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Thursday, 3 May 2018

रीतियों के रखवाले



अपने-अपने धर्म का बैनर लगाकर जो लोग समाजसेवा का प्रदर्शन करते हैं वे दरअसल समाज के विभाजन और सांप्रदायिकता में हिस्सेदरी की नींव रख रहे होते हैं। हैरानी होती है जब यही लोग सांप्रदायिक एकता के मसीहा का काम भी संभाल लेते हैं।

हैरानी होती है कि जिन्हें साल में एक दिन आलू-मैदा बांटने के लिए भी किसी धर्मविशेष की छत्रछाया की ज़रुरत पड़ जाती है वे अपने दम पर अगर किसीकी मदद करनी पड़ जाए तो कैसे करेंगे !?

मदद धर्म से होती है या इंसान में मौजूद इंसानियत, संवेदना और बुद्धि के फलस्वरुप पैदा हुए तर्क और चिंतन की वजह से !?

धर्म और परंपरा से भी मदद होती है, पर कैसे होती है !? आप किसी लड़की की शादी में लिफ़ाफ़े में कुछ पैसे डालकर वहां पटक आते हैं। धर्म और परंपरा आपको इतना भी सोचने का मौक़ा नहीं देते कि लड़कियों की ही शादी में पैसे क्यों देने पड़ते हैं ? यह रिवाज बनाया किसने ? यह तो ऐसे ही हुआ जैसे पहले तो आप ही किसीकी टांग तोड़ दें फिर आप ही मलहम लेकर पहुंच जाएं ! 

जो तथाकथित बुद्धिजीवी ऐसे लोगों को ‘प्रोत्साहित’ करते हैं, हैरानी होती है कि क्या वे इतने कम बुद्धिजीवी हैं कि वे ऐसे नाज़ुक मसलों का भी सिर्फ़ एक ही पहलू देख पाने में सक्षम होते हैं ?

(जारी)

-संजय ग्रोवर



Wednesday, 21 March 2018

वाद का अवसाद





राजेंद्र यादव ‘हंस’ में कविता सिर्फ़ दो पृष्ठों/पेजों में छापते थे।

मुझे याद नहीं ऐसा करने के लिए उन्होंने क्या कारण बताए थे।

लेकिन मैं कुछ हिंदी कवियों को पढ़ता रहा हूं, कुछ के साथ भी रहा हूं।

पहली बात तो यह मुझे समझ में आई कि हिंदी कवियों की प्रगतिशीलता लगभग झूठी है, इनमें से बहुत कम लोग स्वतंत्र रुप से कोई मौलिक सच बोलने में सक्षम हैं ; पुराना, घिसा-पिटा, तयशुदा सच बोलने के लिए भी इन्हें किसी बैनर, किसी वाद, किसी दल, किसी धर्म, किसी जाति का सहारा चाहिए होता है। वे कविता में बहादुर पर दरअसल बेहद कमज़ोर लोग हैं। अस्सी-नब्बे साल की उम्र में एम्स जैसे बड़े, जुगाड़ुओं के लिए ही बने, हॉस्पीटल में मरते हुए भी इन्हें लगता है कि कोई बहुत ही भीषण, विकट समय आ गया है।


सही बात यह है कि जिनके लिए कविता लिखने का इनका दावा होता है उन तक न इनकी कविता पहुंचती है, न उनकी समझ में आती है, न उनको इनकी मौत की ख़बर होती है। उन तक पहुंचने की ये कोई कोशिश करते भी नहीं हैं। दरअसल उनका भीषण-विकट समय हर सरकार, हर वाद, हर शासन में चलता है, उनके जीवन में इनकी कविताएं रत्ती-भर असर नहीं डाल सकतीं। इनकी कविताएं वैसे भी पुरस्कार, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, चेले और चेलियों के लिए लिखी गईं होतीं हैं, ‘उनके’ लिए नहीं।

दूसरी बात, कविता में बिंब, अलंकार, उपमा, भावुकता आदि तो होते हैं पर तर्क नहीं होता। कवियों और शायरों को भी आप अगर पूरे होश में, पूरी जागरुकता के साथ सुनें तो संभावना यही है कि आप इनको अकसर तर्करहित ही पाएंगे।

आप अगर मुझे इजाज़त नहीं भी दें तो मैं इस बात पर ठहाका लगाना चाहूंगा कि इतने अय्याशीपूर्ण ढंग से, तमाम जुगाड़ों, चमचों और सुख-सुविधाओं के बीच मरते हुए भी इनको लगता है कि कोई भीषण और विकट समय आ गया है। ऐसा लगता है कि भारत में कवि और साहित्यकार पहली बार मर रहे हैं। ऐसी अतिश्योक्तिपूर्ण मूर्खोक्तियों की वजह से ही मेरेे जैसा व्यक्ति भांप जाता है कि ज़रुर कोई प्रायोजित माफ़िया है जिसका काम बस अपने-अपने मालिकों के पक्ष में, दूसरों के मालिकों के विपक्ष में अपने-अपने हिस्से का विलाप/प्रलाप/नाटक करना है।

अपने मुहावरों, लोकगीतों, भक्तिगीतों, परंपराओं, वीरोक्तियों, रुदालियों को याद करो--न जाने कितने लाख बार तुमने बोला कि ‘संकट के समय में ही साहस का पता चलता है’। लेकिन तुम्हारे व्यवहार से लगता है कि या तो संकट नक़ली है या साहस नक़ली है। 

कोई हैरानी नहीं होती जब तथाकथित प्रगतिशीलों को यह रोना रोते देखता हूं कि हाए, सारी परंपराएं तोड़ी जा रहीं हैं। बताईए, परंपराएं तोड़ना तो तुम्हारे हिस्से का काम था, यह भी भूल गए क्या ? क्या हो गया तुम्हारी स्मृति को ? लेकिन प्रगतिशीलता होती तब न ! कम-अज़-कम यह तो बताया होता कि कौन-सी परंपरा क्यों नहीं तोड़नी चाहिए या क्यों तोड़नी चाहिए !? या अतार्किक आकाशवाणियां करना ही तुम्हारी परंपरा है !? इनकी एक-एक हरक़त बताती है कि ये प्रगतिशीलता के नाम पर मौक़ापरस्ती के अभ्यस्त हैं।

मेरी माताजी की मृत्यु हुई जब मैं फ़ेसबुक पर आ चुका था, कई लोग जानते थे, कई जानने लगे थे। मुझे ख़्याल भी नहीं आया कि फ़ेसबुक पर डालना चाहिए। मेरे पिताजी का देहांत जीटीबी में हुआ। बहुत दबाव में मैंने दो-चार लोगों को कमरा/वार्ड आदि दिलवाने के लिए फ़ोन किया। मुझे कोई ख़ास बुरा नहीं लगा जब उन्होंने असमर्थता ज़ाहिर कर दी। जबसे मुझे अक़्ल आई तब से मैंने यह चाहना बंद कर दिया था कि मेरे पिताजी मेरे लिए किसीसे जुगाड़ लगाएं।



क्या हम इतनी बड़ी-बड़ी बातें करने के बावजूद मर भी ईमानदारी से नहीं सकते !?

