Friday, 17 November 2017

खेल-खेल में

खेलों के लिए किसीको पुरस्कार दिए जाएं या साहित्य के लिए, उसके लिए नियम तोड़े जाएं या नए जोड़े जाएं, व्यक्तिगत रुप से मुझे पुरस्कार कभी भी महत्वपूर्ण नहीं लगे। विवाह और राजनीति की तरह यह भी आदमी के दिमाग़ की उपज हैं। और ऐसी सब व्यवस्थाओं पर आज सवाल उठ रहे हैं, बहुत-से लोग इन्हें नकार भी रहे हैं। फ़िलहाल, अंधविश्वासों से उबरने के प्रयासों के तहत खेलों पर बात की जाए कि इससे ‘राष्ट्र’ और ‘समाज’ को क्या फ़ायदे होते हैं:-

1. खेल देखने/खेलनेवाले व्यक्ति अपने जीवन में ईमानदार होते हैं या दूसरों से ज़्यादा ईमानदार होते हैं ?

2. खेलों में रुचि रखनेवाले व्यक्ति दहेज नहीं लेते ?

3. खेलों में रुचि रखनेवाले व्यक्ति लड़के-लड़की में भेद नहीं करते ?

4. खेलों में रुचि रखनेवाले बलात्कार नहीं करते ?

5. खेलों में रुचि रखनेवाले लाइन में लगकर काम कराते हैं (जो कि स्वानुशासन की तरफ़ एक क़दम है) ? वे मैच की टिकट कभी ब्लैक में नहीं ख़रीदते ?

6. खेल को पसंद करनेवाले लोग पर्यावरण का ख़्याल रखते हैं ? वे पेड़ नहीं काटते, पेड़ पर चढ़कर मैच नहीं देखते ?

7. खेलप्रेमी लोग अपने दफ़तर हमेशा वक्त पर पहुंचते हैं ?

8. खेलप्रेमी नियमित व्यायाम करते हैं ? व्यायाम करनेवाले सभी लोग खेलप्रेमी होते हैं ?

9. खेलप्रेमी मैच देखते समय रस्सी कूद रहे होते हैं ?

10. खेलप्रेमी अपने सभी टैक्स और बिल ईमानदारी से, सही वक्त पर चुकाते हैं ?

11. खेलप्रेमी होने के लिए भारी ख़तरे उठाने पड़ते हैं ? इसलिए ज़्यादा खेल देखनेवाले लोग ख़तरों से जूझने के अभ्यस्त हो जाते हैं ?

12. खेलप्रेमी कभी सट्टा नहीं खेलते, पैसे के लेन-देनवाली शर्त्तें नहीं लगाते, फ़िक्सिंग का तो उन्होंने नाम तक नहीं सुना होता।

13. मैच देखने से आदमी में न्याय, ईमानदारी और समानता का भाव पैदा होता है, ऊंच-नीच ख़त्म होती है ?

यह चीज़ों की वास्तविकता को समझने का एक छोटा-सा प्रयास है। हो सकता है यह बिलकुल ग़लत हो, हो सकता है काफ़ी हद तक सही हो। आप अपनी तरह से इसे आगे बढ़ा सकते हैं। खेलों से संस्थाओं इत्यादि को आमदनी होती है, इतना ज़रुर समझ में आता है। मगर क्या यह इतनी बड़ी बात है कि खिलाड़ियों को सबके सिर पर बिठा दिया जाए ? पैसा तो कोई भी तमाशा खड़ा करके कमाया जा सकता है।

आपकी तार्किक प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। आप इसमें नए सवाल जोड़ सकते हैं। इसी क्रम में किसी दिन पुरस्कारों की ‘उपयोगिता’ पर भी बात करेंगे।

-संजय ग्रोवर

17-11-2013 ( on facebook )

Wednesday, 15 November 2017

संघियों/कट्टरपंथियों/अंधविश्वासियों/बहुरुपियों की पहचान-

1. किसी न किसी तरह धार्मिक स्थलों का प्रचार-प्रसार करते हैं, ख़ुद जाना पड़े तो ख़ुद भी चले जाते हैं।

2. प्रगतिशील लोगों के नाम पर भी मंदिर बना देते हैं, और वहां जा-जाकर भी विचारों को पूजा-पाठ में बदलने का शर्मनाक खेल खेलते रहते हैं।

3. दहेज न सिर्फ़ लेते-देते हैं बल्कि दहेजवाली शादियों में जा-जाकर लोगों को ऐसा करने के लिए दुष्प्रेरित करते हैं।

4. तरह-तरह के गुट-दल-संस्थाएं आदि बनाकर पूरे समाज को अपने अनुकूल बनाए रखने की कोशिश करते हैं।

5. स्वतंत्र व्यक्ति को तरह-तरह से सताते हैं, डराते हैं, उसे किसी-न-किसी तरह, किसी-न-किसी धर्म से जुड़ा दिखाने की कोशिश करते हैं।

