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Saturday, 12 October 2019

भगवान और चुनौती

कहते हैं कि भगवान कुछ भी कर सकता है !
चलिए, ज़रा आज़माते हैं-
भगवान अगर है तो संविधान उसकी मर्ज़ी से ही बना होगा।
लेकिन असंवैधानिक काम जगह-जगह पर हो रहे हैं !
यहां जातिभेद होता है।
यहां रंगभेद होता है।
यहां स्त्री और पुरुष में भेद होता है।
सिर्फ़ दिल्ली में ही, वो भी पैसेवाले और पढ़े-लिखे लोगों ने, क़दम-क़दम पर असंवैधानिक कमरे बना रखे हैं ! दुकाने बना रखी हैं।
कई औरतें मजबूरन रखैलें और वेश्याएं बनी हुई हैं।
उनसे बलात्कार हो रहे हैं।
लोग मजबूरन पाखाना साफ़ कर रहें हैं, दूसरों की गंदगी ढो रहे हैं।
यूं तो ऐसी कई चीज़ें हो रही हैं मगर भगवान इतने सालों से चुपचाप देख रहा है !
क्या भगवान को संविधान नहीं पता ? क्या वह पढ़ा-लिखा नहीं है ?
हम भगवान को टाइम देते हैं कि आज रात तक वह यह सब बुराईयां ख़त्म कर दे।
असंवैधानिक कमरे गिरा दे।
लड़कियों को आज़ाद कर उनकी शादियां करा दे।
लोगों का पाखाना बंद कर दे या उसे ख़ुद साफ़ किया करे।
जातिभेद ख़त्म कर दे.......
काम तो बहुत हैं और दलाल कहते हैं कि भगवान पलक झपकते ही सब कुछ बदल सकता है।
हम भगवान को छूट देते हैं कि आज शाम तक वह इनमें से कोई पांच काम ही कर दे।
चलो हम यह भी छूट देते हैं कि कोई सा भी भगवान-साकार, निराकार, धार्मिक, धर्मनिरपेक्ष, कोई भी भगवान इस काम को करके दिखा दे। चलो हम यह भी छूट देते हैं कि सारे भगवान मिलकर इस काम को करके दिखा दें।
नहीं तो साबित हो जाएगा कि वह/वे नहीं है।
और उसको माननेवाले फ़िर अनाथ हो जाएंगे।

-संजय ग्रोवर
(on facebook today 12-10-2019)



Wednesday, 17 April 2019

ईश्वर और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया

ईश्वर के होने या न होने पर आपको इंटरनेट पर ख़ूब विचार और बहसें दिखाई देंगे। प्रिंट मीडिया में भी मुख्यधारा के पत्र-पत्रिकाएं न सही, मगर बहुत-से अन्य पत्र-पत्रिकाएं इसपर विचार चलाते रहे हैं।

मगर भारतीय फ़िल्में और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया !?

ज़ाहिर है कि इस मामले में बुरी तरह से पिछड़े हुए हैं। इनकी उपलब्धि शून्य है।

जबकि ये सबसे ज़्यादा समर्थ और सम्पन्न हैं !!

क्या वजह हो सकती है ?





-संजय ग्रोवर
(July 14, 2014 on facebook)

Thursday, 11 April 2019

महसूस तो करो

 महसूस तो करो
मैंने उसे ख़ाली कप दिया और कहा,‘‘लो, चाय पियो।’’
वह परेशान-सा लगा, बोला, ‘‘मगर इसमें चाय कहां है, यह तो ख़ाली है!’’
‘‘चाय है, आप महसूस तो करो।’’
‘‘आज कैसी बातें कर रहे हो, मैं ऐसे मज़ाक़ के मूड में बिलकुल नहीं हूं !?’’
‘‘मज़ाक़ कैसा ? क्या ईश्वर मज़ाक़ है ? ईश्वर ने ही मुझे आदेश दिया है कि मेरे माननेवालों को बिलकुल मेरे जैसी चाय दो जिसका न कोई रंग हो, न गंध हो, न कोई आकार हो, न स्वाद हो, न पेट भरता हो, न ताज़ग़ी आती हो, न बीमारी मिटती हो.............लब्बो-लुआब यह कि जिससे कुछ भी न होता हो मगर फिर भी महसूस होती हो.....आप महसूस तो करो!’’
‘‘ईश्वर ने तुम्हे आदेश दिया, तुमसे बात की! कैसे की ?’’
‘‘जैसे तुमसे करता है।’’
‘‘छोड़ो, क्या बकवास ले बैठे........’’
‘‘ईश्वर की बात तुम्हे बकवास लगती है!? ईश्वर ने मुझसे कहा कि मुझे माननेवालों को सब कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे लोग मुझे बेहतर ढंग से महसूस करें ; वे कपड़े भी ऐसे पहनें जो दिखें या न दिखें मगर महसूस हों, वे ऐसे मकानों में रहें जिनका पता भी किसीको न दिया जा सके मगर उन्हें महसूस हो कि वे मकान में रह रहे हैं, इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोग मुझे महसूस कर पाएंगे....ईश्वर ने मुझसे यह भी कहा कि जो चीज़ें मेरे जैसी नहीं हैं यानि कि साफ़ दिखाई पड़तीं हैं और लोगों के काम आती हैं वे सब मेरे मानने वाले मुझे न माननेवालों को दे दें क्योंकि वे महसूस नहीं कर सकते इसलिए उन्हें सचमुच की चीज़ें चाहिएं........’’
‘‘क्या अनाप-शनाप बोल रहे हो! तुम कब ईश्वर को मानते हो?’’
‘‘हां मैं नहीं मानता मगर तुम साबित करके दिखाओ कि मैं नहीं मानता.....’’
-संजय ग्रोवर
19-08-201
(ON FACEBOOK)























Friday, 4 January 2019

‘ईश्वर की यही मर्ज़ी थी’

ईश्वर को सिद्ध करने में एक वाक्य आलू और पनीर की तरह काम आता है। यह चमत्कारी वाक्य आसानी से कहीं भी घुसेड़ा जा सकता है। 

एक आदमी सड़क पर निकले और जाकर किसी गाड़ी से टकरा जाए तो कम-अज़-कम चार संभावनाएं हैं-

1. आदमी गाड़ी से टकराकर मर जाए-

आप आराम से कह सकते हैं-‘ईश्वर की यही मर्ज़ी थी।’

2. आदमी गाड़ी से टकरा जाए और बच जाए-

आप आराम से कह सकते हैं-‘ईश्वर की यही मर्ज़ी थी।’

3. आदमी गाड़ी से टकराकर बच तो जाए मगर उसकी टांग टूट जाए-

आप आराम से कह सकते हैं-‘ईश्वर की यही मर्ज़ी थी।’

4. यह संभावना थोड़ी अजीब है, मगर संभव है कि आदमी तगड़ा हो कि गाड़ी को नुकसान पहु्रंचा दे-

आप आराम से कह सकते हैं-‘ईश्वर की यही मर्ज़ी थी।’

इसी तरह सुबह आप मलत्याग को बैठें मगर असफ़ल हो जाएं-
कह सकते हैं कि-‘ईश्वर की यही मर्ज़ी थी।’
आप सफ़ल होकर फ्रेश मूड में निकलें-
कह सकते हैं कि-‘ईश्वर की यही मर्ज़ी थी।’

इसी तरह सुबह आप मलत्याग को बैठें मगर असफ़ल हो जाएं-

कह सकते हैं कि-‘ईश्वर की यही मर्ज़ी थी।’

आप सफ़ल होकर फ्रेश मूड में निकलें-

कह सकते हैं कि-‘ईश्वर की यही मर्ज़ी थी।’

तो निश्चय ही यह चमत्कारी वाक्य है और यहां तक किसी तरह बर्दाश्त किया जा सकता है। मगर तब

क्या हो जब कोई किसीको गाड़ी के नीचे धक्का दे दे और कहे कि ईश्वर की यही मर्ज़ी थी !

कोई बलात् किसीको शारीरिक नुकसान पहुचाए और कह दे कि ईश्वर की यही मर्ज़ी थी !!

कोई किसीकी हत्या कर/करवा दे और घोषणा करे/करवाए कि ईश्वर की यही मर्ज़ी थी !?

-संजय ग्रोवर

(फ़ेसबुक, नास्तिक द अथीस्ट ग्रुप)
23 August 2013



Thursday, 3 January 2019

क्या ईश्वर क़िताबें लिखता है!?

