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Thursday, 20 August 2015

मां-बाप और पूजा

कभी कहीं कह दो कि पूजा ख़तरनाक़ है चाहे पत्थर की हो, चाहे गुरु की हो, चाहे मां-बाप की हो तो ज़ाहिर है कि कई तरह के लोगों को, कई तरह के आदियों-वादियों को बुरा लगता होगा। लेकिन यह भी तो समझना चाहिए कि पूजा आखि़र है क्या ? पूजा किसीको ख़ुश करने का सबसे आसान तरीक़ा है। पूजा एकतरफ़ा बातचीत है। मज़े की बात तो यह है कि जिसकी पूजा की जाती है उसकी तो स्वीकृति/अस्वीकृति भी नहीं पूछी जाती। पूजा एकतरफ़ा बातचीत है। जिसका आदर करने का दावा किया जा रहा है उसकी पसंद/नापसंद की भी चिंता नहीं की जाती। पूजा एक असमानता का संबंध है। कुछ कर्मकांड हैं जिन्हें करने में किसी तरह का कोई सामाजिक ख़तरा नहीं है। बल्कि मु्फ्त की तारीफ़ ज़रुर मिलती है।

और पूजा से मां-बाप की ज़रुरतें पूरी हो जाएंगी क्या !? करके देखना चाहिए। सुबह चार बजे उठकर मां-बाप की आरती वगैरह उतारें और दिन-भर उन्हें पूछें नहीं, न खाने को दें न पीने को, न बात करें, न पास बैठें। यही तो पूजा है। इससे मां-बाप का काम चल जाएगा क्या ?

आप पूरे देश में पूछते घूमिए, दस-पचास लोग भी मिल जाएं जो कहते हों कि मां-बाप की बात नहीं माननी चाहिए, मां-बाप महान नहीं होते, मां-बाप को घर से निकाल देना चाहिए........ऐसा कहता है क्या कोई ? उसके बाद सुबह-शाम आप ज़रा पार्कों में चले जाईए, वृद्धाश्रमों में चले जाईए-वहां बूढ़े-बूढ़ियां बैठे अपने बहू-बेटों को रो रहे होते हैं। ये कौन लोग हैं ? ये क्या स्विटज़रलैंड से आए हैं !? या फ्रांस ने हमारी संस्कृति को बदनाम करने को भेज दिए हैं !? भारत में तो कोई मां-बाप का अनादर करता नहीं। फिर ये बूढ़े-बूढ़ियां कहां से टपकते चले जाते हैं ? सही बात यह है कि हम लोग झूठा सम्मान करने में अति-ऐक्सपर्ट लोग हैं।

एक बात और समझ से बाहर है। एकाएक, बैठे-बिठाए किसी दिन आप मां-बाप बनते हैं और महान हो जाते हैं!! कैसे!? दुनिया-भर में गुंडे हैं, बदमाश हैं, स्मगलर हैं, दंगाई हैं, बलात्कारी हैं, आतंकवादी हैं और पता नहीं क्या-क्या हैं.........उनमें से भी ज़्यादातर लोग किसी न किसीके मां-बाप हैं। वे क्यों महान नहीं हैं ? अगर महानता की यही कसौटी है तो उनका भी आदर कीजिए। उन्हें तो आप ग़ालियां भी दे देते हैं!! वे तथाकथित ऊंची जातियां जिन्होंने किन्ही तथाकथित नीची जातियों को ग़ुलाम बनाया, वे भी तो किसीके मां-बाप हैं। वे महान क्यों नहीं हैं ? ये क्या कसौटी हुई कि सिर्फ़ आपके ही मां-बाप महान हैं !? समझ में नहीं आता कि आदमी में ऐसी कौन-सी प्रोग्रामिंग हो रखी है कि इधर उसका बच्चा पैदा होना शुरु होगा और उधर मम्मी-पापा महान होना शुरु हो जाएंगे !?

