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Thursday, 31 December 2015

रंगो और प्रतीकों का चालू खेल-1

शाहरुख़ खान की फ़िल्म ‘दिलवाले’ का ‘रंग दे तू मोहे गेरुआ’ देखकर मुझे आमिर खान की ‘रंग दे बसंती’ याद आ गई (आप कहेंगे निर्देशकों के नाम क्यों नहीं लिखे तो मैं कहूंगा कि फ़िल्म के प्रोमोज़ में हीरो-हीरोइन को जिस तरह आगे किया जाता है और बातचीत की जाती है कि लगता है फ़िल्म उन्हींने बनाई है, सो निर्देशक याद ही नहीं रह पाता)। फ़िल्म में बसंती रंग से जुड़े किन्हीं दबंगों की ख़बर ली गई थी और साथ में फ़िल्म के नाम और कथ्य में इसी रंग को महिमामंडित भी किया गया था। इसीसे मुझे याद आया कि तथाकथित भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ रामदेव से शुरु होकर अन्ना हज़ारे तक पहुंचे तथाकथित आंदोलन के इंटरवल के दौरान आमिर खान ने ही मंच पर आकर, बाक़ायदा टोपी लगाए हुए अपना रोज़ा खोला था और अन्ना हज़ारे को जूस वगैरह पिलाकर अनशन वगैरह ख़त्म कराया था। बाद में इन्हीं आमिर की ‘पीके’ आ गई जिसमें धार्मिक प्रतीकों की हंसी उड़ाई गई थी। 

ऐसे विरोधाभास हमारे जीवन में कोई एक दिन की नहीं, बल्कि आए दिन की बात है। 

बाद में यह भी कहा गया कि अन्ना हज़ारे बीजेपी के आदमी हैं और केजरीवाल प्रगतिशील हैं। और तथाकथित प्रगतिशीलों की एक पूरी की पूरी फ़ौज केजरीवाल के पीछे खड़ी दिखाई देने लगी। मैं बहुत चक्कर में पड़ गया। भगवान-भगवान, अनशन-अनशन, चमत्कार-चमत्कार रामदेव भी कर रहे थे, अन्ना भी कर रहे थे और केजरीवाल भी कर रहे थे। फिर इनमें से कोई कट्टर, कोई मध्यमार्गी और कोई प्रगतिशील कैसे हो गया !? इस हिसाब से तो आमिर खान बीजेपी के आदमी हुए! या वे किसी ग़लतफ़हमी में अन्ना का अनशन तुड़वा आए थे!? या यह कोई फ़िल्म चल रही थी जिसमें सबके जुड़वां और डुप्लीकेट काम कर रहे थे इसलिए कुछ मालूम नहीं हो पा रहा था कि कौन क्या है, किसके लिए काम कर रहा है, काम कर रहा है या काम का नाम करके अपना नाम कर रहा है !?

ख़ैर मुझे इन आंदोलनों से यह लाभ हुआ कि कई उलझी पहेलियां सुलझ गईं। 

रंगों, प्रतीकों, धर्मों, धारणाओं, जातियों, कर्मकांडों...... आदि का मिला-जुला प्रभाव ही ऐसा है कि जब तक आप इनके ज़रिए आदमी को समझने की कोशिश करते रहते हैं, बार-बार धोखा खाते हैं। यह हमारी मूर्खता है कि हमें कोई आदमी सीधे ही समझ में आ रहा होता है फिर भी हम उसे किसी गमछे, टोपी, मफ़लर, टाई, नाम, डिग्री, प्रोफेशन, सलाम, नमस्ते....यानि किन्हीं मान्यताओं और परिभाषाओं में बांध-बांधकर समझने में लगे रहते हैं। हमारी आंखों देखी बात होती है कि भगतसिंह, कबीरदास, विवेकानंद जैसे नामों का इस्तेमाल कई परस्पर विरोधी विचारधाराओं के लोग एक साथ कर रहे होते हैं, फिर भी हम अपनी पसंद या मजबूरी के हिसाब से उनमें से किसी एक को संबंधित महापुरुष का सच्चा अनुयाई, समर्थक या उत्तराधिकारी मान लेते हैं तो दूसरे को उस नाम का नाजायज़ फ़ायदा उठानेवाला चालू आदमी कह लेते हैं। 