(आगे भी)

-संजय ग्रोवर
21-03-2018

Sunday, 19 February 2017

इतने फूल कहां से लाओगे, प्यारे बच्चों!

प्यारे बच्चो,

अंकल को फूल ज़रुर दो लेकिन याद रखो कि तुम्हारे पापा भी किसीके अंकल हैं। और अंकल भी किसीके पापा हैं। अपने पापा पर भी नज़र रखो, कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन कोई तुम्हारा दोस्त, कोई बच्चा तुम्हारे पापा को पूरा बग़ीचा दे जाए। ज़रा अपना घर देखो, क्या यह स्वीकृत नक़्शे के हिसाब से ही बना है ? इसकी बालकनी, इसके कमरे ज़रा ध्यान से देखो। अपने पानी-बिजली के मीटर देखो, क्या यह ठीक से चलते हैं ? उससे भी पहले यह देखो कि क्या यह चलते भी हैं ? उससे भी पहले ये देखो कि क्या ये लगे भी हैं ? अगर तुम्हारा ऐडमीशन किसी जुगाड़ या डोनेशन से हुआ है तो अपनेआप को भी सड़क पर फूल भेंट करो।

यह भी देखो कि तुम्हे फूल देना किसने सिखाया ? उसकी ख़ुदकी ज़िंदग़ी में कितनी ईमानदारी है ? कहीं कोई अपनी राजनीति के लिए तुम्हारा इस्तेमाल तो नहीं कर रहा ? अगर तुम्हे लगता है कि ऐसा हो रहा है तो सबसे पहले उन अंकल को फूल दो जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए तुम्हे मिस्यूज़ कर रहे हैं। ध्यान रहे कि राजनीति यहां सिर्फ़ राजनीति में नहीं होती, घर-घर में होती है। अगर अंदर तुम अपने पापा की बेईमानियां छुपा लेते हो और बाहर अंकलों को फूल देते हो तो तुम भी राजनीति कर रहे हो। राजनीति इसीको कहते हैं मेरे प्यारे बच्चो।


सभी बच्चे अपने मां-बाप को महान समझते हैं। तुम जिन अंकल को फूल दे रहे हो उनके बच्चे भी अपने पापा को महान समझते आए हैं। तुम्हारे फूल से वो अंकल चोर से दिखने लगेंगे। तब उनके बच्चों को कैसा लगेगा ? महान लोग ऐसे होते हैं ? वैसे तुम्हे सोचना चाहिए कि सभी मां-बाप महान होते हैं तो फिर चोरी कौन करता है, भ्रष्टाचार कौन करता है, बलात्कार कौन करता है, टैक्स कौन चुराता है, लूटमार कौन करता है, मकान में से दुकान कौन निकालता है, मकान में नाजायज़ कमरे और बालकनी कौन बनाता है ? अगर मां-बाप यह नहीं करते तो क्या बच्चे करते हैं ? फिर तो बात तुम पर आ जाएगी, प्यारे बच्चो!


कहीं तुम किसीको फूल इसलिए तो नहीं दे रहे कि किसी टीवी वाले अंकल ने तुमसे कहा है कि अगर फूल दो तो तुम्हें टीवी पर दिखाया जाएगा ? इसका मतलब है कि तुम बस थोड़ी देर के लिए अच्छा और साहसी दिखने का अभिनय कर रहे हो। यह राजनीति भी है, पाखंड भी है, मौक़ापरस्ती भी है और बेईमानी भी है। इसके लिए ख़ुदको भी फूल दो और टीवी वाले अंकल-आंटियों को भी फूल दो। वैसे इतने फूल तुम लाओगे कहां से, प्यारे बच्चो !? इस तरह तो देश के सारे बाग़-बग़ीचे उजड़ जाएंगे।


मैं तो कहता हूं कि फूलों का मिस्यूज़ किसी भी हालत में नहीं होना चाहिए। और तुम तो ख़ुद ही फूल जैसे हो। 


ज़रुरी हुआ तो फिर मिलेंगे-


तुम्हारा दोस्त,

-संजय ग्रोवर
20-02-2017

Wednesday, 21 December 2016

रंगों और प्रतीकों का चालू खेल-4

(पिछला हिस्सा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


सुना था, आज देख भी लिया कि एन डी टी वी ने गोरे रंग की क्रीम के विज्ञापनों पर बैन लगा दिया है। कुछ महीने पहले रामदेव और मैगी नूडल्स् के बीच इसी तरह का रिश्ता देखने में आया था। बाद में जो हुआ वह भी सामने ही है।

रामदेव तो ख़ैर रामदेव ही हैं, वे आधुनिकता के लिए जाने भी नहीं जाते मगर एन डी टी वी जैसे ‘मानवीय’ और ‘प्रगतिशील’ चैनल को गोरेपन की क्रीम के नुकसान समझने में इतने साल क्यों लग गए ? गोरेपन की क्रीम तो शराब भी नहीं है कि ग़रीब लोग उसे लगाकर अपने घर में मारपीट करते हों। इस क्रीम से ऐसा क्या नुकसान हो जाएगा ? सही बात यह है कि दहेज नहीं मिटाना, करवाचौथ बनाए रखना है, अपने रीति-रिवाजों पर उंगली नहीं उठानी, नास्तिकता और ईमानदारी पर बात करने में न जाने क्या ख़तरा है, सो सबसे आसान रास्ता यही है कि लोगों को प्रतीकबाज़ी और त्यौहारबाज़ी में उलझाए रखो। यहां याद रखने योग्य बात यह है कि लगभग दो महीने पहले एन डी टी वी पर एक दिन के बैन की घोषणा हुई थी, अभी बैन का दिन आया भी नहीं था कि कई भक्तों ने एन डी टी वी को शहीद घोषित कर डाला था, दूसरी तरफ़ कुछ लोगों ने इसकी विश्वसनीयता पर संदेह भी किया था। ज़ाहिर है कि एक दिन के बैन का अर्थ प्रतीकात्मक या अचानक मिली छुट्टी से ज़्यादा क्या हो सकता है।

सवाल यह भी है कि भारत में गोरे रंग की क्रीम कौन लोग ख़रीदते होंगे !? क्या गोरे लोग !? वे क्यों ख़रीदेंगे, वे तो पहले ही गोरे हैं! जब तक लगानेवालों की मानसिकता नहीं बदलेगी, बैन से क्या होगा ? वैसे भी बैन चाहे अभिव्यक्ति पर हो चाहे शराब-सिगरेट-गुटखे पर, यह कट्टरपंथ, पवित्रतावाद और एकतरफ़ा सोच के बारे में ही बताता है जिसे भारत के कई तथाकथित प्रगतिशील लोग आर एस एस की सोच मानते हैं।

