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Wednesday, 27 April 2016

क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?

सरल मेरा दोस्त है। अपनी सरलता की ही वजह से मेरा दुश्मन भी है। मौलिक है, नास्तिक है, विद्रोही है। जाहिर है ऐसे आदमी के रिश्ते सहज ही किसी से नहीं बनते। बनते हैं तो तकरार, वाद-विवाद, तूतू मैंमैं भी लगातार बीच में बने रहते हैं। यानि कि रिश्ता टूटने का डर लगातार सिर पर लटकता रहता है।

अभी हाल ही में सरल के दो बहनोईयों का निधन 6-8 महीनों के अंतराल में हो गया। कुछेक मित्रों की प्रतिक्रिया थोड़ी दिल को लगने वाली तो थी पर सरल को वह स्वाभाविक भी लगी। संस्कारित सोच के अपने दायरे होते हैं। मित्रों का इशारा था कि अब भी तुम्हारी समझ में नहीं आया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते, इसलिए यह सब हुआ ?

यह सोच सरल के साथ मुझे भी बहुत अजीब लगी।

पहली अजीब बात तो यह थी कि सरल माने न माने पर उसके दोनों बहनोई ईश्वर में पूरा विश्वास रखते थे। फिर ईश्वर ने सरल के किए का बदला उसके बहनोईयों और बहिन-बच्चों से क्यों लिया ?

दूसरी अजीब बात मुझे यह लगी कि अगर ईश्वर को न मानने से आदमी इस तरह मर जाता है तो फिर ईश्वर को मानने वाले को तो कभी मरना ही नहीं चाहिए ! वैसे अगर सब कुछ ईश्वर के ही हाथ में है तो ईश्वर नास्तिकों को बनाता ही क्यों है !? पहले बनाता है फिर मारता है ! ऐसे ठलुओं-वेल्लों की तरह टाइम-पास जैसी हरकतें कम-अज़-कम ईश्वर जैसे हाई-प्रोफाइल आदमी (मेरा मतलब है ईश्वर) को तो शोभा नहीं देतीं।

इससे भी अजीब बात यह है कि ईश्वर क्या किसी मोहल्ले के दादा की तरह अहंकारी और ठस-बुद्धि है जो कहता है कि सालो अगर मुझे सलाम नहीं बजाओगे तो जीने नहीं दूंगा ! मार ही डालूंगा ! क्या ईश्वर किसी सतही स्टंट फिल्म का माफिया डान है कि तुम्हारे किए का बदला मैं तुम्हारे पूरे खानदान से लूंगा !

क्या ईश्वर को ऐसा होना चाहिए ?

ईश्वर को मानने वालों की सतही सोच ने उसे किस स्तर पर ला खड़ा किया है!

वैसे अगर ईश्वर वाकई है तो क्या उसे यह अच्छा लगता होगा !?


-संजय ग्रोवर

16 जून 2009 को ‘संवादघर’ पर प्रकाशित
6 फ़रवरी 2011 को ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर प्रकाशित



Friday, 22 April 2016

नास्तिकता बनाम पारिवारिकता, सामाजिकता, व्यवहारिकता आदि.....

लोगों को ग़ुलाम बनाने के लिए गंदी और भद्दी प्रथाएं और मान्यताएं बनानेवाले किसी व्यक्ति ने शायद ही कभी यह कहा हो कि मैं कोई असामाजिक आदमी हूं और यह काम समाज के खि़लाफ़ कर रहा हूं। वर्णव्यवस्था, सतीप्रथा, छुआछूत, विवाह, दहेज, ऊंचनीच, छोटा-बड़ा, अंधविश्वास, भगवान, साकार, निराकार ..... सब कुछ सामाजिकता की ही आड़ में बनाया गया। तथाकथित सामाजिकता से डरनेवाले किसी व्यक्ति से इनको बदलने की आशा रखना भी बहुत समझदारी या व्यवहारिकता की बात नहीं लगती। राजेंद्र यादव के बारे में बात करते हुए एक बार मुझसे किसीने कहा कि ऐसे लोग क्या कर पाएंगे जो अपना परिवार ही नहीं पाल पाए। मैं उस वक़्त व्यस्त था, मैंने  इतना ही कहा कि परिवार तो गांधीजी भी नहीं पाल पाए, क्या आपको उनसे भी यह शिक़ायत है!? (राजेंद्र यादव परिवार नहीं पाल पाए, इससे भी मैं असहमत हूं)

