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Saturday, 11 July 2015

ग़ुम नास्तिक

व्यंग्य

समाज अकसर ग़ुम नास्तिकों को पसंद करता है।

किसी दुर्घटना के दौरान जब किसीको अंदरुनी चोट, जो कि बाहर से दिखाई नहीं देती, लग जाए तो कई लोग कहते हैं कि फ़लां व्यक्ति को गुम चोट पहुंची है। समानार्थी या निकटार्थी शब्दों में आप गुमसुम, लुल्ल, ग़ायब, ख़ामोश, अंतर्मुखी आदि शब्दों को शामिल कर सकते हैं।

गुम नास्तिक भी कुछ ऐसी ही चीज़ है। कई बार तो इसके अपने अलावा किसीको मालूम ही नहीं होता कि यह नास्तिक है।

पड़ोसी जागरन में बुलाए, यह बिलकुल दूसरों की तरह जाता है।

कोई दहेज़दार शादी में बुलाए, यह बिलकुल दूसरों की तरह मनोयोग के साथ लिफ़ाफ़ा तैयार करता है।

कोई इससे कहे कि धर्मस्थल में घुसने से पहले सर पर कपड़ा, रुमाल, तौलिया वगैरह डाल लो ; यह तत्परता से डाल लेता है।

कोई कुलबुलाहट, कोई ग़ुस्सा, कोई विरोध, कोई विद्रोह !? 

अजी, चेहरे पर एक चिन्ह तक दिखाई नहीं देता।

पूछो कि करवाचौथ की तैयारियां चल रहीं हैं, तुम कुछ बोलते क्यों नहीं !?

‘‘अरे, इतना तो चलता है,’’ यह कहता है।

कहो कि देखो उन्होंने कीर्तन के नाम पर रास्ता जाम कर दिया, हमें उन्हें समझाना चाहिए।

‘‘तो क्या सब तुम्हारी तरह जिएं ? ऐसे चलती है क्या ज़िंदग़ी ?’’ इसे ग़ुस्सा आने लगता है।

इससे कहो कि बच्चे की ख़ाल बहुत नाज़ुक है, उसे दर्द होगा, इन्फ़ेक्शन भी हो सकता है, मुंडन-वुंडन का लफ़ड़ा छोड़ क्यों नहीं देते ?

‘‘अरे बच्चे का मुंडन करा रहे हैं, तुम्हारा तो नहीं करा रहे, तुम्हारा क्यों ख़ून जल रहा है ?’’ इसके तर्क ‘प्रैक्टीकल’ होना शुरु हो जाते हैं। 

कहो कि आप श्राद्ध क्यों कर रहे हो, आप तो नास्तिक हो !?

‘‘ये प्रैक्टीकल लाइफ़ है। तुम्हे कुछ पता भी है!’’ यह डांटने पर उतर आता है। 

मगर जिन्हें डांटना चाहिए, उनके साथ खड़े होकर यह खी खी करेगा।

अब आप पूछेंगे कि यह नास्तिक किधर से है !?

मगर इनमें से कई होते हैं- किसी गोष्ठी में, किसी सेमिनार में, किसी मुशायरे में, किसी सम्मेलन में, दोस्तों के साथ किसी गपशप या बहस में, कभी-कभार होते हैं।

कभी-कभी किसी कविता में जिसमें ठीक-ठीक पता भी नहीं लगता कि यह कविता किसी ईश्वर के होने के संदर्भ में है या न होने के बारे में है, ये वहां नास्तिक होते हैं ; अगर आपको वह कविता ठीक से समझ में आ जाए। 

किसी मुशायरे में ग़ज़ल के पांचवे-छठे शेर में ये नास्तिक होते हैं जिसमें यह पता लगाना मुश्क़िल होता है कि ये ख़ुदा को डांट रहे हैं या उससे डांट खा रहे हैं। ये शेर* इस ‘कलात्मक’ ढंग से रचे गए होते हैं कि ख़ुदा के मानने वाले समझते हैं कि बंदा ख़ुदा की शान में क़सीदे पढ़ रहा है और न मानने वाले समझते हैं कि क्या हिम्मती आदमी है, सरे-आम ख़ुदा को नकार रहा है। 

जैसे कई लोग इंटरव्यू देते वक़्त पीछे दीवार पर भगतसिंह, विवेकानंद आदि का फ़ोटो टांग देते हैं। अच्छा है कि भगतसिंह ख़ुद मौजूद नहीं हैं वरना आप जानते ही हैं, टांगनेवाले कुछ भी टांग सकते हैं। भगतसिंह का फ़ोटो देखकर राष्ट्रवादी लोग समझते हैं कि इंटरव्यू देनेवाले सज्जन राष्ट्रवादी हैं और मानवतावादी नास्तिक समझते हैं कि बंदा नास्तिक है। अब भगतसिंह तो हैं नहीं जो आके बताएं कि वे क्या हैं और किस तरफ़ हैं। आकर करेंगे भी क्या ? आखि़र कितनी बार ख़ुदको टंगवाएंगे ? टांगनेवालों की तो टांगे भी नहीं थकती टांगते-टांगते!

तो ऐसा नास्तिक फिर भी न सिर्फ़ ख़ुदको नास्तिक मानता है बल्कि प्रगतिशील भी मानता है। और सिर्फ़ ख़ुद ही नहीं मानता, अगर मौक़ा और माहौल अनुकूल हों तो, दूसरों से भी मनवाता है।

कई ग़ुम नास्तिक नौकरी न लगने तक, कैरियर न बनने तक ग़ज़ब के बग़ावती, विद्रोही, रिबेल (तीनों का एक ही मतलब है) नास्तिक रहते हैं। नौकरी लगने या कैरियर बनने के बाद इनका पहला काम होता है 
नास्तिकता से पीछा छुड़ाना। उसके बाद इनमें से कई, ग़ुमों से भी ज़्यादा ग़ुम हो जाते हैं। 

पता ही नहीं लगता कि हैं या नहीं हैं।   

दुनियादार लोग ऐसे नास्तिकों को प्रेम से पास बिठाते हैं।


वे भी जानते हैं कि इनका होना न होना बराबर है।


-संजय ग्रोवर
11-07-2015


*ऐसे दो-चार शेर कभी इस ख़ाक़सार ने भी लिखे हैं।