का सम्मान करते हैं। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चला, हर कोई समर्थन करने लगा। नोट बंद हुए, हर कोई बोला हम ब्लैक मनी के खि़लाफ़ हैं। यहां इतने तो अच्छे लोग रहते हैं, फिर रक्षा किससे करनी है ?

आप परिवार की रक्षा कितने वक़्त तक करेंगे ? आप कितने साल तक जिएंगे ? उसके बाद परिवार की रक्षा कौन करेगा ? आपके ‘परिवार की रक्षा’ के शौक़ के लिए परिवार के सभी सदस्यों का 60-60 साल तक बच्चा बना रहना ज़रुरी है क्या ? एक आपकी ईगो की ख़ातिर इतने-इतने लोग क़ुर्बान हो जाएं ? इससे मिलेगा क्या ?


अगर मर्द वह है जो परिवार और महिलाओं की रक्षा करता है तो स्पष्ट है कि परिवार का मुखिया, परिवार का बड़ा, परिवार में शासक भी वही है। यह किसका फ़ायदा है ? परिवार और महिलाओं का या स्वयं मर्द का ? नये डब्बे में पुराने कार्यक्रम कब तक चलाते रहोगे महा-पुरुष !?

आप अगर महिलाओं और परिवार की रक्षा करेंगे तो भगवान क्या करेगा ? यूं तो लोग कहते हैं कि सब कुछ वही करता है मगर आप जैसों की बातें पढ़ें-सुनें तो लगता है कि वह कुछ भी नहीं करता। अगर वह किसी परिवार की सुरक्षा नहीं करना चाहता तो आप क्या उसके खि़लाफ़ जाके रक्षा कर पाएंगे ?



क्यों न परिवार को और औरतों अपनी रक्षा ख़ुद करने दें क्योंकि जिनसे उनकी रक्षा आप करना चाहते हैं वे सब भी पारिवारिक लोग हैं। वे भी अपने:परिवार की सुरक्षा’ की ख़ातिर उन्हें आपसे दूर रखने में लग गए तो ?
 

बेईमानों से हमारा एडजस्टमेंट है, रिश्वतखोरों का हमारे घरों में आना-जाना है, छेड़नेवाले हमारे दूर-पास के संबंधी हैं, दहेजखोर कट्टरपंथी, प्रगतिशीलों-सा भेस बनाकर, हमारे दोस्त-यार हैं।  जिनसे रक्षा करनी है, सब तो हमारे चिर-परिचित हैं। फिर रक्षा किससे करनी है ?  फिर रक्षा बस विज्ञापन में, नाटक में, कविता में, कहानी में, फ़िल्म में, मंच पर ही संभव है।
 

वो तो कई सालों से चल रही है।

वैसे किसीकी रक्षा करने के लिए मर्द होना ज़रुरी क्यों है ? क्या इंसान किसीकी रक्षा नहीं कर सकता ?


-संजय ग्रोवर
20-11-2016

Friday, 7 October 2016

निधन


लघुकथा

जब भी कोई कहता है कि मैं मरकर ज़िंदा रहना चाहता हूं, मैं समझ जाता हूं कि जीतेजी ज़िंदा रहने में इसकी कोई दिलचस्पी नहीं है या फिर मरने से पहले जीने का साहस नहीं है।

ऐसे में मरने के बाद ज़िंदा रहने के अलावा चारा भी क्या है ?

-संजय ग्रोवर
07-10-2016

Thursday, 22 September 2016

भगवान से मदद के ख़्वाहिशमंद

अभी एफ़ एम सुन रहा था, एक बात सुनकर कान खड़े हो गए-‘कई ‘बुद्धिमान’ लोग समझते हैं कि दुनिया में जो भी होता है भगवान करता है.....‘.....मुझे लगा बात सुननी चाहिए, थोड़ी उम्मीद बंध गई जैसी भारत में नास्तिकता पर बनी फ़िल्मों को देखते हुए शुरुआत में बंध जाती है। मैंने आगे सुना-......‘भगवान उन्हीं की मदद करता है जो अपनी मदद ख़ुद करते हैं......’
 

धत्तेरे की!
 

नतीजा भी वही निकला जैसा पहले निकलता था।

जैसे आप कहें कि हम उसी आदमी को खाना देते हैं जिसका पेट भरा हो। जैसे कोई नर्सिंगहोम कहे कि हम तो उन्हीं पेरेंट्स् की डिलीवरी कराते हैं जो अपनी डिलीवरी ख़ुद करा लेते हैं। हम तो उन्हीं बच्चों को पैदा करते हैं जो ख़ुद पैदा हो जाते हैं। हम तो वही कपड़े धोते हैं जो पहले से धुले हों। हम तो उसी रोटी को बनाते हैं जो पहले से बनी हो। हम तो उन्हींको कर्ज़ा देते हैं जिनकी अलमारियां नोटों से भरी हों। हम तो वहीं बखिया मारते हैं जहां कभी उधड़ा न हो। हम तो उसीको पिटने से बचाते हैं जो पीट रहा हो।

ऐसे लोगों को भगवान की मदद किसलिए चाहिए जो अपनी मदद ख़ुद कर लेते हैं!? किसीको वक़्त बर्बाद करने का ज़्यादा ही शौक़ हो तो बात अलग़ है। और भगवान को क्या इतनी भी समझ नहीं कि जो अपना काम ख़ुद ही कर लेता हो उसकी मदद करना अकसर फ़ालतू में क्रेडिट लेने से ज़्यादा कुछ नहीं होता।

और भगवान के पास कोई इसलिए नहीं जाता कि मेरे साथ ज़रा परांठे बनवा दो या दाल लाके देदो। लोग अकसर ऐसे कामों के लिए जाते हैं जो वे ख़ुद नहीं कर सकते या उन्हें लगता है कि नहीं कर सकते-जैसे लड़के को पास करा दो या लड़की की शादी के लिए लड़का ढुंढवा दो। और ऐसी मांग करते हुए कोई अपनी मदद ख़ुद नहीं कर रहा होता, अकसर हाथ फैलाए, याचक की दीन-हीन मुद्रा में ही खड़ा होता है।

और भगवान उनकी मदद कर भी देगा जो अपनी मदद नहीं कर पा रहे तो भगवान का घिस क्या जाएगा ? उन्हें ऐसा बनाया किसने है ? जिन्हें ख़ुद भगवान ने दयनीय/असहाय बनाया है उनकी मदद करना तो उसका फ़र्ज़ बनता है, उसको ज़रुर करनी चाहिए। और ऐसे लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं जिन्हें मदद की ज़रुरत है-बुज़ुर्ग हैं, छोटे बच्चे हैं, विकलांग हैं, जाति-धर्म-नस्ल-रंगभेद के मारे लोग हैं.....।

जब सब कुछ भगवान की मर्ज़ी से होता है तो साफ़ मतलब है कि इनकी दुर्दशा का ज़िम्मेदार भी भगवान है। और यह भी साफ़ है कि जब तक भगवान नहीं चाहेगा, लोग अपनी मदद भी कैसे कर लेंगे? सोच भी कैसे सकते हैं?

वैसे भगवान न तो कहीं होता है, न मदद करता है, न करेगा। अभी लड़की की हत्या हुई, हमला हुआ, भगवान नहीं आया। अगर भगवान होता तो हत्या या हमला होने ही क्यों देता !?

भारत में प्रगतिशीलता की हालत चिंताजनक है।


-संजय ग्रोवर
23-09-2016

Saturday, 20 August 2016

असलियत से भागने के सम्मानित उपाय-2


(असलियत से भागने के सम्मानित उपाय-1)

कल सुबह तीन-चार बजे के बीच नींद खुल गई। एफ़एम सुनने लगा। एक कार्यक्रम में कृष्ण और ‘कर्म करो, फल की इच्छा छोड़ दो’ का ज़िक्र आया तो दूसरे में गीता की तारीफ़ सुनने को मिल गई। जब भी सुनता हूं कि कई बड़े(!), मशहूर और बुद्विमान(!) लोग गीता के उपदेश को पसंद करते रहे हैं, हैरानी में पड़ जाता हूं। मैंने गीता नहीं पढ़ी, लेकिन कुछ वाक्य/उपदेश जगह-जगह दुकानों/दीवारों पर लिखे देखे हैं या लोगों से सुने हैं जो निम्न आशय के हैं-

⃝    शरीर के मरने से आत्मा नहीं मरती।

⃝    हम तो कठपुतलियां हैं, हमारे करने से कुछ नहीं होता, जो वह चाहता है वही हमसे/सबसे करवा लेता है। जो वह चाहता है वही होता है।

⃝    जीवन तो अभिनय है, नाटक है, हमें तो एक पात्र की तरह अपना ‘रोल’ ‘प्ले’ करना होता है।

एक ईमानदार और संवेदनशील इंसान की दृष्टि से मुझे उक्त सभी बातें चकित करतीं हैं।

04-08-2016 

कभी कहीं मैंने सुना या पढ़ा, शेक्यपियर ने भी कहा है कि ‘शो मस्ट गो ऑन...’; मैंने इंटरनेट पर थोड़ी देर ढूंढा, स्पष्ट नहीं हो सका कि उन्होंने यह ख़ुद कहा या यह उनका पसंदीदा जुमला था। बहरहाल, ओशो को कहीं पढ़ा, उन्होंने कहा है, ‘जिओ ऐसे, जैसे अभिनय कर रहे हो और अभिनय ऐसे करो जैसे जी रहे हो।’ निश्चय ही, अभिनय कोई ऐसे कर पाए जैसे जी रहा हो तो इससे ज़्यादा ख़ूबसूरत और यथार्थवादी अभिनय क्या हो सकता है लेकिन जियो ऐसे जैसे अभिनय कर रहे हो, यह बात पल्ले नहीं पड़ती।

इस तरह तो अफ़वाहबाज़ों, बलात्कारियों, पाखंडियों, धूर्त्तों, बेईमानों और मौक़ापरस्तों के लिए बड़ी आसानी हो रहेगी। वे कहेंगे ज़रा बलात्कार का अभिनय ही तो किया है, इतना शोर क्यों मचा रहे हो ?  यह तो गंदा-सा काम करने के लिए ‘अच्छा-सा’(!) बहाना ढूंढ लेने जैसा है। और कौन तय करेगा कि किस बात का अभिनय ठीक है और किस बात का ग़लत ? और इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक़ सच यह है कि यह कौन तय करेगा कि कौन अभिनय करेगा और कौन अभिनय करवाएगा ? कौन रोल लिखेगा और देगा और कौन खोपड़ी गिरवी रखकर चुपचाप रोल करता चला जाएगा ? मेरी समझ में इंसान के द्वारा इंसान का इससे ज़्यादा शर्मनाक़ इस्तेमाल कोई हो नहीं सकता। अगर दूूसरे के कहने पर रोल ही करना है तो फ़िर अपने दिमाग़ का रोल तो ख़त्म ही समझिए। फिर व्यक्ति की आज़ादी का अर्थ भी ख़त्म समझिए। हां, कायरों और कमज़ोरों के लिए जो बहादुर और महान भी दिखना चाहते हैं, यह बहुत अच्छा बहाना है। 

इस सबके साथ यह भी समझना ज़रुरी है कि जो किसीको रोल दे रहा है, उस अहंकारी को इसके लिए चुना किसने है !? यह सिवाय अहंकार और मक्कारी के और क्या है कि आप ख़ुद ही ख़ुदको ऐसे काम के लिए श्रेष्ठ मान लें जिसमें आपका तो फ़ायदा ही फ़ायदा होगा मगर दूसरे कईयों का जीवन दांव पर लग जाएगा या बर्बाद हो जाएगा ? और ऐसी बातें कहनेवाले इन्हें कहने से पहले पर्याप्त समझदारी से इन्हें समझे हों या उनकी नीयत बिलकुल ठीक हो, यह पता कैसे लगाईएगा ? अभी दो-तीन दिन पहले ही मैंने एक नवोदित कलाकार का इंटरव्यू देखा ; वे कह रहे थे कि ज़िंदग़ी को ज़्यादा गंभीरता से मत लो, बस मौज-मज़ा लो, छोटी-सी तो ज़िंदगी है। मैंने सोचा कि फ़िर आप भी अपने कैरियर को हंसी-मज़ाक़ में उड़ा दो, यह भी तो अगंभीर ज़िंदगी का मामूली-सा हिस्सा है, मज़ाकिया-सा क़िस्सा है। मुझे लगता है उन्होंने हाल ही में कहीं पढ़ा या सुना होगा, अपने मतलब का लगा होगा सो बोल दिया होगा।  

कल्पना कीजिए कि ईमानदारी बेईमानों के हाथ लग जाए, प्रगतिशीलता मौक़ापरस्तों के हाथ लग जाए,  तो क्या-क्या संभव है! और यह बहुत आसान है अगर ज़िंदगी के सारे मूल्य, मान्यताएं और जीवनशैली बनाने का काम बेईमानों, पाखंडियों, खोखलों और कायरों के हाथ लग जाए तो वे कुछ भी कर सकते हैं। और ये काम क्या-क्या हो सकते हैं ? ये काम हो सकते हैं क़िताबें लिखना, फ़िल्में बनाना, आंदोलन करना, वक्त्व्य देना, भाषण देना, शिक्षा देना, संपादन करना....। इन सबके सहारे एक पूरे समाज को चंद व्यक्तियों की सहूलियत के अनुसार गढ़ना और गढ़ते चले जाना कोई बहुत मुश्क़िल काम नहीं है।

ज़िंदगी को अभिनय मानने के कई ख़तरे हैं ; अभिनय करनेवाला झूठी माफ़ी मांग सकता है, झूठी दोस्ती कर सकता है, झूठा प्रेम कर सकता है, सही बात तो यह है कि इस बहाने से वह गंदी से गंदी हरक़त पर उतर सकता है। कोई अपनी ज़िंदगी को अभिनय मान भी ले मगर दूसरे की ज़िंदगी को अपने द्वारा किए जा रहे नाटक का हिस्सा कैसे मान सकता है !? जबकि दूसरे को इस बात का अंदाज़ा तक नहीं है, उसके लिए ज़िंदगी बिलकुल वास्तविक और गंभीर कृत्य है। मुझे नहीं समझ में आता कि धर्म, आध्यात्मिकता या सामाजिकता के नाम पर इस तरह की क्रूरता कोई समझदार या संवेदनशील व्यक्ति सोच भी कैसे सकता है!?