क्या परिवार चलाना वाक़ई इतनी महान बात है ? बिलकुल भी नहीं। मैं समझता हूं समाज बदलने, ईमानदारी और मौलिकता से जीने की तुलना में परिवार चलाना निहायत ही टुच्ची कारग़ुज़ारियों का जोड़ है। परिवार चलाने के नाम पर लोग अकसर अपनी बेईमानियों, कायरता, पाखंड, खोखलेपन आदि को पूरी बेशर्मी से वैद्य ठहराते चले जाते हैं-‘हम तो बाल-बच्चे वाले आदमी(!) हैं, हेंहेंहें, क्या करें....’। मुझे समझ में नहीं आता कि जिन लड़कियों को आपने शादी के नाम पर यूंही कहीं भी ठेल देना था, उन्हें पैदा करने की ऐसी क्या मजबूरी थी !? जगह-जगह बच्चे भूखे-नंग-धड़ंग घूम रहे हैं, ऐसे में आपका परिवार, आपके बच्चे न होते तो दुनिया ख़त्म हुई जा रही थी क्या ? दिखावटी सामाजिकता में आप ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और न जाने क्या-क्या पेले जा रहे हैं और आपके पैदा किए व्यवहारिक बच्चे आप ही के बनाए फ़्लाईओवरों को तोड़े डाल रहे हैं। जिसके नीचे दबकर दूसरे व्यवहारिक लोगों के सौ-दो सौ व्यवहारिक बच्चे मर जाते हैं। ऐसे व्यवहारिक आप और आपके बच्चे न होते तो क्या यह ज़्यादा व्यवहारिक और बेहतर न होता ?

कई परिवारवादी कहते हैं कि भई क्या करें, बेटी का दहेज देना है, यह-वो करना है और इसी आड़ में अपने-परायों सभी का बेदर्दी से खून चूसते, जेब काटते चले जाते हैं। लड़के-लड़की के रिश्ते के नाम पर तमाम भद्दी-भद्दी हरक़तें, परस्पर लूटपाट, अमानवीय तलवा-चाटी और चटवाई वगैरह को भी संघर्ष और महानता वगैरह का दर्ज़ा दे दिया जाता है। कथित-काल्पनिक किन्हीं पवित्रताओं और महानताओं के नाम पर ऐसी-ऐसी वास्तविक गंदगी बिखेरी जाती हैं कि अगली कई पीढ़ियों के लिए उन्हें समेटना मुश्क़िल हो जाता है। पीढ़ियों की पीढ़ियां अपने महान पुरख़ों की गंदगी(मसलन दहेज, मर्दवाद, व्यवहारिकता के नाम पर बेईमानीवाद आदि) को ढोते-ढोते मर जातीं हैं। मगर इन परिवार चलानेवाले महानों के लिए पत्थर की लकीरें और उनसे जुड़ा अपना अहंकार इतना महान और महत्वपूर्ण होता है कि इन्हें क़तई किसीपर कोई रहम नहीं आता।

कई लोग दो-चार लड़कियां पैदा करके ज़िम्मेदारी उनके उन भाईयों पर डाल देते हैं जिन्हें पैदा होते वक़्त मालूम ही नहीं होता कि उन पर क्या-क्या थोपा जानेवाला है, तो कई लोग लड़के पैदा करके उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी इससे अनजान बहिनों पर चेप देते हैं। कई लोग एक बार बेटियों की शादियां करके दोबारा पता करने ही नहीं जाते कि बाद में वे किस दशा में रह रहीं हैं या जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं। इन सब हरक़तों को मैं तानाशाही और धोखाधड़ी का दर्ज़ा देना चाहता हूं, इस तरह की पारिवारिकता अधूरी, ग़ैरज़िम्मेदार, पोंगी और पलायनवादी पारिवारिकता है।