क्या रंगों और प्रतीकों को उस तरह बांटा जाना चाहिए जैसे बांट लिया जाता है ? कौन है जो इन्हें बांटने का अधिकारी है, इनका मालिक है ? कौन है जो कहता है कि गाय मैं फलाने के नाम करता हूं, भैंस आज से ढिमकाने की हुई, तोता चमकानेलाल का हुआ और सांप धमकानेप्रसाद का हुआ ? कौन है जो लाल-पीला-नीला-हरा रंग लोगों को अलॉट कर रहा है ? किसने उसे ये अधिकार दिए हैं ? अगर रंगों और प्रतीकों को कुछ लोगों और समूहों को आवंटित कर दिया गया है तो बाक़ी लोग उनका इस्तेमाल करना छोड़ दें क्या!? मसलन मुझे अगर किसी दिन नारंगी रंग का इस्तेमाल करना हो तो पहले तो मैं यह पता लगाने जाऊं कि किसीने इसपर क़ब्ज़ा तो नहीं कर रखा ? और जब मुझे मालिक़ का पता चल जाए तो में ऐप्लीकेशन भेजूं कि भाईसाहब, आज ज़रा नारंगी शर्ट पहनने का मन हो रहा था, आप कहें तो पहन लूं, वरना क्या ऐसे ही निकल जाऊं ? हरा रंग इस्तेमाल करना हो तो उसके मालिक़ के पास जाऊं कि भाईसाहब ढाई सौ ग्राम हरा रंग चाहिए था ज़रा, अकेले आप की ही दुकान है जिसे इस रंग का ठेका मिला हुआ है, इसलिए आपको परेशान किया वरना कहीं और से ले लेता ! रंगों और प्रतीकों पर जिस हास्यास्पद गंभीरता के साथ तरह-तरह की विचारधाराओं ने क़ब्ज़ा कर रखा है उससे नतीजा यह निकलता दिखाई देता है कि भारत में शादी के दिन ज़्यादातर लड़कियां कम्युनिस्ट हो जातीं हैं क्योंकि ज़्यादातर ने उस दिन लाल जोड़ा पहन रखा होता है। 

कम्युनिस्टों के तो मज़े हो गए, उन्हें तो कुछ करने की ज़रुरत ही नहीं रही।


(बचा-ख़ुचा)

-संजय ग्रोवर
31-12-2015


Wednesday, 23 December 2015

मनुवाद, इलीटवाद और न्याय


जो लोग अपेक्षा को अपेक्षा बोलते रहे, उनका भी रिकॉर्ड देखना चाहिए था। क्या अपेक्षा को अपेक्षा बोलते ही फ़्लाईओवर अपने-आप बन जाते हैं, सड़क के गड़ढे ख़त्म हो जाते हैं, किसान आत्महत्या बंद कर देते हैं ? उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश से आनेवाले कितने ही बुद्धिजीवियों को मैंने श को स, व को ब, क्ष को च्छ बोलते सुना है। फ़िल्मकार और ऐडगुरु अकसर ग़लत हिंदी बोलते हैं। मगर भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ चले सरकसनुमां आंदोलन के बाद जिन लोगों को सारे भारत में अकेले लालूप्रसाद ही भ्रष्टाचारी, और चुनाव न लडने लायक भ्रष्टाचारी नेता नज़र आए (और किसी बड़े(?) नेता के चुनाव लड़ने पर पाबंदी हो तो बताएं) उनके घर से कोई अपेक्षा को उपेक्षा बोल दे तो इनके लिए तो बम ही फटा समझो।