लोग राष्ट्रप्रेम और ज्ञान के विस्तार जैसे मूल्यों का, झंडा लगाने या दिए जलाने जैसे कर्मकांडों के ज़रिए, अभिनय करते हैं लेकिन इमारतों में रेत और घटिया सामान लगाकर पैसे कमाने(!) जैसे कामों को असलियत में करते हैं। प्रतीकात्मकता, कर्मकांडों और रिवाजों से हमें क्या मिला, इसीसे पता लगता है। पाखंडियों ने धर्म, भगवान, ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, जाति, सफ़लता जैसी नक़ली और गढ़ी गई चीज़ों को वास्तविक ज़रुरत की तरह स्थापित कर दिया और भूख, प्रेम, सैक्स, इंसानियत जैसी वास्तविक चीज़ों को पीछे धकेल दिया।

जो लोग ज़िंदगी को अभिनय मानते हैं, उन्हें मकान छोड़ देने चाहिए और पेड़ के नीचे जाकर मकान में रहने का अभिनय करना चाहिए। क्यों नहीं वे खाना-पीना छोड़कर खाने-पीने का अभिनय करके काम चलाते ? क्यों नहीं वे अपने कपड़े ग़रीबों को देकर ख़ुद कपड़े पहनने के अभिनय भर से काम चलाते ? क्यों वे दूसरों से सचमुच के पैसे ले लेते हैं, जबकि पैसे ले लेने के अभिनय से भी तो काम चल सकता है!

यह सब लिखना इसलिए भी ज़रुरी है कि जब तक हम असफ़लता को सफ़लता, कमज़ोर को शक्तिशाली, कायर को साहसी कहते रहेंगे, ऐसे लोगों का फ़ायदा कराते रहेंगे। दरअसल ‘ज़िंदगी अभिनय है’ जैसी बातें करनेवाले लोग ख़ुद ही बता रहे होते हैं कि वे असली ज़िंदगी का सामना करने में असफ़ल हो गए हैं, घबरा गए हैं इसलिए उन्होंने ‘दिलके ख़ुश रखने को....’ यह ’अच्छा ख़्याल’ ढूंढ लिया है।  

ऐसी क़िताबें जो लोगों को समझातीं हों कि तुम कठपुतली हो, तुम अभिनेता हो, करनेवाला तो कोई और है, से आज़ादी, लोकतंत्र, उदारता, अहिंसा आदि को समझने की उम्मीद सिवाय नासमझी के क्या हो सकती है ?


-संजय ग्रोवर
20-08-2016

Wednesday, 3 August 2016

असलियत से भागने के सम्मानित उपाय

कभी क़िताब या कॉपी ज़मीन पर गिर जाती तो बच्चे झट से उठाते और ‘हाय! विद्या गिर गई!’ कहकर माथे से लगाने लगते। नहीं समझ पाता था कि ऐसा करने से क्या होगा? मेरी अपनी क़िताब-कॉपी गिरती तो मैं तो बस यही देखता कि फ़ट तो नहीं गई या मिट्टी तो नहीं लगी। लगी हो तो साफ़ करके बस्ते (स्कूल बैग) में रख लेता। प्रतीकात्मकता, कर्मकांड और रस्मो-रिवाज़ मेरी समझ में कभी नहीं आए। मैं यह भी जानता था कि क़िताब माथे से लगाने वाले कई बच्चे इम्तिहान के वक़्त नक़ल करने में कतई नहीं हिचकिचाते। उस वक़्त विरोध का साहस कम था, आत्मविश्वास का मतलब न तो पुरानी परिभाषाओं से समझ में आया था न ही उसको लेकर अपनी कोई समझ पैदा हुई थी, कई सालों तक बीच में लटकने जैसी स्थिति बनी रही।

दूसरे देशों का पता नहीं पर अपने यहां लगता है कि लोगों की आदत और दिलचस्पी असली काम करने या असली ज़िंदगी जीने से ज़्यादा रस्मों, कर्मकांडों और अभिनय में है। पता नहीं भारत में बहिनों की सचमुच रक्षा करनेवाले भाईयों का असली आंकड़ा क्या है मगर देखा है कि बहुत-से लोग धागों की रक्षा जमकर करते हैं। कई लोग रात को सोते समय या दिन में नहाते समय भी धागा अपने-से अलग नहीं करते। कई लोग हर साल रावण को मारकर बुराई का ख़ात्मा कर देते हैं तो कई लोग बीएसपी, कांग्रेस, आरएसएस, वामपंथ आदि को ग़ाली देकर बाक़ी समाज को भारमुक्त कर देते हैं। इस देश में तो, सुनने में आया है कि, शायरी और दर्ज़ीगिरी में भी काम सिखाने के पहले या बाद में उस्ताद और शागिर्द आपस में कुछ धागों की बांधा-बूंधी करते हैं। ऐसी जगह पर प्रगतिशीलता को समझ पाना या समझा पाना वाक़ई टेढ़ी खीर और कलेजे का काम है। कई लोग कपड़ों से प्रगतिशीलता और पढ़ाई-लिखाई नापा करते हैं। भारत में आठ महीने पड़नेवाली सड़ी गर्मी में कोट-टाई-जूते-जुराबें पहनकर पसीने-पसीने होते हुए, गिरते-पड़ते हुए भी ख़ुदको पढ़ा-लिखा और मॉडर्न कहलवा ले जाना मज़ाक़ कैसे हो सकता है !? प्रतीकात्मकता क्या कोई मज़ाक़ है!? कोई बोलके तो दिखाए! कई साल तक तो हम लोग छुरी-कांटों की ‘हाईजेनिकता’ समझने के बजाय उन्हें स्टेटस सिम्बल के तौर पर इस्तेमाल करते रहे।  

दिलचस्प है कि अपने यहां लोग अकसर कर्मकांड निभाने को ही बड़ी सामाजिक ज़िम्मेदारी मानते हैं। अकसर प्रगतिशील समझे जानेवाले पुरुष और स्त्रियां भी दहेज, लगन, तिलक, चूड़ा, भात आदि देने को सामाजिक ज़िम्मेदारी मानते हैं और इन्हें हटाने, बदलने या रोकने की बात या कोशिश करनेवालों को ही एक बुराई की तरह स्थापित करने में लग जाते हैं। ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ या ‘चोरी और सीनाज़ोरी’ यहां एक नितांत ‘सहज’ सामाजिक आदत या चलन है। मेरी समझ में ऐसे लोग इंसानियत के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों से भागे हुए लोग होते हैं। इनकी दिलचस्पी कमज़ोर पक्ष की स्थिति सुधारने के बजाय अमानवीय रीति-रिवाजों को निपटाकर तुरत-फु़रत महान बन जाने में होती है। ज़ाहिर है कि आज भी हमारे समाज में रिश्तों के नाम पर पैसे का अश्लील लेन-देन ख़ुलेआम चलता है और स्पष्टतः इस सारे आयोजन में कमज़ोर स्थिति स्त्रियों या लड़कीवालों की होती है। लेकिन यहां मर्दों के साथ तथाकथित प्रगतिशील स्त्रियां भी ख़ुशी-ख़ुशी भाग लेती दिखाई देतीं हैं। इन अवसरों पर होनेवाले रीति-रिवाजों और कर्मकांडों की उपयोगिता मैं कभी समझ नहीं पाया। इन रीति-रिवाजों और कर्मकांडों से न तो किसी काम के सफ़ल होने की गारंटी होती है न ही इनकी कोई ठोस वजह समझ में आती है। जो काम कोर्ट में आधे घंटे और मामूली ख़र्चे में हो सकता है उसके लिए इस तरह पैसा और वक़्त बर्बाद करना कतई समझ में नहीं आता।  

प्रतीकात्मकता में नाटकीयता या अभिनय का बड़ा रोल है। आप पूरे साल-भर सामाजिक बदलाव के लिए मामूली ख़तरा भी न उठाएं मगर दशहरे पर रावण के पुतले के दहन में ताली बजाकर समाज में सम्मानित बने रह सकते हैं। आप बहिन/स्त्री की रक्षा के वास्तविक काम को कभी न करते हुए भी मात्र धागा बंधाकर और कुछ धनराशि देकर अपने-आपको बहादुर, सामाजिक और मानवीय मान सकते हैं। लब्बो-लुआब यह कि प्रतीकात्मकता का ज़्यादातर खेल असली कामों को छोड़कर फ़ालतू के बचकाने रीति-रिवाजों से चलता है। जिस देश के लोग अपनी आधी से ज़्यादा ज़िंदगी बेमतलब के कर्मकांडों और (अपने ही बनाए अमानवीय रीति-रिवाजों के चलते) लड़के-लड़कियों के लिए रिश्ते देखने में लगा देते हों, उस देश का विज्ञान, विचार, आधुनिकता और मौलिकता में पिछड़ते चले जाना कोई हैरानी की बात नहीं मानी जानी चाहिए।


मैं रीति-रिवाजों में भाग लेने में बहुत उत्सुक तो कभी भी नहीं रहा और पिछले छः सात सालों से तो इस तरह के कामों से पूरी तरह छुटकारा पा चुका हूं। अब सिर्फ़ असली/वास्तविक और प्रामाणिक काम ही करता हूं। बेवजह, भीड़/समाज के डर से, वक़्त या पैसा बरबाद करनेवाला कोई काम नहीं करता। 


-संजय ग्रोवर
03-08-2016

(असलियत से भागने के सम्मानित उपाय-2)


Saturday, 16 July 2016

‎प्रगतिशीलता‬ !?

कई महीनें पहले मित्र नीलांबुज ने एक पोस्ट लगाई थी जिसमें ‪‎निराला‬ की प्रगतिशीलता का ज़िक्र यूं आया था कि उन्होंने अपनी ‪‎बेटी‬ की ‎शादी‬ में पंडित को नहीं बुलाया था, ‪‎मंत्र‬ ख़ुद ही पढ़ लिए थे। मैंने तभी कहा था मुझे तो इसमें कहीं प्रगतिशीलता नहीं नज़र आती।

क्या प्रगतिशीलता इतनी ही आसान चीज़ है!?

फ़िर तो ऐसा हो जाएगा कि यार मैं पहले सोमवार को अंधविश्वासी होता था, अब मैंने क्रांति कर दी है, परंपरा तोड़ डाली है अब मैं बुधवार को अंधविश्वासी होता हूं।

क्या प्रगतिशीलता मज़ाक़ है!?

प्रगतिशीलता के नाम पर अपने यहां यही सब चलता है कि अब ‎स्त्रियां‬ भी ‎अंतिम संस्कार‬ में जाने लगीं हैं, ग्रंथ पढ़ने लगीं हैं! कुछ स्त्रियां और कुछ पुरुष इसपर ख़ुश हो सकते हैं, मगर संपूर्णता में देखें तो यह रुढ़िवाद का विस्तार है, रुढ़िवादियों की जीत है। स्त्री सचमुच प्रगतिशील और साहसी होती तो कहती कि ये बेमतलब के कर्मकांड न तो मैं करुंगी और न, हे पुरुष, तुम्हे करने दूंगी।

'इतनी सारी प्रगतिशीलता' के बावज़ूद भारत में ‎दहेज‬ तक न बंद हो सका !!! असलियत जानने के लिए किसी विवाह समारोह में जा देखें। पुरुष तो क्या, किसी स्त्री को भी वहां चल रहे लेन-देन पर नाराज़ होता न पाएंगे। हो सकता है कोई मजबूरी हो बोल न पाने की मगर नाराज़गी हो तो चेहरे पर तो दिखाई देती है। चेहरे के भाव छुपा लो तो आंखें फ़िर भी बोल पड़तीं हैं। मगर कहां!! वहां तो सब ऐसे प्रसन्न दिखाई देते हैं जैसे दुनिया की सारी समस्याएं ख़त्म हो गईं हों!

और कोई क्यों ऐसे लोगों को प्रगतिशील कहेगा जो हर किसीको भगवान बनाने में लगे रहते हों!? पुराने भगवानों से छुटकारा हुआ नहीं और ये रोज़ाना नए खड़े किए जा रहे हैं! निराला पर कुछ न कहो, गुलज़ार पर मत बोलो, जावेद अख़्तर पर क्यों बोले.......

ये प्रगतिशील लोग हैं!? ये कहते हैं कि ‎मशहूर‬ आदमी की ‎आलोचना‬ करना ‎चांद‬ पर थूकना है!! कौन तय करेगा कौन चांद है!? यू तो ‎साइंस‬ ने बता दिया है कि चांद में गड्ढों के सिवाय कुछ नहीं है, चमकता भी ‪‎सूरज‬ की रोशनी से है। चलो झूठ-मूठ मान लिया कि चांद की रोशनी बड़ा चमत्कार है, फिर भी आदमी को चांद होने की क्या ज़रुरत है!? और ‪‎मार्क्सवादी‬ कहे कि ‘बड़े आदमी की छोटे लोग इसलिए आलोचना करते हैं कि इस बहाने उनका भी नाम हो जाता है’! ये ठहरे मार्क्सवादी! साम्यवादी! समानतावादी! बड़ा-छोटा कर रहे हैं!?

और ‪अध्यात्मवादी‬ !? महाविनम्र!! ईश्वर या किसी अध्यात्मिक शक्ति के सामने ख़ुदको तिनके समान मानते हैं!! इन्हें चांद बनने की क्या ज़रुरत पड़ गई!? अपने समय के सबसे ज़्यादा प्रगतिशील प्रेमचंद की लानत-मलामत हो सकती है, मार्क्स की दाढ़ी खींची जा सकती है, अंबेडकर को गलियाआ जा सकता हैं, नेहरु-गांधी पर बौछार हो सकती है तो निराला और प्रसाद उससे बाहर कैसे रह सकते हैं!? उदयप्रकाश जीतेजी रोज़ाना हड़काए जा सकते हैं तो गुलज़ार क्यों बचे रहें!?

कोई चांद-पांद नहीं है, जिसको चांद बनने का शौक हो उसे चांद पर ही जाकर रहना चाहिए। यह अजीब तमाशा है अपने यहां कि एक ही आदमी को ‎ज़मीन से जुड़ा‬ भी बताया जाता है फ़िर उसे चांद भी बताया जाता है। उसे ‪‎समानता‬ का ‪‎पक्षधर‬ भी बताया जाता है फ़िर उसीको इतना बड़ा भी बताया जाता है कि कोई उंगली भी न उठा सके!!

‎विचित्र‬ प्रगतिशीलता है!!

