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Friday, 26 February 2016

सुनो पीके

तुम कहते हो-

एक ईश्वर वह है जिसने हमें बनाया।
एक ईश्वर वह है जिसे हमने बनाया।

इसका क्या मतलब हुआ ?


हमें बनाया मतलब सिर्फ़ मुझे या आपको !?


जिसने सारी दुनिया बनाई।


जिसने सारी दुनिया बनाई, उसकी दुनिया में आगे जो भी बनेगा क्या उसकी सहमति के, उसके चाहे बिना बनेगा !?


चारों तरफ़, तरह-तरह के भक्त, साकार और निराकार, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, क़िताबें और अख़बार, टीवी और फ़िल्में, यही तो बांच रहे हैं कि ‘उसकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता’।


जब उसकी मर्ज़ी के बिना हम नहीं हो सकते तो उसकी मर्ज़ी के बिना वह दूसरा ईश्वर कैसे हो सकता है जिसे हमने बनाया ?


बात बड़ी साफ़ है।


या तो दोनों ईश्वर झूठे हैं या दोनों सच्चे हैं। या तो दोनों हमने बनाए हैं या दोनों ख़ुद बने हैं।


या तो दोनों ख़ुद बने हैं या दोनों किसी चालू आदमी की बदमाशी हैं।


या तो दोनों हैं या कोई भी नहीं है। 



अब क्या कहते हो ?


-संजय ग्रोवर
27-02-2016


Friday, 15 January 2016

रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-3

(रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-2)


रंगो और प्रतीकों का खेल एक चालाक़ खेल है। इसमें नफ़रत फैलानेवाले शख़्स के लिए प्रेम का कोई प्रतीक चुनकर लोगों को झांसा देने की मज़ेदार सुविधा है, इसमें वंचितों को वंचित बनाए रखकर उनका मसीहा बन जाने का पूरा जुगाड़ है, इसमें स्त्रीविरोधी होते हुए भी स्त्रियों का पसंदीदा बन जाने के अच्छे चांसेज़ हैं।

मुझे याद आता है कि फ़ेसबुक के मेरे दो ग्रुपों में ऐसी कई घटनाएं हुईं। ‘नास्तिक’ ग्रुप में कुछ लोगों ने कहा कि यहां स्त्रियां नहीं हैं। हालांकि ऐसा नहीं था कि ग्रुप में स्त्रियां बिलकुल नहीं थीं, मगर काफ़ी वक़्त तक मैं चुपचाप सुनता और देखता रहा। जब ठीक लगा, इसपर स्टेटस लिखा। हंसी यह देखकर आती है कि लोग कैसी-कैसी बेतुकी बातों में ख़ुद भी उलझे हुए हैं और दूसरों को भी बहका रहे हैं। कलको आप कहेंगे कि ग्रुप में मुसलमान कितने हैं, अगर कम हैं तो आप मुस्लिम-विरोधी हैं, बच्चे कम हैं तो आप बच्चा-विरोधी हैं, ग्रुप में अगर कोई लैस्बियन नहीं है तो आप लैस्बियन-विरोधी हैं, ग्रुप में अगर सांवले लोग नहीं हैं तो आप उनके खि़लाफ़ हैं.........। हैरानी होती है कि कैसे-कैसे लोग यहां चिंतक और प्रगतिशील बने बैठे हैं। अगर किसी ग्रुप में हम नास्तिकता पर विचार करने बैठे हैं और वहां सभी आमंत्रित हैं तो जो भी बात करना चाहे, करे। हम क्या हर तरह की वैराइटी ज़बरदस्ती पकड़-पकड़कर जमा करेंगे ? हम विचार करने बैठे हैं या मिठाई की दुकान खोलकर बैठे हैं, या हम कोई फ़रमाइशी रेडियो-कार्यक्रम चला रहे हैं !? भारत में नास्तिक वैसे ही ढूंढे से मिलते हैं तिसपर भी महिलाएं !? और महिलाएं जहां चाहें वहां नास्तिक बनें, हमारा कोई ठेका है कि हर किसीको हम ही बनाएंगे!! 

और इस दृष्टि से सोचें तो बुद्ध (जैसाकि सुना है उनके यहां स्त्रियों की मौजूदगी नहीं थीं) स्त्रीविरोधी हुए, राजेंद्र यादव (चूंकि दूसरी शादी किए बिना सहायक के साथ रहते थे) स्त्रीविरोधी हुए और वे सब ज़मींदार, राजा-महाराजा और गैंगस्टर नारीवादी हुए जो अपने घरों-महलों-अड्डों में स्त्रियां जमा करके रखते थे। एक पुराने काल्पनिक नायक जो नदी-किनारे, कहानीनुसार, स्त्रियों के कपड़े ले-लेकर भाग जाते थे फिर भी स्त्रियां उनके आसपास मंडरातीं थीं, तो क्या फ़ॉर्मूलानुसार स्त्रियों को लुभाने के लिए हर कोई यही करता फिरे !? क्या रोज़ाना हर किसीकी पसंदानुसार उल्टे-सीधे कामकर उसे लुभाना ही ज़िंदगी है ? आदमी को दूसरा कोई काम नहीं क्या ? 

