Thursday, 20 April 2017

कौन अल्ला! कौन ईश्वर! किसने है देखा कभी

ग़ज़ल

दौर कुछ ऐसा चला है धर्म की अभिव्यक्ति का
एकता ने खून पी डाला अकेले व्यक्ति का

लूट, दंगे, अंधश्रद्धा, आपसी रिश्तों में फूट
कौन सा चेहरा है बाक़ी अब तुम्हारी भक्ति का

कौन अल्ला! कौन ईश्वर! किसने है देखा कभी
भीतरी चेहरा तो ढूंढो इस अजब आसक्ति का

आदमी बिलकुल अकेला, फिर भी ज़िंदा बाजुनून
से बेहतर और क्या परिचय मिलेगा शक्ति का

आसमां का ख़्वाब देकर कुंए में बिठला दिया
वाह क्या तुमने दिखाया रास्ता ये मुक्ति का

पत्थरों की आड़ में इतने भी मत पत्थर बनो
सच नही तो काम छोड़ो बेतुकी पुनरुक्ति का

सुनने में अच्छी लगे पर काम कुछ आती न हो
खुद बताओ यार फिर हम क्या करें उस उक्ति का

पुनरुक्ति = repetition


-संजय ग्रोवर

Monday, 3 April 2017

आर्शीवाद के अंडे

व्यंग्य

अपने देश में ऐसी चीज़ों को बहुत महत्व दिया जाता है जो कहीं दिखाई ही नहीं पड़तीं, पता ही नहीं चलता होतीं भी हैं या होती ही नहीं हैं। हम लोग कुछ पता करने की कोशिश भी नहीं करते। कई बार लगता है कि सिर्फ़ टीवी चैनल ही नहीं बल्कि आम लोग भी टीआरपी देखकर अपनी ज़िंदगी के फ़ैसले लेते हैं। आपने कई बार विजेताओं/सफ़ल लोगों को यह कहते देखा या सुना होगा कि मैं आज जो कुछ भी हूं फ़लाने के आर्शीवाद की वजह से हूं, यह पुरस्कार/ट्रॉफ़ी/मेडल मुझे ढिकानों की दुआओं की वजह से मिला है आदि-आदि। मैं सोचता हूं कि जो बेचारे दूसरे-तीसरे नंबर पर आए हैं उनके शुभचिंतकों ने आर्शीवाद कुछ कम दिया था क्या !? और जो हार गए उनके घरवालों ने क्या श्राप देकर भेजा था !? या उनका आर्शीवाद नक़ली था!? उसमें मिलावट थी!? वे क्यों हार गए ? किसी भी क्षेत्र या प्रतियोगिता में जीतनेवाले तो दो-चार ही होते हैं, हारनेवाले कई बार सैकड़ों-हज़ारों में होते हैं। इससे तो लगता है कि आर्शीवाद इत्यादि जीतने के काम कम और हारने में काम ज़्यादा आता है।

मैं तो सोचता हूं अगर आर्शीवाद और दुआओं में इतनी शक्ति है तो गुरुओं/कोच/संबंधित अधिकारियों को कहना चाहिए कि जो लोग बिना आर्शीवाद के आए हैं वे लोग नेट-प्रैक्टिस/रियाज़/अभ्यास करें और जो आर्शीवाद साथ लाए हैं उन्हें डायरेक्ट ऐंट्री दी जाती है। क्योंकि असली काम तो आर्शीवाद से ही होता है, बाक़ी चीज़े तो टाइमपास ही हैं। फ़ालतू का झंझट ख़त्म ही करो न। जिनको आर्शीवाद वगैरह पर कुछ डाउट वगैरह है उनके भी मुंह वगैरह अपनेआप बंद हो जाएंगे जब वो देखेंगे कि लोग बिना कुछ किए ही सिर्फ़ आर्शीवाद के बल पर ईनाम और सफ़लता वगैरह ले-लेकर जा रहे हैं। 

कई लोग गंभीर बीमारी या ऐक्सीडेंट के बाद जब ठीक हो जाते हैं तो डॉक्टर या विज्ञान को परे फेंककर कहते हैं कि मैं फलां जी के आर्शीवाद और ढिकां जी की दुआओं और भगवान की मर्ज़ी से ठीक हो गया हूं। इनसे पूछना चाहिए कि जब तुम्हारी टांग टूटी थी तो वो किसके आर्शीवाद से टूटी थी ? कैंसर किसकी दुआओं से हुआ था ? अटैक किसकी मर्ज़ी से आया था ? ज़रा उसके लिए भी तो फ़लां-ढिकां के दुआ/आर्शीवाद और भगवान साहब की मर्ज़ी को क्रेडिट दे दो। मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कड़वा थू!?