मुझे तो कतई भी नहीं चाहिए चांद।

जिन्हें चाहिए उन्हें भी उसके गड़ढों की हक़ीकत समझने के लिए तैयार रहना चाहिए।

-‎संजय ग्रोवर‬

16 जुलाई 2013

(अपना एक फ़ेसबुक स्टेटस)




Friday, 3 June 2016

सांप्रदायिकता क्या है-2

आजकल सांप्रदायिकता चर्चा में है। किसी न किसी को तो चर्चा में होना है, चलो सांप्रदायिकता ही सही।

मेरी समझ में जिस दिन किसी बच्चे को सिखाया जाता है, ‘माई मम्मी इज़ द बैस्ट’, सांप्रदायिकता शुरु हो जाती है।


जिस दिन कोई कवि अपने श्रोताओं से कहता है कि हरियाणा के जैसे श्रोता मैंने कहीं नहीं देखे, वह सांप्रदायिकता को हवा दे रहा होता है।


जब कोई एंकर जानकारी दे रहा होता है कि फ़लां त्यौहार फ़लाने लोगों का तैयार है, वह सांप्रदायिकता की सिंचाई कर रहा होता है।


जब आप कहते हैं कि हिंदुओं के यहां जाकर गुझिया और मुस्लिम के यहां सेवईयां ज़रुर खाईए, उसी दिन आप गुझियों और सेवईयों को भी हिंदू और मुस्लिम में बदल डालते हैं।


जिस दिन आप कहते हैं कि पंजाब के लोग बहुत बहादुर और जोशीले होते हैं, उस दिन आप ख़ुद ही उनमें गर्व की हवा भर रहे होते हैं।


सांप्रदायिकता आखि़र यही तो है कि एक से ज़्यादा समूह या संप्रदाय आपस में इस बात पर लड़ रहे होते हैं कि मैं श्रेष्ठ हूं ; नहीं मैं महान हूं। मेरे रिश्तेदार, दोस्त और परिचित स्मार्ट और चालाक़ हैं ; नहीं मेरे बेहतर हैं। इस ज़मीन/सुविधा पर ताक़त और संख्या/योग्यता के आधार पर हमारा क़ब्ज़ा बनता है ; नहीं, नहीं, हमारा बनता है।


सांपदायिकता को लेकर सबसे ज़्यादा चिंतित वही लोग दिखाई देते हैं जो सबसे ज़्यादा परिष्किृत तरीकों से उसे फ़ैला रहे/चुके होते हैं। एक तरफ़ वे अपनी सारी सफ़लताओं/उपलब्धियों को भीड़ की संख्या से आंक रहे होते हैं, दूसरी तरफ़ वही लोग इस बात पर हैरान हो रहे होते हैं कि हाय! लोग भीड़ में कैसे बदल जाते हैं !? 


-संजय ग्रोवर



Saturday, 14 May 2016

कौन है निराकार !?

जो है डरा हुआ
जो है कायर
जो है परदा 
जो है अभिनेता
जो है नाटकीय
जो है कर्मकांडी
जिसने ज़िंदगी को बना दिया है अभिनय

और आपको-मुझको भी लाश बना देना चाहता है सविनय


जिसे चाहिए सारे फ़ायदे
जिसने दूसरों के लिए रचे हैं सारे क़ायदे
जो दूसरों के दिमाग़ हथियाकर
उनपर लिख देता है अपना नाम
जो किसी नुक़सान की नहीं लेता ज़िम्मेदारी
छुप जाता है अपनी ही बनाई
महानता की अपनी इमेज के पिछवाड़े में
इसी ग़ैरज़िम्मेदार ने हड़प रखी है
दुनिया सारी

जो दाएं हाथ से मारता है हमें थप्पड़
और बाएं से सहलाता है
जो दुनियादारी को माफ़िया में बदलकर
समझदार कहलाता है

जो इंटरनेट पर दिखावे और मजबूरी में करता है आपसे बहस
दरअसल ठीक उसी वक्त
ऊंची-नीची होने लगती है आपकी बिजली की वोल्टेज
ख़राब होने लगते हैं आपके उपकरण
अचानक ग़ायब होने लगते हैं आपके चैक़, कोरियर और ऐसे ही कई सामान
आपके घर में घुसता है कोई लालच या आतंक लेकर निराकार का कोई एजेंट
जिसकी शक़्ल आपको कई बार देखी-भाली-सी लगती है
जिनसे पटाकर रखने की निराकार ने दी होती है आपको सलाह

वही फ़ेंकते हैं आपके आंगन में नियमित कचरा


जो दूसरों की तरलता में
ढूंढता है ठगी का रास्ता
और अपने बहुरुपिएपन को कहता है पानी
दूसरे उसे उघाड़ दें तो मरने लगती है इसकी नानी
अरे भाई तुलना तो ठीक से कर लिया करो
पानी कोई आदमी नहीं है
वह शोषित की तरह है, उसे पता भी नहीं 
कि उसे किसमें मिलाया जा रहा है
वह तो अकसर होता है शिकार
और आप बच निकलते हैं हर बार
निराकार


जो राजधानी में अपनी सौम्य कोठियों में
करता है विनम्र अय्याशी
जिसके एवज में दूसरे आए दिन देते हैं
अपने चेहरों की तलाशी
उनके चेहरों पर जैसे छप गए हैं तेज़ाब और पेशाब
जो ख़ुदको मिटाकर बनाए है बेशर्म की ख़ुशबू रंगो आब
अरे! ज़रा छः छः महीने के लिए
ड्यूटी ही बदल लिया करो उनकी अपनी
छः महीने राजधानी की कोठी में रहें वो 
और आप पिसें जंगल में जैसे पिसती है चटनी

निराकार के लोग घर-घर में
बच्चों में डालते हैं
ग़ुलामी के संस्कार
चढ़ा देते हैं चश्मे अपने
कर देते हैं उनकी आंखों को बेकार
उनका रिमोट रहता है निराकार के हाथ में
ख़ुश होता है बंधुआ परिवार

निराकार ही तो है अंधविश्वासियों का चश्मा 
वही तो है उनकी साकार मूर्खताओं की प्रेरणा और शक्ति
देखो, कैसे ख़ुद ही बेवक़ूफ़ियां सिखाकर
ख़ुद ही डांट रहा है उनको
और वे सर झुकाकर सुन रहे हैं आज्ञाकारी
क्या ग़ज़ब है भक्ति
         
निराकार ठीक आपके सामने है
मगर नहीं है, कहीं नहीं है
क्योंकि आपके पास समझने की दृष्टि
और पकड़ने का साहस नहीं है


-संजय ग्रोवर
14-05-2016


Wednesday, 27 April 2016

क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?

सरल मेरा दोस्त है। अपनी सरलता की ही वजह से मेरा दुश्मन भी है। मौलिक है, नास्तिक है, विद्रोही है। जाहिर है ऐसे आदमी के रिश्ते सहज ही किसी से नहीं बनते। बनते हैं तो तकरार, वाद-विवाद, तूतू मैंमैं भी लगातार बीच में बने रहते हैं। यानि कि रिश्ता टूटने का डर लगातार सिर पर लटकता रहता है।

अभी हाल ही में सरल के दो बहनोईयों का निधन 6-8 महीनों के अंतराल में हो गया। कुछेक मित्रों की प्रतिक्रिया थोड़ी दिल को लगने वाली तो थी पर सरल को वह स्वाभाविक भी लगी। संस्कारित सोच के अपने दायरे होते हैं। मित्रों का इशारा था कि अब भी तुम्हारी समझ में नहीं आया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते, इसलिए यह सब हुआ ?

यह सोच सरल के साथ मुझे भी बहुत अजीब लगी।

पहली अजीब बात तो यह थी कि सरल माने न माने पर उसके दोनों बहनोई ईश्वर में पूरा विश्वास रखते थे। फिर ईश्वर ने सरल के किए का बदला उसके बहनोईयों और बहिन-बच्चों से क्यों लिया ?

दूसरी अजीब बात मुझे यह लगी कि अगर ईश्वर को न मानने से आदमी इस तरह मर जाता है तो फिर ईश्वर को मानने वाले को तो कभी मरना ही नहीं चाहिए ! वैसे अगर सब कुछ ईश्वर के ही हाथ में है तो ईश्वर नास्तिकों को बनाता ही क्यों है !? पहले बनाता है फिर मारता है ! ऐसे ठलुओं-वेल्लों की तरह टाइम-पास जैसी हरकतें कम-अज़-कम ईश्वर जैसे हाई-प्रोफाइल आदमी (मेरा मतलब है ईश्वर) को तो शोभा नहीं देतीं।

इससे भी अजीब बात यह है कि ईश्वर क्या किसी मोहल्ले के दादा की तरह अहंकारी और ठस-बुद्धि है जो कहता है कि सालो अगर मुझे सलाम नहीं बजाओगे तो जीने नहीं दूंगा ! मार ही डालूंगा ! क्या ईश्वर किसी सतही स्टंट फिल्म का माफिया डान है कि तुम्हारे किए का बदला मैं तुम्हारे पूरे खानदान से लूंगा !

क्या ईश्वर को ऐसा होना चाहिए ?

ईश्वर को मानने वालों की सतही सोच ने उसे किस स्तर पर ला खड़ा किया है!

वैसे अगर ईश्वर वाकई है तो क्या उसे यह अच्छा लगता होगा !?


-संजय ग्रोवर

16 जून 2009 को ‘संवादघर’ पर प्रकाशित
6 फ़रवरी 2011 को ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर प्रकाशित



Friday, 22 April 2016

नास्तिकता बनाम पारिवारिकता, सामाजिकता, व्यवहारिकता आदि.....

लोगों को ग़ुलाम बनाने के लिए गंदी और भद्दी प्रथाएं और मान्यताएं बनानेवाले किसी व्यक्ति ने शायद ही कभी यह कहा हो कि मैं कोई असामाजिक आदमी हूं और यह काम समाज के खि़लाफ़ कर रहा हूं। वर्णव्यवस्था, सतीप्रथा, छुआछूत, विवाह, दहेज, ऊंचनीच, छोटा-बड़ा, अंधविश्वास, भगवान, साकार, निराकार ..... सब कुछ सामाजिकता की ही आड़ में बनाया गया। तथाकथित सामाजिकता से डरनेवाले किसी व्यक्ति से इनको बदलने की आशा रखना भी बहुत समझदारी या व्यवहारिकता की बात नहीं लगती। राजेंद्र यादव के बारे में बात करते हुए एक बार मुझसे किसीने कहा कि ऐसे लोग क्या कर पाएंगे जो अपना परिवार ही नहीं पाल पाए। मैं उस वक़्त व्यस्त था, मैंने  इतना ही कहा कि परिवार तो गांधीजी भी नहीं पाल पाए, क्या आपको उनसे भी यह शिक़ायत है!? (राजेंद्र यादव परिवार नहीं पाल पाए, इससे भी मैं असहमत हूं)

क्या परिवार चलाना वाक़ई इतनी महान बात है ? बिलकुल भी नहीं। मैं समझता हूं समाज बदलने, ईमानदारी और मौलिकता से जीने की तुलना में परिवार चलाना निहायत ही टुच्ची कारग़ुज़ारियों का जोड़ है। परिवार चलाने के नाम पर लोग अकसर अपनी बेईमानियों, कायरता, पाखंड, खोखलेपन आदि को पूरी बेशर्मी से वैद्य ठहराते चले जाते हैं-‘हम तो बाल-बच्चे वाले आदमी(!) हैं, हेंहेंहें, क्या करें....’। मुझे समझ में नहीं आता कि जिन लड़कियों को आपने शादी के नाम पर यूंही कहीं भी ठेल देना था, उन्हें पैदा करने की ऐसी क्या मजबूरी थी !? जगह-जगह बच्चे भूखे-नंग-धड़ंग घूम रहे हैं, ऐसे में आपका परिवार, आपके बच्चे न होते तो दुनिया ख़त्म हुई जा रही थी क्या ? दिखावटी सामाजिकता में आप ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और न जाने क्या-क्या पेले जा रहे हैं और आपके पैदा किए व्यवहारिक बच्चे आप ही के बनाए फ़्लाईओवरों को तोड़े डाल रहे हैं। जिसके नीचे दबकर दूसरे व्यवहारिक लोगों के सौ-दो सौ व्यवहारिक बच्चे मर जाते हैं। ऐसे व्यवहारिक आप और आपके बच्चे न होते तो क्या यह ज़्यादा व्यवहारिक और बेहतर न होता ?

कई परिवारवादी कहते हैं कि भई क्या करें, बेटी का दहेज देना है, यह-वो करना है और इसी आड़ में अपने-परायों सभी का बेदर्दी से खून चूसते, जेब काटते चले जाते हैं। लड़के-लड़की के रिश्ते के नाम पर तमाम भद्दी-भद्दी हरक़तें, परस्पर लूटपाट, अमानवीय तलवा-चाटी और चटवाई वगैरह को भी संघर्ष और महानता वगैरह का दर्ज़ा दे दिया जाता है। कथित-काल्पनिक किन्हीं पवित्रताओं और महानताओं के नाम पर ऐसी-ऐसी वास्तविक गंदगी बिखेरी जाती हैं कि अगली कई पीढ़ियों के लिए उन्हें समेटना मुश्क़िल हो जाता है। पीढ़ियों की पीढ़ियां अपने महान पुरख़ों की गंदगी(मसलन दहेज, मर्दवाद, व्यवहारिकता के नाम पर बेईमानीवाद आदि) को ढोते-ढोते मर जातीं हैं। मगर इन परिवार चलानेवाले महानों के लिए पत्थर की लकीरें और उनसे जुड़ा अपना अहंकार इतना महान और महत्वपूर्ण होता है कि इन्हें क़तई किसीपर कोई रहम नहीं आता।

कई लोग दो-चार लड़कियां पैदा करके ज़िम्मेदारी उनके उन भाईयों पर डाल देते हैं जिन्हें पैदा होते वक़्त मालूम ही नहीं होता कि उन पर क्या-क्या थोपा जानेवाला है, तो कई लोग लड़के पैदा करके उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी इससे अनजान बहिनों पर चेप देते हैं। कई लोग एक बार बेटियों की शादियां करके दोबारा पता करने ही नहीं जाते कि बाद में वे किस दशा में रह रहीं हैं या जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं। इन सब हरक़तों को मैं तानाशाही और धोखाधड़ी का दर्ज़ा देना चाहता हूं, इस तरह की पारिवारिकता अधूरी, ग़ैरज़िम्मेदार, पोंगी और पलायनवादी पारिवारिकता है।