फिर राजेंद्र यादव को भी याद करें, जिन्होंने स्त्रियों और वंचितों के संदर्भ में हिंदी साहित्य का परिदृश्य ही बदल डाला, उन्हें भी कई महानात्माएं तरह-तरह से स्त्री-विरोधी साबित करने में लग गई। अंतिम दिनों में तो कई महापुरुष और महामहिलाएं मिल-जुलकर उन्हें हिंदूवादी ही साबित करने में लगे हुए थे। वे तो निकल लिए वरना इन्होंने कर ही देना था। अपने अनुसार न होने वाले व्यक्ति को सभी अच्छे बदलावों का विरोधी घोषित करने में इन अति-ऐक्सपर्ट, छुपे हुए मनुवादियों को महारत हासिल है जिसमें दूसरों की मूर्खता का भी क़ाबिले-ज़िक्र योगदान है। वरना सोचने की बात यह है कि जो लोग पूरे प्राणपण से राजेंद्र यादव को स्त्रीविरोधी और देहवादी साबित करने में लगे रहे उन्होंने इससे पहले और बाद में ऐसे अन्य कितने साहित्यिक मर्दों के खि़लाफ़ आंदोलन चलाए !? देशकाल डॉटकॉम पर मैंने राजेंद्र यादव से इस संदर्भ में पूछा था और उन्होंने धर्मवीर भारती और कमलेश्वर के ऐसे प्रसंग बताए थे कि किस तरह उनसे स्त्रियां/पत्नियां पीड़ित थीं मगर उनका ज़िक़्र कोई नहीं करता था। मनुवादी व्यवस्था का यह चेहरा भी समझने जैसा है कि अगर पुरुष अपना है तो पुरुष का सब कुछ ठीक है और अगर स्त्री अपनी है तो फिर सामनेवाला पुरुष दोषी है। दरअसल किसने क्या किया, वो सब जाए भाड़ में!


(यह स्तंभ अब इस साइट से ग़ायब है, मेरी अन्य कई रचनाएं भी ग़ायब हैं। एक व्यंग्य मौजूद है लेकिन उसमें से भी नाम ग़ायब है। यह मेरे साथ किसी न किसी रुप में चलता ही रहता है। इस बारे में अलग से लिखूंगा। बहरहाल, मैंने जो स्क्रीन शॉट लिये थे, आप उसमें पढ़ सकते हैं। 16-02-2017)

अब कुछ लोग इस लड़के पर अपना सारा न्याय और स्नेह उड़ेले दे रहे हैं। लगता है कि भारत में बलात्कार इसी लड़के की वजह से शुरु हुए और यह बाहर रहा तो देश में तबाही आ जाएगी। जिन लोगों के आस-पास रोज़ इस या उस वर्ग के हाथ-पांव सरेआम काट देने के भाषण चलते रहे हों, उन्हें सारा ख़तरा इसी लड़के में दिखाई देने लगे, तो यह अजीब बात है। जैसे कि बाहर सड़क पर, इससे पहले और इसके बाद सब पवित्र और महान आत्माएं ही घूमती रहीं हों!


लड़के को और समाज को ठीक करना है तो पहले तो यह पता लगाना चाहिए कि वह ऐसा बना क्यों आखि़र ? उसके मां-बाप कैसे थे, उसके टीचर क्या सिखाते थे, दोस्त किस तरह की बातें करते थे, भाई-चाचा-मामा किस तरह के पुरुष को बेहतर मानते थे ; भाभियां, चाचियां, बहिनें, मांएं क्या बतातीं थीं कि स्त्रियां किस तरह के पुरुष को पसंद करतीं हैं ; वो जो अख़बार पढ़ता था, वो क्या-क्या छापते थे और उसे क्या अच्छा लगता था ; जो फ़िल्में वो देखता था, क्यों देखता था, उनसे क्या प्रेरणा उसे मिलती थी ; जो कॉमेडी शो उसे पसंद थे उनके कॉमेडी-प्रमुख स्त्रियों की किन बातों की हंसी उड़ाते थे ; जो न्यूज़-चैनल उसे पसंद थे, वहां काम करनेवाले पुरुष और स्त्रियां हास्यकवियों की किस तरह की कविताओं पर ज़्यादा हंसते थे.......


क्या उस लड़के ने सब कुछ ख़ुद-ब-ख़ुद सीख लिया था ? क्या वह यही सोचकर पैदा हुआ था ? संजय दत्त, सलमान ख़ान, शाइनी आहूजा, मधुर भंडारकर, सूरज पंचोली के क़िस्से हम देखते रहे हैं। एक बात तो पक्की है कि इनमें से कोई भी नाबालिग नहीं था।


लड़के को किसी ऐसी जगह भी तो रखा जा सकता हैं जहां वह क़ैद भी न हो और लगातार मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों, समाजविज्ञानियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, चिंतकों की नज़र और असर में रहे। जो उसके ज़रिए यह पता लगाने की कोशिश करें कि इतनी कम उम्र में बच्चों में ऐसी प्रवृत्ति कैसे विकसित हो जाती है !?