क्या ईश्वर क़िताबें लिखता है!? हम सब कभी न कभी ऐसे दावों से दो-चार होते रहे हैं। कमाल की बात यह है कि कथित ईश्वर की लिखी और आदमी की लिखी क़िताबों में ज़रा-सा भी अंतर नहीं दिखाई देता। वही पीला क़ाग़ज़, वही काली स्याही ! ईश्वर को लिखनी ही थीं तो ज़रा अलग़ तरह से लिखता कि ग़रीब आदमी भी पढ़ लेता, अनपढ़ भी पढ़ लेता, मुसीबत में फंसा आदमी भी पढ़ लेता। कहीं लिख देता आसमान पर कि सुबह उठकर ऊपर देखते और चमचमाते अक्षर दिखाई पड़ते। अक्षर तो छोड़िए, आजकल तो आकाशवाणी भी नहीं होती। लिखनी थी तो लिखता कहीं नदी पर, समुद्र पर, पहाड़ पर। कुछ ऐसे अक्षरों में लिखता कि अशिक्षित भी पढ़ ले। मगर यह तो ऐसी भाषा है कि पढ़े-लिखे को भी आसानी से समझ में नहीं आती। जैसे कई लेखक लिखते हैं सिर्फ़ इसलिए कि हमारी तो लग ही जानीं हैं सारी प्रतियां, सारी संस्थाओं में ; सैटिंग जो बढ़िया है अपनी।

मगर यह तो ऐसी भाषा है कि पढ़े-लिखे को भी आसानी से समझ में नहीं आती। जैसे कई लेखक लिखते हैं सिर्फ़ इसलिए कि हमारी तो लग ही जानीं हैं सारी प्रतियां, सारी संस्थाओं में ; सैटिंग जो बढ़िया है अपनी।


और इन क़िताबों के बारे में कोई अपने विचार तो प्रकट करे ज़रा! ईश्वर को तो किसने देखा है, लेकिन उसके स्वघोषित रक्षक। डंडे ले-लेकर निकल आते हैं। इनकी भावनाएं आहत हो जातीं हैं। ज़िंदा आदमी को कोई दिन-दहाड़े मार डाले, इनके सामने मार डाले, इन्हीं में से कोई मार डाले, क्या फ़र्क पड़ता है, आदमी तो है ही इसीलिए, सड़ने-मरने के लिए, मगर क़िताबों का तो कहना ही क्या! इनका बस चले तो क़िताबें भी डंडे से लिख डालें। पता नहीं इनकी भावनाएं इनके दिल में हैं कि इनके डंडों में हैं, कुछ समझ में नहीं आता। और इनकी क़िताबों से दूसरों की भावनाएं तो क्या, जिंदगियां ही ख़राब हो जाएं, हो जाएं तो हो जाएं, क्या फ़र्क पड़ता है! इनके डंडे में भी अतिकोमल भावनाएं निवास करतीं हैं और दूसरों के प्राण भी निकल जाएं तो क्या, आना-जाना तो लगा ही रहता है। इनकी क़िताबों को कुछ कह दो तो ये मारे-पीटें, मुकदमा ठोंक दें और इनकी क़िताबों का लिखा लोगों की पीढ़ियों की पीढ़ियों का ख़ून पी जाए तो वे किसे पकड़ें? इनके तो लेखकों का अता-पता ही नहीं, कोई फ़ोन नंबर नहीं, ईमेल नहीं, घर-दफ्तर का पता ठिकाना नहीं। कमाल की बात कि जिसकी क़िताब की वजह से तरह-तरह के लफ़ड़े हो रहे हैं उसका पता ही नहीं किधर छुपा है!?

कमाल की बात कि जिसकी क़िताब की वजह से तरह-तरह के लफ़ड़े हो रहे हैं उसका पता ही नहीं किधर छुपा है!?

ग़़ैर-ज़िम्मेदारी पता नहीं किसे कहते हैं!? 

-संजय ग्रोवर

(फ़ेसबुक, नास्तिक द अथीस्ट ग्रुप)
12 June 2013

Saturday, 23 June 2018

भगवान और उद्देश्य!

photo by Sanjay Grover


लोग कहते हैं कि भगवान हमें किसी विशेष उद्देश्य से धरती पर भेजता है।

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि हो सकता है बात सही हो।

अंततः भगवान को समझ में आता है कि ये लोग उद्देश्य को पूरा करने में अक्षम हैं इसलिए इन्हें वापस बुला लेता है। 

इससे पता चलता है कि भगवान भी अपने तजुर्बों से कुछ नहीं सीखता 
इसलिए पहले  इन्हें बनाए चला जाता है फिर वापिस मंगाए चला जाता है।

हे भगवान! भगवान ऐसा क्यों है ?

ऐसा भगवान है क्यों ?

वैसे है क्या ?


(कृपया सीरियसली न लें, काल्पनिक भगवान के बारे में कभी-कभी हम यहां मज़ाक़ करते हैं।)


-संजय ग्रोवर
24-06-2018


Monday, 16 April 2018

बलात्कार का स्वाद



मंदिर में बच्ची से बलात्कार की ख़बर क्या कुछ लोगों को चौंका सकती है ? क्या उन लोगों को भी जो कहते हैं ‘भगवान की मरज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता’! क्या उन लोगों को भी जो कहते हैं ‘बच्चे ईश्वर का रुप होते हैं’ ! लेकिन वही लोग यह भी कहते है कि ‘कण-कण में भगवान है’, ‘भगवान हर जगह मौजूद है
’, ‘भगवान की लाठी में आवाज़ नहीं होती’, ‘भगवान जो चाहता है वही होता है’.....  

सही बात यह है कि अगर हम मान भी लें कि भगवान होता है तो भी यह मानना पड़ेगा कि वह फ़िल्मों, कहानियों और कविताओं में ही कमज़ोरों के काम आता है। कमज़ोरों और ग़रीबों को वास्तविकता में उससे कभी कोई फ़ायदा नहीं हुआ। हम थोड़ी अक़्ल लगाने को तैयार हों तो यह सोचने में क्या बुराई है कि भगवान ने स्त्रियों को ऐसा क्यों नहीं बनाया कि कोई उनसे बलात्कार की सोच ही न सके ? उसने बलात्कारियों को ऐसा क्यों नहीं बनाया कि बलात्कार की बात उनके दिल में आए ही नहीं ? जब-जब बलात्कार और अत्याचार होता है, भगवान छुट्टी पर क्यों चला जाता है ?

विचार के नाम पर हम कब तक रट्टा मारते रहेंगे ? कोई कह रहा है कि मेरे घर में भी स्त्रियां हैं इस नाते मैं बलात्कार का विरोध करता हूं। अरे भैया बलात्कारी के घर में भी स्त्रियां हैं। कोई कहता है कि जिनके घर में बेटियां हैं उनको बलात्कार का विरोध करना चाहिए। और जिनके घर में नहीं है उनको क्या समर्थन करना चाहिए ? 

सही बात यह है कि हमको ज़बरदस्ती का स्वाद लग चुका है ? 


(जारी)

(अगला हिस्सा)


-संजय ग्रोवर
16-04-2018

Sunday, 23 July 2017

दुनिया को नई नज़र से देखो, प्यारेलाल

"भगवान नही है चलो मान भी लिया जाये और ये भी मान लिया जाये की सृष्टि की रचना अपने आप हो गयी तो हर चीज का जोड़ा कैसे बना? पशु-पक्षी बने और उनके भी जोड़े बने फिर नस्ल आगे बढ़ने के लिये भी इंतेज़ाम हो गया? पेड़ पौधे चन्द सूरज और तारे सब के सब अपने आप बन गये और अपनाकाम भी बखूबी कर रहे हैं? वैज्ञानिको की मशीने खराब हो जाती है लेकिन ये बिना रुके अपना काम करते जा रहे हैं? सबमेबड़ा सवाल सृष्टि की रचना अपनेआप हुई को पहले नर बना या नारी अगर एक बना तो दूसरी की उत्पत्ती संभव नही? पहले मुर्गी आई या मुर्गा? दोनो के बिना अंडे की उत्पत्ती संभव नही?" on सुनो पीके

कोई मित्र हैं जिन्होंने पहले फ़ेसबुक पर फिर इस ब्लॉग पर यह सवाल पूछा है। इस सवाल में नया कुछ भी नहीं है, बचपन से सुनता आ रहा हूं, आस्तिकों/अनामों के पास वही घिसे-पिटे सवाल हैं, पर चलो मैं उत्तर नया दे देता हूं।

प्यारे दोस्त, दो-तीन बातें आपको ठीक से समझ लेनी चाहिएं वरना बार-बार लोगों को परेशान करते रहेंगे। पहली बात, अगर आपको सड़क पर कोई पायजामा गिरा हुआ मिलता है और लाख ढूंढने पर उसका मालिक़ नहीं मिलता तो क्या आप यह समझ लेते हैं कि यह पायजामा भगवान का है या इसे भगवान फेंक गया है ? जिस चीज़ का कोई कर्त्ता या मालिक़ नहीं उसके लिए आप एक काल्पनिक मालिक़ न सिर्फ़ अपने लिए ढूंढ लेते हैं बल्कि दूसरों पर भी थोपने लगते हैं ? यह तो ऐसा ही हुआ कि किसी फ़िल्म का सारा प्रचार किसी एक आयटम नंबर के आधार पर किया जाए और जब देखने जाओ तो वह आयटम ही उस फ़िल्म में सिरे से ग़ायब हो ! भगवान को आपने ऐसा ही आयटम नंबर बना रखा है, दोस्त! उस काल्पनिक शख़्सियत से बिना उसकी मर्ज़ी पूछे बस अपने मतलब या डरों की वजह से आप उसे नचाए जा रहे हैं।