और हैरानी होती है कि ऐसी अतार्किक बातें वे लोग भी करते हैं जो अपना या अपने समाज का जीवन बदलने के लिए कुछ भी बदलने को तैयार हैं मगर मां-बाप की बात आते ही फिर परंपरा को पकड़कर लटक जाते हैं ? अगर तुम्हे परंपरा में इतनी दिलचस्पी है तो परंपरानुसार ग़ुलामों की तरह रहो फिर। यहां तो सब परंपराएं ग़ुलामी की ही परंपराएं हैं।

तो मैं यह कह रहा था कि पूजा में विचार का, बुद्धि का, सवाल उठाने का कोई स्थान नहीं है। पूजा न करने का यह मतलब नहीं है कि मां-बाप से बदतमीज़ी करें, उन्हें परेशान करें, उनका तिरस्कार करें, उन्हें खाने-पीने को न दें। वैसे यह सब तो पूजा के साथ-साथ भी किया जा सकता है। होता भी होगा। पूजा न करने का मतलब है बराबरी के स्तर पर बातचीत। न कोई छोटा है न बड़ा। न कोई ऊंचा है न नीचा। ऐसे संबंध में बात का और तर्क का महत्व है, व्यक्ति की हैसियत या उम्र का नहीं। जिसकी भी बात जायज़ है, मान ली जाएगी।

वरना तो पूजा करने वाले यही करेंगे कि बाप कहेगा कि जाओ बेटा मां का सर काट लाओ, और ये चल पड़ेंगे सर काटने। लो श्रद्धेय पिताजी, श्रद्धेय माताजी का सर हाज़िर है।

और बाद में सर काटने वालों की भी पूजा होगी।


-संजय ग्रोवर
20-08-2015



Monday, 22 June 2015

बेटा, थोड़ा-सा धन्यवाद होगा क्या ?

लोग अकसर कहते पाए जाते हैं कि सूरज का धन्यवाद करो, तुम्हे धूप देता है ; भगवान की पूजा करो, उसने तुम्हे बनाया है, मां-बाप का अहसान मानो कि वे तुम्हे इस ख़ूबसूरत दुनिया में लाए.....

सुनने में ये बातें बहुत भली लगतीं हैं, मगर इनके पीछे का सच क्या है ?
सूरज क्या किसी व्यक्ति या व्यक्तिविशेष के लिए धूप देता है ? अगर ऐसा होता तो सूरज बंद घरों की दीवारें भेदकर बीमार बूढ़ों और कमज़ोर बच्चों तक न पहुंच जाता ? सूरज तो उन जंगलों और पहाड़ों पर भी धूप बरसाता है जहां आदमी के बच्चे का नामो-निशान तक नहीं पाया जाता! वहां उसको ‘थैंक्यू अंकल’ बोलनेवाला या आर्चीज़ के ग्रीटिंग कार्ड भेजनेवाला कौन बैठा है ? और हम समझ रहे हैं कि सूरज हमारे थोथे कर्मकांडों और खोखली औपचारिकताओं की वजह से ही रोज़ाना ढाई टन प्रति गांव के हिसाब से धूप सप्लाई कर रहा है। 

हम बड़े मज़ेदार लोग हैं। 

मां-बाप का, भगवान का अहसान मानो कि वे तुम्हे दुनिया में लाए! 

मानने में हम काफ़ी होशियार हैं, क्या-क्या नहीं माने बैठे! पर यह भी तो सोचने की बात है कि मां-बाप बच्चों को दुनिया में किसलिए लाते हैं ? क्या बच्चों के लिए ? क़तई नहीं ? कोई बच्चा किन्हीं मां-बाप के पास अर्ज़ी नहीं डालता कि हे मेरे होनेवाले माता-पिता, मिस्टर एंड मिसेज़ अल्फ़ा-बीटा, आपसे अनुरोध है कि कृपया मुझे जल्दी से जल्दी इस दुनिया में लाएं। 


