BookShelf

Wednesday, 24 February 2016

भारतीय ‘प्रगतिशीलों’ का पसंदीदा संगठन आर एस एस एस-2

(भारतीय ‘प्रगतिशीलों’ का पसंदीदा संगठन आर एस एस एस-1)

अभी मैं इस लेख का अगला हिस्सा लिखने का मन बना ही रहा था कि ‘पाखंड वर्सेस पाखंड’ का नया उदाहरण सामने आ गया। किसीने आरोप लगाया कि जेएनयू में प्रतिदिन इतनी मात्रा में कंडोम, इतने ये, उतने वो आदि-आदि पाए जाते हैं। इसपर दूसरा पक्ष लगातार इस बात पर हंस रहा है कि देखो, अब कंडोम गिने जा रहे हैं.....


अगर कोई स्पष्टवादी, बेबाक़ और पारदर्शी सोचवाला समाज/गुट/व्यक्ति इसपर हंसता तो बात समझ में आती मगर क्या जेएनयू के लोगों की स्थिति वाक़ई ऐसी है कि वे इसपर हंस सकें ? वे उन कंडोमों की ‘उपयोगिता’, इस्तेमाल या मौजूदगी के बारे में कोई स्पष्ट बात नहीं बता रहे। इतना ही नहीं वे तो यह भी कह रहे हैं कि ऐसे आरोपों के बाद उन लड़कियों के घरवाले क्या सोचेंगे जो यहां पढ़ने आतीं हैं ?


सोचिए कि इसका क्या मतलब निकलता है ?


यानि कि वे कहना चाह रहे हैं कि वह सब यहां नहीं होता जो उन लड़कियों के घर वाले सोच बैठेंगे ? अगर नहीं होता तो आप कंडोम गिनने पर हंस क्यों रहे हैं ? फिर तो यह जानना बनता कि यहां कंडोम आते कहां से हैं ? क्या शहर के दूसरे लोग अपने कंडोम यहां फेंक जाते हैं ? क्या यहां कोई फ़ैक्टरी लगी है ? क्या यहां कंडोम का कोई पेड़ लगा है जिससे पतझर में कंडोम झर-झरके गिरते हैं ?


अगर यहां यह सब नहीं होता तो आप उनपर हंस किस बात पर रहे हैं ? आप तो ऐसे हंस रहे हैं जैसे कि आप प्रगतिशील हों और वे कट्टरपंथी हों !? जबकि आप लड़कियों के घरवालों के सामने एक परंपरावादी इमेज भी बनाए रखना चाहते हैं। यह तो सौ प्रतिशत पाखंड हुआ। अगर आपमें यह कहने का साहस नहीं है कि कंडोम का यहां पर क्या इस्तेमाल होता है तो कृपा करके अपने को बेबाक़, प्रगतिशील, साहसी वग़ैरह कहना बंद करें। आप और आर एस एस एस एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।


खिड़की से घुसकर, अलमारी में छुपकर, अंधेरे में घुसकर, खाट के नीचे बैठकर संबंध बनाना कोई आधुनिकता नहीं है ; यह पाखंडी, कायर और मौक़ापरस्त लोगों का पुराना क़रतब है।


और अगर आपमें स्पष्ट और पारदर्शी ज़िंदगी जीने की हिम्मत है तो आपको यह चिंता क्यों लगी है कि लड़कियों के घरवाले क्या सोचेंगे ? क्या यहां पढ़नेवाली लड़कियों में वह हिम्मत नहीं है कि अपने घरवालों को साफ़-साफ़ बता सकें !? तो फिर इसमें और दूसरे विश्वविद्यालयों में फ़र्क़ क्या हुआ ? छुपा-छुपी के क़िस्से किस विश्वविद्यालय में नहीं चलते ?

यानि कि पकड़े गए तो प्रगतिशील वरना राष्ट्रप्रेमी और परंपरावादी ! 

क्या आपने कभी सोचा है कि आप जैसे कृत्रिम प्रगतिशीलों के बनाए समाज में उन लोगों के लिए कितनी समस्याएं और तक़लीफ़ें खड़ी हो जातीं हैं जो सचमुच अपने हर रिश्ते को साफ़गोई और ईमानदारी से जीना चाहते हैं ?

जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि यहां के ‘प्रगतिशीलों’ को एक भ्रम/ग़लतफ़हमी है कि वे आर एस एस एस से कुछ अलग हैं, दरअसल इनमें उन्नीस-बीस से ज़्यादा का अंतर नहीं है।


(जारी)

-संजय ग्रोवर
24-02-2016



 

No comments:

Post a Comment