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Saturday, 12 March 2016

लड़कियां

लड़कियों को लेकर भारतीय समाज में अकसर एक ऊहापोह सा बना रहता है। लड़कियां क्या खाती हैं, क्या पीती हैं, क्या सोचतीं हैं आदि-आदि से लेकर ‘लड़कियां किस तरह के पुरुषों को पसंद करतीं हैं’ जैसे विस्फ़ोटक मसलों में कई मर्दों की जान और ज़िंदगी अटकी रहती है। मज़े की बात यह है कि कट्टरपंथी परंपरावादी राजा-महाराजाओं से लेकर तथाकथित प्रगतिशीलों तक सभी अपने आसपास रहनेवाली लड़कियों या महिलाओं की संख्या से अपनी महानता नापने की कोशिश में लगे पाए गए हैं। ऐसा लगता है कि जैसे लड़कियां पुरुषों की छाती पर टांगे जाने वाले मैडल/तमग़े हैं, जैसे लड़कियां पुरुषों को मिलनेवाले पुरस्कार हैं, जैसे वे सत्संग के बाद बंटनेवाला प्रसाद हैं, जैसे वे मर्दों को देखकर गश खाने और क्रश आने के लिए ही पैदा हुई हैं। एक पुरानी और प्रसिद्ध कहानी में कृष्ण नामक एक नायक का ज़िक्र मैंने सुना है जो नदी-किनारे से नहाती हुई लड़कियों के कपड़े वगैरह चुराकर पेड़ पर चढ़ जाते थे और तिसपर भी लड़कियां आ-आकर उनकी गोपियां हुई जातीं थीं। और कहानी के यह कृष्ण शादीशुदा भी हैं और इनकी पत्नियों की भी अच्छी-ख़ासी संख्या गिनाई जाती है।

अभी एक विश्वविद्यालय में कथित रुप से पाए जानेवाले कंडोमों की संख्या किसीने गिनाई तो कुछ लोग उसपर गर्व करते दिखे तो उन्हीं में से कुछ लोग इस चिंता में परेशान दिखे कि वहां पढ़नेवाली लड़कियों के मां-बाप क्या सोचेंगे ? वहां पढ़नेवाले लड़कों के मां-बाप क्या सोचेंगे, इसकी चिंता किसीको भी नहीं हुई। साफ़ है कि इस समाज में अभी लड़कियों की वह स्थिति नहीं बन पाई कि आप उनके साथ अपने संबंधों को जैसे हैं वैसे बता भी सकें। मेरी समझ में पत्नी, प्रेमिका, गोपिकाएं और श्रद्धालु प्रशंसिकाएं एक साथ रखने के लिए इस तरह की विरोधाभासी बातों के पाखंड के अलावा और कोई चारा भी नहीं है। इसको प्रगतिशीलता तो कतई नहीं माना जा सकता। प्रगतिशीलता के लिए बहुत साहस चाहिए जो कि लोगों में अकसर नहीं होता, इसलिए यहां प्रगतिशील कहे जानेवाले या ख़ुदको प्रगतिशील समझने का भ्रम पालनेवाले लोग भी चार तरह की बातें एक साथ कह देते हैं। पाखंडी संस्कृति में लड़कियों को भी ऐसे ही लोग सूट करते हैं जो दिखाने और करने के फ़र्क़ की तथाकथित सभ्यता को बड़ी होशियारी और चालाक़ी से बरतने के आदी हों। अब या तो आप लड़कियों/लड़कों से स्पष्ट संबंध रख लीजिए या फिर यह चिंता कर लीजिए कि उनके घरवाले क्या सोचेंगे। दोनों चीज़ें एक साथ साधेंगे तो झूठ और अभिनय के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। फिर अपनेआप को कट्टरपंथियों और पाखंडियों से अलग और प्रगतिशील समझना एक झूठी तसल्ली से ज़्यादा कुछ नहीं है।