बहरहाल जिस दिन एन डी टी वी पर फ़ायनली बैन लगना था, उसी दिन नोटबंदी की घोषणा हो गई। एन डी टी वी शहीद होते-होते रह गया। अभी-अभी आदरणीय राहुल गांधी जी ने इस संसद-सत्र की समाप्ति से एक-दो दिन पहले भूचाल लाने की बात की और दूसरे-तीसरे दिन उनका आदरणीय प्रधानमंत्री के साथ वार्ता करने का फ़ोटो आ गया। यह भी ख़बर आई कि राजनीतिक दलों को चंदा देने पर क्या-क्या छूटें मिल सकतीं हैं। आज कुछ डायरियों के हवाले से आदरणीय श्री मोदी पर आरोप लगाते आदरणीय श्री राहुल काफ़ी गोरे लग रहे थे। सिर्फ़ उनके गोरेपन के आधार पर उनके सही या ग़लत होने के बारे में कोई नतीजा निकाल लेना कोई समझदारी की बात नहीं लगती।

फिर से क्रीम पर आते हैं। क्या दुनिया में सभी गोरे, क्रीम की वजह से गोरे हैं ? क्या क्रीम लगाने से आदमी के अंदर कोई ऐसे परिवर्तन होते हैं कि वह अत्याचारी हो जाता है ? क्या क्रीम में कोई ऐसी चीज़ है जिससे आदमी को नशा हो जाता है ? मुझे याद आता है, बचपन में मैं काफ़ी दुबला-पतला था। कोई भी मेरे हाथ-पैर मरोड़ देता था। जिनके शरीर अच्छे थे, जो कसरत वग़ैरह करते थे उनमें से ज़्यादातर या तो दादागिरी करते थे, या उससे लड़कियों को प्रभावित करने में लगे रहते थे। मुझे तो एक भी याद नहीं आता जो लड़कियों की या ग़रीबों की रक्षा करता हो। अगर कलको मुझे कोई अधिकार/सत्ता/चैनल मिल जाए तो क्या यह ठीक होगा कि मैं सारे भारत के जिमों और पहलवानी पर बैन लगा दूं !?


(जारी)

-संजय ग्रोवर 
21-12-2016

(अगला हिस्सा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

Sunday, 20 November 2016

वाह रे मर्द!

व्यंग्य

अपने यहां मर्दानगी का शौक़ काफ़ी पुराना लगता है। यह बिलकुल असाध्य रोग की तरह लगता है क्योंकि 2011 से 2016 तक में भी मर्दानगी से संबंधित तरह-तरह की कहानियां, विज्ञापन, कविताएं आदि देखने को मिलते रहते हैं।

मैं अलग से किसी विज्ञापन या कविता (जहां तक तर्कहीनता की बात है कई बार ये दोनों  बिलकुल एक जैसे लगते हैं) का ज़िक़्र नहीं करना चाहता क्योंकि कई लोग इसमें भी अपनी प्रसिद्धि, महानता और शहादत आदि देखने या चाहने लगते हैं। कई लोग मर्दानगी की महानता का चर्चा अकसर औरतों और परिवार की सुरक्षा के संदर्भ में करते हैं। यह बात अलग है कि अपने यहां ऐसे मर्दों का आंकड़ा जुटाना मुश्क़िल है जो वास्तव में अपनी भी सुरक्षा ठीक से कर पाते हों। ज़्यादातर मर्द पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों के नाम पर जगह-जगह, तरह-तरह से एडजस्ट ही करते पकड़े जा सकते हैं।

चलिए, हम थोड़ी देर को मान लेते हैं कि मर्द वह है जो परिवार की सुरक्षा करता है। अब सवाल यह है कि जिसका परिवार नहीं वो क्या ख़ाली अपनी मर्दानगी साबित करने के परिवार पैदा करे ? उसके परिवार का खर्चा कौन उठाएगा ? अगर वह परिवार की आड़ में बेईमानी से एडजस्ट न करना चाहे तो ? देश में ऐसे बहुत सारे मर्द मशहूर होते रहे हैं जिनके परिवार नहीं थे। उनका अब आप क्या करेंगे ? उनको क्या बोलेंगे ?

आप परिवार की रक्षा किससे करेंगे ? आप शरीफ़ हैं तो दूसरे क्या बदमाश हैं ? उनके भी तो परिवार हैं। वे भी अपने परिवार की रक्षा के लिए तरह-तरह के क़रतब कर रहे हैं। कौन तय करेगा कि किसके क़रतब जायज़ हैं, किसके नाजायज़ ? बलात्कार कांड हुआ और एक-एक आदमी बोला कि हम बलात्कार के खि़लाफ़ हैं, औरतों का सम्मान करते हैं। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चला, हर कोई समर्थन करने लगा। नोट बंद हुए, हर कोई बोला हम ब्लैक मनी के खि़लाफ़ हैं। यहां इतने तो अच्छे लोग रहते हैं, फिर रक्षा किससे करनी है ?

आप परिवार की रक्षा कितने वक़्त तक करेंगे ? आप कितने साल तक जिएंगे ? उसके बाद परिवार की रक्षा कौन करेगा ? आपके ‘परिवार की रक्षा’ के शौक़ के लिए परिवार के सभी सदस्यों का 60-60 साल तक बच्चा बना रहना ज़रुरी है क्या ? एक आपकी ईगो की ख़ातिर इतने-इतने लोग क़ुर्बान हो जाएं ? इससे मिलेगा क्या ?


अगर मर्द वह है जो परिवार और महिलाओं की रक्षा करता है तो स्पष्ट है कि परिवार का मुखिया, परिवार का बड़ा, परिवार में शासक भी वही है। यह किसका फ़ायदा है ? परिवार और महिलाओं का या स्वयं मर्द का ? नये डब्बे में पुराने कार्यक्रम कब तक चलाते रहोगे महा-पुरुष !?

आप अगर महिलाओं और परिवार की रक्षा करेंगे तो भगवान क्या करेगा ? यूं तो लोग कहते हैं कि सब कुछ वही करता है मगर आप जैसों की बातें पढ़ें-सुनें तो लगता है कि वह कुछ भी नहीं करता। अगर वह किसी परिवार की सुरक्षा नहीं करना चाहता तो आप क्या उसके खि़लाफ़ जाके रक्षा कर पाएंगे ?



क्यों न परिवार को और औरतों अपनी रक्षा ख़ुद करने दें क्योंकि जिनसे उनकी रक्षा आप करना चाहते हैं वे सब भी पारिवारिक लोग हैं। वे भी अपने:परिवार की सुरक्षा’ की ख़ातिर उन्हें आपसे दूर रखने में लग गए तो ?
 

बेईमानों से हमारा एडजस्टमेंट है, रिश्वतखोरों का हमारे घरों में आना-जाना है, छेड़नेवाले हमारे दूर-पास के संबंधी हैं, दहेजखोर कट्टरपंथी, प्रगतिशीलों-सा भेस बनाकर, हमारे दोस्त-यार हैं।  जिनसे रक्षा करनी है, सब तो हमारे चिर-परिचित हैं। फिर रक्षा किससे करनी है ?  फिर रक्षा बस विज्ञापन में, नाटक में, कविता में, कहानी में, फ़िल्म में, मंच पर ही संभव है।
 

वो तो कई सालों से चल रही है।

वैसे किसीकी रक्षा करने के लिए मर्द होना ज़रुरी क्यों है ? क्या इंसान किसीकी रक्षा नहीं कर सकता ?