दूसरी बात, आप कहते हैं कि भगवान नहीं है तो जोड़े कैसे बने, नस्ल कैसे बढ़ी, मुर्गी और अंडा कैसे आया ? प्यारेलाल, आपको लगता है मालूम नहीं कि इस दुनिया में बहुत-से लोग बिना जोड़े के भी रहते हैं। जिनके जोड़े बन गए हैं उनमें से भी कईयों की आपस में पटती नहीं है, कईयों के पति या पत्नी उन्हें बीच सफ़र में अकेला फंसाकर ख़ुद दुनिया से निकल लेते हैं। जोड़ा बना है तो पूरा तो चलना चाहिए न प्यारेलाल ? दुकानदार तो फिर भी अपने सामान की साल-छै महीने की गारंटी/वारंटी लेते हैं और उसे निभाते भी हैं मगर आपका भगवान! इसके प्रोडक्ट का तो छै दिन का भरोसा नहीं। सबसे घटिया उत्पाद लगता हैं यहीं पैदा होते हैं। और प्यारेलाल, अगर जोड़े आपके भगवान ने बनाए हैं तो लड़के-लड़कियों को ये सही वक़्त पर क्यों नहीं मिलते ? उनके मां-बापों-रिश्तेदारों को क्यों दस-दस साल चप्पल घिसने पड़ते हैं ? भगवान के बनाए जोड़ों के बावजूद उनकी दहेज मांगने की हिम्मत कैसे पड़ जाती है ? मुझे तो लगता है कि इन्हीं दहेजखोरों और बेईमानों ने अपने मतलब के लिए भगवान को पैदा कर लिया है। आपको तो लगता है पूरा मालूम नहीं है कि आजकल सभी लड़के-लड़कियां दो-दो के जोड़ों में नहीं रहते, कहीं-कहीं दो-तीन लड़के, एक लड़की या दो-चार लड़कियां, एक-दो लड़के भी मिलजुलकर रहते हैं। आजकल भारत में भी बहुत-से बच्चे प्रेमविवाह कर रहे हैं जबकि पहले वे शादी के लिए अकसर रिश्तेदारों पर निर्भर रहते थे। अब आप ही सोचो कि यह वाला सिस्टम भगवान ने बनाया है या पिछलावाला ? जब समझ में आ जाए तो बता देना। आगे बात कर लेंगे। और एक बात बताऊं, दुनिया में सिर्फ़ शादियां नहीं होतीं, बलात्कार और छेड़खानियां भी होतीं हैं, गर्भ में लड़कियों की हत्या भी होती है ; कहोकि वो भी भगवान ने बनाया है, कहो ना।

और, प्यारेलाल, आदमी की मशीन और भगवान के पहाड़ों की तुलना बिलकुल बेमतलब है। आदमी कैसा भी काम करे, उसे करते हुए वह सौ प्रतिशत, बिलकुल प्रामाणिक रुप से दिखाई देता है। भगवान को आपने कब बारिश करते या सुनामी लाते हुए देखा ? क़िताबें बहुत-सी पढ़ीं होंगी आपने, कभी कोई चिंतन वग़ैरह भी किया है ? कैसी उल्टी-सीधी तुलना करते रहते हो ?

ये अंडा-मुर्गी बेमतलब की बातें हैं, प्यारेलाल! नस्ल आगे बढ़ने से क्या होता है ? मेरी जानकारी में कई लोग जवानी में ही मर गए, कई पेट में ही मर गए, तो ये दुनिया रुक गई क्या ? इत्ते बड़े-बड़े डायनासोर मर गए तो क्या बिगड़ गया ? नस्ल तो ऊंट और चूहे की भी चल रही है, आपको उनसे कितने दिन काम पड़ता है ? कॉक्रोच की नस्ल से आपको कुछ फ़ायदा होता होगा, मुझे तो उनका न होना ही अच्छा लगता है। मुर्गी और अंडा नहीं होगा तो लोग कुछ और खा/पाल लेंगे। आपने देखा नहीं लोगों को, क्या-क्या खा जाते हैं!

और मेरे प्यारे, आखि़र में सबसे मज़ेदार और सबसे नई बात बताऊं, यह दुनिया किसीने बनाई नहीं है, यह अपनेआप बनी है ? अगर आपको लगता है कि यह किसी भगवान ने बनाई है तो साबित करके दिखाओ-

-संजय ग्रोवर

23-07-2017



Thursday, 13 July 2017

भीड़ और भगवान-1

एक प्रसिद्ध व्यक्ति ट्वीट करता है कि एक सरकारी संस्था ने मुझसे पांच लाख रुपए रिश्वत मांगी है।

कोई पत्रकार उससे नहीं पूछता कि यह रिश्वत किस वजह से मांगी गई है !? वह रिश्वत मांगनेवाले का नाम नहीं बताता। 

वही टीवी चैनल बताते हैं कि यह व्यक्ति ख़ुद भी रेज़ीडेंशियल इलाक़े में कमर्शियल दफ़्तर बनाने के इरादे से अवैद्य निर्माण करवा रहा था। थोड़े दिन चैनलों पर समाचार चलता है, छोटी-मोटी बहसें चलतीं हैं, नतीज़तन वह आदमी और ज़्यादा मशहूर हो जाता है।  

जनता और बुद्धिजीवियों में से कोई नहीं पूछता कि आपने नाम नहीं बताया, आपके अपने अवैद्य निर्माण की हक़ीक़त क्या है ?

उस प्रसिद्ध आदमी के टीवी कार्यक्रम में आए दिन उस ट्वीट की चर्चा उपलब्धि की तरह होती है। भीड़ हंसती है, तालियां बजाती है।

इस भीड़ से किसीको कोई शिक़ायत नहीं है।

अतार्किक मानसिकता अतार्किक भीड़ का निर्माण करती है। अतार्किक भीड़ अतार्किक महापुरुष और सेलेब्रिटी बनाती है।

भीड़ हमारे लिए तालियां बजाती है, हमारे घर के नीचे खड़े होकर हाथ हिलाती है, हमारे ऑटोग्राफ़ लेती है, हमें माला पहनाती है, हमारा सम्मान करती है......

जब तक यह सब होता है, भीड़ हमें महान लगती है, हम नहीं पूछते, नहीं सोचते कि यह सब ठीक है या ग़लत, इससे समाज या दूसरे व्यक्तियों का फ़ायदा होगा या नुकसान.....

इस भीड़ को अंततः झेलता कौन है ?

मेरे आसपास जब भी कोई अवैद्य निर्माण होता है और मैं उसे रुकवाने की कोशिश करता हूं तो मुझे हमेशा यही 
तर्क मिलता है कि सब यही कर रहे हैं तो फिर तुम अकेले कैसे सही हो ?

मेरा मन होता है, संभवतः एक बार मैंने कहा भी कि अगर सब बलात्कार करने लगें तो क्या मैं भी शुरु कर दूं !? कलको सब छेड़खानी करने तुम्हारे घर आएंगे तो तुम चाय-पेप्सी के साथ ख़ुद भी उनमें शामिल हो जाओंगे ?

अवैद्य निर्माणकर्ताओं की यह बात तो सही ही होती है कि ‘सब यही कर रहे हैं’। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, साहित्यकार, पत्रकार, बंगाली, मद्रासी, पंजाबी, गुजराती, आस्तिक, नास्तिक, ब्राहमण, दलित, मार्क्सवादी, राष्ट्रवादी.........कौन है जो यह नहीं करता ?

हममें से किसने इस भीड़ पर ऐतराज़ किया ?

भीड़ हमें भगवान बनाती है और हम ही उसे इसके लिए तैयार करते हैं। अगर कोई भीड़ की ज़्यादा परवाह नहीं करता तो ‘महापुरुष’ तक उसे घमंडी, सनकी, पागल तक करार देने लगते हैं।  

जिस वक़्त भीड़ के खि़लाफ़ एक भीड़ विरोध करने खड़ी होती है ठीक उसी वक़्त दो फ़िल्मी सितारों के घरों के नीचे ‘युवाओं’ की भीड़ हाथ हिलाने और उनके दर्शन के लिए इंतज़ार कर रही होती है।

क्या हमने कभी इस भीड़ के बारे में सोचा ? क्या यह भीड़ बहुत सोच-समझकर आती है ? क्या ये बहुत तार्किक लोग हैं ? हममें से कई लोग इसपर सोचने तक को तैयार नहीं हैं, वजह बड़ी साफ़ है कि उन्हें भी इसी तरह लोकप्रिय होना है, महापुरुष, सेलेब्रिटी, आयकन और आयडल बनना है।

किसी दिन यह भीड़ हमें छोड़कर किसी और के पास चली जाती है, नतीज़तन कोई लोकप्रिय स्टार शराब में डूब जाता है, कोई आयकन प्रसिद्धि वापिस पाने के लिए अजीबोग़रीब हरक़तें शुरु कर देता है.......

इससे भी बुरी स्थिति तब होती है जब हमारी ही बनाई भीड़ हमारे खि़लाफ़ होने लगती है। और भी ख़राब तब यह होता है कि हम ख़ुद कुछ समझने के बजाय दूसरों को समझाना शुरु कर देते हैं......

