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Saturday, 8 August 2015

विचारों से डरते हैं, सुबहो-शाम मरते हैं

विचारों पर रोक लगाने के कई तरीके होते हैं। कई लोग बाहुबल/पॉवर का इस्तेमाल करते हैं जो कि दिख जाता है और उससे बचा भी जा सकता है। लेकिन जो ज़्यादा शातिर लोग होते हैं वे ऐसा नहीं करते। वे अफ़वाहें फ़ैलाते हैं, झूठी शिकायतें करते हैं, सबसे बड़ी बात वे जिन रहस्यों के ख़ुलने या जिन मूल्यों के फ़ैलने से घबराए होते हैं, उन मूल्यों के वाहक दिखनेवाले नक़ली लोग खड़े कर देते हैं, या पहले ही तैयार किए होते हैं। और जब असली सफ़ल होता दिखता है तो फिर नक़ली को फुलाने और असली को छुपाने/दबाने/ग़ायब करने का खेल शुरु होता है। असली के विचारों को भोंथरा और अपने मनोनुकूल बनाकर नक़ली के नाम से प्रचारित करने का पुराना कायर तरीका काम आता है।

इसमें वे लोग भी काम आते हैं जो इन नक़लिओं के स्थायी शिकार होते हैं। आदमी के डर और लालच पर आधारित यह दुश्चक्र ही इस तरह रचा गया है कि किसी न किसी ख़ामख्वाह की हीनभावना, व्यर्थ के अपराधबोध, इतिहास में नाम करने के अजीबो-ग़रीब (लगभग ‘स्वर्ग’ में ही जाने जैसे) लालच, प्रतिष्ठा-पैसा-पुरस्कार-सेमिनार-सफ़लता से सामाजिक बदलाव के अप्रमाणिक और झूठे संतोष आदि-आदि से डरे-घबराए-ललचाए लोग इसमें शामिल होकर ख़ुदको कृतज्ञ महसूस करते हैं।

लेकिन असली आदमी के लिए इस बात का कोई महत्व नहीं होता कि इस तीतर-युद्व में किसने, किसको गिरा दिया, किसने किसकी टांग खींच ली, कौन किसे चपत मारकर भाग गया, कौन बहुरुपिया बनकर आया और असलियत ख़ुलते ही बात बदलने लगा......वैचारिक बदलाव के मामले में इन बचकानी बातों का क्या अर्थ हो सकता है ? जिसके पास विचार है, उसके पास शारीरिक बल भी हो, समूह भी हो, गुंडे भी हों, डंडे भी हों......यह कैसे संभव है!?

लेकिन सच्चे आदमी के पास/साथ एक चीज़ हमेशा रहती है-वह ख़ुद। वह जानता है कि  वह अपने साथ हमेशा खड़ा है, उसे उसकी सोच से कोई अलग नहीं कर सकता। झूठे आदमी के साथ हज़ारों लोग खड़े दिख सकते हैं पर असलियत में वह ख़ुद भी अपने साथ नहीं होता। वह इतना कमज़ोर और कन्फ़्यूज़्ड होता है कि उसे ख़ुद भी नहीं मालूम होता कि वह किस पल अपना रंग बदल लेगा। इसलिए वह चौबीस घंटे घबराया रहता है, हर जगह नज़र रखना चाहता है कि कहीं कुछ ऐसा तो नहीं हो रहा जिससे उसे कुछ नुकसान हो जाए, उसकी प्रतिष्ठा वगैरह का असली रंग दिखने लगे। ऐसे ही घबराए हुए लोग समय-समय पर ऐसी घोषणा करते दिखते हैं कि ‘फ़लां तरह के आदमी की बातें मत सुनो’, ‘ढिकां तरह के लोगों की सोच नकारात्मक है, उनके पास मत जाओ’......। ये किसीके विचारों को बैन करने के ज़्यादा शातिर तरीके हैं। तिसपर और मज़ेदार बात यह है कि ख़ुद हर जगह घुस-घुसकर, बिन बुलाए घुसकर, भेस (आजकल आईडी) बदल-बदलकर हर जगह, हर किसीकी बात सुनने में लगा रहता है। न बेचारा दिन में चैन पाता है, न रात में आराम।

यही पाखंडियों और षड्यंत्रबुद्धियों की सज़ा है जिसका इंतज़ाम उन्होंने ख़ुद ही कर रखा है। जब तक ये झूठी ज़िंदगी जिएंगे, इस सज़ा से बच नहीं पाएंगे।  

-संजय ग्रोवर
08-08-2015

( ये मेरे व्यक्तिगत विचार और अनुभव हैं, कोई इन्हें मानने को बाध्य नहीं है.)

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