कोई हैरान हो सकता है कि लड़कियां, वो भी प्रगतिशील लड़कियां, कैसे किसी शादीशुदा की गोपियां बनने को तैयार हो जातीं हैं ? सीधा कारण समझ में आता है कि बचपन से रटाई सामाजिक मान्यताएं इसमें बड़ा काम करतीं हैं। उसके बाद का काम हमारा साहित्य और फ़िल्में पूरा करते आए हैं।
प्रगतिशील लड़कियां कैसे किसी प्रगतिशील लड़के पर मरनेवाली लड़कियों की गिनती बढ़ाकर अपने जीवन को सार्थक मान सकतीं हैं ? कोई प्रगतिशील मर्द कैसे महिलाओं को मैडल की तरह अपनी छाती पर टांक कर ख़ुश हो सकता है !? यह मानसिकता किसी नेता की रैली में आई या  जैसे-तैसे-कैसे भी जुटाई भीड़ को देखकर ख़ुश होने की मानसिकता से कैसे अलग है ? कैसे कोई शादीशुदा कृष्णकन्हैया इतनी स्त्रियों के प्रेमनिवेदन से ख़ुश हो सकता है जबकि उसके अपने घर में उसकी कई रानिया-महारानियां क़ैदी की तरह रह रहीं हों। कल्पना कीजिए कि उन रानियों के पास भी इतनी-इतनी संख्या में प्रेमनिवेदन और फिर प्रेमनिवेदन की स्वीकृति के बाद पुरुष-गोपक दिन-रात प्रेमलीला रचाते-मचाते नज़र आने लगें तो इन तथाकथित प्रगतिशील महाराज की क्या स्थिति हो रहेगी ? उसके बाद फिर बच्चे भी यही लीला करने लगें तो एक यमुना तट तो घर में बनाना पड़ जाएगा। ऊपर से एक समस्या यह भी रहेगी किन लोगों को इन संबंधों को गर्व की तरह दिखाना है और किन लोगों से इसलिए छुपाना है कि उनके घरवाले क्या सोचेंगे, इसका भी पूरा हिसाब-क़िताब रखना पड़ेगा। सही बात यह है कि ऐसे संबंध आसानी से वही लोग निभा सकते हैं जो रात-दिन पाखंड के आदी हों। दूसरा तरीक़ा है कि इन संबंधों को जैसे हैं वैसा ही बताओ, किसीके घरवाले क्या सोचेंगे इसकी चिंता छोड़ दो। मगर उसके लिए साहस चाहिए, कई तरह के नुकसान उठाने की तैयारी चाहिए, पहलक़दमी की हिम्मत चाहिए, जिसकी हमारे समाज को आदत नहीं है, इसलिए उसमें अभी भी वक़्त लगनेवाला है।


अपने ऊपर मरनेवाली लड़कियों की संख्या गिन-गिनकर ख़ुश होना, दोस्तों-यारों को बताना....लड़कियों को सामान समझने की मानसिकता से क़तई अलग नहीं है। सिर्फ़ लड़कियों की ही संख्या गिनते रहना उन्हें बाक़ी समाज से अलग करके, असामान्य बनाकर देखना भी है जिसमें नुकसान अकसर लड़कियों का ही होता आया है। आखि़र उस संख्या की उपयोगिता क्या है ? क्या आप उनसे किसी विशेष प्रकार का संबंध रखते हैं ? अगर रखते हैं तो क्या उसे सार्वजनिक रुप से स्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं ? या वे लड़कियां आप पर ठीक वैसी ही श्रद्धा रखतीं हैं जैसी किसी गुरु के प्रति रखने की हमारी परंपरा रही है ? जिस श्रद्धा में एकलव्य ने अपना ही अंगूठा काट लिया था ! यह श्रद्धा कतई ख़तरनाक़ है। मगर इसके बड़े फ़ायदे हैं और इसीलिए मुझे लगता है कि तथाकथित प्रगतिशील कहे जानेवाले लोग किसी न किसी तरह से पुरानी परंपराओं को बनाए रखने के बहाने ढूंढते रहते हैं।

