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Saturday, 17 February 2018

तालियों का पिटना

आपकी किसी बात या रचना पर ताली बजना और उससे समाज में बदलाव आना दो बिलकुल अलग़-अलग़ बातें हैं। फ़ेसबुक के लाइकस् को भी हम इस श्रेणी में रख सकते हैं हालांकि वह तालियों जितना तुरंता और तात्कालिक नहीं है। जब तालियां बजती हैं तो माना जा सकता है कि आपके जीवन में ज़रुर कुछ बदलाव आता है, लोग आपको जानने लगते हैं, आपका कैरियर बनता है, आपके काम आसानी से होने लगते हैं, आप घर लौटकर कह सकते हैं कि मम्मी/पापा/भैय्या/डियर....आज तो मेरे पहले ही भाषण पर साढ़े सोलह बार तालियां बजीं और पांच और जगहों पर मुझे बुलाया गया है...। आपका कैरियर बनने में कोई बुराई नहीं है मगर इसमें ज़्यादा सामाजिक कार्य या बदलाव का गर्व मानना या तो भ्रम है या बेईमानी है। सामाजिक या व्यक्ति की मानसिकता में बदलाव का पता तो तभी लग सकता है जब आप एक-एक श्रोता के पीछे एक-एक आदमी लगाएं जो साल-छः महीने चौबीस-चौबीस घंटे उन पर नज़र रखे (और वह उनकी पुरानी ज़िंदग़ी के बारे में भी जानता हो) ; तभी वह बता सकता है कि आपको सुनने के बाद उनके सोचने में और जीवन में क्या बदलाव आया, आया या नहीं आया।


तालियों का तो ऐसा है कि आप सालों पुराना जुमला थोड़ा ठीक-ठाक अंदाज़ में बोल दीजिए कि ‘एक मां-बाप दस बच्चों को पाल सकते हैं मगर दस बच्चे एक मां-बाप को नहीं पाल सकते’......बस, तड़ातड़ तालियां पिटने लगेंगी। शाम को ज़रा किसी पार्क में चले जाईए ; कई जगह उजड़े-उजड़े से बुज़ुर्गवार बैठे मिलेंगे। जहां तक मेरा अनुभव है इनकी राय अपने बच्चों के बारे में प्रशंसात्मक अकसर कम ही मिलती है। टीवी और पत्रिकाओं में भी अकसर भारत के मां-बापों के हालात पढ़ते-सुनते होंगे।

क्या आपको लगता है कि उक्त डायलॉग पर ताली बजानेवाले और उससे बिलकुल उल्टा व्यवहार करनेवाले बिलकुल दो भिन्न-भिन्न व्यक्ति या समाज होते हैं !?

-संजय ग्रोवर

20 july 2014
(on facebook)

3 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन बैंक की साख पर बट्टा है ये घोटाला : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  2. आज कल तो तालियां पिटवाई जाती हैं, यह भी एक रोजगार ही है

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  3. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 21फरवरी 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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