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Monday, 11 April 2016

नास्तिकता सहज है

|| नास्ति दतम् नास्ति हूतम् नास्ति परलोकम् || 


यह पंक्ति मैं पहली बार पढ़ रहा हूं।

जब मैं नास्तिक हुआ तो मैंने चार्वाक या मार्क्स का नाम तक नहीं सुना था। ऐसी कोई भारतीय या अन्य परंपरा है, इसकी मुझे हवा तक नहीं थी। कोई वामपंथी पार्टी भी है, यह भी मुझे बहुत बाद में जाकर पता चला। हां, बाद में सरिता-मुक्ता फ़िर हंस जैसी कुछ पत्रिकाओं से इस विचार को बल ज़रुर मिला। मेरा मानना है कि नास्तिकता सहज स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है। धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के कुछ लोगों द्वारा। कल्पना कीजिए कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह है जहां ईश्वर का नामो-निशान तक नहीं है। ईश्वर की कोई ख़बर तक उस देश में कहीं से नहीं आती। कोई मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज, बड़े होते बच्चों को ईश्वर की कैसी भी जानकारी देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता। क़िस्सों और क़िताबों में ईश्वर का कोई ज़िक्र तक नहीं है। तब भी क्या वहां ईश्वर के अस्तित्व या जन्म की कोई संभावना हो सकती है !?

दूसरे, क्या नास्तिकता को किसी परंपरा की ज़रुरत है ? मेरी समझ में जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां कभी न कभी नास्तिकता आ ही जाएगी। चाहे ऐसी कोई परंपरा हो न हो। नास्तिकता तो ख़ुद ही परंपरा के खि़लाफ़ एक विचार है। यह तो प्रगतिशीलता, तर्कशीलता वैज्ञानिेकता और मानवता का मिश्रण है। परंपरा के नष्ट होने से नास्तिकता नष्ट हो जाएगी, ऐसा मुझे नहीं लगता। हो सकता है कि परंपरा के रहते नास्तिकों की संख्या कुछ ज़्यादा होती। पर ऐसे नास्तिक परंपरा से आए आस्तिकों की तरह ही रुढ़ और हठधर्मी होते। जिस तरह हम देखते हैं कि कई बार राजनीतिक पार्टियों के संपर्क में आने से नास्तिक हो गए लोग घटना-विशेष की प्रतिक्रिया में ठीक कट्टरपंथिओं जैसा ही आचरण करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि चूंकि हम यह आचरण घोषित कट्टरपंथियों के विरोध में कर रहे हैं इसलिए यह कट्टरपंथ नहीं, हमारी ‘वैचारिक प्रतिबद्धता’ है।

दोस्त लोग मानते हैं कि नास्तिकता किसी तरह घिसट-घिसट कर जीवित है। ऐसा शायद वे संख्या और सांसरिक/भौतिक सफ़लताओं के आधार पर तय कर लेते है। यही लोग ख़ुदको अघ्यात्मवादी भी मानते हैं। संख्या बल और भौतिक सफलता को मानक बनाएं तो इंसानियत भी एक अप्रासंगिक शय हो चुकी है और इसे भी दफ़ना देना चाहिए। और अगर आप सफ़लताओं की वजह से आस्तिकता के साथ हैं तो इसका एक मतलब यह भी है कि आप उस विचार और सही-ग़लत की वजह से कम और अपने फ़ायदे की वजह से उसके साथ ज़्यादा हैं। कलको आपको नास्तिकता में सांसरिक फ़ायदे दिखेंगे तो आप उसके गले में हाथ डाल देंगे। अगर नास्तिकता घिसटकर चल रही है और इस वजह से अप्रासंगिक है तो भैया सारी क्रांतियां और स्वतंत्रता आंदोलन भी कभी न कभी घिसटते ही हैं। घिसटने से इतना डरना या उसे हेय दृष्टि से क्यों देखना !? दलितों, अश्वेतों और महिलाओं के आंदोलन भी तो सैकड़ों सालों से घिसट ही रहे थे। आज किसी अंजाम पर पहुंचते भी तो दिख रहे हैं।

--संजय ग्रोवर
11-04-2016

24-04-2010 को ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर प्रकाशित
09-07-2010 को ‘संवादघर’ पर प्रकाशित
10-02-2014 को अंग्रेजी अनुवाद  '(W)hues Me ?'  पर प्रकाशित

Sunday, 15 November 2015

सांप्रदायिकता आखि़र है क्या ?