(जारी)

-संजय ग्रोवर
13-07-2017

Sunday, 4 June 2017

बच्चे की मासूमियत और बड़ों का बचपना

‘अगर आपको भगवान के होने का सबूत चाहिए तो इस वीडियो को देखिए’
ऐसा ही कुछ फ़ेसबुक पर लगे एक वीडियो के ऊपर स्टेटस में लिखा था, नीचे वीडियो में एक छोटा बच्चा सड़क पर अपना किनारा छोड़कर डिवाइडर की तरफ़ भाग पड़ता है। गाड़ियां धीरे-धीरे चल रहीं हैं, शायद लाल बत्ती अभी-अभी हरी हुई है। बच्चा अचानक गिर पड़ता है या लेट जाता है। एक कार उसके ऊपर से आर-पार निकल जाती है। नीचे बच्चा सुरक्षित है। वीडियो बनाने या लगानेवाले के अनुसार यह भगवान के होने का सबूत है। धार्मिक लोगों के मुख से इस तरह की घटनाएं और उनपर इस तरह के उनके रिएक्शन मैंने अकसर देखे-सुने हैं, ज़रुर आपने भी सुने होंगे।

तथाकथित धार्मिकों के अनुसार तो जो भी होता है, भगवान की मर्ज़ी से होता है। तो फिर जब भगवान ने उसे बचाना ही था तो पहले उसे भगाया क्यों ? भगवान क्या बच्चे के साथ सांप-सीढ़ी खेल रहा था ? यह तथाकथित भगवान तो बच्चों का माईबाप है। कोई मां-बाप अपने बच्चों के साथ इस तरह टाइमपास करते हैं क्या ?

यह बच्चा बच गया तो यह भगवान के होने का सबूत है। और जो बच्चे मर जाते हैं वो किस बात का सबूत है ? ज़ाहिर है कि वो फिर भगवान के न होने का सबूत है। और ध्यान रहे कि सड़को-फुटपाथों पर, घरों-अस्पतालों में बहुत-सारे बच्चे मरते हैं। इसका मतलब है कि न होने का सबूत बहुत बड़ा है।

आगे ज़रा कल्पना कीजिए कि कोई बच्चा या व्यक्ति किसी दुर्घटना में अपना नीचे का हिस्सा तुड़ा बैठे और ऊपर-ऊपर से बच जाए तो यह किस बात का सबूत होगा ? कि भगवान आधा है और आधा नहीं है ? आधा टूटा है, आधा साबुत है ?   

इससे ज़रा और आगे सोचते हैं-यह बच्चा या व्यक्ति आज तो बच गया इसलिए आज भगवान भी बच गया लेकिन आगे की क्या गारंटी है ? क्या आगे इसके साथ कोई दुर्घटना नहीं होगी ? क्या यह अमर हो गया ? दुर्घटना ना भी हो तो स्वाभाविक मौत तो सभी मरते हैं। फिर वो किस बात का सबूत होगा ? कि भगवान कभी-कभार छोटी-मोटी दुर्घटना में/से तो बच या बचा सकता है मगर उसके आगे उसके भी बस का कुछ नहीं है।

और अगर लोगों के मरने से ही भगवान के होने, न होने का फ़ैसला होना है तो आए दिन हज़ारों लोग मरते हैं। फिर तो समझिए कि भगवान भी एक-एक दिन में कई-कई बार मरता है। आए दिन होनेवाली लाखों घटनाओं में से एक घटना आपने उठा ली, वह भी ऐसी घटना जो सालों में एकाध बार होती है, और उसे भगवान के होने का सबूत बता दिया। बाक़ी लाखों घटनाएं-बलात्कार, चोरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार, तकनीक का दुरुपयोग, दुर्घटनाएं, कुपोषण से होनेवाली बच्चों की मौतें.....उनके बारे में क्या ख़्याल है ? वो किसकी कारिस्तानी है ?

आप यह भी बताएं कि इतना अहंकार आपमें आया कहां से कि भगवान के होने के सबूत आप देते फिरते हैं। भगवान क्या आपसे कमज़ोर है ? वह अपने होने के सबूत ख़ुद क्यों नहीं देता ?

सबसे मज़े की बात तो यह है कि जब हम आपसे कहते हैं कि अपने पिताजी से मिलवाओ तो आप सीधा ही मिलवा देते हो लेकिन इतने बड़े (आप ही के हिसाब से) सर्वशक्तिमान, सर्वविद्यमान भगवान की बात चलती है तो आप सबूत दिखाना शुरु कर देते हो !?

अरे किसी दिन सीधे ही मिलवा दो। सारा झंझट ही ख़त्म हो जाएगा।

-संजय ग्रोवर
04-06-2017

Sunday, 25 December 2016

भगवान की पहचान

भगवान आजकल-1
(भगवान के नाम पर आजकल जो भी होता है, का चर्चा)


रात मैंने देखा, पता नहीं सपना था या सच था, एक प्रसिद्ध आदमी से एक लड़की ने कह दिया कि आप मेरे लिए भगवान के समान हो, मेरे भगवान हो.....’

बस वह मेरा दोस्त काफ़ी देर तक भावुक होता रहा, कई कोणों से दिलचस्प मुद्राएं दिखाता रहा।

मैंने सोचा क्या इस मेरे दोस्त को पूरा मालूम है कि भगवान कैसा है, किधर है, क्या काम करता है !? क्या यह बचपन से भगवान बनना चाहता था !? आज इसकी ‘तपस्या’ पूरी हुई, इस लड़की ने घोषित किया कि यही है भगवान, आज से यह भगवान हुआ!

कौन है यह लड़की !? लगता है कई भगवान देख चुकी है, कईयों को भगवान बता चुकी है, भगवान बना चुकी है!

इस लड़की को पूरा आयडिया है कि भगवान कैसा होता है, किधर रहता है, क्या काम करता है। जब भी बताएगी, यही बताएगी, कि यह लो, आ गया तुम्हारा भगवान। भगवान को आज तक ख़ुद पता नहीं था कि मैं भगवान हूं, इस लड़की ने बताया कि तुम भगवान हो, और मेरे भाई ने तुरंत मान भी लिया।

यह तो बड़ी क़ाबिल लड़की है। कल यह किसीको बताएगी कि तुम एमए हो तब उसे पता लगेगा कि मैं एमए हूं। ज़ाहिर ही है कि एमए होना भगवान होने से तो बहुत छोटा ही माना गया है। जब इस लड़की का दिया भगवत्ता का सर्टीफ़िकेट मान्य है तो एमए, बीए क्या बेचते हैं !?

लेकिन फिर मैंने देखा कि वही लड़की भगवान से अपने लिए चांस मांग रही है, अपने बारे में भगवान से पूछ रही है जो काम आप कई सालों से कर रहे हो, मैं उसे शुरु करने लायक हूं या नहीं !? मैं देखता आया हूं कि चांस चाहनेवाले किसीको भी भगवान बता देते हैं। भगवान को पहचानती है तो ख़ुद कहां और क्यों भटक रही है!?

हे भगवान! हे लड़की! हे दोस्तो! पहले आपस में फ़ायनल कर लो कि कौन क्या है फिर मैं भी अपना सपना तोड़कर हक़ीक़त में आ जाऊं।

तब तक कोई गाना सुन लेता हूं।

-संजय ग्रोवर
25-12-2016

Wednesday, 27 April 2016

क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?

सरल मेरा दोस्त है। अपनी सरलता की ही वजह से मेरा दुश्मन भी है। मौलिक है, नास्तिक है, विद्रोही है। जाहिर है ऐसे आदमी के रिश्ते सहज ही किसी से नहीं बनते। बनते हैं तो तकरार, वाद-विवाद, तूतू मैंमैं भी लगातार बीच में बने रहते हैं। यानि कि रिश्ता टूटने का डर लगातार सिर पर लटकता रहता है।

अभी हाल ही में सरल के दो बहनोईयों का निधन 6-8 महीनों के अंतराल में हो गया। कुछेक मित्रों की प्रतिक्रिया थोड़ी दिल को लगने वाली तो थी पर सरल को वह स्वाभाविक भी लगी। संस्कारित सोच के अपने दायरे होते हैं। मित्रों का इशारा था कि अब भी तुम्हारी समझ में नहीं आया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते, इसलिए यह सब हुआ ?

यह सोच सरल के साथ मुझे भी बहुत अजीब लगी।

पहली अजीब बात तो यह थी कि सरल माने न माने पर उसके दोनों बहनोई ईश्वर में पूरा विश्वास रखते थे। फिर ईश्वर ने सरल के किए का बदला उसके बहनोईयों और बहिन-बच्चों से क्यों लिया ?

दूसरी अजीब बात मुझे यह लगी कि अगर ईश्वर को न मानने से आदमी इस तरह मर जाता है तो फिर ईश्वर को मानने वाले को तो कभी मरना ही नहीं चाहिए ! वैसे अगर सब कुछ ईश्वर के ही हाथ में है तो ईश्वर नास्तिकों को बनाता ही क्यों है !? पहले बनाता है फिर मारता है ! ऐसे ठलुओं-वेल्लों की तरह टाइम-पास जैसी हरकतें कम-अज़-कम ईश्वर जैसे हाई-प्रोफाइल आदमी (मेरा मतलब है ईश्वर) को तो शोभा नहीं देतीं।

इससे भी अजीब बात यह है कि ईश्वर क्या किसी मोहल्ले के दादा की तरह अहंकारी और ठस-बुद्धि है जो कहता है कि सालो अगर मुझे सलाम नहीं बजाओगे तो जीने नहीं दूंगा ! मार ही डालूंगा ! क्या ईश्वर किसी सतही स्टंट फिल्म का माफिया डान है कि तुम्हारे किए का बदला मैं तुम्हारे पूरे खानदान से लूंगा !