एक दफ़ा जब मैं घर बदलने जा रहा था तो एक प्रगतिशील परिचित ने हिदायत दी कि वहां पर पड़ोसियों से पटाकर रखना। मैंने सोचा कि पड़ोसी क्या कोई गुंडे वगैरह होते हैं जो सुबह-शाम उनकी शान में आदाब बजाना ज़रुरी है!? मैंने क्या कोई उल्टे-सीधे काम करने हैं जो इससे-उससे पटाके रखूं!? अगर ठीक काम करने हैं तो फिर डरना क्यों ? अगर ग़लत काम करुं तो सज़ा मिलनी ही चाहिए, चाहे जितना भी पटाके रखूं। पटाके रखने से क्या ग़लत काम सही हो जाएंगे!? अगर हर किसीसे पटाकर ही रखनी पड़ेगी तो फिर इतने सारे आर्शीवाद और दुआएं क्या फ़ालतू में जमा करके रखे थे!? फिर लोकतंत्र और उदारता क्या त्यौहार मनाने भर के लिए हैं !? मेरे पास वक़्त हो, काम जायज़ हो, मेरे बस का हो, मेरा मूड हो तो रास्ता चलते आदमी का भी कर सकता हूं ; ग़लत काम हो तो पड़ोसी का भी क्यों करुं!? दरअसल जो बात सिखाने की है वो यह है कि पड़ोसी से ज़बरदस्ती मत करो, पड़ोसी क्या किसीसे भी ज़बरदस्ती मत करो। अपनी उंगलियों पर थोड़ा नियंत्रण रखो।   

फिर यही लोग छाती भी पीटते हैं कि रास्तों पर कोई किसीकी मदद नहीं करता! कैसे करेगा भैया ? बीच में तुमने ही तो इतनी शर्तें लागू कर रखीं हैं-कि पड़ोसी से पटाके रखो, बुर्ज़ूगों का आर्शीवाद लो, दोस्ती पहले निभाओ.......। अब रास्ता चलनेवाला हर आदमी पड़ोसी, दोस्त, रिश्तेदार तो होता नहीं ; इसलिए लोग दूसरों को पिटता-मरता छोड़ भाग जाते हैं। पहले दर्द भी तुम्ही दे देते हो, फिर दवाएं भी अजीब-अजीब लेकर आ जाते हो!

बाक़ी दुआओं के महत्व पर आपने पुराना और प्रसिद्व गाना सुन ही रखा होगा कि ‘बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले...’ । हर शादी में सुबह-सुबह पौ-फटे यह गाना बजता था। आजकल कौन-सा गाना फटता है, पता नहीं। कई लोग रोने लगते थे। तमाम उलाईयों-रुलाईयों बावजूद लोगों को यह आयडिया नहीं आता था कि ऐसे रीति-रिवाज क्यों न बंद कर दें जिनकी वजह से सुबह-सवेरे जुकाम नाक में लटक आता है और आदमी ख़ुद भी ज़िंदगी-भर लटका ही रहता है। क्योंकि कोई भारतीय ख़ाली दुआएं लेकर नहीं टलता, अच्छा-ख़ासा दहेज भी हड़प जाता है। उसके बाद भी आए दिन क़िस्तें देनी होतीं हैं, देती ही रहनी होती हैं। उस सबके बाद दुआएं ले जानेवाली को कौन-सा सुखी संसार मिलता है, यह इसीसे पता चलता है कि आज तक वही कॉमेडी की केंद्रीय पात्रा बनी हुई है और दहेज का बाल तक बांका नहीं हुआ।

और ले लो आर्शीवाद। बटोर ले जाओ दुआएं। सुखी संसार रसोई की काली कोठरी में इंतज़ार कर रहा है।