अब यह तथ्य लोग जानने लगे हैं कि किसी केस पर पब्लिक का रिएक्शन कैसा हो, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि मीडिया उसे कैसे पेश करता है।


वंचित वर्गों की स्त्रियों से आए दिन बलात्कार होते हैं। कोई पूछने भी नहीं जाता।


-संजय ग्रोवर
23-12-2015



Sunday, 20 December 2015

धर्म

लघुव्यंग्य

एक बच्चे को, पैदा होते ही, उसके घरवालों ने पैजामा पहना दिया, और उसे पैजामा-पैजामा बुलाने लगे।

बड़ा होता बच्चा इससे परेशान होने लगा तो ऐतराज़ करने लगा कि सर से पांव तक पैजामा चढ़े होने की वजह से खाने-पीने-पहनने-बात करने, हर काम में परेशानी होती है।

मां-बाप बोले कि ये पैजामा नहीं है, ये तुम हो, इसके बिना तुम्हारा कोई मतलब नहीं है, दूसरे बच्चों को देखो-वो भी तो कोई चड़ढी है, कोई पतलून है, कोई शर्ट है, कोई लुंगी है, कोई धोती है, कोई ब्लाउज़ है......

बच्चे ने देखा, चारों तरफ़ आदमक़द चड्ढियां, साड़ियां, धोतियां, ब्लेज़र, ट्राउज़र्स वग़ैरह कांए-कांए करते घूम रहे थे।

बच्चा घबरा गया, या कहने को कह सकते हैं कि प्रभावित हो गया, समझ गया और उसने समर्पण कर दिया।

अब चारों तरफ़ प्रभावित पैजामे हैं, चड्ढियां हैं, बनियाने हैं......

इनमें से किसीको भी नहीं मालूम कि जब ये पैदा हुए थे तब ये सब इंसान थे।

-संजय ग्रोवर
20-12-2015

Monday, 14 December 2015

भगवान के दूत

व्यंग्य

राजधानी का एक संपन्न इलाक़ा जहां कुछ ग़रीबों को भी ‘बिज़नेस’ करने की अनुमति है। बिज़नेस मायने ग़ुब्बारे बेचना, मिट्टी के सस्ते खि़लौने बेचना, भीख मांगना या कुछ ऐसे ही और छोटे-मोटे काम करना।

एक बड़ी और सुंदर गाड़ी। एक हृष्ट-पुष्ट लड़का उतरता है। उसके हाथ में 500-500 रु. के कुछ नोट हैं। उतरकर फ़ुटपाथ पर जाता है जहां एक फ़टेहाल पगली खड़ी आसमान से बातें कर रही है।
‘आप भगवान को मानतीं हैं?’ हृष्ट-पुष्ट लड़का पूछता है।
‘.............’
‘‘मुझे भगवान ने भेजा है, यह लो‘‘, वह 500रु. का एक नोट पगली के हाथ में थमा देता है।
पगली ख़ुशी से नाचने लगती है। उसके कपड़े फ़टे हैं, फ़ुटपाथ पर, और उससे पहले न जाने क्या-क्या सहती आई है मगर नाच रही है। पगली जो है।
हृष्ट-पुष्ट लड़का मन ही मन नाच रहा है। इसने पगली जैसा कुछ नहीं सहा, यूं भी अकसर नाचता ही रहता है। दोनों भगवान को मानते हैं।

यह लड़का एक ग़रीब ग़ुब्बारेवाले के पास पहुंचता है-
‘‘आप भगवान को मानते हैं?’’
‘‘हां, मानता हूं, बहुत मानता हूं।’’
‘‘यह लो 500रु., मुझे भगवान ने भेजा है।’’
ग़ुब्बारेवाला पल-भर सकुचाता है, फिर स्वीकृति के भाव से नोट ग्रहण करता है।

