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Sunday, 5 July 2015

छोटी समझ और ‘बड़े’ आदमी

जो लोग समानता और मानवता की वक़ालत करते हैं, वही जब इंसान को ‘बड़े’ और ‘छोटे’ में बांटते हैं और इसपर किसीको हंसी आती है तो उसे हंस लेना चाहिए। यह बहुत साफ़-सुथरी पूर्वाग्रहरहित और हिम्मत-भरी हंसी होगी। और ऐसे लोग ख़ुदको नास्तिक कहें तो इसपर भी सोचना चाहिए। क्योंकि इसका भी बहुत मजबूत आधार है। इनके पीछे लगभग एक जैसी ही मानसिकता है। आप देखेंगे कि जब किसी तथाकथित भगवान या देवता के बारे में आप कोई आलोचना करते हैं तो आपकी आलोचना चाहे कितनी ही तर्क और तथ्यपूर्ण क्यों न हो, भक्तगण डंडा लेकर आपके पीछे दौड़ पड़ते हैं। ठीक वैसे ही जब आप किसी तथाकथित बड़े आदमी की कितनी ही तार्किक आलोचना क्यों न करें, पुंछल्ले तलवार निकालकर चमकाना शुरु कर देते हैं। कई तथाकथित प्रगतिशीलों और तथाकथित नास्तिकों में भी भगवान-सा, चमत्कारी-सा, जादूगर-सा, करिश्माई-सा होने की और उससे मिलनेवाले सभी फ़ायदे उठाने की वैसी ही लालसा या हवस होती है जैसी की दूसरों में वे आलोचना करते हैं।

अकसर पुंछल्लों की ‘फ़ैनियत’ का आधार उनके द्वारा अपने ‘फ़ैवरिट’ के पक्ष में दिए जानेवाले तर्कों से ही समझ में आने लगता है। उनके तर्क अकसर इस तरह के होते हैं - ‘चांद पर थूकोगे तो तुम्हारे ही मुंह पर गिरेगा’, ‘बड़े’(!) नाम का सहारा लेकर ख़ुदका नाम करना चाहते हो’, ‘जो ख़ुद बड़ा नहीं बन सकता, वो दूसरों को छोटा(!) बनाना चाहता है’......वगैरह। 

आपको क्या लगता है कि वाक़ई इन्हें तर्क कहा जा सकता है ?

इन बचकाना बातों को थोड़ी देर को तर्क मान भी लें तो इनसे पूछना चाहिए कि सूरज और चांद क्या चमचों के बल पर चमकते हैं ? अगर तुम सूरज की तारीफ़ नहीं करोगे, उसपर अविता-कविता नहीं लिखोगे तो उसकी वोल्टेज कम हो जाएगी क्या ? उसकी धूप में कुछ अंतर आ जाएगा क्या ? भैया रे! तुलना तो ज़रा सोच-समझ कर किया करो ? और अगर तुम्हे लग रहा है कि हर कोई ‘बड़े’ आदमी की आलोचना अपना नाम आगे बढ़ाने के लिए करता है तो तुम ‘बड़े’ आदमी की प्रशंसा, उसके लिए लट्ठबाज़ी क्या त्याग करने के लिए करते हो ? 

सही बात यह है कि हर कोई आसानी से समझ सकता है कि हमारे जैसे समाजों में आलोचना में ख़तरे ही ख़तरे हैं, नुकसान ही नुकसान हैं, और प्रशंसा में फ़ायदे ही फ़ायदे हैं। थोड़ा अक़्ल लगाते तो तुम्हे यह भी पता लगता कि ‘बड़ा’ आदमी बनने को वे लोग मरे जाते हैं जो ख़ुदको ‘छोटा’ मानते या समझते हैं, ये हीनभावना से ग्रस्त लोग होते हैं। ईमानदारी से ख़ुदको समझने वाला आदमी आसानी से समझ सकता है कि ‘बड़े’ बनने से पहले भी, और बाद में भी ज़्यादातर छोटे ही काम करने होते हैं। आदमी को चाहिए कि वह अपनी हीनभावना से उबरे, न कि दूसरे की हीनभावना को उभारना शुरु कर दे, उसे बढ़ाने लगे। 

मज़े की बात है कई लोग तर्क देते हैं कि जो ख़ुद बड़ा नहीं बन सकता वो दूसरों को छोटा करने लगता है। इससे ज़्यादा बचकाना और हास्यास्पद तर्क दूसरा नहीं हो सकता। पूछो कि तुम्हारे ‘बड़े’ आखि़र ‘बड़े’ हुए कैसे ? ज़ाहिर है कि वे दूसरों की तुलना में बड़े हैं। इसके अलावा इनके पास और कोई तरीक़ा था क्या ‘बड़े’ होने का ? ख़ुद ऐसा किया इसलिए समझ रहे हैं कि सभी यही करते होंगे! 