क्या ईश्वर को ऐसा होना चाहिए ?

ईश्वर को मानने वालों की सतही सोच ने उसे किस स्तर पर ला खड़ा किया है!

वैसे अगर ईश्वर वाकई है तो क्या उसे यह अच्छा लगता होगा !?


-संजय ग्रोवर

16 जून 2009 को ‘संवादघर’ पर प्रकाशित
6 फ़रवरी 2011 को ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर प्रकाशित



Monday, 11 April 2016

नास्तिकता सहज है

|| नास्ति दतम् नास्ति हूतम् नास्ति परलोकम् || 


यह पंक्ति मैं पहली बार पढ़ रहा हूं।

जब मैं नास्तिक हुआ तो मैंने चार्वाक या मार्क्स का नाम तक नहीं सुना था। ऐसी कोई भारतीय या अन्य परंपरा है, इसकी मुझे हवा तक नहीं थी। कोई वामपंथी पार्टी भी है, यह भी मुझे बहुत बाद में जाकर पता चला। हां, बाद में सरिता-मुक्ता फ़िर हंस जैसी कुछ पत्रिकाओं से इस विचार को बल ज़रुर मिला। मेरा मानना है कि नास्तिकता सहज स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है। धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के कुछ लोगों द्वारा। कल्पना कीजिए कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह है जहां ईश्वर का नामो-निशान तक नहीं है। ईश्वर की कोई ख़बर तक उस देश में कहीं से नहीं आती। कोई मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज, बड़े होते बच्चों को ईश्वर की कैसी भी जानकारी देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता। क़िस्सों और क़िताबों में ईश्वर का कोई ज़िक्र तक नहीं है। तब भी क्या वहां ईश्वर के अस्तित्व या जन्म की कोई संभावना हो सकती है !?

दूसरे, क्या नास्तिकता को किसी परंपरा की ज़रुरत है ? मेरी समझ में जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां कभी न कभी नास्तिकता आ ही जाएगी। चाहे ऐसी कोई परंपरा हो न हो। नास्तिकता तो ख़ुद ही परंपरा के खि़लाफ़ एक विचार है। यह तो प्रगतिशीलता, तर्कशीलता वैज्ञानिेकता और मानवता का मिश्रण है। परंपरा के नष्ट होने से नास्तिकता नष्ट हो जाएगी, ऐसा मुझे नहीं लगता। हो सकता है कि परंपरा के रहते नास्तिकों की संख्या कुछ ज़्यादा होती। पर ऐसे नास्तिक परंपरा से आए आस्तिकों की तरह ही रुढ़ और हठधर्मी होते। जिस तरह हम देखते हैं कि कई बार राजनीतिक पार्टियों के संपर्क में आने से नास्तिक हो गए लोग घटना-विशेष की प्रतिक्रिया में ठीक कट्टरपंथिओं जैसा ही आचरण करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि चूंकि हम यह आचरण घोषित कट्टरपंथियों के विरोध में कर रहे हैं इसलिए यह कट्टरपंथ नहीं, हमारी ‘वैचारिक प्रतिबद्धता’ है।

दोस्त लोग मानते हैं कि नास्तिकता किसी तरह घिसट-घिसट कर जीवित है। ऐसा शायद वे संख्या और सांसरिक/भौतिक सफ़लताओं के आधार पर तय कर लेते है। यही लोग ख़ुदको अघ्यात्मवादी भी मानते हैं। संख्या बल और भौतिक सफलता को मानक बनाएं तो इंसानियत भी एक अप्रासंगिक शय हो चुकी है और इसे भी दफ़ना देना चाहिए। और अगर आप सफ़लताओं की वजह से आस्तिकता के साथ हैं तो इसका एक मतलब यह भी है कि आप उस विचार और सही-ग़लत की वजह से कम और अपने फ़ायदे की वजह से उसके साथ ज़्यादा हैं। कलको आपको नास्तिकता में सांसरिक फ़ायदे दिखेंगे तो आप उसके गले में हाथ डाल देंगे। अगर नास्तिकता घिसटकर चल रही है और इस वजह से अप्रासंगिक है तो भैया सारी क्रांतियां और स्वतंत्रता आंदोलन भी कभी न कभी घिसटते ही हैं। घिसटने से इतना डरना या उसे हेय दृष्टि से क्यों देखना !? दलितों, अश्वेतों और महिलाओं के आंदोलन भी तो सैकड़ों सालों से घिसट ही रहे थे। आज किसी अंजाम पर पहुंचते भी तो दिख रहे हैं।

--संजय ग्रोवर
11-04-2016

24-04-2010 को ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर प्रकाशित
09-07-2010 को ‘संवादघर’ पर प्रकाशित
10-02-2014 को अंग्रेजी अनुवाद  '(W)hues Me ?'  पर प्रकाशित

Friday, 26 February 2016

सुनो पीके

तुम कहते हो-

एक ईश्वर वह है जिसने हमें बनाया।
एक ईश्वर वह है जिसे हमने बनाया।

इसका क्या मतलब हुआ ?


हमें बनाया मतलब सिर्फ़ मुझे या आपको !?


जिसने सारी दुनिया बनाई।


जिसने सारी दुनिया बनाई, उसकी दुनिया में आगे जो भी बनेगा क्या उसकी सहमति के, उसके चाहे बिना बनेगा !?


चारों तरफ़, तरह-तरह के भक्त, साकार और निराकार, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, क़िताबें और अख़बार, टीवी और फ़िल्में, यही तो बांच रहे हैं कि ‘उसकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता’।


जब उसकी मर्ज़ी के बिना हम नहीं हो सकते तो उसकी मर्ज़ी के बिना वह दूसरा ईश्वर कैसे हो सकता है जिसे हमने बनाया ?


बात बड़ी साफ़ है।


या तो दोनों ईश्वर झूठे हैं या दोनों सच्चे हैं। या तो दोनों हमने बनाए हैं या दोनों ख़ुद बने हैं।


या तो दोनों ख़ुद बने हैं या दोनों किसी चालू आदमी की बदमाशी हैं।


या तो दोनों हैं या कोई भी नहीं है। 



अब क्या कहते हो ?


-संजय ग्रोवर
27-02-2016


Friday, 12 February 2016

नास्तिकता पर गोलमोल बातें


4.17 मिनट का यह वीडियो है। फ़ेसबुक पर कुछ लोगों ने इस सलाह के साथ लगाया कि इसे देखकर आपकी आंखें खुल जाएंगी। मैंने, देखा तो मुझे इसमें कोई ख़ास या नई बात नज़र नहीं आई। मैंने पूरा वीडियो ढूंढने की कोशिश की, क़रीब आधा घंटा लगाया, नहीं मिला। एक अन्य वीडियो मिला जो तकरीबन दस मिनट का था।
बहरहाल, कहीं पूरा वीडियो मिल गया और उसमें कुछ अलग निष्कर्ष निकलता दिखाई दिया तो हम दोबारा बात कर लेंगे। अभी इसीपर करते हैं।

यहां यह समझना मुश्क़िल है कि जावेद अख़्तर क्यों यह सफ़ाई दे रहे हैं कि ‘मैंने तो हमेशा कहा आयम एन अथीस्ट.....’, मगर यह स्पष्ट है कि बात पीके की चल रही है और फ़िल्म के निर्देशक राजू हिरानी भी वहीं कुर्सी डाले बैठे हैं। सोचने की बात है कि इससे पहले कब किसीको यह सफ़ाई देनी पड़ती थी कि वह नास्तिक है। यह माहौल नास्तिकता के खि़लाफ़ माना जाए कि उसके पक्ष में माना जाए !? यहां जावेद अख़्तर सहिष्णुता की बात करते हुए 1975 में बनी अपनी ‘शोले’ के उस दृश्य का हवाला दे रहे हैं कि किस तरह नायक एक मंदिर में भगवान की मूर्ति के पीछे छुपकर भगवान बनकर बोल रहा है। वे कहते हैं कि शायद आज मैं इस दृश्य को न लिखता। अब सोचने की बात यह है कि क्या ‘शोले’ अंधविश्वास के खि़लाफ़ और नास्तिकता के पक्ष में बनी कोई फ़िल्म थी !? क़तई नहीं। यह फ़िल्म बदले पर आधारित, नाटकीय दृश्यों से भरी एक साधारण फ़िल्म थी। इसे भी छोड़िए। क्या नायक इस दृश्य में अंधविश्वास हटाने की कोशिश कर रहा है ? क्या वह भगवान का न होना साबित कर रहा है ? बिलकुल भी नहीं। वह तो उसके होने के अंधविश्वास का लाभ उठा रहा है। यह लाभ उसे मिल रहा है यह इसीसे पता चलता है कि नायिका तुरंत इस पर विश्वास कर लेती है। यह दृश्य अंधविश्वास और भगवान के होने के पक्ष में है, उसके खि़लाफ़ नहीं।  इसपर कोई भक्त क्यों ऐतराज़ करेगा ? वीडियो के इस टुकड़े से तो यही समझ में आता है कि वे ग़लत उदाहरण दे रहे हैं। वे और भी फ़िल्मों का उदाहरण देते हैं जिनमें से किसीमें कोई पात्र भगवान की मूर्ति उठाकर फ़ेंक देता है। ऐसी तो बहुत फ़िल्में बनी हैं। अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘नास्तिक’, 1954 में बनी ‘नास्तिक’, सुनील दत्त अभिनीत ‘रेलवे प्लेटफॉर्म’ ऐसी ही, या ऐसे ही कुछ दृश्यों वाली फ़िल्में हैं। मुद्दे की असली बात यह है कि ऐसी किसी फ़िल्म में भगवान के अस्तित्व से इंकार नहीं किया गया। 