-संजय ग्रोवर
03-04-2017

Wednesday, 22 March 2017

अपनी जान के दुश्मन

बचपन में कभी-कभी मंदिर चला जाता था। कहना चाहिए कि मंदिर तक चला जाता था। अकेला नास्तिक था, करता भी क्या !? रास्ते-भर हंसी उड़ाता जाता, दोस्त भी रास्ते-भर हंसते जाते और मंदिर जाकर सीरियस हो जाते। मैं कहता जाओ तुम लोग दर्शन करके आओ मैं तुम्हारी चप्पलें देखता हूं। उन्हें भी मालूम था और मुझे तो मालूम ही था कि भगवान इन्हें जो भी देगा, पता नहीं कब देगा, पर इनकी चप्पलें नहीं बचा सकता। चप्पलें भगवान-भरोसे नहीं छोड़ी जा सकतीं। सही बात तो यह है कि मंदिर तक भगवान भरोसे नहीं छोड़े जा सकते। मंदिरों को बचाने के लिए कई बार क़ानून का सहारा लिया जाता है, उन्हें बनाया चाहे जैसे भी गया हो।

अंदर से मंदिर तो दो-चार बार ही देखे हैं, हां रास्ते में आ जाएं तो कभी-कभी उड़ती-सी नज़र मार लेता हूं। कई मंदिर बहुत-ही छोटी-सी ज़मीन घेर कर बनाए गए होते हैं। उनमें पुजारी, आधे अंदर आधे बाहर, दरवाज़े पर ही बैठे रहते हैं। मुझे उनसे सहानुभूति होती है। मैं सोचता हूं इनकी भी क्या ज़िंदगी है ? पूरे दिन दरवाज़े पर बैठे देखते रहो, कोई आए, प्रसाद लाए तो हम उठकर उसे भगवान को चढ़ाएं। चढ़ाकर लिफ़ाफ़ा वापिस करें और फिर वहीं बैठ जाएं। अगले भक्त का इंतज़ार करो। न आए तो बैठे रहो। आए तो फिर लिफ़ाफ़ा लो, फिर चढ़ाओ।

मुझे नहीं पता मंदिर के अंदर क्या-क्या बना रहता है ? टॉयलेट, बाथरुम, डाइनिंग रुम, टीवी, वीडियो, किचेन...आदि-आदि होते हैं कि नहीं। जब भक्त नहीं आते तो पुजारी लोग क्या करते होंगे, कैसे वक़्त काटते होंगे ? एक ही जगह, एक ही पोज़ में कोई कब तक बैठ सकता है!? मैं तो पिक्चर-हॉल में भी कई बार करवट बदलता हूं। कई मंदिर तो इतने छोटे-छोटे से रहते हैं, कि उनमें करवट क्या पॉश्चर बदलने में दिक़्क़त आती होगी। हां, चेहरे के भाव ज़रुर बदले जा सकते हैं। या बदल रहे हों तो छुपाने की कोशिश की जा सकती है।

मैं कई बार बाज़ार जाता हूं, मंदिर रास्ते में पड़ जाए तो मन करता है पुजारी को उठाकर साथ ले चलूं कि भैय्या आओ ज़रा तुम भी हवा खा लो। थोड़ा घूम-फिर लो। गोलगप्पे वगैरह खा लो। क्या मजबूरी है जो इस तरह एक ही जगह बैठे रहते हो ? बोर नहीं होते ? ख़ालीपन महसूस नहीं होता ? दुनिया कहां से कहां जा रही है, तुम वहीं के वहीं बैठे हो !? समस्या क्या है!? मुझे कोई सोना दे, चांदी दे, पैसे दे, कुछ भी क्यों न दे दे, मैं तो आधे घंटे में ही बोरियत से मर जाऊं।

आखि़र पुजारी के लिए आकर्षण क्या है ? कुछ लोग पैर छूते हैं, कुछ लोग आर्शीवाद लेते हैं, कुछ लोग समझते हैं कि ये श्रेष्ठ हैं, इनमें बड़ी शक्तियां हैं! मेरी समझ से बाहर है ऐसी हालत में रहना पड़े तो श्रेष्ठता और शक्ति का फ़ायदा क्या है, अर्थ क्या है ? बिना शक्ति और श्रेष्ठता वाले लोग भी तो ऐसे ही रहते हैं, रह लेते हैं। इनमें फ़र्क़ क्या है ?