यहां यह क़ाबिले-ग़ौर है कि फ़ेसबुक पर मेरे साथ 3-4 बार ऐसा हुआ कि कोई लड़की ख़ुदही बात करने आई और सामान्य बातें ही कर रही थी कि एकाएक बीच में कोई तथाकथित प्रगतिशील शख़्स प्रकट भए और लड़की को इशारों-इशारों में सावधान करने लगे, मेरी उम्र वगैरह के बारे में हिंट देने लगे। बड़ी हैरानी हुई क्योंकि ये लोग एक तो ख़ुदको प्रगतिशील कहते थे, दूसरे ख़ुद शादीशुदा होते हुए भी ट्राई मारते फिरते थे। जबकि मैं एक बैचलर हूं। और उम्र क्या बता रहे हो, जब लड़की साक्षात मुझसे मिलेगी तो देख ही लेगी, सब कुछ फ़ेसबुक पर तो नहीं हो जानेवाला! राजेंद्र यादव के मामले में देख ही चुका था, समझने में देर नहीं लगी कि इन तथाकथित प्रगतिशीलों की भी अपनी वानर-सेनाएं हैं और ये भी किसीसे कम नहीं हैं। ये भी तरह-तरह के डरों और आशंकाओं से घबराए हुए हैं और स्त्रियों को उनके हाल पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। फिर एक-दो दूसरी घटनाएं हुईं जिनमें लड़कियों ने पहले ख़ुद ही कोई बोल्ड क़िस्म का मज़ाक़ किया, बाद में प्रत्युत्तर में मैंने कुछ कह दिया तो उन्होंने उसे ग़लत ढंग से पेश करना शुरु कर दिया। समझ में आया कि मनुवाद अभी कितने-कितने रुपों में मौजूद है।

बहरहाल मैं तो करना कुछ और दिखाना कुछ को न तो प्रगतिशीलता मान सकता हूं न साहस। न ही लड़कियों को तमग़ों की तरह टांगने में कोई दिलचस्पी(कभी हुआ करती थी) बची है। अगर ‘मरनेवाली’ लड़कियों की संख्या से ही किसीकी महानता नापनी हो तो विजय माल्या, रविशंकर, शाहरुख़ खान, आमिर ख़ान, सलमान, अक्षय कुमार, चार्ल्स शोभराज, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, इमरान ख़ान, उमर शरीफ़, ओशो रजनीश आदि-आदि को सर्वाधिक महान लोगों में गिना जाना चाहिए।


हां, स्पष्टवादी और बेबाक़ व्यक्ति के प्रति, थोड़ी देर के लिए ही सही, एक आदर का भाव ज़रुर उठता है, चाहे वह व्यक्ति लड़का हो चाहे लड़की।


-संजय ग्रोवर

12-03-2016

Saturday, 18 July 2015

झूठ से पैदा समस्याएं झूठ से हल कैसे होंगी !?

आंकड़े हमेशा ज़रुरी नहीं होते, कई तथ्य ऐसे होते हैं जो हम अकसर अपनी आंखों से देखते हैं मगर समाज में फ़ैली कुछ मान्यताओं या परंपराओं, क़िताबें पढ़-पढ़कर बनी कुछ धारणाओं के डर से ख़ुदसे भी छुपाते रहते हैं। कई लोग कहते हैं कि समलैंगिकता जैसी चीज़ भारत में बाहर/यूरोप से आ गई है, हम तो बड़े अध्यात्मिक लोग हैं......

मुझे यह जानने के लिए क़तई आंकड़ों की ज़रुरत नहीं है कि यह चीज़ भारत में बहुत पहले से मौजूद है। मैं जिस कस्बे में पैदा हुआ वह पुरुष समलैंगिकता के लिए मशहूर था। वहां मेरे जैसे लड़के बिलकुल उसी तरह डरे रहते थे जैसे लड़कियां डरी रहती थीं। कई लोग इसी दृष्टि से घूरते भी थे, या मुझे लगता होगा कि ऐसा है। जैसे डरी हुई लड़कियां किसी भी पुरुष का विश्वास आसानी से नहीं कर पातीं, अगर मेरे जैसे लड़कों को भी यह लगता था तो इसमें असामान्य क्या है! इस तथ्य(पुरुष समलैंगिकता की वजह से हमारे कस्बे की मशहूरी) की पुष्टि उस दिन हुई जब दूसरे शहर के हॉस्टल के कुछ सीनियर लड़कों ने रैगिंग के दौरान मेरा परिचय जानने के बाद अपने हाथ पीछे ले जाते हुए कहा कि भई, इससे तो डर लग रहा है, हाथरस से आया है।

मैं समझता हूं कि हमारी समलैंगिकता से उनकी बेहतर इसलिए है क्योंकि वे ज़बरदस्ती नहीं करते, सहमति से संबंध बनाते हैं, छुपाते नहीं हैं। भारत के लोगों को बहुत कुछ इसलिए छुपाना पड़ता है क्योंकि यहां के लोगों ने अपनी महानता(?) और पवित्रता(?) को लेकर दुनिया-भर में बड़ी-बड़ी डींगें हांक रखीं हैं कि तुम सब भौतिकतावादी हो इसलिए बड़े ख़राब हो, चरित्रहीन हो।