हृष्ट-पुष्ट लड़का इसी तरह कुछ और नोट भगवान को माननेवाले ग़रीबों को बांटता है।

एक फ़टेहाल लड़का अख़बार बेच रहा है।
हृष्ट-लड़का उसके भी पास पहुंच गया है-
‘‘आप भगवान को मानते हैं?’’
अख़बारवाला लड़का उसका मुंह देखने लगता है।
हृष्ट-पुष्ट थोड़ी अड़चन में है। पहली बार उसे अपना सवाल दोहराना पड़ रहा है।
‘‘आप भगवान को मानते हैं ?’’
‘‘.....मानता हूं...तो ?’’
‘‘यह लीजिए, मुझे भगवान ने भेजा है।’’
‘‘ओह! अच्छा! भगवान ने आपको क्यों भेजा!? वह ख़ुद क्यों नहीं आया ?’’
‘‘.............’’
‘‘मुझे भगवान से मिलना है...सुनिए...रुकिए तो सही...मुझे भगवान से मिलना है..’’
‘‘भगवान हर जगह ख़ुद नहीं जा सकते, उन्होंने तुम्हारे लिए मुझे भेजा है।’’
‘‘क्यों, तुम्हारे पास आ सकते हैं तो मेरे पास क्यों नहीं आ सकते?’’
‘‘देखिए आप यह हज़ार रुपए रखिए, मुझे औरों के पास भी जाना है, मैं चलता हूं...’’
‘‘नहीं...मैं आपको ऐसे नहीं जाने दूंगा....यहां राजधानी में ऐसे भी फ्रॉड बहुत होते हैं...आपको सबूत देना होगा कि आपको भगवान ने भेजा है...’’
‘‘..........मगर मैं ऐसा क्यों करुंगा...मैं कुछ दे ही रहा हूं, कुछ ले तो नहीं रहा?’’
‘‘क्या पता तुमने कहीं छुपा कैमरा लगा रखा हो ? बाद में इसे इधर-उधर अपलोड करके हीरो बनते फिरोगे। अपने-आपको श्रेष्ठ साबित करोगे। लड़कियों को इम्प्रैस करोगे। पांच-दस हज़ार रुपए ख़र्च करना तुम जैसों के लिए मामूली बात है......’’
‘‘......................’’
‘‘तुम तो एकदम चुप हो गए?’’
‘‘आप मेरा हाथ छोड़िए....देखिए हम सब एक ही भगवान के बनाए हुए हैं.....उन्होंने मुझे देने के लिए चुना है और तुम्हे लेने के लिए......’’
‘‘पर मुझे तो भगवान बताने आया नहीं कि उसने मुझे पैसे लेने के लिए चुना है !?’’
‘‘...........’’
‘‘तुम जवाब क्यों नहीं दे रहे? ठहरो! तुम्हारी शक़्ल तो उस आदमी से मिलती है जो टीवी पर कह रहा था कि कोई नेता अगर ग़रीब जनता से रुपए या दारु देकर वोट मांगे तो बिलकुल मत देना......कमाल है! अगर तुम वही हो तो ख़ुद कितना गिरा हुआ काम कर रहे हो!?’’
‘‘देखिए......’’
‘‘मुझे भगवान से पूछना है कि इन हज़ार रुपयों से मेरा क्या काम हो सकता है, बाक़ी सारी ज़िंदगी मैं क्या करुंगा? सुनो, तुमने कहा हम दोनों तो एक ही भगवान के बनाए हुए हैं। ऐसा करो, तुम अपना गाड़ी और घर मुझे दे दो, मैं वहां रहूंगा, तुम यहां अख़बार बेचो......’’
‘‘नहीं, मैं अख़बार नहीं बेच सकता, मुझे अपना काम पूरा करना है......’’
‘‘लेकिन मुझसे भगवान ने कहा है कि जो लड़का तुम्हे पांच सौ रुपए देने आएगा उसके गाड़ी और घर तुम ले लेना, और उसे यहां अख़बार बेचने को खड़ा कर देना......’’
‘‘..........’’
‘‘कमाल है! तुम कुछ बोल ही नहीं रहे....मैं तो तुम्हारे भगवान की इच्छा मान रहा हूं, तुम मेरे भगवान की इच्छा क्यों नहीं मान रहे......मैं पुलिस को बुलाऊं क्या?’’
‘‘................................’’

अख़बार वाले लड़के ने हृष्ट-पुष्ट लड़के का हाथ पकड़ा हुआ है और बात-चीत जारी है.......

(मजबूर लोगों में पैसे बांटकर भगवान को सिद्ध करने की चेष्टा करने का एक हास्यास्पद वीडियो देखने के बाद लिखा गया)

-संजय ग्रोवर
23-09-2014

('पागलख़ाना' से साभार)


Sunday, 13 December 2015

महत्वाकांक्षा और आतंक

1-दीवारों के कान महान!