पता लगा है कि आज भी कई लोग चाहते हैं कि मंदिर-मस्ज़िद-चर्च-गुरुद्वारे ज़्यादा से ज़्यादा बनाए जाएं। मैं सोचता हूं यह भी करके देखना चाहिए। समझता हूं कि अगर दुनिया को भगवान/ख़ुदा/गॉड वगैरह ही चलाते हैं, और मंदिरों, मस्ज़िदों से ही चलाते हैं तो बाक़ी सारी चीज़ें बंद करके हमें इसी काम में लग जाना चाहिए। दुकान, मकान, घर, दफ़्तर, स्टेडियम, कार्यालय, वाचनालय, पुस्तकालय, शौचालय, विद्यालय....आदि सब छोड़कर और ज़रुरत पड़े तो तोड़कर, सब कहीं मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे आदि बना देने चाहिए। जो करना है अब कर ही डालो, कई सदियां तो निकल गई, मंदिर-मस्जिद तक पूरे नहीं बन सके!! तुमसे नहीं बन पड़ता तो भगवान/ख़ुदा/गॉड से कहो कि ख़ुद ही बना ले, तुम्हारे चक्कर में कब तक बैठा रहेगा। या उससे भी नहीं बन पा रहे!? अगर उससे इतना भी नहीं हो पा रहा तो आगे का काम कैसे करेगा !? 

बहरहाल, ये सब बना लेने के बाद इनके सामने बैठकर भगवान की आज्ञा का इंतज़ार करना चाहिए कि वो पहले कौन-सा पत्ता हिलाना चाहता है। उसकी मर्ज़ी होगी तो हम हिलेंगे वरना पड़े रहेंगे। वो नहीं चाहेगा तो हम चाहें तो भी क्या कर पाएंगे !? 

मुझे उम्मीद है कि कल सुबह जब मैं सोकर उठूंगा तो देश मंदिरों-मस्ज़िदो से भरा मिलेगा, देश में या तो भक्त बचेंगे या पुजारी। कोई अपनी बुद्धि नहीं लगाएगा, बस सब कठपुतलियों की तरह भगवान की तरफ़ से डोरियां हिलाए जाने का इंतज़ार करेंगे। अगर डोरी खिंचीं तो लोग भी हिलेंगे वरना पड़े रहेंगे।

आईए, हम सब पड़ जाएं, अभी और कई सदियों तक पड़े रहें।


-संजय ग्रोवर
22-03-2017



Sunday, 19 February 2017

इतने फूल कहां से लाओगे, प्यारे बच्चों!

प्यारे बच्चो,

अंकल को फूल ज़रुर दो लेकिन याद रखो कि तुम्हारे पापा भी किसीके अंकल हैं। और अंकल भी किसीके पापा हैं। अपने पापा पर भी नज़र रखो, कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन कोई तुम्हारा दोस्त, कोई बच्चा तुम्हारे पापा को पूरा बग़ीचा दे जाए। ज़रा अपना घर देखो, क्या यह स्वीकृत नक़्शे के हिसाब से ही बना है ? इसकी बालकनी, इसके कमरे ज़रा ध्यान से देखो। अपने पानी-बिजली के मीटर देखो, क्या यह ठीक से चलते हैं ? उससे भी पहले यह देखो कि क्या यह चलते भी हैं ? उससे भी पहले ये देखो कि क्या ये लगे भी हैं ? अगर तुम्हारा ऐडमीशन किसी जुगाड़ या डोनेशन से हुआ है तो अपनेआप को भी सड़क पर फूल भेंट करो।

यह भी देखो कि तुम्हे फूल देना किसने सिखाया ? उसकी ख़ुदकी ज़िंदग़ी में कितनी ईमानदारी है ? कहीं कोई अपनी राजनीति के लिए तुम्हारा इस्तेमाल तो नहीं कर रहा ? अगर तुम्हे लगता है कि ऐसा हो रहा है तो सबसे पहले उन अंकल को फूल दो जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए तुम्हे मिस्यूज़ कर रहे हैं। ध्यान रहे कि राजनीति यहां सिर्फ़ राजनीति में नहीं होती, घर-घर में होती है। अगर अंदर तुम अपने पापा की बेईमानियां छुपा लेते हो और बाहर अंकलों को फूल देते हो तो तुम भी राजनीति कर रहे हो। राजनीति इसीको कहते हैं मेरे प्यारे बच्चो।