-संजय ग्रोवर
20-11-2016

Saturday, 20 August 2016

असलियत से भागने के सम्मानित उपाय-2


(असलियत से भागने के सम्मानित उपाय-1)

कल सुबह तीन-चार बजे के बीच नींद खुल गई। एफ़एम सुनने लगा। एक कार्यक्रम में कृष्ण और ‘कर्म करो, फल की इच्छा छोड़ दो’ का ज़िक्र आया तो दूसरे में गीता की तारीफ़ सुनने को मिल गई। जब भी सुनता हूं कि कई बड़े(!), मशहूर और बुद्विमान(!) लोग गीता के उपदेश को पसंद करते रहे हैं, हैरानी में पड़ जाता हूं। मैंने गीता नहीं पढ़ी, लेकिन कुछ वाक्य/उपदेश जगह-जगह दुकानों/दीवारों पर लिखे देखे हैं या लोगों से सुने हैं जो निम्न आशय के हैं-

⃝    शरीर के मरने से आत्मा नहीं मरती।

⃝    हम तो कठपुतलियां हैं, हमारे करने से कुछ नहीं होता, जो वह चाहता है वही हमसे/सबसे करवा लेता है। जो वह चाहता है वही होता है।

⃝    जीवन तो अभिनय है, नाटक है, हमें तो एक पात्र की तरह अपना ‘रोल’ ‘प्ले’ करना होता है।

एक ईमानदार और संवेदनशील इंसान की दृष्टि से मुझे उक्त सभी बातें चकित करतीं हैं।

04-08-2016 

कभी कहीं मैंने सुना या पढ़ा, शेक्यपियर ने भी कहा है कि ‘शो मस्ट गो ऑन...’; मैंने इंटरनेट पर थोड़ी देर ढूंढा, स्पष्ट नहीं हो सका कि उन्होंने यह ख़ुद कहा या यह उनका पसंदीदा जुमला था। बहरहाल, ओशो को कहीं पढ़ा, उन्होंने कहा है, ‘जिओ ऐसे, जैसे अभिनय कर रहे हो और अभिनय ऐसे करो जैसे जी रहे हो।’ निश्चय ही, अभिनय कोई ऐसे कर पाए जैसे जी रहा हो तो इससे ज़्यादा ख़ूबसूरत और यथार्थवादी अभिनय क्या हो सकता है लेकिन जियो ऐसे जैसे अभिनय कर रहे हो, यह बात पल्ले नहीं पड़ती।

इस तरह तो अफ़वाहबाज़ों, बलात्कारियों, पाखंडियों, धूर्त्तों, बेईमानों और मौक़ापरस्तों के लिए बड़ी आसानी हो रहेगी। वे कहेंगे ज़रा बलात्कार का अभिनय ही तो किया है, इतना शोर क्यों मचा रहे हो ?  यह तो गंदा-सा काम करने के लिए ‘अच्छा-सा’(!) बहाना ढूंढ लेने जैसा है। और कौन तय करेगा कि किस बात का अभिनय ठीक है और किस बात का ग़लत ? और इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक़ सच यह है कि यह कौन तय करेगा कि कौन अभिनय करेगा और कौन अभिनय करवाएगा ? कौन रोल लिखेगा और देगा और कौन खोपड़ी गिरवी रखकर चुपचाप रोल करता चला जाएगा ? मेरी समझ में इंसान के द्वारा इंसान का इससे ज़्यादा शर्मनाक़ इस्तेमाल कोई हो नहीं सकता। अगर दूूसरे के कहने पर रोल ही करना है तो फ़िर अपने दिमाग़ का रोल तो ख़त्म ही समझिए। फिर व्यक्ति की आज़ादी का अर्थ भी ख़त्म समझिए। हां, कायरों और कमज़ोरों के लिए जो बहादुर और महान भी दिखना चाहते हैं, यह बहुत अच्छा बहाना है। 

इस सबके साथ यह भी समझना ज़रुरी है कि जो किसीको रोल दे रहा है, उस अहंकारी को इसके लिए चुना किसने है !? यह सिवाय अहंकार और मक्कारी के और क्या है कि आप ख़ुद ही ख़ुदको ऐसे काम के लिए श्रेष्ठ मान लें जिसमें आपका तो फ़ायदा ही फ़ायदा होगा मगर दूसरे कईयों का जीवन दांव पर लग जाएगा या बर्बाद हो जाएगा ? और ऐसी बातें कहनेवाले इन्हें कहने से पहले पर्याप्त समझदारी से इन्हें समझे हों या उनकी नीयत बिलकुल ठीक हो, यह पता कैसे लगाईएगा ? अभी दो-तीन दिन पहले ही मैंने एक नवोदित कलाकार का इंटरव्यू देखा ; वे कह रहे थे कि ज़िंदग़ी को ज़्यादा गंभीरता से मत लो, बस मौज-मज़ा लो, छोटी-सी तो ज़िंदगी है। मैंने सोचा कि फ़िर आप भी अपने कैरियर को हंसी-मज़ाक़ में उड़ा दो, यह भी तो अगंभीर ज़िंदगी का मामूली-सा हिस्सा है, मज़ाकिया-सा क़िस्सा है। मुझे लगता है उन्होंने हाल ही में कहीं पढ़ा या सुना होगा, अपने मतलब का लगा होगा सो बोल दिया होगा।  

कल्पना कीजिए कि ईमानदारी बेईमानों के हाथ लग जाए, प्रगतिशीलता मौक़ापरस्तों के हाथ लग जाए,  तो क्या-क्या संभव है! और यह बहुत आसान है अगर ज़िंदगी के सारे मूल्य, मान्यताएं और जीवनशैली बनाने का काम बेईमानों, पाखंडियों, खोखलों और कायरों के हाथ लग जाए तो वे कुछ भी कर सकते हैं। और ये काम क्या-क्या हो सकते हैं ? ये काम हो सकते हैं क़िताबें लिखना, फ़िल्में बनाना, आंदोलन करना, वक्त्व्य देना, भाषण देना, शिक्षा देना, संपादन करना....। इन सबके सहारे एक पूरे समाज को चंद व्यक्तियों की सहूलियत के अनुसार गढ़ना और गढ़ते चले जाना कोई बहुत मुश्क़िल काम नहीं है।

ज़िंदगी को अभिनय मानने के कई ख़तरे हैं ; अभिनय करनेवाला झूठी माफ़ी मांग सकता है, झूठी दोस्ती कर सकता है, झूठा प्रेम कर सकता है, सही बात तो यह है कि इस बहाने से वह गंदी से गंदी हरक़त पर उतर सकता है। कोई अपनी ज़िंदगी को अभिनय मान भी ले मगर दूसरे की ज़िंदगी को अपने द्वारा किए जा रहे नाटक का हिस्सा कैसे मान सकता है !? जबकि दूसरे को इस बात का अंदाज़ा तक नहीं है, उसके लिए ज़िंदगी बिलकुल वास्तविक और गंभीर कृत्य है। मुझे नहीं समझ में आता कि धर्म, आध्यात्मिकता या सामाजिकता के नाम पर इस तरह की क्रूरता कोई समझदार या संवेदनशील व्यक्ति सोच भी कैसे सकता है!?