इसी तरह जानवरों के साथ संबंधों के क़िस्से भी मैंने तभी सुन लिए थे। इसमें कितनी नमक-मिर्च थी, कितनी ‘आंखिन-देखी’ थी यह तो मैं नहीं बता सकता मगर आज मुझे इसमें कोई हैरानी भी नहीं होती। अगर हम मनुष्य के साथ बिना सहमति के कोई संबंध बना सकते हैं, ऊंच-नीच कर सकते हैं तो पशुत्व की तरफ़ क़दम तो हम पहले ही बढ़ा चुके हैं।

इस्मत चुगताई की कहानी ‘लिहाफ़’ पहले ही इशारा कर रही थी कि स्त्री-समलैंगिकता भी अपने यहां कहीं न कहीं मौजूद है। हमारे पास कुछ है तो बस यही कि हर चीज़ को छुपाओ, किसीको भी, ख़ासकर विदेशियों को कुछ पता न लगने दो। मगर सोचने की बात यह है कि छुपाने से दूसरी बहुत सारी (मानसिक) समस्याएं/बीमारियां पैदा हो जातीं हैं। मैंने जो थोड़ा-बहुत मनोविज्ञान पढ़ा या सुना है और ख़ुद भी अनुभव किया है उससे तो यही पता चलता है कि मनुष्य की बहुत-सी मानसिक समस्याओं/बीमारियों की वजह उसका दोहरा व्यवहार/'छुपाओ' यानि ‘करो कुछ बताओ कुछ’ का रवैय्या है। तिस पर एक और बड़ी मुसीबत यह है कि यही लोग आए दिन दूसरों को, ख़ासकर उन लोगों को पागल/सनकी/विकृत करार देते और नुकसान पहुंचाते रहते हैं जो एक साफ़-सुथरी और स्पष्ट ज़िंदगी जीने की कोशिश कर रहे हैं।

झूठ समझने और बताने के लिए हमेशा आंकड़ों और सर्वे की ज़रुरत नहीं होती, दोहरी ज़िंदगी जीने वाले समाजों में या अतीत में घट चुकी घटनाओं के मामले में हमेशा यह संभव भी नहीं हैं। लेकिन कुछ बातें सहज समझ और अनुभवों से भी समझी जा सकती हैं। एक-दो ऐसे उदाहरण बताता हूं। जैसे कि बीच में कहा गया कि चाउमिन की वजह से छेड़छाड़ या बलात्कार होते हैं। इसका मतलब क्या हुआ ? इसके अलावा और क्या कि चाउमिन पुरुषों की किसी क्षमता या उत्तेजना में वृद्धि करते हैं। मगर सोचने की बात यह है कि तब क्या चाउमिन इतने सस्ते मिलते !? तब लोग महंगे शिलाजीत और महामहंगे वियाग्रा की तरफ़ क्यों भागते !? तब इनपर भी बैन क्यों नहीं होना चाहिए ? जब आदमी का कोई भरोसा ही नहीं है तो वह कुछ भी खाकर कहीं भी कुछ भी कर सकता है। सही बात यह है कि ज़्यादातर घटनाएं इन सब कारकों की अनुपस्थिति में होतीं हैं। दूसरे उदाहरण में, जो राजा हज़ार-हज़ार और पांच-पांच सौ रानियां रखते थे उनमें से कई अपने हरमों में उन रानियों की सेवा के लिए हिजड़ो (आज की सभ्य भाषा में लैंगिक विकलांग) की नियुक्ति करते थे। इससे तो यही समझ में आता है कि वे भी मर्द की सीमित क्षमताओं को जानते थे और अपनी अनुपस्थिति में घट सकने वाली सहज-संभाव्य घटनाओं से बचने की फ़ौरी जुगाड़ करते थे। यानि कि मर्दों की वास्तविक/सीमित क्षमता पर परदा डालने का प्रयत्न करते थे। एक झूठे अहंकार की रक्षा करते थे।

इसमें सोचने की बात यही है कि ऐसे प्रयत्नों से समस्याएं सुलझेंगी कि बढ़ती जाएंगी !?   

-संजय ग्रोवर    
18-07-2015