सभी बच्चे अपने मां-बाप को महान समझते हैं। तुम जिन अंकल को फूल दे रहे हो उनके बच्चे भी अपने पापा को महान समझते आए हैं। तुम्हारे फूल से वो अंकल चोर से दिखने लगेंगे। तब उनके बच्चों को कैसा लगेगा ? महान लोग ऐसे होते हैं ? वैसे तुम्हे सोचना चाहिए कि सभी मां-बाप महान होते हैं तो फिर चोरी कौन करता है, भ्रष्टाचार कौन करता है, बलात्कार कौन करता है, टैक्स कौन चुराता है, लूटमार कौन करता है, मकान में से दुकान कौन निकालता है, मकान में नाजायज़ कमरे और बालकनी कौन बनाता है ? अगर मां-बाप यह नहीं करते तो क्या बच्चे करते हैं ? फिर तो बात तुम पर आ जाएगी, प्यारे बच्चो!


कहीं तुम किसीको फूल इसलिए तो नहीं दे रहे कि किसी टीवी वाले अंकल ने तुमसे कहा है कि अगर फूल दो तो तुम्हें टीवी पर दिखाया जाएगा ? इसका मतलब है कि तुम बस थोड़ी देर के लिए अच्छा और साहसी दिखने का अभिनय कर रहे हो। यह राजनीति भी है, पाखंड भी है, मौक़ापरस्ती भी है और बेईमानी भी है। इसके लिए ख़ुदको भी फूल दो और टीवी वाले अंकल-आंटियों को भी फूल दो। वैसे इतने फूल तुम लाओगे कहां से, प्यारे बच्चो !? इस तरह तो देश के सारे बाग़-बग़ीचे उजड़ जाएंगे।


मैं तो कहता हूं कि फूलों का मिस्यूज़ किसी भी हालत में नहीं होना चाहिए। और तुम तो ख़ुद ही फूल जैसे हो। 


ज़रुरी हुआ तो फिर मिलेंगे-


तुम्हारा दोस्त,

-संजय ग्रोवर
20-02-2017

Tuesday, 14 February 2017

दुआ का मतलब

‘मैं तुम्हारे लिया दुआ करता हूं’ का मतलब है-

1. कोई चमत्कार हो जाए और तुम्हारी सब समस्याएं ख़त्म हो जाएं...

2. दुआ दरअसल एक बहुत बड़ा काम है जो कि मैं तुम्हारे लिए करता हूं.....

3. मेरी सामाजिकता/ऊंगली की वजह से ही तो तुम पर मुसीबत/
बीमारी 
 आई है इसलिए मैं तुम्हारे लिए सिर्फ़ दुआ करता हूं, अगर कोई वास्तविेक काम किया तो कहीं तुम ठीक न हो जाओ।

4. दुआ मालिश/मक्खनबाज़ी/चमचागिरी/पॉलिश/भक्ति/फ़ैनियत का ही पर्यायवाची/समानार्थी शब्द है और मुझे बस यही आता है।

5. दुआ मेरे नर्सिंग होम का नाम है और मैं तुम्हे उसमें मुफ़्त में भर्ती करता हूं।

6. धरती पर तो अब कोई ढंग का आदमी(अगर कभी था) बचा नहीं इसलिए मैं आसमान की तरफ़ टकटकी लगाकर देखता हूं, शायद वहां से ही तुम्हारी समस्या का कोई हल टपक पड़े।

7. दरअसल मैं तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं करना चाहता मगर अब सामने पड़ ही गए हो, फंस ही गया हूं, इमेज अच्छी बनाए रखनी है, सबसे पटाके रखनी है, दुनियादारी निभानी है तो कुछ तो बोलना ही था......

8. इसके अलावा कुछ और.....

-संजय ग्रोवर
14-02-2017