लोग राष्ट्रप्रेम और ज्ञान के विस्तार जैसे मूल्यों का, झंडा लगाने या दिए जलाने जैसे कर्मकांडों के ज़रिए, अभिनय करते हैं लेकिन इमारतों में रेत और घटिया सामान लगाकर पैसे कमाने(!) जैसे कामों को असलियत में करते हैं। प्रतीकात्मकता, कर्मकांडों और रिवाजों से हमें क्या मिला, इसीसे पता लगता है। पाखंडियों ने धर्म, भगवान, ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, जाति, सफ़लता जैसी नक़ली और गढ़ी गई चीज़ों को वास्तविक ज़रुरत की तरह स्थापित कर दिया और भूख, प्रेम, सैक्स, इंसानियत जैसी वास्तविक चीज़ों को पीछे धकेल दिया।

जो लोग ज़िंदगी को अभिनय मानते हैं, उन्हें मकान छोड़ देने चाहिए और पेड़ के नीचे जाकर मकान में रहने का अभिनय करना चाहिए। क्यों नहीं वे खाना-पीना छोड़कर खाने-पीने का अभिनय करके काम चलाते ? क्यों नहीं वे अपने कपड़े ग़रीबों को देकर ख़ुद कपड़े पहनने के अभिनय भर से काम चलाते ? क्यों वे दूसरों से सचमुच के पैसे ले लेते हैं, जबकि पैसे ले लेने के अभिनय से भी तो काम चल सकता है!

यह सब लिखना इसलिए भी ज़रुरी है कि जब तक हम असफ़लता को सफ़लता, कमज़ोर को शक्तिशाली, कायर को साहसी कहते रहेंगे, ऐसे लोगों का फ़ायदा कराते रहेंगे। दरअसल ‘ज़िंदगी अभिनय है’ जैसी बातें करनेवाले लोग ख़ुद ही बता रहे होते हैं कि वे असली ज़िंदगी का सामना करने में असफ़ल हो गए हैं, घबरा गए हैं इसलिए उन्होंने ‘दिलके ख़ुश रखने को....’ यह ’अच्छा ख़्याल’ ढूंढ लिया है।  

ऐसी क़िताबें जो लोगों को समझातीं हों कि तुम कठपुतली हो, तुम अभिनेता हो, करनेवाला तो कोई और है, से आज़ादी, लोकतंत्र, उदारता, अहिंसा आदि को समझने की उम्मीद सिवाय नासमझी के क्या हो सकती है ?


-संजय ग्रोवर
20-08-2016

Saturday, 12 March 2016

लड़कियां

लड़कियों को लेकर भारतीय समाज में अकसर एक ऊहापोह सा बना रहता है। लड़कियां क्या खाती हैं, क्या पीती हैं, क्या सोचतीं हैं आदि-आदि से लेकर ‘लड़कियां किस तरह के पुरुषों को पसंद करतीं हैं’ जैसे विस्फ़ोटक मसलों में कई मर्दों की जान और ज़िंदगी अटकी रहती है। मज़े की बात यह है कि कट्टरपंथी परंपरावादी राजा-महाराजाओं से लेकर तथाकथित प्रगतिशीलों तक सभी अपने आसपास रहनेवाली लड़कियों या महिलाओं की संख्या से अपनी महानता नापने की कोशिश में लगे पाए गए हैं। ऐसा लगता है कि जैसे लड़कियां पुरुषों की छाती पर टांगे जाने वाले मैडल/तमग़े हैं, जैसे लड़कियां पुरुषों को मिलनेवाले पुरस्कार हैं, जैसे वे सत्संग के बाद बंटनेवाला प्रसाद हैं, जैसे वे मर्दों को देखकर गश खाने और क्रश आने के लिए ही पैदा हुई हैं। एक पुरानी और प्रसिद्ध कहानी में कृष्ण नामक एक नायक का ज़िक्र मैंने सुना है जो नदी-किनारे से नहाती हुई लड़कियों के कपड़े वगैरह चुराकर पेड़ पर चढ़ जाते थे और तिसपर भी लड़कियां आ-आकर उनकी गोपियां हुई जातीं थीं। और कहानी के यह कृष्ण शादीशुदा भी हैं और इनकी पत्नियों की भी अच्छी-ख़ासी संख्या गिनाई जाती है।

अभी एक विश्वविद्यालय में कथित रुप से पाए जानेवाले कंडोमों की संख्या किसीने गिनाई तो कुछ लोग उसपर गर्व करते दिखे तो उन्हीं में से कुछ लोग इस चिंता में परेशान दिखे कि वहां पढ़नेवाली लड़कियों के मां-बाप क्या सोचेंगे ? वहां पढ़नेवाले लड़कों के मां-बाप क्या सोचेंगे, इसकी चिंता किसीको भी नहीं हुई। साफ़ है कि इस समाज में अभी लड़कियों की वह स्थिति नहीं बन पाई कि आप उनके साथ अपने संबंधों को जैसे हैं वैसे बता भी सकें। मेरी समझ में पत्नी, प्रेमिका, गोपिकाएं और श्रद्धालु प्रशंसिकाएं एक साथ रखने के लिए इस तरह की विरोधाभासी बातों के पाखंड के अलावा और कोई चारा भी नहीं है। इसको प्रगतिशीलता तो कतई नहीं माना जा सकता। प्रगतिशीलता के लिए बहुत साहस चाहिए जो कि लोगों में अकसर नहीं होता, इसलिए यहां प्रगतिशील कहे जानेवाले या ख़ुदको प्रगतिशील समझने का भ्रम पालनेवाले लोग भी चार तरह की बातें एक साथ कह देते हैं। पाखंडी संस्कृति में लड़कियों को भी ऐसे ही लोग सूट करते हैं जो दिखाने और करने के फ़र्क़ की तथाकथित सभ्यता को बड़ी होशियारी और चालाक़ी से बरतने के आदी हों। अब या तो आप लड़कियों/लड़कों से स्पष्ट संबंध रख लीजिए या फिर यह चिंता कर लीजिए कि उनके घरवाले क्या सोचेंगे। दोनों चीज़ें एक साथ साधेंगे तो झूठ और अभिनय के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। फिर अपनेआप को कट्टरपंथियों और पाखंडियों से अलग और प्रगतिशील समझना एक झूठी तसल्ली से ज़्यादा कुछ नहीं है।