नास्तिकता के लिए किसी भी सामाजिक मान्यता को वैसे का वैसा स्वीकार कर लेना क़तई अजीब बात है। सामाजिकता वैसे भी दुनिया के सभी संप्रदायों/समूहों के लिए बिलकुल एक जैसी नहीं होती। ब्राहमणवाद के लिए सामाजिकता, दूसरों का प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष शोषण है और अगर दूसरे भी उसी सामाजिकता को ज्यों का त्यों अपनाएंगे तो उनके लिए यह सामाजिकता नहीं लगभग आत्महत्या जैसी बात होगी ; जबकि मैं देखता हूं कि ब्राहमणवाद तो अपनी बनाई प्रथाओं को सकारात्मकता और सृजनात्मकता भी बता देता है। ऐसे में नास्तिकता को अपनी अलग सामाजिकता पैदा करनी होती है, मौलिक जीवनशैली विकसित करनी होती है। इसमें डरा हुआ आदमी ज़्यादा आगे तक नहीं जा सकता, थोड़ा साहस तो करना ही पड़ता है। भीड़ और कुप्रथाओं से डरकर कोई निर्णय लेना नास्तिक की सामाजिकता तो बिलकुल भी नहीं हो सकती, उसमें सामाजिक बदलाव की बात तो दूर, अपने लिए राहत का एक कोना बनाना भी असंभव-सी बात है। नास्तिक की व्यवहारिकता दूसरों की व्यवहारिकता जैसी कैसे हो सकती है ? यही तो उसमें और दूसरों में बुनियादी फ़र्क़ है। दूसरों के लिए तो मंदिर जाना भी व्यवहारिकता है, नास्तिक के लिए यह पूरी तरह वक़्त की बर्बादी है। छीना-छपटी, लेन-देन, टांगमारी, सेटिंग-जुगाड़ दूसरों के लिए एक व्यवहारिक समाज हो सकता है लेकिन नास्तिक इसमें एक सुनियोजित आपराधिक माफ़िया को भांप सकता है।

हां, कई लोगों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति इतनी ख़राब होती है कि वे नास्तिकता को दुनियादारी में जोड़ें तो शायद उनके लिए रोज़ का खाना-कमाना मुश्क़िल हो जाए। उनकी समस्या भी समझ में आती है और सहानुभूति भी होती है। मगर ऐसे में कोई व्यक्ति अपनी डरी हुई मनस्थिति में लिए गए किसी निर्णय को सभीके लिए सिद्धांत या आदर्श जैसा कुछ बनाने की कोशिश करे, यह भी ठीक नहीं है। इससे तो लगता है कि आप इतने अहंकारी आदमी हैं कि आपको लग रहा है दुनिया में आप अकेले ही बहादुर पैदा हुए थे, आप सरेंडर कर गए तो दूसरा कोई साहसी पैदा होने की संभावनाएं ही जैसे ख़त्म हो गईं, अब किसीको इस बारे में सोचना ही नहीं चाहिए। यह क़तई अव्यवहारिक सोच है क्योंकि दुनिया में दुनिया बदलनेवाले लोग हमेशा ही पैदा होते रहे हैं और कुछ न कुछ बदलाव करते रहे हैं, कबीर, ग़ैलीलियो, तसलीमा, राजेंद्र यादव, ओशो जैसे लोग किसी संस्थाविशेष से पढ़े-पढ़ाए नहीं थे, मगर ऐसे कई लोगों ने बड़े बदलाव किए हैं या उनके लिए माहौल बनाया है, बीज बोए हैं। तसलीमा ने अपना देश छोड़ा, राजेंद्र यादव आए दिन वामपंथी ब्राहमणों के अजीबोग़रीब विवादों का शिकार होते थे, कबीर पत्थर खाया करते थे, ओशो के बारे में आधारहीन, लगभग अफ़वाहनुमां, ग़लत तथ्यों से भरे विश्लेषण(!) आज भी देखने को मिल जाते हैं। कोई भी बदलाव सेटिंग-वैटिंग करते हुए, ट्राफ़ी-ऑफ़ी जुगाड़ते हुए जवान नहीं होता। उसमें नुकसान और ख़तरे क़दम-क़दम पर साथ चलते हैं। मगर इस बदलती हुई दुनिया में जहां विचार, चेतना और तर्क नया साहस और बड़ा दायरा पा रहे हैं, बदलाव की संभावनाऐं बढ़ रहीं हैं।

मुझे नहीं लगता कि आज के माहौल में नास्तिक को घबराना चाहिए।

यूं हम लिखते ही रहे हैं कि इस ग्रुप में आकर आर्थिक फ़ायदे और टीवी कवरेज आदि के लालच में न पड़ें, बल्कि कुछ ख़तरों, कुछ ग़ाली-ग़लौच, कुछ अफ़वाहों, क़िस्से-कहानियों को झेलने के लिए हमेशा तैयार रहें। यहां से जाने का रास्ता भी 24 घंटे ख़ुला ही रहता है। संख्या की सजावट में हमारी ज़्यादा दिलचस्पी कभी नहीं रही।

व्यवहारिकता के नाम पर अगर आपको नास्तिकता के साथ खड़े दिखने में डर और नुक़सान लगता है, तो आप कभी भी विदा ले सकते हैं, हम बिलकुल बुरा नहीं मानते।

जिनको यहां कोई सार्थकता दिखाई देती है, आराम से यहां रहें।

-संजय ग्रोवर
22-04-2016


Monday, 11 April 2016

नास्तिकता सहज है

|| नास्ति दतम् नास्ति हूतम् नास्ति परलोकम् || 


यह पंक्ति मैं पहली बार पढ़ रहा हूं।

जब मैं नास्तिक हुआ तो मैंने चार्वाक या मार्क्स का नाम तक नहीं सुना था। ऐसी कोई भारतीय या अन्य परंपरा है, इसकी मुझे हवा तक नहीं थी। कोई वामपंथी पार्टी भी है, यह भी मुझे बहुत बाद में जाकर पता चला। हां, बाद में सरिता-मुक्ता फ़िर हंस जैसी कुछ पत्रिकाओं से इस विचार को बल ज़रुर मिला। मेरा मानना है कि नास्तिकता सहज स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है। धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के कुछ लोगों द्वारा। कल्पना कीजिए कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह है जहां ईश्वर का नामो-निशान तक नहीं है। ईश्वर की कोई ख़बर तक उस देश में कहीं से नहीं आती। कोई मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज, बड़े होते बच्चों को ईश्वर की कैसी भी जानकारी देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता। क़िस्सों और क़िताबों में ईश्वर का कोई ज़िक्र तक नहीं है। तब भी क्या वहां ईश्वर के अस्तित्व या जन्म की कोई संभावना हो सकती है !?

दूसरे, क्या नास्तिकता को किसी परंपरा की ज़रुरत है ? मेरी समझ में जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां कभी न कभी नास्तिकता आ ही जाएगी। चाहे ऐसी कोई परंपरा हो न हो। नास्तिकता तो ख़ुद ही परंपरा के खि़लाफ़ एक विचार है। यह तो प्रगतिशीलता, तर्कशीलता वैज्ञानिेकता और मानवता का मिश्रण है। परंपरा के नष्ट होने से नास्तिकता नष्ट हो जाएगी, ऐसा मुझे नहीं लगता। हो सकता है कि परंपरा के रहते नास्तिकों की संख्या कुछ ज़्यादा होती। पर ऐसे नास्तिक परंपरा से आए आस्तिकों की तरह ही रुढ़ और हठधर्मी होते। जिस तरह हम देखते हैं कि कई बार राजनीतिक पार्टियों के संपर्क में आने से नास्तिक हो गए लोग घटना-विशेष की प्रतिक्रिया में ठीक कट्टरपंथिओं जैसा ही आचरण करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि चूंकि हम यह आचरण घोषित कट्टरपंथियों के विरोध में कर रहे हैं इसलिए यह कट्टरपंथ नहीं, हमारी ‘वैचारिक प्रतिबद्धता’ है।

दोस्त लोग मानते हैं कि नास्तिकता किसी तरह घिसट-घिसट कर जीवित है। ऐसा शायद वे संख्या और सांसरिक/भौतिक सफ़लताओं के आधार पर तय कर लेते है। यही लोग ख़ुदको अघ्यात्मवादी भी मानते हैं। संख्या बल और भौतिक सफलता को मानक बनाएं तो इंसानियत भी एक अप्रासंगिक शय हो चुकी है और इसे भी दफ़ना देना चाहिए। और अगर आप सफ़लताओं की वजह से आस्तिकता के साथ हैं तो इसका एक मतलब यह भी है कि आप उस विचार और सही-ग़लत की वजह से कम और अपने फ़ायदे की वजह से उसके साथ ज़्यादा हैं। कलको आपको नास्तिकता में सांसरिक फ़ायदे दिखेंगे तो आप उसके गले में हाथ डाल देंगे। अगर नास्तिकता घिसटकर चल रही है और इस वजह से अप्रासंगिक है तो भैया सारी क्रांतियां और स्वतंत्रता आंदोलन भी कभी न कभी घिसटते ही हैं। घिसटने से इतना डरना या उसे हेय दृष्टि से क्यों देखना !? दलितों, अश्वेतों और महिलाओं के आंदोलन भी तो सैकड़ों सालों से घिसट ही रहे थे। आज किसी अंजाम पर पहुंचते भी तो दिख रहे हैं।

--संजय ग्रोवर
11-04-2016

24-04-2010 को ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर प्रकाशित
09-07-2010 को ‘संवादघर’ पर प्रकाशित
10-02-2014 को अंग्रेजी अनुवाद  '(W)hues Me ?'  पर प्रकाशित

Tuesday, 15 March 2016

छोड़ो स्कूल-फिस्कूल, ज्ञान बाबा आते होंगे

कई बार पढ़ने-सुनने को मिलता है कि फ़लां चीज़ खाने से ढिकाने को ज्ञान मिला या वैसे पेड़ के नीचे बैठे-बैठे ऐसे को ज्ञानप्राप्ति हो गई।

सोचता हूं कि आखि़र यह ज्ञान किस टाइप की चीज़ होती थी !? अगर कुछ खाने से किसीको ज्ञान मिलता हो तो उस खाद्य को बनानेवाले या खिलानेवाले के पास तो बहुत ज्ञान होना चाहिए था ! मगर क्या ऐसा था ? 

आप लोग तो क़ाफ़ी क़िताबें पढ़ते होंगे, फ़िल्में देखते होंगे, टीवी देखते होंगे, इंटरनेट पर झक मारतें होंगे, तब जाकर कुछ पल्ले पड़ता होगा। 

आपके दिमाग़ में कभी यह क्यों नहीं आया कि इतनी मेहनत करने से बेहतर है कि किसी पेड़-वेड़ के नीचे आराम से बैठा जाए, कभी न कभी तो कोई आएगा, ज़्यादा नहीं तो दो-चार गाने गा चुकने के बाद आएगा, कोई तो लाएगा, कैसे तो लाएगा, ले आया तो कैसा मज़ा आएगा! न कोई क्लास अटैंड की न कोई  चैप्टर पढ़ा, मगर रिज़ल्ट आया तो पता चला कि यूनिवर्सिटी क्या ‘ब्रहमांड’ टॉप कर गए। छूटते ही गोल्ड मैडल।

मैं सोचता हूं जिन्हें ज्ञान मिला उनकी तो कई उपलब्धियां बताई जातीं हैं, पर जिन्होंने ज्ञान दिया उनके प्रोफ़ाइल में ज्ञान की दृष्टि से उल्लेखनीय कुछ नहीं दिखाई देता! यह अजीब नहीं कि बैंक ख़ुद तो कंगाल हो मगर उपभोक्ताओं को लाखों रुपए कर्ज़ा बांटे चला जा रहा हो !?

यह ज्ञान दिया किस विधि से, किस रुप में जाता होगा !? कोई पुढ़िया वगैरह या खाने-पीने की आयटम में कोई कैमिकल मिलाया जाता होगा ? जितनी तत्परता से ज्ञान एक से दूसरे को शिफ़्ट हो जाता था, उतनी जल्दी तो संक्रामक बीमारियां जैसे जुकाम, आई फ़्लू, टीबी आदि ही होते पाए जाते रहे हैं। इतने मामूली लम्हे में मिले ज्ञान में कितना स्लैबस संभव है, क्या-क्या इसके दायरे में आता होगा !? लोग तो ऐसे ज्ञानियों को सर्वज्ञानी से कम नहीं मानते थे! तो क्या इस ज्ञान में पायजामा काटने और मिठाई बनाने से लेकर अच्छा सेल्समैन बनने के नुस्ख़ों तक सब कुछ शामिल रहता होगा !?

तो आजकल लोग क्यों स्कूलों और यूनिवर्सिटियों में डोनेशन ले-लेके भागे फिरते हैं !? 

भाईयो! किसी पेड़-वेड़ के नीचे डेरा जमाओ, देखो ज़रुर कोई तुम्हारे वास्ते कटोरा, थाली, पत्तल, क़ाग़ज़ की प्लेट या प्लास्टिक के दोनें में कुछ लेकर आता होगा। पांच-दस साल भी लग जाएं तो क्या दिक़्क़त है!? 20-30 साल धक्के खाकर आधा-पूधा अज्ञानी होने से तो बेहतर है। हैं कि नहीं ! 