आपको अपने उस धर्म पर गर्व है जिसे चुनने में आपका कोई हाथ नहीं।

आप अपने उस इतिहास पर इतराते फिरते हैं जिसे बनाने में आपका कोई हाथ नहीं। बनाना तो छोड़िए, उसमें कितना सही है कितना ग़लत है, यह भी आप ठीक से पता नहीं लगा सकते।

आपको अपने पुरख़ों पर गर्व है जिन्हें भी आपने नहीं बनाया। न सिर्फ़ गर्व है, बल्कि बिना किसी डी एन ए टैस्ट के गर्व है।

आपको अपने माता-पिता पर गर्व है क्योंकि वे आपके माता-पिता हैं, भले आप यह पता नही लगा सकते कि उनके आपके माता-पिता होने में आपका भी कोई हाथ है या नहीं। 

आपको अपने देश/प्रांत/शहर पर अभिमान है जिनमें आप जब पैदा हुए तो आपको अपनी चड्ढी संभालना भी नहीं आता था, यानि यह सवाल ही नहीं पैदा होता था कि आप अपनी मर्ज़ी से उन्हें चुन सकें। 

यानि कि आपको उन सब चीज़ों/परंपराओं/रिश्तों/मूल्यों पर गर्व है जिन्हें बनाने में आपका रत्ती-भर भी हाथ नहीं है, जिनकी प्रामाणिकता का भी ठीक-ठाक पता नहीं है।

तो फिर आपको उन चीज़ों/मूल्यों/रिश्तों पर तो भयानक गर्व होगा जिन्हें बनाने या चुनने में आपका भी थोड़ा-सा या ज़्यादा-सा हाथ होगा! मसलन आपका स्कूल, आपका कॉलेज, आपका प्रेमी, आपकी प्रेमिका, आपका पति, आपकी पत्नी, आपके बच्चे, आपकी नौकरी, आपका मकान, आपकी दुकान, आपके.......

अभी थोड़ी ही देर बाद आपको उदारता, सहिष्णुता, ख़ुलेपन...आदि-आदि पर भाषण देने जाना है।

पर उस भाषण में आप किसे संबोधित करेंगे !? जितने भी लोग वहां बैठे हैं सबके मां-बाप महान हैं, सबके बच्चे महान हैं, सबके धर्म महान हैं, सबके इतिहास गौरवशाली हैं, सब दुनिया के बैस्ट स्कूल में पढ़े हैं, दुनिया के सबसे अच्छे दोस्त सबको मिले हैं.... और ठीक यही स्थिति आपकी भी है।

अगर सबका सब कुछ महान है तो फिर ख़राब कौन है ? बुरा कौन है ? दुष्ट कौन है ? आप लेक्चर किसको देने जा रहे हैं !? वे सब तो ऑलरेडी महान हैं! और आपका तो कहना ही क्या ?

क्या आपको यह बात कभी भी अजीब नहीं लगी कि दुनिया का हर आदमी, अंधों की तरह, बिना किसी तर्क और प्रमाण के, ख़ुदको और ख़ुदसे जुड़ी हर चीज़ को महान और श्रेष्ठ बताएगा और फिर भी वह दूसरों को नीची नज़र से नहीं देखेगा ?

आप हर किसी पर महानता और पवित्रता की झूठी चाशनी चढ़ाने से भी बाज़ नहीं आएंगे और दुनिया में असमानता, भेदभाव और ऊंच-नीच पर भाषण भी करेंगे !?

छोड़ क्यों नहीं देते इस पोपली पवित्रता और मज़ाक़िया महानता का ढोल पीटना !?

कब तक पैदा करते रहेंगे सीज़ोफ्रीनिक/विभाजित व्यक्तित्वों की पीढ़ियां दर पीढ़ियां !?

सही बात तो यह है कि अपने धर्म, अपने वर्ण, अपनी जाति, अपने इतिहास, अपने पुरख़ों, अपने वंश, अपने स्कूल, कॉलेज, शहर, यूनिवर्सिटी, प्रांत, देश, राष्ट्र, वाद, दल.....आदि-आदि पर अंधों की तरह, बिना किसी वजह, तर्क और प्रमाण के गर्व करनेवाला एक-एक आदमी सांप्रदायिक है। 

फ़र्क़ इतना ही है कि किसकी सांप्रदायिकता किस रुप में प्रकट होती/फूटती है? कौन सामने आकर हिंसा करता है और कौन छुपकर ? कौन अपने नाम से काम करता है और कौन दूसरों के कंधों पर रखकर बंदूक चलाता है ?

कम से कम मैं तो ऐसे लोगों में शामिल नहीं हो सकता।

मेरा न कोई इतिहास है, न वंश-परंपरा है, न ख़ानदान-पानदान है, न कोई जाति है, न धर्म है।

न मुझे किसीपर कोई गर्व है, न इनके न होने की कोई शर्म है।

-संजय ग्रोवर
15-11-2015