कोई हैरान हो सकता है कि लड़कियां, वो भी प्रगतिशील लड़कियां, कैसे किसी शादीशुदा की गोपियां बनने को तैयार हो जातीं हैं ? सीधा कारण समझ में आता है कि बचपन से रटाई सामाजिक मान्यताएं इसमें बड़ा काम करतीं हैं। उसके बाद का काम हमारा साहित्य और फ़िल्में पूरा करते आए हैं।
प्रगतिशील लड़कियां कैसे किसी प्रगतिशील लड़के पर मरनेवाली लड़कियों की गिनती बढ़ाकर अपने जीवन को सार्थक मान सकतीं हैं ? कोई प्रगतिशील मर्द कैसे महिलाओं को मैडल की तरह अपनी छाती पर टांक कर ख़ुश हो सकता है !? यह मानसिकता किसी नेता की रैली में आई या  जैसे-तैसे-कैसे भी जुटाई भीड़ को देखकर ख़ुश होने की मानसिकता से कैसे अलग है ? कैसे कोई शादीशुदा कृष्णकन्हैया इतनी स्त्रियों के प्रेमनिवेदन से ख़ुश हो सकता है जबकि उसके अपने घर में उसकी कई रानिया-महारानियां क़ैदी की तरह रह रहीं हों। कल्पना कीजिए कि उन रानियों के पास भी इतनी-इतनी संख्या में प्रेमनिवेदन और फिर प्रेमनिवेदन की स्वीकृति के बाद पुरुष-गोपक दिन-रात प्रेमलीला रचाते-मचाते नज़र आने लगें तो इन तथाकथित प्रगतिशील महाराज की क्या स्थिति हो रहेगी ? उसके बाद फिर बच्चे भी यही लीला करने लगें तो एक यमुना तट तो घर में बनाना पड़ जाएगा। ऊपर से एक समस्या यह भी रहेगी किन लोगों को इन संबंधों को गर्व की तरह दिखाना है और किन लोगों से इसलिए छुपाना है कि उनके घरवाले क्या सोचेंगे, इसका भी पूरा हिसाब-क़िताब रखना पड़ेगा। सही बात यह है कि ऐसे संबंध आसानी से वही लोग निभा सकते हैं जो रात-दिन पाखंड के आदी हों। दूसरा तरीक़ा है कि इन संबंधों को जैसे हैं वैसा ही बताओ, किसीके घरवाले क्या सोचेंगे इसकी चिंता छोड़ दो। मगर उसके लिए साहस चाहिए, कई तरह के नुकसान उठाने की तैयारी चाहिए, पहलक़दमी की हिम्मत चाहिए, जिसकी हमारे समाज को आदत नहीं है, इसलिए उसमें अभी भी वक़्त लगनेवाला है।


अपने ऊपर मरनेवाली लड़कियों की संख्या गिन-गिनकर ख़ुश होना, दोस्तों-यारों को बताना....लड़कियों को सामान समझने की मानसिकता से क़तई अलग नहीं है। सिर्फ़ लड़कियों की ही संख्या गिनते रहना उन्हें बाक़ी समाज से अलग करके, असामान्य बनाकर देखना भी है जिसमें नुकसान अकसर लड़कियों का ही होता आया है। आखि़र उस संख्या की उपयोगिता क्या है ? क्या आप उनसे किसी विशेष प्रकार का संबंध रखते हैं ? अगर रखते हैं तो क्या उसे सार्वजनिक रुप से स्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं ? या वे लड़कियां आप पर ठीक वैसी ही श्रद्धा रखतीं हैं जैसी किसी गुरु के प्रति रखने की हमारी परंपरा रही है ? जिस श्रद्धा में एकलव्य ने अपना ही अंगूठा काट लिया था ! यह श्रद्धा कतई ख़तरनाक़ है। मगर इसके बड़े फ़ायदे हैं और इसीलिए मुझे लगता है कि तथाकथित प्रगतिशील कहे जानेवाले लोग किसी न किसी तरह से पुरानी परंपराओं को बनाए रखने के बहाने ढूंढते रहते हैं।

यहां यह क़ाबिले-ग़ौर है कि फ़ेसबुक पर मेरे साथ 3-4 बार ऐसा हुआ कि कोई लड़की ख़ुदही बात करने आई और सामान्य बातें ही कर रही थी कि एकाएक बीच में कोई तथाकथित प्रगतिशील शख़्स प्रकट भए और लड़की को इशारों-इशारों में सावधान करने लगे, मेरी उम्र वगैरह के बारे में हिंट देने लगे। बड़ी हैरानी हुई क्योंकि ये लोग एक तो ख़ुदको प्रगतिशील कहते थे, दूसरे ख़ुद शादीशुदा होते हुए भी ट्राई मारते फिरते थे। जबकि मैं एक बैचलर हूं। और उम्र क्या बता रहे हो, जब लड़की साक्षात मुझसे मिलेगी तो देख ही लेगी, सब कुछ फ़ेसबुक पर तो नहीं हो जानेवाला! राजेंद्र यादव के मामले में देख ही चुका था, समझने में देर नहीं लगी कि इन तथाकथित प्रगतिशीलों की भी अपनी वानर-सेनाएं हैं और ये भी किसीसे कम नहीं हैं। ये भी तरह-तरह के डरों और आशंकाओं से घबराए हुए हैं और स्त्रियों को उनके हाल पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। फिर एक-दो दूसरी घटनाएं हुईं जिनमें लड़कियों ने पहले ख़ुद ही कोई बोल्ड क़िस्म का मज़ाक़ किया, बाद में प्रत्युत्तर में मैंने कुछ कह दिया तो उन्होंने उसे ग़लत ढंग से पेश करना शुरु कर दिया। समझ में आया कि मनुवाद अभी कितने-कितने रुपों में मौजूद है।

बहरहाल मैं तो करना कुछ और दिखाना कुछ को न तो प्रगतिशीलता मान सकता हूं न साहस। न ही लड़कियों को तमग़ों की तरह टांगने में कोई दिलचस्पी(कभी हुआ करती थी) बची है। अगर ‘मरनेवाली’ लड़कियों की संख्या से ही किसीकी महानता नापनी हो तो विजय माल्या, रविशंकर, शाहरुख़ खान, आमिर ख़ान, सलमान, अक्षय कुमार, चार्ल्स शोभराज, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, इमरान ख़ान, उमर शरीफ़, ओशो रजनीश आदि-आदि को सर्वाधिक महान लोगों में गिना जाना चाहिए।


हां, स्पष्टवादी और बेबाक़ व्यक्ति के प्रति, थोड़ी देर के लिए ही सही, एक आदर का भाव ज़रुर उठता है, चाहे वह व्यक्ति लड़का हो चाहे लड़की।


-संजय ग्रोवर

12-03-2016

Friday, 8 January 2016

मरे हुए विचारों की तस्वीरों पर माला

हम जब छोटे थे, किसी न किसी स्कूल में पढ़ने जाते थे। मुझे याद आता है वहां कहीं न कहीं दीवारों पर अच्छी-अच्छी बातें लिखी रहतीं थी, मसलन-‘झूठ बोलना पाप है’, ‘सदा सत्य बोलो’, ‘बड़ों का आदर करो’ आदि-आदि। लेकिन बहुत-से बच्चे तो पढ़ते ही नहीं थे। जो पढ़ते भी होंगे उन्हें उससे क्या प्रेरणा मिलती होगी क्योंकि असल जीवन में तो वे स्कूल में ही इसका उल्टा होते देख रहे होते होंगे। विचार के साथ तार्किकता भी होनी चाहिए जो कि एक-दो छोटे वाक्यों में लगभग असंभव है। जैसे कि ‘बड़ों का आदर करो’ मेरी समझ में क़तई अतार्किक बात है। उसपर तुर्रा यह कि कई छात्र जो टीचर को आते देख ‘गुरुजी, नमस्कार’ चिल्लाते थे, उन्हींमें से कई पीठ-पीछे गुरुजी को ग़ाली देने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगाते थे।