6. त्यौहार न मनानेवाले, कर्मकांडों में विश्वास न करनेवाले, बिना किसी संस्था-दल-गुट से जुड़े अपने दम पर और जेनुइन लोगों को ढूंढ/जोड़कर स्वतंत्र रुप से समाज बदलने का काम करनेवालों को बदनाम करते हैं, परेशान करते हैं, डराते हैं।

7. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ऐसे विरोधियों को जो डायरियों/संस्मरणों/आत्मकथाओं/संपादकीयों/लेखों यानि जिस तरह के लेखन में स्पष्ट और खुले सच की उम्मीद हो, का विरोध करते हों, को बढ़ावा देते हैं और ऐसा स्पष्ट और खुला सच लिखनेवाले को बदनाम करते हैं, उनके विचारों और क़िताबों को लोगों तक पहुंचने से रोकते हैं।

8. कविता, कथा, कहानी यानि कि गल्प/गप्प/फ़ैंटसी लिखनेवालों को प्रोत्साहित/पुरस्कृत करते हैं जिनकी रचनाएं इस क़दर प्रतीकबाज़ी से भरी होतीं हैं कि उनके एक ही समय में कई मनमाने/अवसरानुकूल अर्थ निकाले जा सकते हैं। इनके कार्यकर्ता अपने विरोधियों/स्वतंत्र लोगों की माफ़िक न आनेवाली बातों का ग़लत अर्थ फैलाते हुए आम देखे जा सकते हैं।

9. जब भी इन्हें लगता है कि लोगों को पता चल गया है कि समाज में विभिन्न पदों/जगहों पर इन्हींके बेईमान लोग तरह-तरह की अच्छी शक्लें/इमेजें बनाए बैठे हैं, आपस में झगड़ने का ज़ोरदार ड्रामा करते हैं।

10. किन्हीं दो घटनाओं/चुनावों के बीच समाज की स्मृति मिटाने की कोशिश करते हैं जिससे कि लोगों को यह पता न चल सके कि हर समय में हर जगह पर एक ही तरह के लोगों/बेईमानों का क़ब्ज़ा रहता है।

11. समाज को बेहूदी बहसों में अटकाएं रखते हैं मसलन मरने के बाद आदमी को टेढ़ा लिटाया जाता है कि आड़ा, खड़ा लिटाया जाता है कि बैठा, अंतिम संस्कार भाई करेगा या बेटा, स्त्री करती है या पुरुष। बाद में यही बातें व्यक्तियों/समूहों/संप्रदायों/गुटों/परिवारों/देशों में झगड़े का आधार बन जातीं हैं।

12. अच्छाई के नाम पर लोगों को प्रतीकों, कर्मकांडों, त्यौहारो में फंसाए रखते हैं बिना यह समझे कि रक्षाबंधन मनानेवाले कितने भाईयों ने आज तक बहिनों की रक्षा की ? लोग भी ख़ुशी-ख़ुशी फंस जाते हैं क्योंकि सच बोलकर भीड़ से पंगा लेने से कहीं आसान होता है अच्छाई के नाम पर कोई नाटक/अभिनय करके अपने ही जैसे लोगों की तारीफ़ पा लेना।

13. किसी-न-किसी बहाने अपने गुटों/धर्मों/परिवारों/वंशों/जातियों से जुड़े अतीत/इतिहास की तारीफ़ में लगे रहते हैं बिना इस मामूली से तथ्य को समझे कि अतीत/इतिहास को बनाने में इनका कोई भी हाथ/योगदान नहीं होता बल्कि ये बाई चांस उससे जुड़ गए होते हैं। ये सचमुच ही उस अतीत/इतिहास से जुड़े हैं जिसको ये अपना मान/समझकर लड़-मर रहे हैं/जान दे रहे हैं, अकसर इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण भी नहीं होता।

14. संघ/ कट्टरपंथ/अंधविश्वास/पाखंड जितना अपनी संस्थाओं/गुटों/दलों के अंदर है उससे कई गुना ज़्यादा दूसरी संस्थाओं/गुटों/दलों और समाज की आदतों/रीति-रिवाजों/कर्मकांडों/अंधविश्वासों/बेईमानियों/मानसिकता में फैला हुआ है। जब तक समाज बेईमान, पाखंडी, दोमुंहा, तानाशाह है, संघ/ कट्टरपंथ/अंधविश्वास/बहुरुपिएपन को ख़त्म नहीं किया जा सकता। समाज क़ाग़ज़ के पुतले जलाने यानि कर्मकांड और प्रतीकबाज़ी से नहीं बदलता बल्कि जिन्हें यथास्थिति बनाए रखनी हो वही ऐसे कर्मकांडो का आविष्कार कर लेते हैं। 

-संजय ग्रोवर
14/15-11-2017