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Thursday, 24 September 2015

भगवान करे!

व्यंग्य/कविता



भगवान करे कि आपको बीमारी न हो
अगर हो जाए तो भगवान करे कि ठीक हो जाए

भगवान करे कि आपके घर में आटा आ जाए
भगवान करे कि आपके घर में घी आ जाए
भगवान करे कि उसका परांठा बन जाए

भगवान करे कि आपको खाना हज़म हो जाए
अगर न हो तो भगवान करे कि आपको क़ब्ज़ न हो 
अगर हो जाए तो भगवान करे कि खुल जाए

भगवान करे कि आज कहीं लूटमार न हो
भगवान करे कि आज कहीं भ्रष्टाचार न हो
भगवान करे कि आज कहीं बलात्कार न हो

क्योंकि भगवान ही तो सब कुछ करता है
हे भगवान फिर हम किसलिए हैं
भगवान करे हम हुआ ही न करें

और जब हम ही न हों तो कौन बीमार होगा और कौन ठीक होगा
किसको ठीक करेगा भगवान किसकी ज़िंदगी से खेलेगा भगवान

फिर भगवान भी क्यों हुआ करे ?

भगवान दरअस्ल है भी कहां ?

मैं भी तो भगवान से ज़रा-सा टाइमपास कर रहा था

-संजय ग्रोवर
25-09-2015



Sunday, 20 September 2015

फ़ोटोकॉपियों का ‘वैचारिक’ द्वंद :-)


अगर कोई सेठ किसी मजदूर से कहे कि भईया ज़रा एक दीवार खड़ी कर दो मैं तुम्हे इतनी मज़दूरी दूंगा और मजदूर थोड़ी देर हवा में खुरपी चलाए, सर पर नक़ली तसला रखे, थोड़ी देर दीवार बनाने का अभिनय करे फिर कहे कि लो बन गई दीवार, अब दो मेरे पैसे! तो सेठ दे देगा क्या ?

लेकिन मज़ेदार बात यह है कि धर्म और कर्मकांड के नाम पर यही बचकाना अभिनय घर-घर में चलता है। कोई किसी एक दिन किसीको एक धागा बांध देता है और सोचता है कि हो गई उसकी रक्षा। अब यह बहिन बाज़ार में छेड़ी जाए कि ससुराल में पीटी जाए, भाई ख़बर लेने भी न जाए, पर यह काल्पनिक रक्षा हवा में चलती रहती है। कई लोग साल में एक दिन कहीं कुछ दिया-बत्ती जला देते हैं और सोचते हैं कि फ़ैल गया ज्ञान का प्रकाश। कोई किसी दिन एक डंडे में झंडा लटका लेता है और सारे घिनौने काम बेफ़िक्री से जारी रखता है और वो राष्ट्रप्रेमी कहलाता है।

मज़े की बात यह है कि इन बचकाने लोगों का ‘आत्मविश्वास’ इतने ग़ज़ब का होता है कि जो लोग ये बचकानी हरक़तें न करतें हों, उन्हें ये ‘सुधारना’ चाहते हैं, ‘ऐक्सपोज़’ करना चाहते हैं। क्या ग़ज़ब है !? और इनमें सभी तरह की विचारधाराओं, धर्मों, लिंगों, पेशों के लोग होते हैं।

ये मज़ेदार लोग प्रगतिशीलता की चिंघाड़ लगाते-लगाते एक ऐसे आदमी के पीछे खड़े हो जाते हैं जो बड़े-बड़े पाखंडियों से भी ज़्यादा ऊंची आवाज़ में भगवान-भगवान, चमत्कार-चमत्कार चिल्ला रहा होता है। जिसके ऑडियो-वीडियो सारी दुनिया के देशों और चैनलों में/पर मौजूद होते हैं फिर भी इन्हें यह ख़ुशफ़हमी होती है कि ये ऐक्सपोज़ नहीं हुए, कोई दूसरा ऐक्सपोज़ हो गया है!! ये चाहते हैं कि इन्हें सिर्फ़ इसलिए प्रगतिशील मान लिया जाए कि इन्हींके ‘दर्शन’ और ‘थ्येरी’ से बनी किसी कट्टरपंथी राजनीतिक या सामाजिक संस्था को ये नियमित अंतराल के बाद ग़ालियां बकते रहने का कर्मकांड करते हैं। ये ख़ुद कबीरदास की लाश में से फूल निकाल लेते हैं और दूसरों को मूर्ति को दूध पिलाने पर डांटते हैं।

ऐसे आत्ममुग्ध और बेहोश लोगों को कोई सुधार सकता है क्या ? इन्हें तो होश में लाना भी मुश्क़िल है।

ऐसे, तथाकथित ‘परस्पर-विरोधी’, लोग एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं, एक ही पायजामे के दो पायचे होते हैं, एक ही कट्टरता के दो चेहरे होते हैं।

इनके कर्मकांडो से कुछ नहीं बदलता, अकसर ये किसी दूसरे के किए का मज़ा ले रहे होते हैं।

-संजयग्रोवर
20-09-2015

Tuesday, 15 September 2015

कौन मरा ?


मशहूर डायलॉग है-

जो डर गया समझो मर गया।

भारत में यह डायलॉग बहुत कामयाब हुआ, घर-घर में बच्चे इसे बोलते दिखाई दिये।

यह बात अलग है कि यहां बच्चा पैदा होते ही उसके साथ किए जानेवाले कुछ शुरुआती कामों में से एक ज़रुरी काम यह होता है कि बच्चे को कई चीज़ों से डराया जाता है, सबसे ज़्यादा भगवान से डराया जाता है।

ऐसे डरे हुए बच्चे जीते होंगे या डरते होंगे या कि बस .......

और आप ही तो गली-गली कहते फिरते हैं-

जो डर गया समझो मर गया।

-संजय ग्रोवर
15-09-2015

Labels : Moving Dead Bodies , Child-Victimization , Terror Of God , Forced Virtue , Dead-Live

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