जावेद अख़्तर किस तरह के नास्तिक हैं यह तो वही बताएंगे, लेकिन इस तरह की जितनी फ़िल्में बनी हैं, वे भगवान के होने की पुष्टि करतीं हैं, वे किसीकी आंखें नहीं खोलती बल्कि जागते हुए लोगों को भी सुलाने की कोशिश करती लगतीं हैं। आंखें क्या वे तो खुले हुए दिमाग़ों को भी बंद कर देतीं हैं। जावेद यहां कह रहे हैं कि वे भगवान में विश्वास नहीं करते जबकि उन्हींके बराबर में बैठे राजू हिरानी कह रहे हैं कि फ़िल्म दो तरह के भगवानों के बारे में बताती है-एक, जिसे हमने बनाया है ; दूसरा, जिसने हमें बनाया है। और जैसाकि फ़िल्म में भी दिखाया गया है कि दूसरा वाला भगवान असली है। अब जावेद अख़्तर का इसपर क्या मानना है यह तो, अगर उन्होंने इसपर कुछ कहा है तो, बाक़ी वीडियो से ही पता लग सकता है। मेरी समझ में, जावेद अख़्तर की नास्तिकता(अगर वे नास्तिकता का मतलब भगवान के वजूद से इंकार करना मानते हैं) और राजू हिरानी के अंधविश्वास-विरोध का अंतर तो यहीं साफ़ हो जाता है। 


पहले तो इस देश के ज़िम्मेदार प्रगतिशीलों और अंधविश्वास-विरोधियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके नास्तिकता के अर्थ क्या हैं-भगवान को न मानना या मूर्ति और कर्मकांड को न मानना। अब जिन तालिबान की मूढ़ता का हवाला देकर जावेद प्रगतिशीलता का मतलब समझाने की कोशिश कर रहे हैं, मूर्तिपूजा तो वे भी नहीं करते। इससे उनको हासिल क्या हुआ ? असली समस्या सिर्फ़ मूर्तिपूजा नहीं है, असली समस्या 
है किसी निराकार, ग़ायब भगवान/ख़ुदा/शक्ति/गॉड के होने का समर्थन या फिर इसपर चुप्पी या गोलमोल बातें।

12-02-2016

असली समस्याएं हैं इस तरह की मान्यताएं कि कोई अदृश्य शक्ति या शक्तियां इस दुनिया को चलातीं हैं जो कि इंसान से कई गुना ज़्यादा ताक़तवर हैं, इंसान की उस/उनके सामने कोई औक़ात नहीं है, वह बेबस, मजबूर और कमज़ोर है, वह उनके हाथों की कठपुतली है, उसके बस का कुछ नहीं है जब तक कि वह उन तथाकथित शक्तिओं के आगे सिर न झुकाए, उनका अहसान न माने, उन अहसानों का बदला न चुकाए, उन तथाकथित शक्तिओं के होने को बेशर्त स्वीकार न कर ले। मूर्तियां, कर्मकांड, संस्कार, कलंडर, भजन, फ़िल्में, लेख आदि तो उन तथाकथित शक्तिओं के विज्ञापन या रीमाइंडर्स की तरह हैं। ‘भगवान सर्वशक्तिमान है’, ‘वह सर्वत्रविद्यमान है’, ‘उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती’, ‘उसके आगे किसीका बस नहीं चलता’, ‘उसकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता’, ‘उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता’, ‘जाको राखे साईयां’,.....जैसे प्रचलित और आम लोगों में स्वीकृत कहावतें और मुहावरे ही बताते हैं कि समस्या मूर्ति तक सीमित नहीं है। दूरदराज़ गांवों में ओझाओं द्वारा औरतों को उल्टा लटकाकर, आग में मिर्ची झोंककर उनका तथाकथित ‘भूत’ उतारना हो या ज्योतिषी द्वारा किसीका हाथ देखकर भविष्य बताते हुए पैसा झाड़ लेना हो, इन सबकी जड़ में मूर्ति नहीं बल्कि कुछ निराकार/ग़ायब/अदृश्य शक्तिओं पर आदमी का विश्वास है। उन तथाकथित निराकार शक्तियों पर स्पष्ट बातचीत के बिना हम काला जादू, मिडिलमैन और बाबावाद का कुछ कर पायेंगे, यह एक बचकाना ख़्याल ही लगता है। कट्टरपंथिओं को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप ऐसी या वैसी, कैसी शक्तियों को मानते हैं ; उनके लिए इतना काफ़ी है कि आप किसी अमानवीय यानि मानवता से इतर/ऊपर किसी रहस्यमय शक्ति में विश्वास करते हैं। तालिबान भी किसी मूर्ति की वजह से नहीं बल्कि किसी निराकार शक्ति में विश्वास की वजह से ही सब कुछ कर रहे हैं।

जावेद 1975 और आज के फ़र्क़ की बात कर रहे हैं। मेरे पास यह नापने का कोई तरीक़ा नहीं है कि आजकल असहिष्णुता की मात्रा क्या है। लेकिन मैं कह सकता हूं कि असहिष्णुता कि जड़ सिर्फ़ वहां नहीं है, जहां तयशुदा नतीजों के साथ ढूंढी जा रही है। कर्मकांडों और अंधविश्वासों के स्पष्ट विरोधी कहे जानेवाले कबीर की लाश में से फूल 1975 से पहले ही निकाले जा चुके थे। बिना शिक्षा दिए दक्षिणा में ‘शिष्य’ एकलव्य का अंगूठा काट लेनेवाले ‘गुरु’ द्रोणाचार्य के नाम पर पुरस्कार 1975 से पहले से चल रहे हैं। बाबरी मस्ज़िद कांड और दुग्धपान कांड के वक़्त सहिष्णुता थी या असहिष्णुता, कैसे पता लगाया जाए ? ‘जय संतोषी मां’ भी 1974-75 के आसपास ही सुपरहिट हो चुकी थी।

हालांकि उस वक़्त की स्टंट और कमर्शियल फ़िल्मों को हर समझदार दर्शक एक जैसी गंभीरता से लेता होगा, लगता तो नहीं है। फिर भी बात आई है तो ठीक से कर ही लेनी चाहिए कि मूर्ति के साथ भक्तों को इस तरह बातचीत करते शायद ही किसीने देखा होगा जैसा ‘शोले’ व अन्य फ़िल्मों में होता है। वे लोग भजन वग़ैरह गाते हैं, प्रसाद इत्यादि चढ़ाते हैं पर तेज़ आवाज़ में इस तरह बातचीत....! कुछ फ़िल्मों में तथाकथित नास्तिक नायक मंदिर में जाकर भगवान की मूर्ति से लड़ता है कि ‘मैं तुझे नहीं मानता, नहीं मानूंगा.....’ आदि-आदि। नास्तिकता का यह कांसेप्ट सिरे से ग़लत है। जो भगवान के अस्तित्व में ही विश्वास नहीं करता वह उससे लड़ने क्यों जाएगा !? यह तो फ़िल्मी नास्तिकता हुई। यहां यह ज़िक्र करना ज़रुरी है कि मैं 4-5 साल से यूट्यूब पर खोज रहा हूं, मुझे असली नास्तिकता पर आज तक न तो एक भी हिंदी गीत मिला है न एक भी हिंदी फ़िल्म। मेरी खोज में कमी हो सकती है पर यह अभी जारी है।  

यह अनुमान लगाना भी अजीब लगता है कि शोले का वह दृश्य आज स्वीकृत न हो पाता। ‘पीके’ 2015 की रिलीज़ है। 2012 में ‘ओह माय गॉड’ रिलीज़ हुई थी जिसमें नास्तिक शब्द का ख़ुला इस्तेमाल है और परेश रावल मूर्तियों और बाबाओं के साथ कई बार, कई तरह की छेड़खानियां करते हैं। ‘पीकू’ जैसी फ़िल्म भी आजकल में ही रिलीज़ हुई है जिसमें एक बाप अपनी बेटी के सामने उसके सैक्स-संबंधों की चर्चा करता है। ‘तेरे बिन लादेन’ नाम की फ़िल्म का अगला भाग तैयार है। जैसे बोल्ड विषयों पर और बोल्ड संवादों के साथ आजकल फ़िल्में बन रहीं हैं, 1975 में सोचना भी मुश्क़िल रहा होगा। और मैं यह क़तई नहीं कह रहा कि इसका श्रेय किसी सरकार या विचारधारा को जाता है। मेरी सीमित समझ के अनुसार इसका श्रेय टैक्नोलॉजी को जाता है जिसने इंटरनेट, वाई-फ़ाई, स्मार्टफ़ोन, लैपटॉप जैसे माध्यम और उपकरण देकर इंसान को इंसान के क़रीब आने, नये विचार बांटने और एक-दूसरे की संस्कृतियों को जानने में मदद की है, उसकी सोच-समझ के दायरे को बड़ा कर दिया है। 

जावेद यहां यह भी कह रहे हैं कि आपको तालिबान जैसा क्यों बनना चाहिए, क्यों नहीं आप उन्हें अपने जैसा बनाएं। लेकिन भारत की तथाकथित उदारवादी या प्रगतिशील विचारधाराओं से जुड़ी संस्थाएं/पार्टियां क्यों नहीं आर एस एस/मुस्लिम लीग को अपने जैसा बना पाईं ? क्या इसलिए कि उनमें बस उतना ही अंतर है जितना कि साकार और निराकार या ग़ायब और हाज़िर में होता है ?


