Thursday, 5 April 2018

कुरीतियों का सर्कस



नाचने का मुझे शौक था। लेकिन शर्मीला बहुत था। कमरा बंद करके या ज़्यादा से ज़्यादा घरवालों के सामने नाच लेता था। उस वक़्त नाचने के लिए ज़्यादा मंच थे भी नहीं सो बारात एक अच्छा माध्यम था, समझिए कि बस खुला मंच था। एक किसी शादी का इनवीटेशन कार्ड आ जाए तो समझिए कि आपके लिए प्रतिष्ठा-प्रसिद्धि-पाँपुलैरिटी आदि का रास्ता खुल गया। बारात में सड़क पर नाचना अजीब तो लगता था पर एक प्रेरणा मिल गई थी-शराब। दो-चार पेग मारे कि झिझक मिट जाती थी। बस फिर क्या था-जितनी एनर्जी थी नहीं उससे काफ़ी ज़्यादा नाच जाता था। रास्ते में, सड़को पे, छज्जों पे खड़े लड़के-लड़कियां, औरतें-बच्चे उत्साह बढ़ा देते थे। उस समय रिएलिटी शोज़ जैसे जज वगैरह तो नहीं होते थे मगर कोई तथाकथित बड़ा, प्रतिष्ठित, स्टाइलिश आदमी तारीफ़ कर दे तो कहना ही क्या। अगली दो-चार और बारातों में नाचने के लिए ख़ुराक़ मिल जाती थी। हालांकि दहेज-वहेज, रीति-रिवाज शुरु से ही पसंद नहीं थे मगर नाचने में थोड़ा फ़ायदा लगता था। काफ़ी टाइम नाचते रहे। कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई।


आखि़र की दो बारातें दर्दनाक़ ग़ुज़री। जाने का मन भी नहीं था मगर पॉपुलैरिटी का लालच भी नहीं छूटता था। एक शादी की कॉकटेल में रात को नाचना शुरु किया था पर सुबह जब आंख खुली तो पाया कि रात को बेहोश हो गया था। बाद में एक दोस्त ने बताया कि दूसरे दोस्त ने मेरी शराब में काफ़ी ज़्यादा शराब मिला दी थी। क्यों मिला दी होगी ? वह आदमी भगवान के अस्तित्व पर बहस करते हुए अकसर तर्क में कम पड़ जाया करता था। दूसरी जगह भी कुछ ऐसा ही मामला निकला।

बाद में कोई समस्या भी नहीं हुई बल्कि आसानी ही हो गई क्योंकि नाचने और उससे मिलनेवाले फ़ायदे के अलावा बाक़ी सब रस्मो-रिवाजों से तो शुरु से ही परेशान रहता था। आज सोचता हूं कि शुरु से ही इतना साहस, तर्क, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास होता तो क्या इस तरह सड़क पर नाचना संभव होता ? 
HANS/Dec/2006

जवाब अकसर न में ही आता है।

वरना बाद में ऐसे शेर कैसे लिख पाता-

लड़केवाले नाच रहे थे, लड़कीवाले ग़ुमसुम थे
याद करो उस वारदात में अकसर शामिल हम-तुम थे 

उनपे हँसो जो बुद्ध कबीर के हश्र पे अकसर हँसते हैं

ईमाँ वाले लोगों को तो अपने नतीजे मालूम थे



(जारी)

-संजय ग्रोवर
06-04-2018

(अगला हिस्सा)






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