नास्तिकता के लिए किसी भी सामाजिक मान्यता को वैसे का वैसा स्वीकार कर लेना क़तई अजीब बात है। सामाजिकता वैसे भी दुनिया के सभी संप्रदायों/समूहों के लिए बिलकुल एक जैसी नहीं होती। ब्राहमणवाद के लिए सामाजिकता, दूसरों का प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष शोषण है और अगर दूसरे भी उसी सामाजिकता को ज्यों का त्यों अपनाएंगे तो उनके लिए यह सामाजिकता नहीं लगभग आत्महत्या जैसी बात होगी ; जबकि मैं देखता हूं कि ब्राहमणवाद तो अपनी बनाई प्रथाओं को सकारात्मकता और सृजनात्मकता भी बता देता है। ऐसे में नास्तिकता को अपनी अलग सामाजिकता पैदा करनी होती है, मौलिक जीवनशैली विकसित करनी होती है। इसमें डरा हुआ आदमी ज़्यादा आगे तक नहीं जा सकता, थोड़ा साहस तो करना ही पड़ता है। भीड़ और कुप्रथाओं से डरकर कोई निर्णय लेना नास्तिक की सामाजिकता तो बिलकुल भी नहीं हो सकती, उसमें सामाजिक बदलाव की बात तो दूर, अपने लिए राहत का एक कोना बनाना भी असंभव-सी बात है। नास्तिक की व्यवहारिकता दूसरों की व्यवहारिकता जैसी कैसे हो सकती है ? यही तो उसमें और दूसरों में बुनियादी फ़र्क़ है। दूसरों के लिए तो मंदिर जाना भी व्यवहारिकता है, नास्तिक के लिए यह पूरी तरह वक़्त की बर्बादी है। छीना-छपटी, लेन-देन, टांगमारी, सेटिंग-जुगाड़ दूसरों के लिए एक व्यवहारिक समाज हो सकता है लेकिन नास्तिक इसमें एक सुनियोजित आपराधिक माफ़िया को भांप सकता है।

हां, कई लोगों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति इतनी ख़राब होती है कि वे नास्तिकता को दुनियादारी में जोड़ें तो शायद उनके लिए रोज़ का खाना-कमाना मुश्क़िल हो जाए। उनकी समस्या भी समझ में आती है और सहानुभूति भी होती है। मगर ऐसे में कोई व्यक्ति अपनी डरी हुई मनस्थिति में लिए गए किसी निर्णय को सभीके लिए सिद्धांत या आदर्श जैसा कुछ बनाने की कोशिश करे, यह भी ठीक नहीं है। इससे तो लगता है कि आप इतने अहंकारी आदमी हैं कि आपको लग रहा है दुनिया में आप अकेले ही बहादुर पैदा हुए थे, आप सरेंडर कर गए तो दूसरा कोई साहसी पैदा होने की संभावनाएं ही जैसे ख़त्म हो गईं, अब किसीको इस बारे में सोचना ही नहीं चाहिए। यह क़तई अव्यवहारिक सोच है क्योंकि दुनिया में दुनिया बदलनेवाले लोग हमेशा ही पैदा होते रहे हैं और कुछ न कुछ बदलाव करते रहे हैं, कबीर, ग़ैलीलियो, तसलीमा, राजेंद्र यादव, ओशो जैसे लोग किसी संस्थाविशेष से पढ़े-पढ़ाए नहीं थे, मगर ऐसे कई लोगों ने बड़े बदलाव किए हैं या उनके लिए माहौल बनाया है, बीज बोए हैं। तसलीमा ने अपना देश छोड़ा, राजेंद्र यादव आए दिन वामपंथी ब्राहमणों के अजीबोग़रीब विवादों का शिकार होते थे, कबीर पत्थर खाया करते थे, ओशो के बारे में आधारहीन, लगभग अफ़वाहनुमां, ग़लत तथ्यों से भरे विश्लेषण(!) आज भी देखने को मिल जाते हैं। कोई भी बदलाव सेटिंग-वैटिंग करते हुए, ट्राफ़ी-ऑफ़ी जुगाड़ते हुए जवान नहीं होता। उसमें नुकसान और ख़तरे क़दम-क़दम पर साथ चलते हैं। मगर इस बदलती हुई दुनिया में जहां विचार, चेतना और तर्क नया साहस और बड़ा दायरा पा रहे हैं, बदलाव की संभावनाऐं बढ़ रहीं हैं।

मुझे नहीं लगता कि आज के माहौल में नास्तिक को घबराना चाहिए।

यूं हम लिखते ही रहे हैं कि इस ग्रुप में आकर आर्थिक फ़ायदे और टीवी कवरेज आदि के लालच में न पड़ें, बल्कि कुछ ख़तरों, कुछ ग़ाली-ग़लौच, कुछ अफ़वाहों, क़िस्से-कहानियों को झेलने के लिए हमेशा तैयार रहें। यहां से जाने का रास्ता भी 24 घंटे ख़ुला ही रहता है। संख्या की सजावट में हमारी ज़्यादा दिलचस्पी कभी नहीं रही।

व्यवहारिकता के नाम पर अगर आपको नास्तिकता के साथ खड़े दिखने में डर और नुक़सान लगता है, तो आप कभी भी विदा ले सकते हैं, हम बिलकुल बुरा नहीं मानते।