मगर प्रतीकात्मकता-पसंद लोगों के मानदण्ड इतने ही हास्यास्पद हैं। अगर कोई मर्द अपने घर में बिना किसी दूसरे मर्द/मानव के रहता हो तो इनके हिसाब से तो वो भी मर्द या मानवविरोधी हुआ!! यह तो ऐसे हुआ कि जब तक आप कोट-टाई पहने हैं तब तक पढ़े-लिखे हैं, रात को जैसे ही आप पायजामा पहनेंगे, अनपढ़ हो जाएंगे!! इन र्खों की तथाकथित बुद्धि के अनुसार तो होगा यही कि आदमी जिन-जिन मूल्यों का समर्थक है उनकी एक-एक निशानी चौबीस घंटे अपने शरीर पर, घर में, दफ़्तर में, रास्ते में.....हर जगह प्रदर्शित करे वरना ये उसको विरोधी घोषित कर डालेंगे। अब सोचिए कि आदमी इनकी बुद्धि से चला तो उसका दिन कैसे गुज़रेगा और रातों की क्या गत बनेगी !?

निशानियां पाखंडियों को चाहिएं होतीं हैं, करनेवाले चुपचाप अपना काम करते हैं, अपने स्वभाव को जीते हैं। 

इनकी मेधा तो ऐसी है कि जब तक आप दुनिया के सारे धर्मों, देशों के लोगों के साथ उनके त्यौहार नहीं मनाएंगे, उनकी मिठाईयां नहीं खाएंगे, उनके साथ उनके त्यौहार पर नाचेंगे नहीं...तब तक ये आपको उनका दुश्मन मानेंगे। अगर आपका कोई क्रिश्चियन दोस्त नहीं है तो आपको इनकी वजह से बनाना पड़ेगा या किराए पर लाना पड़ेगा। अगर आपका कोई रशियन दोस्त नहीं है तो आप वहां जाकर कुछ रशियन दोस्त बनाईए, किराया-ख़र्चा ये उठाएंगे। दुनिया में अगर एक भी आदमी ऐसा है जिससे कभी आप मिले नहीं, उसके साथ कभी खाया-पिया नहीं, सलाम-नमस्ते-गुड मॉर्निंग इत्यादि नहीं की तो इनके अनुसार आप उसके दुश्मन हुए। कर लीजिए क्या करेंगे ?

कई लोग समय-समय पर अपने परिवारों की भी प्रदर्शनी लगाते हैं कि देखिए मैं हिंदू हूं, पत्नी मुस्लिम है, बेटा क्रिश्चियन है, फ़लां ये है, ढिकां वो है....और हम पचास/पांच सौ साल से एक साथ रहते हैं। मैं सोचता हूं कि पचास/पांच सौ साल तक साथ रहकर भी हिंदू हिंदू रहा, क्रिश्चियन क्रिश्चियन और मुस्लिम मुस्लिम ; आदमी कोई भी न हो सका तो यह ख़ुश होने की बात है या रोने की, माथा फोड़ने की बात है !? 

इनकी ज़िंदगी है कि चलता-फिरता शोकेस है !?

(ज़रुरी हुआ तो आगे भी)
-संजय ग्रोवर
15-01-2016

Thursday, 31 December 2015

रंगो और प्रतीकों का चालू खेल-1

शाहरुख़ खान की फ़िल्म ‘दिलवाले’ का ‘रंग दे तू मोहे गेरुआ’ देखकर मुझे आमिर खान की ‘रंग दे बसंती’ याद आ गई (आप कहेंगे निर्देशकों के नाम क्यों नहीं लिखे तो मैं कहूंगा कि फ़िल्म के प्रोमोज़ में हीरो-हीरोइन को जिस तरह आगे किया जाता है और बातचीत की जाती है कि लगता है फ़िल्म उन्हींने बनाई है, सो निर्देशक याद ही नहीं रह पाता)। फ़िल्म में बसंती रंग से जुड़े किन्हीं दबंगों की ख़बर ली गई थी और साथ में फ़िल्म के नाम और कथ्य में इसी रंग को महिमामंडित भी किया गया था। इसीसे मुझे याद आया कि तथाकथित भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ रामदेव से शुरु होकर अन्ना हज़ारे तक पहुंचे तथाकथित आंदोलन के इंटरवल के दौरान आमिर खान ने ही मंच पर आकर, बाक़ायदा टोपी लगाए हुए अपना रोज़ा खोला था और अन्ना हज़ारे को जूस वगैरह पिलाकर अनशन वगैरह ख़त्म कराया था। बाद में इन्हीं आमिर की ‘पीके’ आ गई जिसमें धार्मिक प्रतीकों की हंसी उड़ाई गई थी। 