लग जाओ। लगे रहो।

-संजय ग्रोवर
16-03-2016

Saturday, 12 March 2016

लड़कियां

लड़कियों को लेकर भारतीय समाज में अकसर एक ऊहापोह सा बना रहता है। लड़कियां क्या खाती हैं, क्या पीती हैं, क्या सोचतीं हैं आदि-आदि से लेकर ‘लड़कियां किस तरह के पुरुषों को पसंद करतीं हैं’ जैसे विस्फ़ोटक मसलों में कई मर्दों की जान और ज़िंदगी अटकी रहती है। मज़े की बात यह है कि कट्टरपंथी परंपरावादी राजा-महाराजाओं से लेकर तथाकथित प्रगतिशीलों तक सभी अपने आसपास रहनेवाली लड़कियों या महिलाओं की संख्या से अपनी महानता नापने की कोशिश में लगे पाए गए हैं। ऐसा लगता है कि जैसे लड़कियां पुरुषों की छाती पर टांगे जाने वाले मैडल/तमग़े हैं, जैसे लड़कियां पुरुषों को मिलनेवाले पुरस्कार हैं, जैसे वे सत्संग के बाद बंटनेवाला प्रसाद हैं, जैसे वे मर्दों को देखकर गश खाने और क्रश आने के लिए ही पैदा हुई हैं। एक पुरानी और प्रसिद्ध कहानी में कृष्ण नामक एक नायक का ज़िक्र मैंने सुना है जो नदी-किनारे से नहाती हुई लड़कियों के कपड़े वगैरह चुराकर पेड़ पर चढ़ जाते थे और तिसपर भी लड़कियां आ-आकर उनकी गोपियां हुई जातीं थीं। और कहानी के यह कृष्ण शादीशुदा भी हैं और इनकी पत्नियों की भी अच्छी-ख़ासी संख्या गिनाई जाती है।

अभी एक विश्वविद्यालय में कथित रुप से पाए जानेवाले कंडोमों की संख्या किसीने गिनाई तो कुछ लोग उसपर गर्व करते दिखे तो उन्हीं में से कुछ लोग इस चिंता में परेशान दिखे कि वहां पढ़नेवाली लड़कियों के मां-बाप क्या सोचेंगे ? वहां पढ़नेवाले लड़कों के मां-बाप क्या सोचेंगे, इसकी चिंता किसीको भी नहीं हुई। साफ़ है कि इस समाज में अभी लड़कियों की वह स्थिति नहीं बन पाई कि आप उनके साथ अपने संबंधों को जैसे हैं वैसे बता भी सकें। मेरी समझ में पत्नी, प्रेमिका, गोपिकाएं और श्रद्धालु प्रशंसिकाएं एक साथ रखने के लिए इस तरह की विरोधाभासी बातों के पाखंड के अलावा और कोई चारा भी नहीं है। इसको प्रगतिशीलता तो कतई नहीं माना जा सकता। प्रगतिशीलता के लिए बहुत साहस चाहिए जो कि लोगों में अकसर नहीं होता, इसलिए यहां प्रगतिशील कहे जानेवाले या ख़ुदको प्रगतिशील समझने का भ्रम पालनेवाले लोग भी चार तरह की बातें एक साथ कह देते हैं। पाखंडी संस्कृति में लड़कियों को भी ऐसे ही लोग सूट करते हैं जो दिखाने और करने के फ़र्क़ की तथाकथित सभ्यता को बड़ी होशियारी और चालाक़ी से बरतने के आदी हों। अब या तो आप लड़कियों/लड़कों से स्पष्ट संबंध रख लीजिए या फिर यह चिंता कर लीजिए कि उनके घरवाले क्या सोचेंगे। दोनों चीज़ें एक साथ साधेंगे तो झूठ और अभिनय के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। फिर अपनेआप को कट्टरपंथियों और पाखंडियों से अलग और प्रगतिशील समझना एक झूठी तसल्ली से ज़्यादा कुछ नहीं है।

कोई हैरान हो सकता है कि लड़कियां, वो भी प्रगतिशील लड़कियां, कैसे किसी शादीशुदा की गोपियां बनने को तैयार हो जातीं हैं ? सीधा कारण समझ में आता है कि बचपन से रटाई सामाजिक मान्यताएं इसमें बड़ा काम करतीं हैं। उसके बाद का काम हमारा साहित्य और फ़िल्में पूरा करते आए हैं।
प्रगतिशील लड़कियां कैसे किसी प्रगतिशील लड़के पर मरनेवाली लड़कियों की गिनती बढ़ाकर अपने जीवन को सार्थक मान सकतीं हैं ? कोई प्रगतिशील मर्द कैसे महिलाओं को मैडल की तरह अपनी छाती पर टांक कर ख़ुश हो सकता है !? यह मानसिकता किसी नेता की रैली में आई या  जैसे-तैसे-कैसे भी जुटाई भीड़ को देखकर ख़ुश होने की मानसिकता से कैसे अलग है ? कैसे कोई शादीशुदा कृष्णकन्हैया इतनी स्त्रियों के प्रेमनिवेदन से ख़ुश हो सकता है जबकि उसके अपने घर में उसकी कई रानिया-महारानियां क़ैदी की तरह रह रहीं हों। कल्पना कीजिए कि उन रानियों के पास भी इतनी-इतनी संख्या में प्रेमनिवेदन और फिर प्रेमनिवेदन की स्वीकृति के बाद पुरुष-गोपक दिन-रात प्रेमलीला रचाते-मचाते नज़र आने लगें तो इन तथाकथित प्रगतिशील महाराज की क्या स्थिति हो रहेगी ? उसके बाद फिर बच्चे भी यही लीला करने लगें तो एक यमुना तट तो घर में बनाना पड़ जाएगा। ऊपर से एक समस्या यह भी रहेगी किन लोगों को इन संबंधों को गर्व की तरह दिखाना है और किन लोगों से इसलिए छुपाना है कि उनके घरवाले क्या सोचेंगे, इसका भी पूरा हिसाब-क़िताब रखना पड़ेगा। सही बात यह है कि ऐसे संबंध आसानी से वही लोग निभा सकते हैं जो रात-दिन पाखंड के आदी हों। दूसरा तरीक़ा है कि इन संबंधों को जैसे हैं वैसा ही बताओ, किसीके घरवाले क्या सोचेंगे इसकी चिंता छोड़ दो। मगर उसके लिए साहस चाहिए, कई तरह के नुकसान उठाने की तैयारी चाहिए, पहलक़दमी की हिम्मत चाहिए, जिसकी हमारे समाज को आदत नहीं है, इसलिए उसमें अभी भी वक़्त लगनेवाला है।


अपने ऊपर मरनेवाली लड़कियों की संख्या गिन-गिनकर ख़ुश होना, दोस्तों-यारों को बताना....लड़कियों को सामान समझने की मानसिकता से क़तई अलग नहीं है। सिर्फ़ लड़कियों की ही संख्या गिनते रहना उन्हें बाक़ी समाज से अलग करके, असामान्य बनाकर देखना भी है जिसमें नुकसान अकसर लड़कियों का ही होता आया है। आखि़र उस संख्या की उपयोगिता क्या है ? क्या आप उनसे किसी विशेष प्रकार का संबंध रखते हैं ? अगर रखते हैं तो क्या उसे सार्वजनिक रुप से स्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं ? या वे लड़कियां आप पर ठीक वैसी ही श्रद्धा रखतीं हैं जैसी किसी गुरु के प्रति रखने की हमारी परंपरा रही है ? जिस श्रद्धा में एकलव्य ने अपना ही अंगूठा काट लिया था ! यह श्रद्धा कतई ख़तरनाक़ है। मगर इसके बड़े फ़ायदे हैं और इसीलिए मुझे लगता है कि तथाकथित प्रगतिशील कहे जानेवाले लोग किसी न किसी तरह से पुरानी परंपराओं को बनाए रखने के बहाने ढूंढते रहते हैं।

यहां यह क़ाबिले-ग़ौर है कि फ़ेसबुक पर मेरे साथ 3-4 बार ऐसा हुआ कि कोई लड़की ख़ुदही बात करने आई और सामान्य बातें ही कर रही थी कि एकाएक बीच में कोई तथाकथित प्रगतिशील शख़्स प्रकट भए और लड़की को इशारों-इशारों में सावधान करने लगे, मेरी उम्र वगैरह के बारे में हिंट देने लगे। बड़ी हैरानी हुई क्योंकि ये लोग एक तो ख़ुदको प्रगतिशील कहते थे, दूसरे ख़ुद शादीशुदा होते हुए भी ट्राई मारते फिरते थे। जबकि मैं एक बैचलर हूं। और उम्र क्या बता रहे हो, जब लड़की साक्षात मुझसे मिलेगी तो देख ही लेगी, सब कुछ फ़ेसबुक पर तो नहीं हो जानेवाला! राजेंद्र यादव के मामले में देख ही चुका था, समझने में देर नहीं लगी कि इन तथाकथित प्रगतिशीलों की भी अपनी वानर-सेनाएं हैं और ये भी किसीसे कम नहीं हैं। ये भी तरह-तरह के डरों और आशंकाओं से घबराए हुए हैं और स्त्रियों को उनके हाल पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। फिर एक-दो दूसरी घटनाएं हुईं जिनमें लड़कियों ने पहले ख़ुद ही कोई बोल्ड क़िस्म का मज़ाक़ किया, बाद में प्रत्युत्तर में मैंने कुछ कह दिया तो उन्होंने उसे ग़लत ढंग से पेश करना शुरु कर दिया। समझ में आया कि मनुवाद अभी कितने-कितने रुपों में मौजूद है।

बहरहाल मैं तो करना कुछ और दिखाना कुछ को न तो प्रगतिशीलता मान सकता हूं न साहस। न ही लड़कियों को तमग़ों की तरह टांगने में कोई दिलचस्पी(कभी हुआ करती थी) बची है। अगर ‘मरनेवाली’ लड़कियों की संख्या से ही किसीकी महानता नापनी हो तो विजय माल्या, रविशंकर, शाहरुख़ खान, आमिर ख़ान, सलमान, अक्षय कुमार, चार्ल्स शोभराज, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, इमरान ख़ान, उमर शरीफ़, ओशो रजनीश आदि-आदि को सर्वाधिक महान लोगों में गिना जाना चाहिए।


हां, स्पष्टवादी और बेबाक़ व्यक्ति के प्रति, थोड़ी देर के लिए ही सही, एक आदर का भाव ज़रुर उठता है, चाहे वह व्यक्ति लड़का हो चाहे लड़की।


-संजय ग्रोवर

12-03-2016

Tuesday, 8 March 2016

आज़ाद ग़ुलामों की शर्मनाक़ मुश्क़िलें

जब आप किसीको ग़ुलाम बनाते हैं तो आपकी अपनी आज़ादी भी ख़तरे में पड़ जाती है। क्योंकि दूसरे को ग़ुलाम बनाने के लिए कुछ न कुछ झूठ बोलना पड़ता है, कोई न कोई षड्यंत्र रचना पड़ना है। बेवजह कोई क्यों आपकी ग़ुलामी करेगा, क्यों ख़ुदको आपसे छोटा मानेगा, क्यों आपसे दबेगा !? सो आपको झूठ बोलना पड़ता है, किसी जाति को बड़ा बनाना पड़ाता है, किसी पद-प्रतिष्ठा से डराना पड़ता है, मां-बापके नाम का, वंश का ख़ौफ़ दिखाना पड़ता है, किसी संस्था, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना पड़ता है, किसीको तथाकथित स्वर्ग में पहुंचा देने का झूठा भरोसा देना पड़ता है, ऐसे ही तरह-तरह के अन्य उपाय करने पड़ते हैं।

आज की बदलती परिस्थितियों में ज़्यादातर लोग जानते लगते हैं कि ये सब भद्दी तरक़ीबें काम भी करतीं हैं। स्त्रियां तो शारीरिक रुप से थोड़ी हल्की थीं भी लेकिन बनानेवालों ने लैंगिक विकलांगों जो कि शारीरिक बल में अकसर पुरुषों से मजबूत दिखाई पड़ते हैं, को भी मानसिक रुप से कमज़ोर करके या तो ग़ुलाम बनाया या हाशिए पर पहुंचा दिया।

लेकिन जब आप षड्यंत्र करके दूसरों को ग़ुलाम/हीन/छोटा/नीच ठहराते या बनाते हैं तो आपके लिए यह मुश्क़िल खड़ी हो जाती है कि आपको आगे के लिए इन झूठों/बेईमानियों को छुपाए रखने का भी इंतेज़ाम करना पड़ता है। आपको बारह महीने चौबीस घंटे डर लगा रहता है कि कहीं पोल खुल न जाए। जितने बड़े दायरे में आपने झूठ फ़ैलाया है उतने ही बड़े स्तर पर उसे छुपाए रखने के भी जुगाड़ करने पड़ेंगे, नेटवर्क बनाना पड़ेगा, आदमी लगाने पड़ेंगे। आपको लोगों में फूट डाले रखने के नये-नये तरीक़े ढूंढने पड़ते हैं, अफ़वाहें फ़ैलाने के लिए आदमी चाहिए पड़ेंगे। इससे भी बड़ी बात कि क़दम-क़दम पर सतर्क रहना पड़ेगा, लोगों की निगरानी करनी या करवानी पड़ेगी क्योंकि आपसे ज़्यादा कौन जानता है कि ज़रा भी कोई व्यक्ति मानसिक रुप से जागृत हुआ, उसमें आत्मविश्वास आया कि आपकी नक़ली महानता और श्रेष्ठता की चूलें हिल जाएंगीं। मैं समझता हूं कि षड्यंत्रकारी को दूसरों के मुक़ाबले अतिरिक्त रुप से ऐक्टिव रहना पड़ता होगा। उसका दिन का चैन और रात की नींद आसान नहीं हो सकती। एक आंदोलन का नक़लीपन छुपाने के लिए उसे हज़ार तरह के नये नक़ली आंदोलन खड़े करने पड़ सकते हैं।


इस सबके मुक़ाबले वह आदमी जो न तो किसीका ग़ुलाम है, न किसीको ग़ुलाम बनाने का ख़्वाहिशमंद है, बेहतर ज़िंदगी बिता सकता है बशर्ते वह मौत के डर से मुक्त हो जाए और हवाई मान्यताओं (जैसे प्रतिष्ठा, जाति, वंश, बदनामी, लोकप्रियता, इज़्ज़त....आदि-आदि) की चिंता करना छोड़ दे।


-संजय ग्रोवर
08-03-2016


Sunday, 28 February 2016

सौ बार क्या ?

अकसर लोग कहते हैं कि झूठ को सौ बार बोला जाए तो सच लगने लगता है।

लेकिन क्या यह सिर्फ़ बोलने वाले पर निर्भर है ?

क़तई नहीं। 

यह सुननेवाले पर भी उतना ही निर्भर है। सुननेवाला या तो सही स्रोतों से जानने की कोशिश नहीं करता या वह बोलनेवाले पर अंधा विश्वास करता है या उसमें ख़ुदमें आत्मविश्वास की कमी होती है या वह भीड़/संख्या से प्रभावित होने का आदी होता है या वह ख़ुद भी मिलते-जुलते ग़लत संस्कारों, मान्यताओं, शिक्षाओं के बीच पला-बढ़ा होता है।

ज़रुरी नहीं कि झूठ को सौ बार बोला जाए, इससे ज़्यादा असरमंद तरीक़ा तो मैंने यह देखा है कि दो-चार, दस-बीस, सौ-पचास लोग मिलकर झूठ बोलते हैं और एक-दो बार में काम हो जाता है।

झूठ को सौ बार बोलने की आलोचना करनेवाले लोग ख़ुद सच को सौ दफ़ा बोलने की कोशिश अपनी पूरी ज़िंदगी में कितनी बार करते हैं ?

अकसर यह होता है कि ज़्यादा शातिर झूठ को हम सच समझ लेते हैं और कम शातिर को झूठ।

-संजय ग्रोवर
28-02-2016


Friday, 26 February 2016

सुनो पीके

तुम कहते हो-

एक ईश्वर वह है जिसने हमें बनाया।
एक ईश्वर वह है जिसे हमने बनाया।

इसका क्या मतलब हुआ ?


हमें बनाया मतलब सिर्फ़ मुझे या आपको !?


जिसने सारी दुनिया बनाई।


जिसने सारी दुनिया बनाई, उसकी दुनिया में आगे जो भी बनेगा क्या उसकी सहमति के, उसके चाहे बिना बनेगा !?


चारों तरफ़, तरह-तरह के भक्त, साकार और निराकार, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, क़िताबें और अख़बार, टीवी और फ़िल्में, यही तो बांच रहे हैं कि ‘उसकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता’।


जब उसकी मर्ज़ी के बिना हम नहीं हो सकते तो उसकी मर्ज़ी के बिना वह दूसरा ईश्वर कैसे हो सकता है जिसे हमने बनाया ?