यानि कि न के बराबर !  

17-02-2016

-संजय ग्रोवर

(इस संदर्भ में ये लेख भी प्रासंगिक हैं- पहला, दूसरा)

(‘ओह माई गॉड’ की समीक्षा और नास्तिकता पर बनी कुछ अन्य हिंदी फ़िल्मों पर बात जल्दी ही)









Monday, 14 December 2015

भगवान के दूत

व्यंग्य

राजधानी का एक संपन्न इलाक़ा जहां कुछ ग़रीबों को भी ‘बिज़नेस’ करने की अनुमति है। बिज़नेस मायने ग़ुब्बारे बेचना, मिट्टी के सस्ते खि़लौने बेचना, भीख मांगना या कुछ ऐसे ही और छोटे-मोटे काम करना।

एक बड़ी और सुंदर गाड़ी। एक हृष्ट-पुष्ट लड़का उतरता है। उसके हाथ में 500-500 रु. के कुछ नोट हैं। उतरकर फ़ुटपाथ पर जाता है जहां एक फ़टेहाल पगली खड़ी आसमान से बातें कर रही है।
‘आप भगवान को मानतीं हैं?’ हृष्ट-पुष्ट लड़का पूछता है।
‘.............’
‘‘मुझे भगवान ने भेजा है, यह लो‘‘, वह 500रु. का एक नोट पगली के हाथ में थमा देता है।
पगली ख़ुशी से नाचने लगती है। उसके कपड़े फ़टे हैं, फ़ुटपाथ पर, और उससे पहले न जाने क्या-क्या सहती आई है मगर नाच रही है। पगली जो है।
हृष्ट-पुष्ट लड़का मन ही मन नाच रहा है। इसने पगली जैसा कुछ नहीं सहा, यूं भी अकसर नाचता ही रहता है। दोनों भगवान को मानते हैं।

यह लड़का एक ग़रीब ग़ुब्बारेवाले के पास पहुंचता है-
‘‘आप भगवान को मानते हैं?’’
‘‘हां, मानता हूं, बहुत मानता हूं।’’
‘‘यह लो 500रु., मुझे भगवान ने भेजा है।’’
ग़ुब्बारेवाला पल-भर सकुचाता है, फिर स्वीकृति के भाव से नोट ग्रहण करता है।

हृष्ट-पुष्ट लड़का इसी तरह कुछ और नोट भगवान को माननेवाले ग़रीबों को बांटता है।

एक फ़टेहाल लड़का अख़बार बेच रहा है।
हृष्ट-लड़का उसके भी पास पहुंच गया है-
‘‘आप भगवान को मानते हैं?’’
अख़बारवाला लड़का उसका मुंह देखने लगता है।
हृष्ट-पुष्ट थोड़ी अड़चन में है। पहली बार उसे अपना सवाल दोहराना पड़ रहा है।
‘‘आप भगवान को मानते हैं ?’’
‘‘.....मानता हूं...तो ?’’
‘‘यह लीजिए, मुझे भगवान ने भेजा है।’’
‘‘ओह! अच्छा! भगवान ने आपको क्यों भेजा!? वह ख़ुद क्यों नहीं आया ?’’
‘‘.............’’
‘‘मुझे भगवान से मिलना है...सुनिए...रुकिए तो सही...मुझे भगवान से मिलना है..’’
‘‘भगवान हर जगह ख़ुद नहीं जा सकते, उन्होंने तुम्हारे लिए मुझे भेजा है।’’
‘‘क्यों, तुम्हारे पास आ सकते हैं तो मेरे पास क्यों नहीं आ सकते?’’
‘‘देखिए आप यह हज़ार रुपए रखिए, मुझे औरों के पास भी जाना है, मैं चलता हूं...’’
‘‘नहीं...मैं आपको ऐसे नहीं जाने दूंगा....यहां राजधानी में ऐसे भी फ्रॉड बहुत होते हैं...आपको सबूत देना होगा कि आपको भगवान ने भेजा है...’’
‘‘..........मगर मैं ऐसा क्यों करुंगा...मैं कुछ दे ही रहा हूं, कुछ ले तो नहीं रहा?’’
‘‘क्या पता तुमने कहीं छुपा कैमरा लगा रखा हो ? बाद में इसे इधर-उधर अपलोड करके हीरो बनते फिरोगे। अपने-आपको श्रेष्ठ साबित करोगे। लड़कियों को इम्प्रैस करोगे। पांच-दस हज़ार रुपए ख़र्च करना तुम जैसों के लिए मामूली बात है......’’
‘‘......................’’
‘‘तुम तो एकदम चुप हो गए?’’
‘‘आप मेरा हाथ छोड़िए....देखिए हम सब एक ही भगवान के बनाए हुए हैं.....उन्होंने मुझे देने के लिए चुना है और तुम्हे लेने के लिए......’’
‘‘पर मुझे तो भगवान बताने आया नहीं कि उसने मुझे पैसे लेने के लिए चुना है !?’’
‘‘...........’’
‘‘तुम जवाब क्यों नहीं दे रहे? ठहरो! तुम्हारी शक़्ल तो उस आदमी से मिलती है जो टीवी पर कह रहा था कि कोई नेता अगर ग़रीब जनता से रुपए या दारु देकर वोट मांगे तो बिलकुल मत देना......कमाल है! अगर तुम वही हो तो ख़ुद कितना गिरा हुआ काम कर रहे हो!?’’
‘‘देखिए......’’
‘‘मुझे भगवान से पूछना है कि इन हज़ार रुपयों से मेरा क्या काम हो सकता है, बाक़ी सारी ज़िंदगी मैं क्या करुंगा? सुनो, तुमने कहा हम दोनों तो एक ही भगवान के बनाए हुए हैं। ऐसा करो, तुम अपना गाड़ी और घर मुझे दे दो, मैं वहां रहूंगा, तुम यहां अख़बार बेचो......’’
‘‘नहीं, मैं अख़बार नहीं बेच सकता, मुझे अपना काम पूरा करना है......’’
‘‘लेकिन मुझसे भगवान ने कहा है कि जो लड़का तुम्हे पांच सौ रुपए देने आएगा उसके गाड़ी और घर तुम ले लेना, और उसे यहां अख़बार बेचने को खड़ा कर देना......’’
‘‘..........’’
‘‘कमाल है! तुम कुछ बोल ही नहीं रहे....मैं तो तुम्हारे भगवान की इच्छा मान रहा हूं, तुम मेरे भगवान की इच्छा क्यों नहीं मान रहे......मैं पुलिस को बुलाऊं क्या?’’
‘‘................................’’

अख़बार वाले लड़के ने हृष्ट-पुष्ट लड़के का हाथ पकड़ा हुआ है और बात-चीत जारी है.......

(मजबूर लोगों में पैसे बांटकर भगवान को सिद्ध करने की चेष्टा करने का एक हास्यास्पद वीडियो देखने के बाद लिखा गया)

-संजय ग्रोवर
23-09-2014

('पागलख़ाना' से साभार)


Thursday, 26 November 2015

भगवानों को भगवानों से बचाएं

लघुव्यंग्य

सुना है जिस दिन भी दो(या तीन-चार-पांच भी हो सकते हैं) भगवान/ख़ुदा/गॉड आपस में लड़ पड़ते हैं, बहुत-से भक्तों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है।

इसलिए कभी भी दो (तथाकथित) ईश्वरों/ख़ुदाओं/गॉडों को आमने-सामने न पड़ने दें वरना वही होने की पूरी संभावना है जो होता आया है-कोई कहा-सुनी, कोई झगड़ा-फ़साद, कोई मार-पीट, कोई लफ़ड़ा-दंगा.....

हालांकि यह बहुत ही मुश्क़िल काम है क्योंकि तथाकथित माननेवालों का कहना है कि तथाकथित ईश्वर/ख़ुदा/गॉड इत्यादि-इत्यादि हर कहीं मौजूद हैं, ज़र्रे-ज़र्रे और आदमी-आदमी तक में मौजूद है....

इंसान बचाए इन माननेवालों से और इनके (तथाकथित) ईश्वरों/ख़ुदाओं/गॉडों से....हमें भी बचाए और इन्हें भी बचाए...

-संजय ग्रोवर
26-11-2015


Thursday, 24 September 2015

भगवान करे!