ऐसे विरोधाभास हमारे जीवन में कोई एक दिन की नहीं, बल्कि आए दिन की बात है। 

बाद में यह भी कहा गया कि अन्ना हज़ारे बीजेपी के आदमी हैं और केजरीवाल प्रगतिशील हैं। और तथाकथित प्रगतिशीलों की एक पूरी की पूरी फ़ौज केजरीवाल के पीछे खड़ी दिखाई देने लगी। मैं बहुत चक्कर में पड़ गया। भगवान-भगवान, अनशन-अनशन, चमत्कार-चमत्कार रामदेव भी कर रहे थे, अन्ना भी कर रहे थे और केजरीवाल भी कर रहे थे। फिर इनमें से कोई कट्टर, कोई मध्यमार्गी और कोई प्रगतिशील कैसे हो गया !? इस हिसाब से तो आमिर खान बीजेपी के आदमी हुए! या वे किसी ग़लतफ़हमी में अन्ना का अनशन तुड़वा आए थे!? या यह कोई फ़िल्म चल रही थी जिसमें सबके जुड़वां और डुप्लीकेट काम कर रहे थे इसलिए कुछ मालूम नहीं हो पा रहा था कि कौन क्या है, किसके लिए काम कर रहा है, काम कर रहा है या काम का नाम करके अपना नाम कर रहा है !?

ख़ैर मुझे इन आंदोलनों से यह लाभ हुआ कि कई उलझी पहेलियां सुलझ गईं। 

रंगों, प्रतीकों, धर्मों, धारणाओं, जातियों, कर्मकांडों...... आदि का मिला-जुला प्रभाव ही ऐसा है कि जब तक आप इनके ज़रिए आदमी को समझने की कोशिश करते रहते हैं, बार-बार धोखा खाते हैं। यह हमारी मूर्खता है कि हमें कोई आदमी सीधे ही समझ में आ रहा होता है फिर भी हम उसे किसी गमछे, टोपी, मफ़लर, टाई, नाम, डिग्री, प्रोफेशन, सलाम, नमस्ते....यानि किन्हीं मान्यताओं और परिभाषाओं में बांध-बांधकर समझने में लगे रहते हैं। हमारी आंखों देखी बात होती है कि भगतसिंह, कबीरदास, विवेकानंद जैसे नामों का इस्तेमाल कई परस्पर विरोधी विचारधाराओं के लोग एक साथ कर रहे होते हैं, फिर भी हम अपनी पसंद या मजबूरी के हिसाब से उनमें से किसी एक को संबंधित महापुरुष का सच्चा अनुयाई, समर्थक या उत्तराधिकारी मान लेते हैं तो दूसरे को उस नाम का नाजायज़ फ़ायदा उठानेवाला चालू आदमी कह लेते हैं। 

क्या रंगों और प्रतीकों को उस तरह बांटा जाना चाहिए जैसे बांट लिया जाता है ? कौन है जो इन्हें बांटने का अधिकारी है, इनका मालिक है ? कौन है जो कहता है कि गाय मैं फलाने के नाम करता हूं, भैंस आज से ढिमकाने की हुई, तोता चमकानेलाल का हुआ और सांप धमकानेप्रसाद का हुआ ? कौन है जो लाल-पीला-नीला-हरा रंग लोगों को अलॉट कर रहा है ? किसने उसे ये अधिकार दिए हैं ? अगर रंगों और प्रतीकों को कुछ लोगों और समूहों को आवंटित कर दिया गया है तो बाक़ी लोग उनका इस्तेमाल करना छोड़ दें क्या!? मसलन मुझे अगर किसी दिन नारंगी रंग का इस्तेमाल करना हो तो पहले तो मैं यह पता लगाने जाऊं कि किसीने इसपर क़ब्ज़ा तो नहीं कर रखा ? और जब मुझे मालिक़ का पता चल जाए तो में ऐप्लीकेशन भेजूं कि भाईसाहब, आज ज़रा नारंगी शर्ट पहनने का मन हो रहा था, आप कहें तो पहन लूं, वरना क्या ऐसे ही निकल जाऊं ? हरा रंग इस्तेमाल करना हो तो उसके मालिक़ के पास जाऊं कि भाईसाहब ढाई सौ ग्राम हरा रंग चाहिए था ज़रा, अकेले आप की ही दुकान है जिसे इस रंग का ठेका मिला हुआ है, इसलिए आपको परेशान किया वरना कहीं और से ले लेता ! रंगों और प्रतीकों पर जिस हास्यास्पद गंभीरता के साथ तरह-तरह की विचारधाराओं ने क़ब्ज़ा कर रखा है उससे नतीजा यह निकलता दिखाई देता है कि भारत में शादी के दिन ज़्यादातर लड़कियां कम्युनिस्ट हो जातीं हैं क्योंकि ज़्यादातर ने उस दिन लाल जोड़ा पहन रखा होता है। 

कम्युनिस्टों के तो मज़े हो गए, उन्हें तो कुछ करने की ज़रुरत ही नहीं रही।


(बचा-ख़ुचा)

-संजय ग्रोवर
31-12-2015