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Friday, 4 December 2015

उस ज़हर का क्या करें.....

ग़ज़ल

इस सदी की आस्था को देखकर मैं डर गया
बच्चे प्यासे मर गए और दूध पी पत्थर गया

माना अमृत हो गया दो दिन समंदर का बदन
उस ज़हर का क्या करें जो आदमी में भर गया

हिंदू भी नाराज़ मुझसे और मुसलमां भी ख़फ़ा
होके इंसा यार मेरे! जीतेजी मैं मर गया

दर्द को इतना जिया कि दर्द मुझसे डर गया
और फिर हंस कर के बोला, यार मैं तो मर गया

-संजय ग्रोवर


Thursday, 24 September 2015

भगवान करे!

व्यंग्य/कविता



भगवान करे कि आपको बीमारी न हो
अगर हो जाए तो भगवान करे कि ठीक हो जाए

भगवान करे कि आपके घर में आटा आ जाए
भगवान करे कि आपके घर में घी आ जाए
भगवान करे कि उसका परांठा बन जाए

भगवान करे कि आपको खाना हज़म हो जाए
अगर न हो तो भगवान करे कि आपको क़ब्ज़ न हो 
अगर हो जाए तो भगवान करे कि खुल जाए

भगवान करे कि आज कहीं लूटमार न हो
भगवान करे कि आज कहीं भ्रष्टाचार न हो
भगवान करे कि आज कहीं बलात्कार न हो

क्योंकि भगवान ही तो सब कुछ करता है
हे भगवान फिर हम किसलिए हैं
भगवान करे हम हुआ ही न करें

और जब हम ही न हों तो कौन बीमार होगा और कौन ठीक होगा
किसको ठीक करेगा भगवान किसकी ज़िंदगी से खेलेगा भगवान

फिर भगवान भी क्यों हुआ करे ?

भगवान दरअस्ल है भी कहां ?

मैं भी तो भगवान से ज़रा-सा टाइमपास कर रहा था

-संजय ग्रोवर
25-09-2015