बात बड़ी साफ़ है।


या तो दोनों ईश्वर झूठे हैं या दोनों सच्चे हैं। या तो दोनों हमने बनाए हैं या दोनों ख़ुद बने हैं।


या तो दोनों ख़ुद बने हैं या दोनों किसी चालू आदमी की बदमाशी हैं।


या तो दोनों हैं या कोई भी नहीं है। 



अब क्या कहते हो ?


-संजय ग्रोवर
27-02-2016


Wednesday, 24 February 2016

भारतीय ‘प्रगतिशीलों’ का पसंदीदा संगठन आर एस एस एस-2

(भारतीय ‘प्रगतिशीलों’ का पसंदीदा संगठन आर एस एस एस-1)

अभी मैं इस लेख का अगला हिस्सा लिखने का मन बना ही रहा था कि ‘पाखंड वर्सेस पाखंड’ का नया उदाहरण सामने आ गया। किसीने आरोप लगाया कि जेएनयू में प्रतिदिन इतनी मात्रा में कंडोम, इतने ये, उतने वो आदि-आदि पाए जाते हैं। इसपर दूसरा पक्ष लगातार इस बात पर हंस रहा है कि देखो, अब कंडोम गिने जा रहे हैं.....


अगर कोई स्पष्टवादी, बेबाक़ और पारदर्शी सोचवाला समाज/गुट/व्यक्ति इसपर हंसता तो बात समझ में आती मगर क्या जेएनयू के लोगों की स्थिति वाक़ई ऐसी है कि वे इसपर हंस सकें ? वे उन कंडोमों की ‘उपयोगिता’, इस्तेमाल या मौजूदगी के बारे में कोई स्पष्ट बात नहीं बता रहे। इतना ही नहीं वे तो यह भी कह रहे हैं कि ऐसे आरोपों के बाद उन लड़कियों के घरवाले क्या सोचेंगे जो यहां पढ़ने आतीं हैं ?


सोचिए कि इसका क्या मतलब निकलता है ?


यानि कि वे कहना चाह रहे हैं कि वह सब यहां नहीं होता जो उन लड़कियों के घर वाले सोच बैठेंगे ? अगर नहीं होता तो आप कंडोम गिनने पर हंस क्यों रहे हैं ? फिर तो यह जानना बनता कि यहां कंडोम आते कहां से हैं ? क्या शहर के दूसरे लोग अपने कंडोम यहां फेंक जाते हैं ? क्या यहां कोई फ़ैक्टरी लगी है ? क्या यहां कंडोम का कोई पेड़ लगा है जिससे पतझर में कंडोम झर-झरके गिरते हैं ?


अगर यहां यह सब नहीं होता तो आप उनपर हंस किस बात पर रहे हैं ? आप तो ऐसे हंस रहे हैं जैसे कि आप प्रगतिशील हों और वे कट्टरपंथी हों !? जबकि आप लड़कियों के घरवालों के सामने एक परंपरावादी इमेज भी बनाए रखना चाहते हैं। यह तो सौ प्रतिशत पाखंड हुआ। अगर आपमें यह कहने का साहस नहीं है कि कंडोम का यहां पर क्या इस्तेमाल होता है तो कृपा करके अपने को बेबाक़, प्रगतिशील, साहसी वग़ैरह कहना बंद करें। आप और आर एस एस एस एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।


खिड़की से घुसकर, अलमारी में छुपकर, अंधेरे में घुसकर, खाट के नीचे बैठकर संबंध बनाना कोई आधुनिकता नहीं है ; यह पाखंडी, कायर और मौक़ापरस्त लोगों का पुराना क़रतब है।


और अगर आपमें स्पष्ट और पारदर्शी ज़िंदगी जीने की हिम्मत है तो आपको यह चिंता क्यों लगी है कि लड़कियों के घरवाले क्या सोचेंगे ? क्या यहां पढ़नेवाली लड़कियों में वह हिम्मत नहीं है कि अपने घरवालों को साफ़-साफ़ बता सकें !? तो फिर इसमें और दूसरे विश्वविद्यालयों में फ़र्क़ क्या हुआ ? छुपा-छुपी के क़िस्से किस विश्वविद्यालय में नहीं चलते ?

यानि कि पकड़े गए तो प्रगतिशील वरना राष्ट्रप्रेमी और परंपरावादी ! 

क्या आपने कभी सोचा है कि आप जैसे कृत्रिम प्रगतिशीलों के बनाए समाज में उन लोगों के लिए कितनी समस्याएं और तक़लीफ़ें खड़ी हो जातीं हैं जो सचमुच अपने हर रिश्ते को साफ़गोई और ईमानदारी से जीना चाहते हैं ?

जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि यहां के ‘प्रगतिशीलों’ को एक भ्रम/ग़लतफ़हमी है कि वे आर एस एस एस से कुछ अलग हैं, दरअसल इनमें उन्नीस-बीस से ज़्यादा का अंतर नहीं है।


(जारी)

-संजय ग्रोवर
24-02-2016



 

Friday, 12 February 2016

नास्तिकता पर गोलमोल बातें


4.17 मिनट का यह वीडियो है। फ़ेसबुक पर कुछ लोगों ने इस सलाह के साथ लगाया कि इसे देखकर आपकी आंखें खुल जाएंगी। मैंने, देखा तो मुझे इसमें कोई ख़ास या नई बात नज़र नहीं आई। मैंने पूरा वीडियो ढूंढने की कोशिश की, क़रीब आधा घंटा लगाया, नहीं मिला। एक अन्य वीडियो मिला जो तकरीबन दस मिनट का था।
बहरहाल, कहीं पूरा वीडियो मिल गया और उसमें कुछ अलग निष्कर्ष निकलता दिखाई दिया तो हम दोबारा बात कर लेंगे। अभी इसीपर करते हैं।

यहां यह समझना मुश्क़िल है कि जावेद अख़्तर क्यों यह सफ़ाई दे रहे हैं कि ‘मैंने तो हमेशा कहा आयम एन अथीस्ट.....’, मगर यह स्पष्ट है कि बात पीके की चल रही है और फ़िल्म के निर्देशक राजू हिरानी भी वहीं कुर्सी डाले बैठे हैं। सोचने की बात है कि इससे पहले कब किसीको यह सफ़ाई देनी पड़ती थी कि वह नास्तिक है। यह माहौल नास्तिकता के खि़लाफ़ माना जाए कि उसके पक्ष में माना जाए !? यहां जावेद अख़्तर सहिष्णुता की बात करते हुए 1975 में बनी अपनी ‘शोले’ के उस दृश्य का हवाला दे रहे हैं कि किस तरह नायक एक मंदिर में भगवान की मूर्ति के पीछे छुपकर भगवान बनकर बोल रहा है। वे कहते हैं कि शायद आज मैं इस दृश्य को न लिखता। अब सोचने की बात यह है कि क्या ‘शोले’ अंधविश्वास के खि़लाफ़ और नास्तिकता के पक्ष में बनी कोई फ़िल्म थी !? क़तई नहीं। यह फ़िल्म बदले पर आधारित, नाटकीय दृश्यों से भरी एक साधारण फ़िल्म थी। इसे भी छोड़िए। क्या नायक इस दृश्य में अंधविश्वास हटाने की कोशिश कर रहा है ? क्या वह भगवान का न होना साबित कर रहा है ? बिलकुल भी नहीं। वह तो उसके होने के अंधविश्वास का लाभ उठा रहा है। यह लाभ उसे मिल रहा है यह इसीसे पता चलता है कि नायिका तुरंत इस पर विश्वास कर लेती है। यह दृश्य अंधविश्वास और भगवान के होने के पक्ष में है, उसके खि़लाफ़ नहीं।  इसपर कोई भक्त क्यों ऐतराज़ करेगा ? वीडियो के इस टुकड़े से तो यही समझ में आता है कि वे ग़लत उदाहरण दे रहे हैं। वे और भी फ़िल्मों का उदाहरण देते हैं जिनमें से किसीमें कोई पात्र भगवान की मूर्ति उठाकर फ़ेंक देता है। ऐसी तो बहुत फ़िल्में बनी हैं। अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘नास्तिक’, 1954 में बनी ‘नास्तिक’, सुनील दत्त अभिनीत ‘रेलवे प्लेटफॉर्म’ ऐसी ही, या ऐसे ही कुछ दृश्यों वाली फ़िल्में हैं। मुद्दे की असली बात यह है कि ऐसी किसी फ़िल्म में भगवान के अस्तित्व से इंकार नहीं किया गया। 


जावेद अख़्तर किस तरह के नास्तिक हैं यह तो वही बताएंगे, लेकिन इस तरह की जितनी फ़िल्में बनी हैं, वे भगवान के होने की पुष्टि करतीं हैं, वे किसीकी आंखें नहीं खोलती बल्कि जागते हुए लोगों को भी सुलाने की कोशिश करती लगतीं हैं। आंखें क्या वे तो खुले हुए दिमाग़ों को भी बंद कर देतीं हैं। जावेद यहां कह रहे हैं कि वे भगवान में विश्वास नहीं करते जबकि उन्हींके बराबर में बैठे राजू हिरानी कह रहे हैं कि फ़िल्म दो तरह के भगवानों के बारे में बताती है-एक, जिसे हमने बनाया है ; दूसरा, जिसने हमें बनाया है। और जैसाकि फ़िल्म में भी दिखाया गया है कि दूसरा वाला भगवान असली है। अब जावेद अख़्तर का इसपर क्या मानना है यह तो, अगर उन्होंने इसपर कुछ कहा है तो, बाक़ी वीडियो से ही पता लग सकता है। मेरी समझ में, जावेद अख़्तर की नास्तिकता(अगर वे नास्तिकता का मतलब भगवान के वजूद से इंकार करना मानते हैं) और राजू हिरानी के अंधविश्वास-विरोध का अंतर तो यहीं साफ़ हो जाता है। 


पहले तो इस देश के ज़िम्मेदार प्रगतिशीलों और अंधविश्वास-विरोधियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके नास्तिकता के अर्थ क्या हैं-भगवान को न मानना या मूर्ति और कर्मकांड को न मानना। अब जिन तालिबान की मूढ़ता का हवाला देकर जावेद प्रगतिशीलता का मतलब समझाने की कोशिश कर रहे हैं, मूर्तिपूजा तो वे भी नहीं करते। इससे उनको हासिल क्या हुआ ? असली समस्या सिर्फ़ मूर्तिपूजा नहीं है, असली समस्या 
है किसी निराकार, ग़ायब भगवान/ख़ुदा/शक्ति/गॉड के होने का समर्थन या फिर इसपर चुप्पी या गोलमोल बातें।

12-02-2016

असली समस्याएं हैं इस तरह की मान्यताएं कि कोई अदृश्य शक्ति या शक्तियां इस दुनिया को चलातीं हैं जो कि इंसान से कई गुना ज़्यादा ताक़तवर हैं, इंसान की उस/उनके सामने कोई औक़ात नहीं है, वह बेबस, मजबूर और कमज़ोर है, वह उनके हाथों की कठपुतली है, उसके बस का कुछ नहीं है जब तक कि वह उन तथाकथित शक्तिओं के आगे सिर न झुकाए, उनका अहसान न माने, उन अहसानों का बदला न चुकाए, उन तथाकथित शक्तिओं के होने को बेशर्त स्वीकार न कर ले। मूर्तियां, कर्मकांड, संस्कार, कलंडर, भजन, फ़िल्में, लेख आदि तो उन तथाकथित शक्तिओं के विज्ञापन या रीमाइंडर्स की तरह हैं। ‘भगवान सर्वशक्तिमान है’, ‘वह सर्वत्रविद्यमान है’, ‘उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती’, ‘उसके आगे किसीका बस नहीं चलता’, ‘उसकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता’, ‘उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता’, ‘जाको राखे साईयां’,.....जैसे प्रचलित और आम लोगों में स्वीकृत कहावतें और मुहावरे ही बताते हैं कि समस्या मूर्ति तक सीमित नहीं है। दूरदराज़ गांवों में ओझाओं द्वारा औरतों को उल्टा लटकाकर, आग में मिर्ची झोंककर उनका तथाकथित ‘भूत’ उतारना हो या ज्योतिषी द्वारा किसीका हाथ देखकर भविष्य बताते हुए पैसा झाड़ लेना हो, इन सबकी जड़ में मूर्ति नहीं बल्कि कुछ निराकार/ग़ायब/अदृश्य शक्तिओं पर आदमी का विश्वास है। उन तथाकथित निराकार शक्तियों पर स्पष्ट बातचीत के बिना हम काला जादू, मिडिलमैन और बाबावाद का कुछ कर पायेंगे, यह एक बचकाना ख़्याल ही लगता है। कट्टरपंथिओं को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप ऐसी या वैसी, कैसी शक्तियों को मानते हैं ; उनके लिए इतना काफ़ी है कि आप किसी अमानवीय यानि मानवता से इतर/ऊपर किसी रहस्यमय शक्ति में विश्वास करते हैं। तालिबान भी किसी मूर्ति की वजह से नहीं बल्कि किसी निराकार शक्ति में विश्वास की वजह से ही सब कुछ कर रहे हैं।

जावेद 1975 और आज के फ़र्क़ की बात कर रहे हैं। मेरे पास यह नापने का कोई तरीक़ा नहीं है कि आजकल असहिष्णुता की मात्रा क्या है। लेकिन मैं कह सकता हूं कि असहिष्णुता कि जड़ सिर्फ़ वहां नहीं है, जहां तयशुदा नतीजों के साथ ढूंढी जा रही है। कर्मकांडों और अंधविश्वासों के स्पष्ट विरोधी कहे जानेवाले कबीर की लाश में से फूल 1975 से पहले ही निकाले जा चुके थे। बिना शिक्षा दिए दक्षिणा में ‘शिष्य’ एकलव्य का अंगूठा काट लेनेवाले ‘गुरु’ द्रोणाचार्य के नाम पर पुरस्कार 1975 से पहले से चल रहे हैं। बाबरी मस्ज़िद कांड और दुग्धपान कांड के वक़्त सहिष्णुता थी या असहिष्णुता, कैसे पता लगाया जाए ? ‘जय संतोषी मां’ भी 1974-75 के आसपास ही सुपरहिट हो चुकी थी।