मैं कई सालों से जगह-जगह पढ़ता आया हूं कि ‘विचार अमर हैं’, ‘विचार कभी नहीं मरते’ आदि-आदि। ऐसी कई स्थापनाओं पर मन में कभी न कभी शंकाएं उठतीं रहीं हैं, अब चूंकि इंटरनेट जैसा माध्यम उपलब्ध है सो उन शंकाओं पर विचार करने और बांटने में सुविधा हो गई है। आखि़र विचार के न मरने से हमारा तात्पर्य क्या है ? क्योंकि विचार जगह-जगह दीवारों पर लिखे होते हैं ! क्योंकि विचार फ़िल्मों में डायलॉग की तरह इस्तेमाल हो रहे होते हैं ? क्योंकि उनके या उनके प्रकट करनेवाले को कुछ ट्राफ़ियां और पुरस्कार जीतेजी या मरणोपरांत दे दिए जाते हैं ? या कि उनके नाम पर ट्राफ़ियां या पुरस्कार बांटे गए होते हैं ? क्या यह विचारों के जीवित रहने का सबूत है ? एक दुकान जिसपर सामने बड़े-बड़े और सुंदर अक्षरों में लिखा है कि ‘न कुछ साथ लेकर आए थे, न लेकर जाओगे', वहीं दुकानदार ग्राहक की जेब में से सारे पैसे लूट ले रहा है तो क्या हम इसे विचारों का ‘जीवित रहना’ कहेंगे !?


क्या मोहम्मद रफ़ी मार्ग(अगर हो) से गुज़रनेवाले हर आदमी का गला सुरीला हो जाएगा ? मुझे ख़ूब अच्छी तरह याद है कि एक वक़्त में, बस में सफ़र करते हुए, मैं जगह-जगह लिखा देखता कि ‘दहेज लेना-देना जुर्म है’। मगर व्यवहारिक रुप से तब भी इसका उल्टा होता था आज भी होता है जबकि दहेज के खि़लाफ़ सख़्त क़ानून मौजूद हैं। मगर आप यह भी सोचिए कि जिस पेंटर ने यह पेंट किया है उसके लिए यह सिर्फ़ उसका धंधा है, दरअसल वह दहेज का समर्थक है। जिसने लिखवाया है, उसकी मानसिकता भी कुछ अलग होगी, लगता तो नहीं है। जो इसे पढ़ रहा है वह भी टाइम पास कर रहा है। वह इसे कभी ठीक से पढ़ नहीं पाएगा क्योंकि इससे पहले जो व्यवहारिक पढ़ाई उसने पढ़ रखी है वह इससे उलट है। या तो वह दुनियादारी निभा ले या विचार आज़मा ले। और हर किसीको दुनियादारी बड़ी प्यारी है। हां, जिस दिन यह विचार बल्कि विचार करना दुनियादारी का हिस्सा बन जाएगा, उस दिन ज़रुर कुछ संभावना पैदा हो सकती है। वह तभी हो सकता है जब एक-एक व्यक्ति नाम, मशहूरी, टीवी कवरेज आदि-आदि की चिंता कि
 बिना विचार को व्यक्तिगत जीवन में आज़माए।

जैसे जगह-जगह महात्मा गांधी व अन्य महापुरुषों की तस्वीरें लगीं हैं ऐसे ही विचार भी टंगे हैं। वे मर गए हैं और लोग उनकी तस्वीरों पर माला चढ़ाकर ख़ुश हो रहे हैं।


विचारों के मरते चले जाने पर भी ज़रा विचार करें।



-संजय ग्रोवर
08-01-2016

Saturday, 18 July 2015

झूठ से पैदा समस्याएं झूठ से हल कैसे होंगी !?

आंकड़े हमेशा ज़रुरी नहीं होते, कई तथ्य ऐसे होते हैं जो हम अकसर अपनी आंखों से देखते हैं मगर समाज में फ़ैली कुछ मान्यताओं या परंपराओं, क़िताबें पढ़-पढ़कर बनी कुछ धारणाओं के डर से ख़ुदसे भी छुपाते रहते हैं। कई लोग कहते हैं कि समलैंगिकता जैसी चीज़ भारत में बाहर/यूरोप से आ गई है, हम तो बड़े अध्यात्मिक लोग हैं......

मुझे यह जानने के लिए क़तई आंकड़ों की ज़रुरत नहीं है कि यह चीज़ भारत में बहुत पहले से मौजूद है। मैं जिस कस्बे में पैदा हुआ वह पुरुष समलैंगिकता के लिए मशहूर था। वहां मेरे जैसे लड़के बिलकुल उसी तरह डरे रहते थे जैसे लड़कियां डरी रहती थीं। कई लोग इसी दृष्टि से घूरते भी थे, या मुझे लगता होगा कि ऐसा है। जैसे डरी हुई लड़कियां किसी भी पुरुष का विश्वास आसानी से नहीं कर पातीं, अगर मेरे जैसे लड़कों को भी यह लगता था तो इसमें असामान्य क्या है! इस तथ्य(पुरुष समलैंगिकता की वजह से हमारे कस्बे की मशहूरी) की पुष्टि उस दिन हुई जब दूसरे शहर के हॉस्टल के कुछ सीनियर लड़कों ने रैगिंग के दौरान मेरा परिचय जानने के बाद अपने हाथ पीछे ले जाते हुए कहा कि भई, इससे तो डर लग रहा है, हाथरस से आया है।

मैं समझता हूं कि हमारी समलैंगिकता से उनकी बेहतर इसलिए है क्योंकि वे ज़बरदस्ती नहीं करते, सहमति से संबंध बनाते हैं, छुपाते नहीं हैं। भारत के लोगों को बहुत कुछ इसलिए छुपाना पड़ता है क्योंकि यहां के लोगों ने अपनी महानता(?) और पवित्रता(?) को लेकर दुनिया-भर में बड़ी-बड़ी डींगें हांक रखीं हैं कि तुम सब भौतिकतावादी हो इसलिए बड़े ख़राब हो, चरित्रहीन हो।

इसी तरह जानवरों के साथ संबंधों के क़िस्से भी मैंने तभी सुन लिए थे। इसमें कितनी नमक-मिर्च थी, कितनी ‘आंखिन-देखी’ थी यह तो मैं नहीं बता सकता मगर आज मुझे इसमें कोई हैरानी भी नहीं होती। अगर हम मनुष्य के साथ बिना सहमति के कोई संबंध बना सकते हैं, ऊंच-नीच कर सकते हैं तो पशुत्व की तरफ़ क़दम तो हम पहले ही बढ़ा चुके हैं।