व्यंग्य/कविता



भगवान करे कि आपको बीमारी न हो
अगर हो जाए तो भगवान करे कि ठीक हो जाए

भगवान करे कि आपके घर में आटा आ जाए
भगवान करे कि आपके घर में घी आ जाए
भगवान करे कि उसका परांठा बन जाए

भगवान करे कि आपको खाना हज़म हो जाए
अगर न हो तो भगवान करे कि आपको क़ब्ज़ न हो 
अगर हो जाए तो भगवान करे कि खुल जाए

भगवान करे कि आज कहीं लूटमार न हो
भगवान करे कि आज कहीं भ्रष्टाचार न हो
भगवान करे कि आज कहीं बलात्कार न हो

क्योंकि भगवान ही तो सब कुछ करता है
हे भगवान फिर हम किसलिए हैं
भगवान करे हम हुआ ही न करें

और जब हम ही न हों तो कौन बीमार होगा और कौन ठीक होगा
किसको ठीक करेगा भगवान किसकी ज़िंदगी से खेलेगा भगवान

फिर भगवान भी क्यों हुआ करे ?

भगवान दरअस्ल है भी कहां ?

मैं भी तो भगवान से ज़रा-सा टाइमपास कर रहा था

-संजय ग्रोवर
25-09-2015



Sunday, 20 September 2015

फ़ोटोकॉपियों का ‘वैचारिक’ द्वंद :-)


अगर कोई सेठ किसी मजदूर से कहे कि भईया ज़रा एक दीवार खड़ी कर दो मैं तुम्हे इतनी मज़दूरी दूंगा और मजदूर थोड़ी देर हवा में खुरपी चलाए, सर पर नक़ली तसला रखे, थोड़ी देर दीवार बनाने का अभिनय करे फिर कहे कि लो बन गई दीवार, अब दो मेरे पैसे! तो सेठ दे देगा क्या ?

लेकिन मज़ेदार बात यह है कि धर्म और कर्मकांड के नाम पर यही बचकाना अभिनय घर-घर में चलता है। कोई किसी एक दिन किसीको एक धागा बांध देता है और सोचता है कि हो गई उसकी रक्षा। अब यह बहिन बाज़ार में छेड़ी जाए कि ससुराल में पीटी जाए, भाई ख़बर लेने भी न जाए, पर यह काल्पनिक रक्षा हवा में चलती रहती है। कई लोग साल में एक दिन कहीं कुछ दिया-बत्ती जला देते हैं और सोचते हैं कि फ़ैल गया ज्ञान का प्रकाश। कोई किसी दिन एक डंडे में झंडा लटका लेता है और सारे घिनौने काम बेफ़िक्री से जारी रखता है और वो राष्ट्रप्रेमी कहलाता है।

मज़े की बात यह है कि इन बचकाने लोगों का ‘आत्मविश्वास’ इतने ग़ज़ब का होता है कि जो लोग ये बचकानी हरक़तें न करतें हों, उन्हें ये ‘सुधारना’ चाहते हैं, ‘ऐक्सपोज़’ करना चाहते हैं। क्या ग़ज़ब है !? और इनमें सभी तरह की विचारधाराओं, धर्मों, लिंगों, पेशों के लोग होते हैं।

ये मज़ेदार लोग प्रगतिशीलता की चिंघाड़ लगाते-लगाते एक ऐसे आदमी के पीछे खड़े हो जाते हैं जो बड़े-बड़े पाखंडियों से भी ज़्यादा ऊंची आवाज़ में भगवान-भगवान, चमत्कार-चमत्कार चिल्ला रहा होता है। जिसके ऑडियो-वीडियो सारी दुनिया के देशों और चैनलों में/पर मौजूद होते हैं फिर भी इन्हें यह ख़ुशफ़हमी होती है कि ये ऐक्सपोज़ नहीं हुए, कोई दूसरा ऐक्सपोज़ हो गया है!! ये चाहते हैं कि इन्हें सिर्फ़ इसलिए प्रगतिशील मान लिया जाए कि इन्हींके ‘दर्शन’ और ‘थ्येरी’ से बनी किसी कट्टरपंथी राजनीतिक या सामाजिक संस्था को ये नियमित अंतराल के बाद ग़ालियां बकते रहने का कर्मकांड करते हैं। ये ख़ुद कबीरदास की लाश में से फूल निकाल लेते हैं और दूसरों को मूर्ति को दूध पिलाने पर डांटते हैं।

ऐसे आत्ममुग्ध और बेहोश लोगों को कोई सुधार सकता है क्या ? इन्हें तो होश में लाना भी मुश्क़िल है।

ऐसे, तथाकथित ‘परस्पर-विरोधी’, लोग एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं, एक ही पायजामे के दो पायचे होते हैं, एक ही कट्टरता के दो चेहरे होते हैं।

इनके कर्मकांडो से कुछ नहीं बदलता, अकसर ये किसी दूसरे के किए का मज़ा ले रहे होते हैं।

-संजयग्रोवर
20-09-2015

Monday, 31 August 2015

भगवान है तो उसके पास जाते क्यों नहीं !?

व्यंग्य

मेरे लिए यह मानना मुश्क़िल है कि लोग भगवान और स्वर्ग इत्यादि में विश्वास करते हैं। 

लगभग हर तथाकथित धार्मिक आदमी कहता है कि आखि़रकार तो हमें भगवान के पास जाना है। हर कोई बताता है कि स्वर्ग में बढ़िया शराब है, जिसे सुंदर महिलाएं सर्व करतीं हैं। वहां कोई जादुई पेड़ है जो इच्छाएं पूरी करता है। वहां रहने का कोई किराया नहीं लगता, मकान या प्लॉट नहीं ख़रीदना पड़ता, वहां जाने तक के सफ़र में भी कोई पैसे नहीं लगते। इसके अलावा मैं देखता हूं, आप भी देखते होंगे कि तथाकथित धार्मिक आदमी जो भी करता है, स्वर्ग और भगवान को ध्यान में रखकर करता है।

लेकिन मुझे एक बात क़तई समझ में नहीं आती, जो आपकी निगाह में दुनिया की सबसे सुंदर जगह है, जहां जाने के लिए ही आप सब कुछ कर रहे हैं, वहां जाने की जल्दी किसीको भी नहीं है!? क्यों !? इतनी अच्छी जगह को छोड़कर आप इस सड़ी-गली-पापी दुनिया में क्यों रह रहे हैं !? क्या मजबूरी है !? भगवान के पास जाना तो बहुत ही आसान है। कोई किराया भी नहीं लगता। थोड़ी-सी नींद की गोलियां, एक रस्सी का फंदा, एक माचिस की तीली, एक ऊंची छत......ऐसा कोई एक विकल्प चाहिए बस। और तो कुछ करना नहीं है।

स्वर्ग से अच्छी कॉलोनी कहां मिलेगी ?भगवान जैसा सर्वगुणसंपन्न, सर्वशक्तिमान पड़ोसी भी कहां मिलेगा ? मगर किसीको जल्दी नहीं है !? आदमी को जनता फ्लैट छोड़कर एल आई जी लेने का मन आ जाए, तब तो वह उधार ले-लेकर भी वहां पहुंच जाता है। मगर जो फ़ाइनल डेस्टीनेशन है, वहां पहुंचने की कोई जल्दी नहीं !? अस्सी-अस्सी साल तक यहीं पड़े हैं !! दवाईयां खा-खाके खाट से चिपटे हैं !! टट्टी-पेशाब भी बिस्तर में ही किए जा रहे हैं। दूसरे साफ़ कर रहे हैं। इंजेक्शन और ड्रिप घुसा-घुसाके किसी तरह ज़िंदा हैं। मगर दुनिया छोड़ने को राजी नहीं है !! अरे भई, जाओ अपनी पसंदीदा जगह, जल्दी से जल्दी जाओ। कौन रोक रहा है ? कोई रोके तो शिकायत करो। तमाम एन जी ओ हैं, समाजसेवी संस्थाएं हैं, दानी सज्जन हैं.....सब आपकी मदद करेंगे। वे भी तो वहीं जाना चाहते हैं। सब पीछे-पीछे आएंगे। आप शुरुआत तो करो अच्छे काम की।

क्यों दोस्तों की, परिचितों की, रिश्तेदारों की चिंता करते हो ? एक बार ख़ुद पहुंच जाओ, फिर उन्हें भी बुला लेना। इतनी अच्छी जगह हर किसीको जाना चाहिए, जल्दी से जल्दी जाना चाहिए। 

मगर ये तथाकथित धार्मिक लोग ख़ुद तो जाते नहीं, दूसरों को भेजना चाहते हैं। वो भी उनको जो भगवान-स्वर्ग-नरक को मानते ही नहीं। अरे भाई अगर तुम्हे वाक़ई भगवान और स्वर्ग में विश्वास है तो पहले ख़ुद जाना चाहिए। तभी तो लोगों को विश्वास आएगा। तब वे ख़ुद ही पीछे-पीछे आएंगे।

जिस दिन मैं तथाकथित धार्मिक लोगों को किरोसिन तेल, नींद की गोलियों, रस्सी के फंदे, चाकू या ब्लेड वगैरह के साथ एडवांस में डैथ सर्टीफिकेट के लिए एप्लाई करते देखूंगा, मुझे भी थोड़ा-थोड़ा विश्वास आएगा कि वाक़ई तथाकथित धार्मिक लोग स्वर्ग और भगवान इत्यादि में विश्वास करते हैं।

-संजय ग्रोवर
01-09-2015