Thursday, 11 April 2019

नास्तिकों के खि़लाफ़, भगवान के खि़लाफ़

 जो लोग भगवान को मानते हुए भी नास्तिकों के खि़लाफ़ हैं, वे भगवान के ही खि़लाफ़ हैं। क्योंकि जिस भगवान की मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता वो अगर न चाहता तो नास्तिक कैसे हो सकते थे ? और अगर भगवान चाहता है कि नास्तिक पृथ्वी पर हों तो आप क्यों चाहते हैं कि वे न हों? यह तो भगवान के काम में टांग अड़ाना हुआ। आप क्या ख़ुदको भगवान से भी बड़ा मानते हैं जो उसके फ़ैसलों में ग़लतियां ढूंढ रहे हैं? हद हो गई अहंकार की !!

और अगर नास्तिक पृथ्वी पर भगवान की मर्ज़ी के बिना हैं तो साफ़ है कि सब कुछ भगवान की मर्ज़ी से नहीं होता, सब कुछ भगवान के कंट्रोल में नहीं है। भगवान ज़्यादा से ज़्यादा चाइना या अमेरिका के राष्ट्रपति जैसी हैसियत या शक्ति रखता है। क्या आप चाइना या अमेरिका के राष्ट्रपतियों/राष्ट्रप्रमुखों को भगवान मानने को तैयार हैं ? बच्चे भी जानते हैं कि सभी राष्ट्रप्रमुख आदमी ही होते हैं।

ऐसे भगवान का क्या करना जो एक पृथ्वी पर भी ठीक से नियंत्रण नहीं रख सकता!?

-संजय ग्रोवर
01-07-2014
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महसूस तो करो

 महसूस तो करो
मैंने उसे ख़ाली कप दिया और कहा,‘‘लो, चाय पियो।’’
वह परेशान-सा लगा, बोला, ‘‘मगर इसमें चाय कहां है, यह तो ख़ाली है!’’
‘‘चाय है, आप महसूस तो करो।’’
‘‘आज कैसी बातें कर रहे हो, मैं ऐसे मज़ाक़ के मूड में बिलकुल नहीं हूं !?’’
‘‘मज़ाक़ कैसा ? क्या ईश्वर मज़ाक़ है ? ईश्वर ने ही मुझे आदेश दिया है कि मेरे माननेवालों को बिलकुल मेरे जैसी चाय दो जिसका न कोई रंग हो, न गंध हो, न कोई आकार हो, न स्वाद हो, न पेट भरता हो, न ताज़ग़ी आती हो, न बीमारी मिटती हो.............लब्बो-लुआब यह कि जिससे कुछ भी न होता हो मगर फिर भी महसूस होती हो.....आप महसूस तो करो!’’
‘‘ईश्वर ने तुम्हे आदेश दिया, तुमसे बात की! कैसे की ?’’
‘‘जैसे तुमसे करता है।’’
‘‘छोड़ो, क्या बकवास ले बैठे........’’
‘‘ईश्वर की बात तुम्हे बकवास लगती है!? ईश्वर ने मुझसे कहा कि मुझे माननेवालों को सब कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे लोग मुझे बेहतर ढंग से महसूस करें ; वे कपड़े भी ऐसे पहनें जो दिखें या न दिखें मगर महसूस हों, वे ऐसे मकानों में रहें जिनका पता भी किसीको न दिया जा सके मगर उन्हें महसूस हो कि वे मकान में रह रहे हैं, इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोग मुझे महसूस कर पाएंगे....ईश्वर ने मुझसे यह भी कहा कि जो चीज़ें मेरे जैसी नहीं हैं यानि कि साफ़ दिखाई पड़तीं हैं और लोगों के काम आती हैं वे सब मेरे मानने वाले मुझे न माननेवालों को दे दें क्योंकि वे महसूस नहीं कर सकते इसलिए उन्हें सचमुच की चीज़ें चाहिएं........’’
‘‘क्या अनाप-शनाप बोल रहे हो! तुम कब ईश्वर को मानते हो?’’
‘‘हां मैं नहीं मानता मगर तुम साबित करके दिखाओ कि मैं नहीं मानता.....’’
-संजय ग्रोवर
19-08-201
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