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Sunday, 15 November 2015

सांप्रदायिकता आखि़र है क्या ?

आपको अपने उस धर्म पर गर्व है जिसे चुनने में आपका कोई हाथ नहीं।

आप अपने उस इतिहास पर इतराते फिरते हैं जिसे बनाने में आपका कोई हाथ नहीं। बनाना तो छोड़िए, उसमें कितना सही है कितना ग़लत है, यह भी आप ठीक से पता नहीं लगा सकते।

आपको अपने पुरख़ों पर गर्व है जिन्हें भी आपने नहीं बनाया। न सिर्फ़ गर्व है, बल्कि बिना किसी डी एन ए टैस्ट के गर्व है।

आपको अपने माता-पिता पर गर्व है क्योंकि वे आपके माता-पिता हैं, भले आप यह पता नही लगा सकते कि उनके आपके माता-पिता होने में आपका भी कोई हाथ है या नहीं। 

आपको अपने देश/प्रांत/शहर पर अभिमान है जिनमें आप जब पैदा हुए तो आपको अपनी चड्ढी संभालना भी नहीं आता था, यानि यह सवाल ही नहीं पैदा होता था कि आप अपनी मर्ज़ी से उन्हें चुन सकें। 

यानि कि आपको उन सब चीज़ों/परंपराओं/रिश्तों/मूल्यों पर गर्व है जिन्हें बनाने में आपका रत्ती-भर भी हाथ नहीं है, जिनकी प्रामाणिकता का भी ठीक-ठाक पता नहीं है।

तो फिर आपको उन चीज़ों/मूल्यों/रिश्तों पर तो भयानक गर्व होगा जिन्हें बनाने या चुनने में आपका भी थोड़ा-सा या ज़्यादा-सा हाथ होगा! मसलन आपका स्कूल, आपका कॉलेज, आपका प्रेमी, आपकी प्रेमिका, आपका पति, आपकी पत्नी, आपके बच्चे, आपकी नौकरी, आपका मकान, आपकी दुकान, आपके.......

अभी थोड़ी ही देर बाद आपको उदारता, सहिष्णुता, ख़ुलेपन...आदि-आदि पर भाषण देने जाना है।

पर उस भाषण में आप किसे संबोधित करेंगे !? जितने भी लोग वहां बैठे हैं सबके मां-बाप महान हैं, सबके बच्चे महान हैं, सबके धर्म महान हैं, सबके इतिहास गौरवशाली हैं, सब दुनिया के बैस्ट स्कूल में पढ़े हैं, दुनिया के सबसे अच्छे दोस्त सबको मिले हैं.... और ठीक यही स्थिति आपकी भी है।

अगर सबका सब कुछ महान है तो फिर ख़राब कौन है ? बुरा कौन है ? दुष्ट कौन है ? आप लेक्चर किसको देने जा रहे हैं !? वे सब तो ऑलरेडी महान हैं! और आपका तो कहना ही क्या ?

क्या आपको यह बात कभी भी अजीब नहीं लगी कि दुनिया का हर आदमी, अंधों की तरह, बिना किसी तर्क और प्रमाण के, ख़ुदको और ख़ुदसे जुड़ी हर चीज़ को महान और श्रेष्ठ बताएगा और फिर भी वह दूसरों को नीची नज़र से नहीं देखेगा ?

आप हर किसी पर महानता और पवित्रता की झूठी चाशनी चढ़ाने से भी बाज़ नहीं आएंगे और दुनिया में असमानता, भेदभाव और ऊंच-नीच पर भाषण भी करेंगे !?

छोड़ क्यों नहीं देते इस पोपली पवित्रता और मज़ाक़िया महानता का ढोल पीटना !?

कब तक पैदा करते रहेंगे सीज़ोफ्रीनिक/विभाजित व्यक्तित्वों की पीढ़ियां दर पीढ़ियां !?

सही बात तो यह है कि अपने धर्म, अपने वर्ण, अपनी जाति, अपने इतिहास, अपने पुरख़ों, अपने वंश, अपने स्कूल, कॉलेज, शहर, यूनिवर्सिटी, प्रांत, देश, राष्ट्र, वाद, दल.....आदि-आदि पर अंधों की तरह, बिना किसी वजह, तर्क और प्रमाण के गर्व करनेवाला एक-एक आदमी सांप्रदायिक है। 

फ़र्क़ इतना ही है कि किसकी सांप्रदायिकता किस रुप में प्रकट होती/फूटती है? कौन सामने आकर हिंसा करता है और कौन छुपकर ? कौन अपने नाम से काम करता है और कौन दूसरों के कंधों पर रखकर बंदूक चलाता है ?

कम से कम मैं तो ऐसे लोगों में शामिल नहीं हो सकता।

मेरा न कोई इतिहास है, न वंश-परंपरा है, न ख़ानदान-पानदान है, न कोई जाति है, न धर्म है।

न मुझे किसीपर कोई गर्व है, न इनके न होने की कोई शर्म है।

-संजय ग्रोवर
15-11-2015

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