इस्मत चुगताई की कहानी ‘लिहाफ़’ पहले ही इशारा कर रही थी कि स्त्री-समलैंगिकता भी अपने यहां कहीं न कहीं मौजूद है। हमारे पास कुछ है तो बस यही कि हर चीज़ को छुपाओ, किसीको भी, ख़ासकर विदेशियों को कुछ पता न लगने दो। मगर सोचने की बात यह है कि छुपाने से दूसरी बहुत सारी (मानसिक) समस्याएं/बीमारियां पैदा हो जातीं हैं। मैंने जो थोड़ा-बहुत मनोविज्ञान पढ़ा या सुना है और ख़ुद भी अनुभव किया है उससे तो यही पता चलता है कि मनुष्य की बहुत-सी मानसिक समस्याओं/बीमारियों की वजह उसका दोहरा व्यवहार/'छुपाओ' यानि ‘करो कुछ बताओ कुछ’ का रवैय्या है। तिस पर एक और बड़ी मुसीबत यह है कि यही लोग आए दिन दूसरों को, ख़ासकर उन लोगों को पागल/सनकी/विकृत करार देते और नुकसान पहुंचाते रहते हैं जो एक साफ़-सुथरी और स्पष्ट ज़िंदगी जीने की कोशिश कर रहे हैं।

झूठ समझने और बताने के लिए हमेशा आंकड़ों और सर्वे की ज़रुरत नहीं होती, दोहरी ज़िंदगी जीने वाले समाजों में या अतीत में घट चुकी घटनाओं के मामले में हमेशा यह संभव भी नहीं हैं। लेकिन कुछ बातें सहज समझ और अनुभवों से भी समझी जा सकती हैं। एक-दो ऐसे उदाहरण बताता हूं। जैसे कि बीच में कहा गया कि चाउमिन की वजह से छेड़छाड़ या बलात्कार होते हैं। इसका मतलब क्या हुआ ? इसके अलावा और क्या कि चाउमिन पुरुषों की किसी क्षमता या उत्तेजना में वृद्धि करते हैं। मगर सोचने की बात यह है कि तब क्या चाउमिन इतने सस्ते मिलते !? तब लोग महंगे शिलाजीत और महामहंगे वियाग्रा की तरफ़ क्यों भागते !? तब इनपर भी बैन क्यों नहीं होना चाहिए ? जब आदमी का कोई भरोसा ही नहीं है तो वह कुछ भी खाकर कहीं भी कुछ भी कर सकता है। सही बात यह है कि ज़्यादातर घटनाएं इन सब कारकों की अनुपस्थिति में होतीं हैं। दूसरे उदाहरण में, जो राजा हज़ार-हज़ार और पांच-पांच सौ रानियां रखते थे उनमें से कई अपने हरमों में उन रानियों की सेवा के लिए हिजड़ो (आज की सभ्य भाषा में लैंगिक विकलांग) की नियुक्ति करते थे। इससे तो यही समझ में आता है कि वे भी मर्द की सीमित क्षमताओं को जानते थे और अपनी अनुपस्थिति में घट सकने वाली सहज-संभाव्य घटनाओं से बचने की फ़ौरी जुगाड़ करते थे। यानि कि मर्दों की वास्तविक/सीमित क्षमता पर परदा डालने का प्रयत्न करते थे। एक झूठे अहंकार की रक्षा करते थे।

इसमें सोचने की बात यही है कि ऐसे प्रयत्नों से समस्याएं सुलझेंगी कि बढ़ती जाएंगी !?   

-संजय ग्रोवर    
18-07-2015



Saturday, 25 April 2015

भूकंप पर चिंतन में निराधार कंपन

प्राकृतिक आपदाओं के बाद जो सबसे अजीब और विचित्र (मुझे पता है दोनों का मतलब एक ही है) प्रतिक्रिया होती है, वह यह है कि यह सब भगवान ने ही किया है। इसलिए कि धरती पर पाप बहुत बढ़ गए थे, प्रदूषण ज़्यादा हो गया था वगैरह......। कई लोग चाहें तो इसमें व्यक्तिगत ख़ुन्नस भी जोड़ सकते हैं कि मेरा पड़ोसी गुटख़ा बहुत खाने लगा था, फ़ेसबुक पर साहित्य के मुनीमों की पूंछ(मतलब महत्व वग़ैरह) ख़त्म हो गई थी, लोग पुरस्कारों पर उंगली उठाने लगे थे.......तो भूकंप तो आना ही था।

इन विद्वानों से पूछना चाहिए कि जब पाप बढ़ रहे थे तब भगवान क्या कर रहा था!? क्या भगवान भी इलैक्ट्रौनिक मीडिया में काम सीखके आया है कि पहले तो किसीको अपनी हत्या करने दे बाद में रोना-धोना करने लगे!? यह भगवान है कि किसी पोंगे स्कूल का टीचर है जो पहले तो बच्चों को लड़ता-मरता छोड़कर क्लास से ग़ायब हो जाता है और बाद में आकर उन्हें पीटता है कि मेरी अनुपस्थिति में लड़ क्यों रहे थे ?


और यह क्या ढंग हुआ पापियों को समझाने का ? मुझे किसीसे कोई शिक़ायत है, मैं उसे कुछ समझाना चाहता हूं तो बिलकुल सीधा और आसान रास्ता है कि मैं अपने मुंह से बोलकर उसे बताऊं कि भई मुझे आपसे यह शिक़ायत है, कृपया आप मेरे साथ ऐसा व्यवहार न किया करें। मगर यह क्या तरीक़ा हुआ कि मैं उसे पीछे से जाकर झकझोर दूं और भागकर ग़ायब हो जाऊं, उसे यह तक न पता चले कि कौन झकझोर गया, क्यों झकझोर गया !?

यह तो मैं तभी करुंगा जब मैं गूंगा होऊं या ख़ुद मेरे मन में कोई शैतानी हो।


क्या भगवान ऐसा ही है? पहले तो पाप होते देखता रहता है, फिर जब पाप हो चुकते हैं तो लोगों को समझाने निकलता है!? और समझाते हुए भी सीधा नहीं बोलता, झटके देता है, पहेलियां बुझाता है! इसका मतलब तो यह हुआ कि कुछ लोग पाप की वजह से मर जाते हैं और कुछ भगवान के समझाने के अजीब ढंग की वजह से।


अगर दुनिया के सभी लोग एक-दूसरे को भगवान वाले ढंग से समझाने लगे तो क्या हाल होगा इस दुनिया का ?

भूकंप से तो जो नुकसान होता है, होता ही है, उससे बड़ा और दीर्घकालिक नुकसान इस वजह से होता है कि लोग एक प्राकृतिक आपदा को भगवान नाम की पूर्णतया अव्यवहारिक कल्पना से जोड़कर जनमानस के मन में निराधार डर और अंधविश्वास भरते रहने से बाज़ नहीं आते।


-संजय ग्रोवर
25-04-2015