जो है ही नहीं उसकी न तो मर्ज़ी का कोई स्कोप है न अर्ज़ी की कोई संभावना।

बच्चे की चाहत बड़ों को होती है। कोई दादी, पोते (आजकल कहीं-कहीं पोती ) का मुंह देखना चाहती है तो कोई नाना, नातिन से खेलना चाहते हैं। किसीको वंश बढ़ाने की चिंता है तो किसीको बच्चा किसी बाबा को देना है। बच्चे न हुए जैसे रेवड़ियां हो गईं। होनेवाले बच्चे को बेचारे को मालूम ही नहीं है कि मुझे लेकर क्या-क्या योजनाएं बनाई जा चुकी हैं। मालूम पड़ जाए तो हो सकता है बहुत-से बच्चे पिछली गली से ही निकल लिया करें कि अंकल, हमीं पर सारी नींव जमाई जा रही है और हमसे पूछा तक नहीं!! अपने पास रखो ऐसी तानाशाह दुनिया! हम जहां हैं, वहीं ठीक हैं। नहीं हैं, तो नहीं ठीक हैं। 

कुछ बच्चे, सुना है, लापरवाही में ही पैदा हो जाते हैं। अहसान तो उनपर भी उतना ही लादा जाता होगा। कौन उन बच्चों से कहता होगा कि बेटे तुम तो यूंही भूल-चूक लेनी-देनी के खाते में चढ़ गए, हमसे ग़लती हुई, हमें माफ़ करो। सुना है क्या कभी ? उल्टे उनसे भी जमकर काम लिया जाता होगा।


कई लोग बच्चे इसलिए पैदा करके बैठ जाते हैं वे हमारा नाम करेंगे। नाम अव्वल तो होता नहीं, हो जाए तो भी उससे कुछ होता नहीं। आप ही बताईए, भारत में किसीको राजेश खन्ना के मम्मी-पापा का नाम मालूम है क्या ? कितने लोग दिलीप कुमार के माता-पिता का नाम जानते हैं ? चलो रतन टाटा के मम्मी-पापा का नाम ही बता दो ज़रा ?

क्या हुआ ?


नाम से होना बस यही है कि जुगाड़ से किसीको अस्पताल में बैड दिलवा दोगे। सिफ़ारिश से किसीकी नौकरी लगवा दोगे। किसीका ट्रांसफ़र रुकवा दोगे। यानि सारे काम इम्प्रोपर चैनल से करोगे। क़ायदे से कुछ नहीं करोगे। देश में सही सभ्यता हो, ईमानदारी हो तो जेनुइन काम तो सबके यूंही हो जाया करेंगे, किसी जुगाड़ की, सिफ़ारिश की ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी। मगर ऐसा हुआ तो फिर आपको कौन पूछेगा, आपका नाम कैसे होगा!? इसलिए भैया अपने चार अक्षर के नाम के लिए देश में गंदगी मेंटेन करो, और करो, करते ही रहो।

पिछले बरसों तक तो कई लोगों को यही डर लगा रहता था कि शादी के दस-बारह महीने में बच्चा न हुआ तो कहीं कोई नामर्द न कह दे! अब बताईए, मर्दानगी का ढोल किसीको पीटना है और भुगतेगा कोई और। यह पवित्र भावना अभी भी बहुत जगह जारी होगी। यहां तो प्रगतिशील भी तरह-तरह की परंपराएं पकड़े बैठे हैं फिर दूसरों का क्या दोष!

वैसे धन्यवाद करने को दुनिया में और भी बहुत लोग हैं-कूड़ा उठानेवाले हैं जो एक हफ़्ते न आएं तो हमारी सारी प्लानिंग बिगड़ जाती है। रिक्शेवाले हैं जो हमसे उम्र में बड़े हों तो भी हमें बाऊजी-बाऊजी कहते हैं। वैज्ञानिक हैं जो घरबार छोड़कर, दिन-रात प्रयोगशालाओं में बैठे-बैठे हमारे लिए सुविधाएं पैदा करते हैं। बच्चों का भी धन्यवाद किया जा सकता है कि हम तुम्हारी मर्ज़ी पूछे बिना तुम्हे इस दुनिया में ले आए और तुमने बुरा न माना, जो भी हमने कहा मानते चले गए, कभी कोई सवाल न उठाया।


चांद-सूरज को हम धन्यवाद न भी दे  तो उनका कुछ बिगड़ नहीं जाएगा। वे हमारे धन्यवाद से नहीं चलते।


-संजय ग्रोवर
23-06-2015