जिनको यहां कोई सार्थकता दिखाई देती है, आराम से यहां रहें।

-संजय ग्रोवर
22-04-2016


Monday, 11 April 2016

नास्तिकता सहज है

|| नास्ति दतम् नास्ति हूतम् नास्ति परलोकम् || 


यह पंक्ति मैं पहली बार पढ़ रहा हूं।

जब मैं नास्तिक हुआ तो मैंने चार्वाक या मार्क्स का नाम तक नहीं सुना था। ऐसी कोई भारतीय या अन्य परंपरा है, इसकी मुझे हवा तक नहीं थी। कोई वामपंथी पार्टी भी है, यह भी मुझे बहुत बाद में जाकर पता चला। हां, बाद में सरिता-मुक्ता फ़िर हंस जैसी कुछ पत्रिकाओं से इस विचार को बल ज़रुर मिला। मेरा मानना है कि नास्तिकता सहज स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है। धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के कुछ लोगों द्वारा। कल्पना कीजिए कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह है जहां ईश्वर का नामो-निशान तक नहीं है। ईश्वर की कोई ख़बर तक उस देश में कहीं से नहीं आती। कोई मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज, बड़े होते बच्चों को ईश्वर की कैसी भी जानकारी देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता। क़िस्सों और क़िताबों में ईश्वर का कोई ज़िक्र तक नहीं है। तब भी क्या वहां ईश्वर के अस्तित्व या जन्म की कोई संभावना हो सकती है !?

दूसरे, क्या नास्तिकता को किसी परंपरा की ज़रुरत है ? मेरी समझ में जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां कभी न कभी नास्तिकता आ ही जाएगी। चाहे ऐसी कोई परंपरा हो न हो। नास्तिकता तो ख़ुद ही परंपरा के खि़लाफ़ एक विचार है। यह तो प्रगतिशीलता, तर्कशीलता वैज्ञानिेकता और मानवता का मिश्रण है। परंपरा के नष्ट होने से नास्तिकता नष्ट हो जाएगी, ऐसा मुझे नहीं लगता। हो सकता है कि परंपरा के रहते नास्तिकों की संख्या कुछ ज़्यादा होती। पर ऐसे नास्तिक परंपरा से आए आस्तिकों की तरह ही रुढ़ और हठधर्मी होते। जिस तरह हम देखते हैं कि कई बार राजनीतिक पार्टियों के संपर्क में आने से नास्तिक हो गए लोग घटना-विशेष की प्रतिक्रिया में ठीक कट्टरपंथिओं जैसा ही आचरण करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि चूंकि हम यह आचरण घोषित कट्टरपंथियों के विरोध में कर रहे हैं इसलिए यह कट्टरपंथ नहीं, हमारी ‘वैचारिक प्रतिबद्धता’ है।

दोस्त लोग मानते हैं कि नास्तिकता किसी तरह घिसट-घिसट कर जीवित है। ऐसा शायद वे संख्या और सांसरिक/भौतिक सफ़लताओं के आधार पर तय कर लेते है। यही लोग ख़ुदको अघ्यात्मवादी भी मानते हैं। संख्या बल और भौतिक सफलता को मानक बनाएं तो इंसानियत भी एक अप्रासंगिक शय हो चुकी है और इसे भी दफ़ना देना चाहिए। और अगर आप सफ़लताओं की वजह से आस्तिकता के साथ हैं तो इसका एक मतलब यह भी है कि आप उस विचार और सही-ग़लत की वजह से कम और अपने फ़ायदे की वजह से उसके साथ ज़्यादा हैं। कलको आपको नास्तिकता में सांसरिक फ़ायदे दिखेंगे तो आप उसके गले में हाथ डाल देंगे। अगर नास्तिकता घिसटकर चल रही है और इस वजह से अप्रासंगिक है तो भैया सारी क्रांतियां और स्वतंत्रता आंदोलन भी कभी न कभी घिसटते ही हैं। घिसटने से इतना डरना या उसे हेय दृष्टि से क्यों देखना !? दलितों, अश्वेतों और महिलाओं के आंदोलन भी तो सैकड़ों सालों से घिसट ही रहे थे। आज किसी अंजाम पर पहुंचते भी तो दिख रहे हैं।

--संजय ग्रोवर
11-04-2016

24-04-2010 को ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर प्रकाशित
09-07-2010 को ‘संवादघर’ पर प्रकाशित
10-02-2014 को अंग्रेजी अनुवाद  '(W)hues Me ?'  पर प्रकाशित

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