हालांकि उस वक़्त की स्टंट और कमर्शियल फ़िल्मों को हर समझदार दर्शक एक जैसी गंभीरता से लेता होगा, लगता तो नहीं है। फिर भी बात आई है तो ठीक से कर ही लेनी चाहिए कि मूर्ति के साथ भक्तों को इस तरह बातचीत करते शायद ही किसीने देखा होगा जैसा ‘शोले’ व अन्य फ़िल्मों में होता है। वे लोग भजन वग़ैरह गाते हैं, प्रसाद इत्यादि चढ़ाते हैं पर तेज़ आवाज़ में इस तरह बातचीत....! कुछ फ़िल्मों में तथाकथित नास्तिक नायक मंदिर में जाकर भगवान की मूर्ति से लड़ता है कि ‘मैं तुझे नहीं मानता, नहीं मानूंगा.....’ आदि-आदि। नास्तिकता का यह कांसेप्ट सिरे से ग़लत है। जो भगवान के अस्तित्व में ही विश्वास नहीं करता वह उससे लड़ने क्यों जाएगा !? यह तो फ़िल्मी नास्तिकता हुई। यहां यह ज़िक्र करना ज़रुरी है कि मैं 4-5 साल से यूट्यूब पर खोज रहा हूं, मुझे असली नास्तिकता पर आज तक न तो एक भी हिंदी गीत मिला है न एक भी हिंदी फ़िल्म। मेरी खोज में कमी हो सकती है पर यह अभी जारी है।  

यह अनुमान लगाना भी अजीब लगता है कि शोले का वह दृश्य आज स्वीकृत न हो पाता। ‘पीके’ 2015 की रिलीज़ है। 2012 में ‘ओह माय गॉड’ रिलीज़ हुई थी जिसमें नास्तिक शब्द का ख़ुला इस्तेमाल है और परेश रावल मूर्तियों और बाबाओं के साथ कई बार, कई तरह की छेड़खानियां करते हैं। ‘पीकू’ जैसी फ़िल्म भी आजकल में ही रिलीज़ हुई है जिसमें एक बाप अपनी बेटी के सामने उसके सैक्स-संबंधों की चर्चा करता है। ‘तेरे बिन लादेन’ नाम की फ़िल्म का अगला भाग तैयार है। जैसे बोल्ड विषयों पर और बोल्ड संवादों के साथ आजकल फ़िल्में बन रहीं हैं, 1975 में सोचना भी मुश्क़िल रहा होगा। और मैं यह क़तई नहीं कह रहा कि इसका श्रेय किसी सरकार या विचारधारा को जाता है। मेरी सीमित समझ के अनुसार इसका श्रेय टैक्नोलॉजी को जाता है जिसने इंटरनेट, वाई-फ़ाई, स्मार्टफ़ोन, लैपटॉप जैसे माध्यम और उपकरण देकर इंसान को इंसान के क़रीब आने, नये विचार बांटने और एक-दूसरे की संस्कृतियों को जानने में मदद की है, उसकी सोच-समझ के दायरे को बड़ा कर दिया है। 

जावेद यहां यह भी कह रहे हैं कि आपको तालिबान जैसा क्यों बनना चाहिए, क्यों नहीं आप उन्हें अपने जैसा बनाएं। लेकिन भारत की तथाकथित उदारवादी या प्रगतिशील विचारधाराओं से जुड़ी संस्थाएं/पार्टियां क्यों नहीं आर एस एस/मुस्लिम लीग को अपने जैसा बना पाईं ? क्या इसलिए कि उनमें बस उतना ही अंतर है जितना कि साकार और निराकार या ग़ायब और हाज़िर में होता है ?


यानि कि न के बराबर !  

17-02-2016

-संजय ग्रोवर

(इस संदर्भ में ये लेख भी प्रासंगिक हैं- पहलादूसरा)

(‘ओह माई गॉड’ की समीक्षा और नास्तिकता पर बनी कुछ अन्य हिंदी फ़िल्मों पर बात जल्दी ही)









Sunday, 7 February 2016

भारतीय ‘प्रगतिशीलों’ का पसंदीदा संगठन आर एस एस एस

प्रगतिशील होने का दावा करनेवाले किसी युवा से आप पूछें कि वह कैसे कह सकता है कि वह प्रगतिशील है ; जवाब में वह कहे कि क्योंकि मेरे सामनेवाला कट्टरपंथी है इसलिए मैं प्रगतिशील हूं ; तो इस जवाब पर शायद आप हंसेंगे, हैरान होंगे या सर पीटेंगे। मगर ग़ौर से देखें तो भारत में प्रगतिशीलता के मायने लगभग यही हैं। और यहां सामनेवाला नब्बे पिच्यानवें प्रतिशत मामलों में आर एस एस एस होता है। जिस तरह आर एस एस एस को या किसी तथाकथित राष्ट्रवादी को अपना राष्ट्रप्रेम साबित करने के लिए पाक़िस्तान और मुसलमान की ज़रुरत पड़ती है ठीक उसी तरह से यहां के प्रगतिशीलों को अपनी प्रगतिशीलता बताने के लिए आर एस एस एस की ज़रुरत पड़ती है। कल्पना कीजिए कि पाक़िस्तान न हो तो आर एस एस एस क्या करेगा ? साथ ही यह भी कल्पना कीजिए कि आर एस एस एस न हो तो तथाकथित प्रगतिशील क्या करेगा ?

भारतीय बुद्धिजीविता की खोखली प्रगतिशीलता के प्राण आर एस एस एस जैसे संगठनों में ही बसते हैं। यहां के तथाकथित प्रगतिशील विद्वान आर एस एस एस की बातों को कितनी गंभीरता से लेते हैं, इसके दो ताज़ा-ताज़ा उदाहरण मुझे याद आ रहे हैं। पहला उदाहरण फ़िल्म पीके पर चले विवाद का है। आर एस एस एस ने कहा कि इसमें हिंदू धार्मिक प्रतीकों की हंसी उड़ाई गई है। भारत के तथाकथित प्रगतिशील तुरंत उसके साथ बहस में उलझ गए जैसेकि वे इसीका इंतज़ार कर रहे हों। हैरानी की बात यह है कि इन तथाकथित प्रगतिशीलों को यह क्यों नहीं दिखाई दिया कि उसी कथित फ़ासीवादी विचाराधारा के सेंसरबोर्ड ने ही यह फ़िल्म इन दृश्यों के साथ पास की है जिसे ये मुंह भर-भर कर ग़ालियां देते हैं !? दूसरी तरफ़ मेरे जैसा आदमी यह कह रहा था कि इस फ़िल्म में नया या क्रांतिकारी कुछ नहीं है, इसमें वही किया गया है जो कट्टरपंथ, अंधविश्वास और सांप्रदायिकता के विरोध के नाम पर पहले भी कुछ फ़िल्मों में किया जा चुका है। इस फ़िल्म के अंत में भी उसी कथित भगवान के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया है जो वस्तुतः सारे अंधविश्वासों, झगड़ों और बेईमानियों की जड़ है (इस संदर्भ में ये लेख पढ़ें-पहला, दूसरा )। फ़ेसबुक और नास्तिक ग्रुप के कुछ युवाओं ने इस बात को समझा और बात आगे चलाई। लेकिन
राष्ट्रीय न्यूज़चैनलों पर इस मुद्दे का ज़िक्र कहीं दिखाई नहीं पड़ा। क्यों दिखाई नहीं पड़ा, इसपर आगे बात करेंगे।

दूसरी घटना पुरस्कार वापस लौटाने के हास्यास्पद प्रकरण की रही। मेरे जैसे लोग पूछ रहे थे कि एक सरकार से लिए पुरस्कार दूसरी को कैसे लौटाए जा सकते हैं, आप जैसे ‘स्वाभिमानी’ जो बात-बात में नेताओं, सेठों और राजनीति को ग़ालियां देते हैं, उन्हींके दिए पुरस्कार लेते ही क्यों हैं, आप जो एक सरकार को लोकतांत्रिकता की दृष्टि से लगभग अछूत मान रहे हैं, उसीके चैनलों पर बहसों में दिखते हुए ख़ुश कैसे हो सकते हैं, पुरस्कार आपने लौटाए इसका सबूत क्या है.........आदि-आदि (इस संदर्भ में यह लेख पढ़ें)। इसमें भी किसीकी रुचि नहीं दिखाई दी। वे लोग तो आर एस एस एस के ‘महत्वपूर्ण’ सवालों के जवाब देनें में लगे हुए थे।

सवाल यह है कि ये लोग दूसरे या दूसरों के प्रश्नों को छोड़ आर एस एस एस के लचर प्रश्नों में इतनी रुचि क्यों लेते हैं ? दो-तीन बातें समझ में आती हैं-एक यह कि इनका बौद्धिक स्तर ही इतना है कि इन्हें आर एस एस एस से ही बहस में आसानी दिखाई देती है। दूसरी, इन्हें कुछ प्रतीकों, बैनरों, कपड़ों, भाषाओं, भंगिमाओं के फ़र्क़ के चलते अपने प्रगतिशील होने का भ्रम हो गया है, दरअसल इनमें और आर एस एस एस में उन्नीस-बीस से ज़्यादा का अंतर नहीं है। तीसरी, भारत में ज़्यादातर संस्थाओं के शीर्ष पर ब्राहमणवाद बैठा हुआ है और अलग-अलग मुंहों से वही अपनी बात कह रहा होता है। चौथी, इनका एक निश्चित एजेंडा है और ये ऐसे हर व्यक्ति, विचार, तथ्य और तर्क से घबराते हैं जो उस एजेंडा के बाहर जाकर, समस्या की जड़ की तरफ़ इशारा कर रहा होता है। पांचवीं, इनका झगड़ा दिखावटी है, दरअसल ये एक-दूसरे के पूरक हैं। 

मैं कई साल तक टीवी की बहसें बड़ी रुचि के साथ देखता रहा हूं। अंततः मैंने पाया कि यहां अंधविश्वास और कट्टरता के विरोध के नाम पर ‘धर्म बनाम विज्ञान’, ‘अध्यात्म बनाम तर्क’, ‘नया बनाम पुराना’, ‘मंदिर बनाम मस्ज़िद’, जैसे कुछ मिलते-जुलते नामों से इधर-उधर की बहसें चलाई जातीं हैं। नास्तिकता शब्द का उच्चारण भी मैंने नास्तिक ग्रुप शुरु करने के बाद भी हिंदी चैनलों के किसी एंकर के मुख से दो-चार बार ही सुना है। ‘ईश्वर है या नहीं’ ऐसी कोई बहस तो मेरे देखने में कभी भी नहीं आई। यही हाल हिंदी फ़िल्मों का भी रहा है। बात समझना इतना मुश्क़िल भी नहीं है कि ऐसे लोगों को आर एस एस एस सूट नहीं करेगा तो और कौन सूट करेगा। ‘हींग लगे न फ़िटकरी और रंग चोखा का चोखा’। किया कुछ भी नहीं, बस आर एस एस एस को ग़ाली देने का दैनिक कर्मकांड निपटाया और प्रगतिशील बनके बैठ गए।

दरअसल ऐसे ‘प्रगतिशीलों’ ने ब्राहमणवाद, आर एस एस एस या धर्म से उपजी हर बुराई को विस्तार दिया है। साकार भगवान से निपटने के नाम पर इन्होंने निराकार भगवान नाम की बड़ी चालाक़ी खड़ी कर दी। प्रगतिशीलों, उदारवादियों और तार्किकों के बीच धर्म को मान्यता और स्वीकृति दिलानेवाली सबसे बड़ी और भ्रामक अवधारणा ‘धर्मनिरपेक्षता’ ऐसी ही बुद्धिओं() का ‘चमत्कार’ लगती है (इस संदर्भ में ये भी पढ़ें-पहलादूसरा )। आर एस एस एस का दिखावटी विरोध करनेवाली तथाकथित गंगा-जमुनी संस्कृति भी ऐसी ही अजीबो-ग़रीब मानसिकताओं का जोड़ मालूम होती है। ये गाय को मां बताए जाने पर तो हंसते हैं पर यह भूल जाते हैं कि ये ख़ुद नदियों को मां बनाए बैठे हैं। आप नदियों व ‘भारतीयता’ पर राज कपूर व अन्य तथाकथित प्रगतिशीलों की फ़िल्मों के गाने देखिए-सुनिए। ज़रा सोचिए कि अगर ‘होंठों पर सचाई रहती है, हर दिल में सफ़ाई रहती है’ तो इतने सारे ट्रकों की पीठ पर ‘सौ में से निन्यानवें बेईमान’ किसने और क्यों लिख दिया था!? ‘हम उस देस के वासी हैं जिस देस में गंगा बहती है’........तो ? दुनिया में आपका क्या अकेला ऐसा देश है जिसमें कोई नदी बहती है !? आपकी वजह से बहती है क्या ? आप न होते तो न बहती ? यहां अंग्रेज़ आए तो गंगा बहना बंद हो गई थी क्या ? बहने से सारी समस्याएं भी अपने-आप बह जाएंगी क्या ? साहिर कहते हैं कि ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा’ और फिर अगली ही पंक्तियों में यह भी कह देते हैं कि ‘कुरआन न हो जिसमें वो मंदिर नहीं तेरा, गीता न हो जिसमें वो हरम तेरा नहीं है’....., अब पूछिए कि गीता और क़ुरान होंगे और हिंदू और मुसलमान नहीं होंगे !?’ गीता और क़ुरान में क्या अचार डालने के तरीक़े बताए गए हैं !? इंटरनेट की बहसों में दूसरों के अलावा कुछ तथाकथित प्रगतिशील भी सलाहें देते पाए जाते हैं कि क़िताबें ज़रुर पढ़नी चाहिएं, अध्ययन ज़्यादा से ज़्यादा करना चाहिए। भाईजी, आपने साहिर को गीता का अध्ययन करते देखा था क्या ? अगर अध्ययन करने के बाद भी उन्हें यह महान नुस्ख़ा सूझा तो कहने ही क्या !! मेरी तलवार आपके घर रख दें और आपका भाला मेरे घर में रख दे तो हम दोनों का झगड़ा ख़त्म हो जाएगा !? कमाल का आयडिया है!  दूसरे क्रांतिकारी शायर फ़ैज़ ‘हम देखेंगे, हम देखेंगे...के बाद भविष्य के संदर्भ में कुछ घोषणाएं करते हुए आखि़रकार कहते हैं कि ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का, जो ग़ायब भी है हाज़िर भी......’। तो लीजिए, यह रही आपकी क्रांति। आर एस एस एस लिखेगा तो इससे कुछ अलग लिखेगा क्या ? उसकी तो तबियत चकाचक हो जाती होगी ऐसे गाने सुनकर।

(भारतीय ‘प्रगतिशीलों’ का पसंदीदा संगठन आर एस एस एस-2)