कुछ लोग दूसरों को इतना डराते क्यों हैं !?


ज़रा आप किसी मशहूर(), सफ़ल(), बड़े() आदमी का नाम लेकर कुछ कह दो, लिख दो, ये आपकी जान को पड़ जाते हैं कि ‘तुम्हारी औक़ात क्या है, तुम उसके सामने बेचते क्या हो, तुमने चांद पर पत्थर मार दिया, आसमान पर थूक दिया.....

कोई किसी पढ़े-लिखे आदमी से कुछ कह दे तो भी यही कि अबे! तुम जानते क्या हो, जानते नहीं कितना ज्ञानी आदमी है, यहां भाषण देता है, वहां सेमिनार में जाता है, कितनी नॉलेज है अगले की...

आप किसी लेखक के कहे पर कुछ कह दो, किसी फ़िल्मस्टार की कोई ग़लती बता दो, किसी पुराने-धुराने कवि की धूल झाड़ दो, किसी महापुरुष की महानता को अगरबत्ती की जगह मोमबत्ती दिखा दो, किसी आयकन-फ़ायकन को सर-वर कहकर संबोधित न करो....ये एकदम से सांड की तरह भड़क जाते हैं (सही बात यह है कि सांड को भड़कते तो मैंने कभी देखा ही नहीं, इन्हीं को देखकर अंदाज़ा लगा लेता हूं)। इनमें कुछ बिचौलिए टाइप के लोग होते हैं जो एकदम तड़पने लगते हैं कि तुम अपना नाम करने के लिए ‘बड़े’ नामों का इस्तेमाल करते हो.....

दिलचस्प तथ्य यह है कि यही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्ति की समानता के भी चाचा-मामा बने बैठे रहते हैं। भईया या तो समानता ही ले आओ या फिर चमचई ही निपटा लो.....। समानता बड़ा-छोटा नहीं देखती, इसमें सब इंसानों को एक से अधिकार होते हैं, समानता में बड़ा-छोटा होना भी क्यों चाहिए!? अज्ञात शायर का शे‘र है कि-

इश्क़ में ज़ख़्म सब बराबर हैं,
इसमें छोटा-बड़ा नहीं होता.  

जहां तक मेरी बात है, मैं अमूमन लोगों के नामों के ज़िक़्र से बचता हूं, बहुत ज़रुरी लगने पर ही नाम लेता हूं, मेरा उद्देश्य व्यक्तियों पर कम और प्रवृत्तिओं पर बात करने का ज़्यादा रहता है। दूसरे, मुझे यह भी लगता है कि किसीका नाम लेने से उसे फ़ायदा ही होता है, हमें हो न हो। जब मैं छोटा-बड़ा मानता ही नही तो किसीका नाम लेकर ख़ामख़्वाह उसे ‘बड़े’ होने की ग़लतफ़हमी या ख़ुशफ़हमी क्यों गिफ़्ट करुं ? जो लोग नाम के लिए कुछ भी करते फिरते हैं, उनमें से बहुत-से लोग तो कहीं भी, कैसे भी नाम लिए जाने पर ख़ुश ही होते होंगे ; हम मुफ़्त में उनका नाम क्यों करते फिरें !?

आप अपनी फ़िल्मों, कहानियों, कार्टूनों, अन्य रचनाओं के ज़रिए समाज और व्यक्तिओं पर तरह-तरह की टिप्पणियां करते हैं, बदले में कोई आप पर अपनी राय व्यक्त कर देता है तो उसमें इतना घबराने की क्या बात है !? 

और आप इतना डराते क्यों हैं लोगों को !? कि इस क़िताब में दस ‘बड़ेे’ लोगों ने भूमिका लिखी है इसलिए इसपर किसीको बोलने का हक़ नहीं है। इस फ़िल्म की पहले दिन की कलैक्शन इतने करोड़ है इसलिए सब चुप रहो। यह आदमी कई विदेश-यात्राएं कर चुका है इसलिए चुप! उस आदमी के ढाई करोड़ फ़ैन हैं इसलिए चुप! उस आदमी को पच्चीस पुरस्कार मिल चुके हैं इसलिए चुप! 

चुप! चुप! चुप! चुप रहो बे!