अगर तुम समझते हो कि आलोचना के पीछे सिर्फ़ यही कारण होते हैं, तब तो आलोचना नाम की चीज़ को हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए। फ़िर क्यों इतनी गंदी-भद्दी चीज़ को ज़िंदा रखे बैठे हो !? मगर तुम यह भी नहीं कर सकते! क्योंकि तुम्हे इस बात का भी तो क्रेडिट चाहिए कि देखिए फ़लां साहब कितने विनम्र हैं, कोई आलोचना भी करे तो उसका भी सम्मान करते हैं। क्या कहने ? यह तो ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी’ वाली बात हो गई। तिसपर भी तारीफ़ से पेट न भरे तो एक और महान अस्त्र/शस्त्र उपलब्ध है-आत्मालोचना। अपनी ही आलोचना! ग़ज़ब है रे भैय्या! एक तरफ़ तो भाईसाहब आत्मालोचना जैसी शहीदाना कसरत कर रहे हैं, दूसरी तरफ़ पुंछल्ले जनता को वास्तविक आलोचना करने से रोक रहे हैं !! इस विचित्र स्थिति के लिए कोई ठीक-ठाक मुहावरा भी नहीं सूझ पा रहा!! छोड़िए यहीं।

और फिर ये ‘निंदक नियरे राखिए’ का झंडा क्यों सजाए फिरते हो ? फेंको इसे कचरे में!

अगर बड़े आदमी को हमारी आलोचना नहीं चाहिए तो प्रशंसा भी क्यों चाहिए !? अजीब बात है !! सूरज की तरह चमको न अपनेआप। आसमान की तरह लटको बिना किसी सहारे के।

एक और समझने की बात यह है कि ‘छोटे’ लोग ‘बड़े’ लोगों की ज़िंदगी में कभी उस तरह से बाधा नहीं बनते, बन भी नहीं सकते जिस तरह ‘बड़े’ लोग बनते हैं। ‘बड़े’ लोग रेडियो, टीवी, पत्र-पत्रिका, विज्ञापन आदि के माध्यम से हमारे घरों को अपने अनुकूल बनाने की कोशिश करते हैं। वे अरबों रुपयों से बने धारावाहिकों और फ़िल्मों के ज़रिए अंधविश्वासों, रुढ़ियों, अजीबो-ग़रीब कर्मकांडों और जीवनशैली को धार्मिक और नैतिक आधार देकर हमारे घरों के कोने-कोने तक पहुंचाते हैं। धर्म/ब्राहमणवाद को जैसे का तैसा बनाए रखकर सुधार की कोशिशें पहले से भ्रमित लोगों को और भ्रमित और दुराग्रही बनातीं हैं। टीवी पर, रेडियो पर, अख़बारों में, कलंडरों में कहानियों में, कविताओं में, विज्ञापनों में, पाठ्यक्रमों में......हर कहीं ‘बड़े’ लोग कहीं परंपरा तो कहीं प्रगतिशीलता का मास्क चढ़ाए, हाथों में धर्म/ब्राहमणवाद का इंजेक्शन लिए खड़े हैं। आप अपने परिजनों/मित्रों को मिसगाइड होने से बचाएंगे भी तो आखि़र कैसे बचाएंगे!? क्या आप समझते हैं कि यह सिर्फ़ संयोग है कि जिस ज़माने में दुनिया सीधे दिमाग़ से स्क्रीन पर टाइपिंग करने की सोच रही है, हम दहेज और करवाचौथ में उलझे हुए हैं!?

गांवों में ख़ाप पंचायत वही लोग लगाते हैं जो वहां ‘बड़े’ माने जाते हैं, वर्णव्यवस्था भी उन्हीं लोगों ने बनाई जिन्हें ‘बड़ा’ कहा गया, ‘पवित्र’ सतीप्रथा भी ‘बड़े’ और ‘पवित्र’ लोगों की देन है। जाओ, तुम्ही ‘फ़ॉलो’ करो ‘बड़े’ लोगों को। 

यह लेख ‘बड़े’ लोगों के ‘विरोध’ में या उनके ‘ऊपर’ नहीं लिखा गया। यह आदमी के ख़ुदको ख़ामख्वाह ‘बड़ा’ और दूसरों को बेवजह ‘छोटा’ समझने या ‘बनाने’ की मानसिक बीमारी को समझने-समझाने के लिए लिखा गया है।

इस लेखक के लिए ‘बड़े’ तब तक ही ‘बड़े’ थे जब तक इसकी समझ ‘छोटी’ थी।


-संजय ग्रोवर
05-07-2015


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