-संजय ग्रोवर
07-02-2016


Wednesday, 27 January 2016

निरपेक्ष

लघुकथा

बंदूक, तलवार, भाला, तोप, तमंचा, बम, पत्थर, थप्पड़, घूंसा, ग़ाली आदि-आदि सब एक-दूसरे को कोई नुकसान पहुंचाए बिना मिल-जुलकर रहते थे।

क्योंकि सबके सब हथियारनिरपेक्ष थे।

हां, जब कोई अकेला, शांतिप्रिय, एकांतप्रिय, स्वतंत्र और मौलिक इंसान उनके सामने पड़ जाता तो वे मिल-जुलकर उसका कचूमर निकाल देते थे।

-संजय ग्रोवर
28-01-2016

Friday, 15 January 2016

रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-3

(रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-2)


रंगो और प्रतीकों का खेल एक चालाक़ खेल है। इसमें नफ़रत फैलानेवाले शख़्स के लिए प्रेम का कोई प्रतीक चुनकर लोगों को झांसा देने की मज़ेदार सुविधा है, इसमें वंचितों को वंचित बनाए रखकर उनका मसीहा बन जाने का पूरा जुगाड़ है, इसमें स्त्रीविरोधी होते हुए भी स्त्रियों का पसंदीदा बन जाने के अच्छे चांसेज़ हैं।

मुझे याद आता है कि फ़ेसबुक के मेरे दो ग्रुपों में ऐसी कई घटनाएं हुईं। ‘नास्तिक’ ग्रुप में कुछ लोगों ने कहा कि यहां स्त्रियां नहीं हैं। हालांकि ऐसा नहीं था कि ग्रुप में स्त्रियां बिलकुल नहीं थीं, मगर काफ़ी वक़्त तक मैं चुपचाप सुनता और देखता रहा। जब ठीक लगा, इसपर स्टेटस लिखा। हंसी यह देखकर आती है कि लोग कैसी-कैसी बेतुकी बातों में ख़ुद भी उलझे हुए हैं और दूसरों को भी बहका रहे हैं। कलको आप कहेंगे कि ग्रुप में मुसलमान कितने हैं, अगर कम हैं तो आप मुस्लिम-विरोधी हैं, बच्चे कम हैं तो आप बच्चा-विरोधी हैं, ग्रुप में अगर कोई लैस्बियन नहीं है तो आप लैस्बियन-विरोधी हैं, ग्रुप में अगर सांवले लोग नहीं हैं तो आप उनके खि़लाफ़ हैं.........। हैरानी होती है कि कैसे-कैसे लोग यहां चिंतक और प्रगतिशील बने बैठे हैं। अगर किसी ग्रुप में हम नास्तिकता पर विचार करने बैठे हैं और वहां सभी आमंत्रित हैं तो जो भी बात करना चाहे, करे। हम क्या हर तरह की वैराइटी ज़बरदस्ती पकड़-पकड़कर जमा करेंगे ? हम विचार करने बैठे हैं या मिठाई की दुकान खोलकर बैठे हैं, या हम कोई फ़रमाइशी रेडियो-कार्यक्रम चला रहे हैं !? भारत में नास्तिक वैसे ही ढूंढे से मिलते हैं तिसपर भी महिलाएं !? और महिलाएं जहां चाहें वहां नास्तिक बनें, हमारा कोई ठेका है कि हर किसीको हम ही बनाएंगे!! 

और इस दृष्टि से सोचें तो बुद्ध (जैसाकि सुना है उनके यहां स्त्रियों की मौजूदगी नहीं थीं) स्त्रीविरोधी हुए, राजेंद्र यादव (चूंकि दूसरी शादी किए बिना सहायक के साथ रहते थे) स्त्रीविरोधी हुए और वे सब ज़मींदार, राजा-महाराजा और गैंगस्टर नारीवादी हुए जो अपने घरों-महलों-अड्डों में स्त्रियां जमा करके रखते थे। एक पुराने काल्पनिक नायक जो नदी-किनारे, कहानीनुसार, स्त्रियों के कपड़े ले-लेकर भाग जाते थे फिर भी स्त्रियां उनके आसपास मंडरातीं थीं, तो क्या फ़ॉर्मूलानुसार स्त्रियों को लुभाने के लिए हर कोई यही करता फिरे !? क्या रोज़ाना हर किसीकी पसंदानुसार उल्टे-सीधे कामकर उसे लुभाना ही ज़िंदगी है ? आदमी को दूसरा कोई काम नहीं क्या ? 

मगर प्रतीकात्मकता-पसंद लोगों के मानदण्ड इतने ही हास्यास्पद हैं। अगर कोई मर्द अपने घर में बिना किसी दूसरे मर्द/मानव के रहता हो तो इनके हिसाब से तो वो भी मर्द या मानवविरोधी हुआ!! यह तो ऐसे हुआ कि जब तक आप कोट-टाई पहने हैं तब तक पढ़े-लिखे हैं, रात को जैसे ही आप पायजामा पहनेंगे, अनपढ़ हो जाएंगे!! इन र्खों की तथाकथित बुद्धि के अनुसार तो होगा यही कि आदमी जिन-जिन मूल्यों का समर्थक है उनकी एक-एक निशानी चौबीस घंटे अपने शरीर पर, घर में, दफ़्तर में, रास्ते में.....हर जगह प्रदर्शित करे वरना ये उसको विरोधी घोषित कर डालेंगे। अब सोचिए कि आदमी इनकी बुद्धि से चला तो उसका दिन कैसे गुज़रेगा और रातों की क्या गत बनेगी !?

निशानियां पाखंडियों को चाहिएं होतीं हैं, करनेवाले चुपचाप अपना काम करते हैं, अपने स्वभाव को जीते हैं। 

इनकी मेधा तो ऐसी है कि जब तक आप दुनिया के सारे धर्मों, देशों के लोगों के साथ उनके त्यौहार नहीं मनाएंगे, उनकी मिठाईयां नहीं खाएंगे, उनके साथ उनके त्यौहार पर नाचेंगे नहीं...तब तक ये आपको उनका दुश्मन मानेंगे। अगर आपका कोई क्रिश्चियन दोस्त नहीं है तो आपको इनकी वजह से बनाना पड़ेगा या किराए पर लाना पड़ेगा। अगर आपका कोई रशियन दोस्त नहीं है तो आप वहां जाकर कुछ रशियन दोस्त बनाईए, किराया-ख़र्चा ये उठाएंगे। दुनिया में अगर एक भी आदमी ऐसा है जिससे कभी आप मिले नहीं, उसके साथ कभी खाया-पिया नहीं, सलाम-नमस्ते-गुड मॉर्निंग इत्यादि नहीं की तो इनके अनुसार आप उसके दुश्मन हुए। कर लीजिए क्या करेंगे ?

कई लोग समय-समय पर अपने परिवारों की भी प्रदर्शनी लगाते हैं कि देखिए मैं हिंदू हूं, पत्नी मुस्लिम है, बेटा क्रिश्चियन है, फ़लां ये है, ढिकां वो है....और हम पचास/पांच सौ साल से एक साथ रहते हैं। मैं सोचता हूं कि पचास/पांच सौ साल तक साथ रहकर भी हिंदू हिंदू रहा, क्रिश्चियन क्रिश्चियन और मुस्लिम मुस्लिम ; आदमी कोई भी न हो सका तो यह ख़ुश होने की बात है या रोने की, माथा फोड़ने की बात है !? 

इनकी ज़िंदगी है कि चलता-फिरता शोकेस है !?

(ज़रुरी हुआ तो आगे भी)
-संजय ग्रोवर
15-01-2016

Monday, 11 January 2016

रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-2

(रंगो और प्रतीकों का चालू खेल-1)

रंगों और प्रतीकों के खेल में आदमी किस तरह उलझ जाता है इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण याद आता है। एक प्रसिद्ध खिलाड़ी के रिटायरमेंट पर उसके एक फ़ैन को पूरे स्टेडियम में एक प्रतीक को हाथ में उठाकर चक्कर लगाने का मौक़ा दिया गया। पता नहीं ईमानदारी, अनुशासन और सुरक्षा-व्यवस्था के कौन-से नियमों के तहत यह करने दिया गया। सोने पर सुहागा यह कि उस फ़ैन का पूरा गेटअप जाति या वर्णविशेष को चिन्हित कर रहा था। कोई दूसरा यह करता तो पूरी संभावना थी कि इसे जातिवाद और सांप्रदायिकता कहा जाता मगर वर्णविशेष की सुविधानुसार यह श्रेष्ठता और महानता का सूचक कहलाया। पूरा मीडिया इस ‘महानता’ में हाथ बंटा रहा था। इस घटना को कईयों ने लाइव देखा। इसके वीडियोज़ में फ़ैन की बातें सुनकर यही समझ में आता है कि सारी मानसिकता वही है जो किसी कट्टरपंथी भक्त की अपने भगवान के प्रति होती है। लेकिन यहां सांप्रदायिकता और प्रगतिशीलता व्यवहार और मानसिकता से नहीं बल्कि प्रतीकों और बैनरों से तय की जाती है।

मैं एक बहुत ही मज़ेदार बात शेयर करना चाहूंगा जो कि प्रतीकात्मता को गंभीरता से लेनेवालों और उसे चालाक़ी से इस्तेमाल करनेवालों, दोनों की हास्यास्पद मानसिकता के बारे में बताती है। मेरे एक मुस्लिम मित्र दूसरों के साथ अपनी बातचीत में अकसर जी शब्द का इस्तेमाल किया करते। एक तो उनके बोलने का अंदाज़ अच्छा था दूसरे, मुझे यह शब्द इसलिए जम गया कि मैं रिश्तों में इंसानियत, ईमानदारी, दोस्ती, प्रेम जैसे मूल्यों का तो महत्व चाहता हूं मगर थुपे हुए रिश्ते और थुपे हुए संबोधन आसानी से हज़म नहीं कर पाता। जैसे दूसरे लोग तपाक से किसीको मामा, चाचा, भईया, दीदी, भाभी, जीजा कहना शुरु कर देते हैं, मुझसे नहीं हो पाता। मुझे लगा कि यह ‘जी’ शब्द तो बड़े काम का है, आदर भी हो जाता है और बात-बात में किसीको बाऊजी-ताऊजी बनाने की भी ज़रुरत भी नहीं पड़ती। धीरे-धीरे यह मेरे व्यवहार में आ गया। बाद में मैंने देखा कि कई लोग इस शब्द की वजह से आपको किसी संघ या सांप्रदायिकता से जोड़ना शुरु कर देते हैं। ये कोई ढंग के लोग होते तो भी बात थी मगर मैंने दूर से भी और क़रीब से भी ख़ूब देखा कि ख़ुद ये लोग क़तई भी विश्वसनीय नहीं हैं। ख़ुद ये आंगरन-जांगरन, हंडिया टुडे-झंडिया टुडे, द हिंदू-द बिंदू...किसी भी पत्र-पत्रिका में काम करते हुए भी प्रगतिशील, उदार, एकपक्षीय, धर्मनिरपेक्ष(?) वगैरह बने रहते हैं और दूसरे को एक-दो शब्दों या प्रतीकों के आधार पर कुछ भी घोषित कर डालते हैं। मुझे समझ में आया कि ग़लती मेरी भी है कि ऐसे फ़ालतू और अविश्वसनीय लोगों की बातों पर कान और ध्यान दे देता हूं। इस तरह के हल्के लोगों की बातों पर ध्यान देने का मतलब है कि मेरे आत्मविश्वास में भी कहीं न कहीं, कुछ कमी है।

काफ़ी वक़्त से मैं यूट्यूब पर उमर शरीफ़ के कॉमेडी शो और अन्य पाक़िस्तानी कार्यक्रम देख रहा हूं। पता चल रहा है कि वहां जी शब्द का इस्तेमाल बहुतायत में होता है। इस दृष्टि से तो पूरा पाक़िस्तान ही संघी साबित होता है। ख़ैर! यह न भी हो तो भी मैं, जब तक मुझे अच्छा लगेगा, जी का इस्तेमाल करता रहूंगा। मेरे लिए आत्मविश्वास का यही मतलब है।


राहत इंदौरी के एक शेर की एक पंक्ति है कि ‘किसीके बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है........’
शेर की भाषा पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है। अन्य संदर्भ में स्त्रीवादी और मातावादी लोग कह सकते हैं कि ‘किसीकी मां का हिंदोस्तान थोड़ी है....’ कहना चाहिए था। मगर शेर का साधारण अर्थ भी ठीक-ठाक हैं। जैसा कि इस लेख में पहले भी कहा और इस शेर में जोड़ते हुए भी कहूंगा कि इस पूरी दुनिया का कोई भी रंग, शब्द, प्रतीक...आदि-आदि किसीके मां, बाप, भाई, बहिन, चाचा, मामा, जीजा, साले का नहीं है। उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी रंग, शब्द, प्रतीक, भाषा, शिल्प, कपड़ों....से किसीके चरित्र और मानसिकता का कुछ पता नहीं चलता। और उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि चालाक, बेईमान और मौक़ापरस्त लोग रंग और प्रतीक बदलने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगाते। वे देखते हैं कि कब कौन-सी चीज़ भीड़ में स्वीकृत हो गई है और तुरंत वही करना शुरु कर देते हैं। 

यहां तक कि इनके व्यवहार को देखकर कई लोग समझ बैठते हैं कि समय के साथ बदलना और मौक़ापरस्त होना एक ही बात होती है। 


मज़े की बात देखिए कि 2-4 साल पहले हमें बज़रिए प्रगतिशील बौद्धिकता यह पता चला कि केजरीवाल प्रगतिशील हैं। अब मैं यह याद करने की कोशिश कर रहा हूं कि वो कौन विद्वान थे जिन्होंने यह बताया था कि केजरीवाल और ‘यूथ फ़ॉर इक्वैलिटी’ आरक्षण-विरोधी हैं!?


ख़ैर! प्रगतिशीलता, कट्टरपंथ, ईमानदारी, सांप्रदायिकता आदि को लेकर अपने पास बहुत-सारे अनुभव भी हैं और बहुत-सारी समझ भी है। जिसके चलते यह तो बिलकुल साफ़ हो चुका है कि इन मूल्यों के प्रतिनिधि बने बैठे बहुत-सारे लोग क़तई अविश्वसनीय, प्रायोजित और नाटकबाज़ लोग हैं। वे दूसरों को इन मूल्यों के बहाने बांट रहे हैं और ख़ुद हर तरफ़ मज़े ले रहे हैं। 


हम जैसे लोग जिन्हें न किसीसे कुछ लेना है न खाना-पीना है, ऐसे बेसिर-पैर लोगों की परवाह करेंगे तो अपना वक़्त भी बरबाद करेंगे और ज़िंदगी भी।


(रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-3)

-संजय ग्रोवर
11-01-2016