समझ में नहीं आता कि आप लोग लेखक, कलाकार और मशहूर आदमी हैं या डरावने और आतंकवादी टाइप के आदमी हैं !? 

लोगों को इतना डरा-डरा कर नाम करने में और बड़ा बनने में आखि़र अच्छा और बड़ा बचता क्या है !?

-संजय ग्रोवर
13-12-2015


  

दीवारों के कान महान!

कहते हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं।

किसने यह मुहावरा बनाया होगा !?

यही लोग तो संवेदनहीन आदमी की तुलना दीवारों और पत्थरों से करते हैं। दीवार और पत्थर ठोस हैं, ठस हैं, उनमें कहीं नरमी नहीं है। संभवतः इसीलिए अमानवीयता के बारे में बताने के लिए उनका उदाहरण दिया जाता है। 

उनके कान कैसे हो सकते हैं!?

फिर ये कान किसके हैं!?

लगता है यह कहावत उन लोगों ने गढ़ी है जो इमेज में जीते हैं, जो नाम के लिए जीते हैं, मशहूरी के लिए जीते हैं, ‘बड़े’ कहलाने के लिए जीते हैं। वे लोग जानते हैं कि हमेशा एक जैसा रहना मुमक़िन नहीं है; अच्छा और महान दिखना आसान है, होना आसान नहीं है। सच तो यह है कि महानता की कोई स्पष्ट परिभाषा ही नहीं है, पता नहीं कौन-से इंचटेप से लोग इसे नाप लेते हैं ! लेकिन तथाकथित महान लोग शायद जानते हैं कि महानता जो कुछ भी होती हो, चौबीस घंटे संभव ही नहीं है इसलिए महान आदमी की इमेज बनाओ, जब भी हम नॉन-महान यानि गंदी हरक़तें करेंगे, यह इमेज हमारी रक्षा करेगी।

यथार्थवादी व्यक्ति किसी काल्पनिक महानता की चिंता में कैसे जी सकता है !?

इमेज में जीनेवाले को स्वभावतः इमेज टूटने का ख़तरा हर पल सताएगा, क्योंकि उसका सब कुछ इमेज में बंधा है। इमेज गई तो सब गया। नाम बिगड़ जाएगा तो ज़िंदगी बिगड़ जाएगी। ज़ाहिर है कि उसे ऐसे एक-एक आदमी से डर लगेगा जो उसकी इमेज के लिए ख़तरा हो सकता है। ऐसा आदमी हर पल असुरक्षा की भावना में जिएगा। कहीं दूरदराज़ किसी कोने में कोई आदमी कोई ऐसी बात कह रहा है जो उसकी इमेज के लिए, नाम के लिए नुकसानदायक है, असुरक्षा की भावना से ग्रस्त आदमी के कान खड़े हो जाएंगे, उसे डर लगने लगेगा। यह डरा हुआ आदमी हर जगह अपने कान लगाए बैठा रहेगा, यह दीवारों, खिड़कियों और रोशनदानों में लटका रहेगा क्योंकि इसे अपनी नक़ली महानता की रक्षा करनी है। यह तरह-तरह से लोगों को डराएगा, उन्हें डराने के लिए मुहावरे गढ़ेगा, कुछ भी करेगा क्योंकि इसकी सारी महानता लोगों के डर से पैदा हो रही है, इसकी या इसके जैसे लोगों की बनाई मान्यताओं से पैदा हो रही है।

वरना ‘दीवारों के कान’ की अन्य वजह या अन्य अर्थ क्या हो सकते हैं ?

(जारी)

2-महत्वाकांक्षा और आतंक

-संजय ग्रोवर
13-12-2015

  

Friday, 4 December 2015

उस ज़हर का क्या करें.....

ग़ज़ल

इस सदी की आस्था को देखकर मैं डर गया
बच्चे प्यासे मर गए और दूध पी पत्थर गया

माना अमृत हो गया दो दिन समंदर का बदन
उस ज़हर का क्या करें जो आदमी में भर गया

हिंदू भी नाराज़ मुझसे और मुसलमां भी ख़फ़ा
होके इंसा यार मेरे! जीतेजी मैं मर गया

दर्द को इतना जिया कि दर्द मुझसे डर गया
और फिर हंस कर के बोला, यार मैं तो मर गया

-संजय ग्रोवर


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