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Saturday, 25 April 2015

भूकंप पर चिंतन में निराधार कंपन

प्राकृतिक आपदाओं के बाद जो सबसे अजीब और विचित्र (मुझे पता है दोनों का मतलब एक ही है) प्रतिक्रिया होती है, वह यह है कि यह सब भगवान ने ही किया है। इसलिए कि धरती पर पाप बहुत बढ़ गए थे, प्रदूषण ज़्यादा हो गया था वगैरह......। कई लोग चाहें तो इसमें व्यक्तिगत ख़ुन्नस भी जोड़ सकते हैं कि मेरा पड़ोसी गुटख़ा बहुत खाने लगा था, फ़ेसबुक पर साहित्य के मुनीमों की पूंछ(मतलब महत्व वग़ैरह) ख़त्म हो गई थी, लोग पुरस्कारों पर उंगली उठाने लगे थे.......तो भूकंप तो आना ही था।

इन विद्वानों से पूछना चाहिए कि जब पाप बढ़ रहे थे तब भगवान क्या कर रहा था!? क्या भगवान भी इलैक्ट्रौनिक मीडिया में काम सीखके आया है कि पहले तो किसीको अपनी हत्या करने दे बाद में रोना-धोना करने लगे!? यह भगवान है कि किसी पोंगे स्कूल का टीचर है जो पहले तो बच्चों को लड़ता-मरता छोड़कर क्लास से ग़ायब हो जाता है और बाद में आकर उन्हें पीटता है कि मेरी अनुपस्थिति में लड़ क्यों रहे थे ?


और यह क्या ढंग हुआ पापियों को समझाने का ? मुझे किसीसे कोई शिक़ायत है, मैं उसे कुछ समझाना चाहता हूं तो बिलकुल सीधा और आसान रास्ता है कि मैं अपने मुंह से बोलकर उसे बताऊं कि भई मुझे आपसे यह शिक़ायत है, कृपया आप मेरे साथ ऐसा व्यवहार न किया करें। मगर यह क्या तरीक़ा हुआ कि मैं उसे पीछे से जाकर झकझोर दूं और भागकर ग़ायब हो जाऊं, उसे यह तक न पता चले कि कौन झकझोर गया, क्यों झकझोर गया !?

यह तो मैं तभी करुंगा जब मैं गूंगा होऊं या ख़ुद मेरे मन में कोई शैतानी हो।


क्या भगवान ऐसा ही है? पहले तो पाप होते देखता रहता है, फिर जब पाप हो चुकते हैं तो लोगों को समझाने निकलता है!? और समझाते हुए भी सीधा नहीं बोलता, झटके देता है, पहेलियां बुझाता है! इसका मतलब तो यह हुआ कि कुछ लोग पाप की वजह से मर जाते हैं और कुछ भगवान के समझाने के अजीब ढंग की वजह से।


अगर दुनिया के सभी लोग एक-दूसरे को भगवान वाले ढंग से समझाने लगे तो क्या हाल होगा इस दुनिया का ?

भूकंप से तो जो नुकसान होता है, होता ही है, उससे बड़ा और दीर्घकालिक नुकसान इस वजह से होता है कि लोग एक प्राकृतिक आपदा को भगवान नाम की पूर्णतया अव्यवहारिक कल्पना से जोड़कर जनमानस के मन में निराधार डर और अंधविश्वास भरते रहने से बाज़ नहीं आते।


-संजय ग्रोवर
25-04-2015