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Saturday, 12 October 2019

भगवान और चुनौती

कहते हैं कि भगवान कुछ भी कर सकता है !
चलिए, ज़रा आज़माते हैं-
भगवान अगर है तो संविधान उसकी मर्ज़ी से ही बना होगा।
लेकिन असंवैधानिक काम जगह-जगह पर हो रहे हैं !
यहां जातिभेद होता है।
यहां रंगभेद होता है।
यहां स्त्री और पुरुष में भेद होता है।
सिर्फ़ दिल्ली में ही, वो भी पैसेवाले और पढ़े-लिखे लोगों ने, क़दम-क़दम पर असंवैधानिक कमरे बना रखे हैं ! दुकाने बना रखी हैं।
कई औरतें मजबूरन रखैलें और वेश्याएं बनी हुई हैं।
उनसे बलात्कार हो रहे हैं।
लोग मजबूरन पाखाना साफ़ कर रहें हैं, दूसरों की गंदगी ढो रहे हैं।
यूं तो ऐसी कई चीज़ें हो रही हैं मगर भगवान इतने सालों से चुपचाप देख रहा है !
क्या भगवान को संविधान नहीं पता ? क्या वह पढ़ा-लिखा नहीं है ?
हम भगवान को टाइम देते हैं कि आज रात तक वह यह सब बुराईयां ख़त्म कर दे।
असंवैधानिक कमरे गिरा दे।
लड़कियों को आज़ाद कर उनकी शादियां करा दे।
लोगों का पाखाना बंद कर दे या उसे ख़ुद साफ़ किया करे।
जातिभेद ख़त्म कर दे.......
काम तो बहुत हैं और दलाल कहते हैं कि भगवान पलक झपकते ही सब कुछ बदल सकता है।
हम भगवान को छूट देते हैं कि आज शाम तक वह इनमें से कोई पांच काम ही कर दे।
चलो हम यह भी छूट देते हैं कि कोई सा भी भगवान-साकार, निराकार, धार्मिक, धर्मनिरपेक्ष, कोई भी भगवान इस काम को करके दिखा दे। चलो हम यह भी छूट देते हैं कि सारे भगवान मिलकर इस काम को करके दिखा दें।
नहीं तो साबित हो जाएगा कि वह/वे नहीं है।
और उसको माननेवाले फ़िर अनाथ हो जाएंगे।

-संजय ग्रोवर
(on facebook today 12-10-2019)



Thursday, 11 April 2019

नास्तिकों के खि़लाफ़, भगवान के खि़लाफ़

 जो लोग भगवान को मानते हुए भी नास्तिकों के खि़लाफ़ हैं, वे भगवान के ही खि़लाफ़ हैं। क्योंकि जिस भगवान की मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता वो अगर न चाहता तो नास्तिक कैसे हो सकते थे ? और अगर भगवान चाहता है कि नास्तिक पृथ्वी पर हों तो आप क्यों चाहते हैं कि वे न हों? यह तो भगवान के काम में टांग अड़ाना हुआ। आप क्या ख़ुदको भगवान से भी बड़ा मानते हैं जो उसके फ़ैसलों में ग़लतियां ढूंढ रहे हैं? हद हो गई अहंकार की !!

और अगर नास्तिक पृथ्वी पर भगवान की मर्ज़ी के बिना हैं तो साफ़ है कि सब कुछ भगवान की मर्ज़ी से नहीं होता, सब कुछ भगवान के कंट्रोल में नहीं है। भगवान ज़्यादा से ज़्यादा चाइना या अमेरिका के राष्ट्रपति जैसी हैसियत या शक्ति रखता है। क्या आप चाइना या अमेरिका के राष्ट्रपतियों/राष्ट्रप्रमुखों को भगवान मानने को तैयार हैं ? बच्चे भी जानते हैं कि सभी राष्ट्रप्रमुख आदमी ही होते हैं।

ऐसे भगवान का क्या करना जो एक पृथ्वी पर भी ठीक से नियंत्रण नहीं रख सकता!?

-संजय ग्रोवर
01-07-2014
(on facebook)

Saturday, 31 March 2018

कर्ज़ जिनका मर्ज़ है उन्हींको ऐतराज़ है



बनियानें चिथड़े-चिथड़े हो गई थीं। भला हो सलीके-से रखे, सस्ते में बनें पुराने कपड़ों और स्वेटरों का जिनमें वे छिप जातीं थीं। दोनों तरफ़ के दांतों में कीड़े लग चुके थे, पानी पीने में भी इतना दर्द होता था कि बर्दाश्त नहीं होता था। सुबह दुकान खोलने से पहले दो-तीन केले और आधा लीटर दूध ख़रीदता और दुकान में रखे गैस-चूल्हे पर उबालकर नाश्ता करता। दोपहर में आठ रुपए के कुलचे-छोले। चबाते हुए दांतों में जो दर्द होता कि पसीने छूट जाते।

एक दिन पहले ही बैंक-अकाउंट से 4000 रु निकाले थे और अब सिर्फ़ 3000 रु ही बचे थे कि सुबह एक और मौत की ख़बर आ गई। मेरी आंखों के सामने अगले दिनों में होनेवाले रीति-रिवाजों के सर्कसनुमां मंज़र कौंधने लगे जो मुझे सख़्त नापसंद थे। दाढ़ी और बाल पूरे सफ़ेद हो रहे थे। मैं गया, एक दिन के रीति-रिवाज आधे-अधूरे निपटाए और मन उखड़ गया गया। बाक़ी सब बीच में ही छोड़के लौट आया।


अब दुकान जल्द से जल्द बेचनी थी। शीला दीक्षित सरकार के वक़्त में एक साल तक जो सीलिंग ड्राइव चली, उसके बाद हुए फ़ैसले में जनता फ़्लैट्स् में बनी दुकानें भी मंज़ूर हो गईं थीं, ना भी होतीं तो मैंने दुकान बंद करने का मन बना लिया था। मेरी सोच यही थी कि देश में संविधान का राज क़ायम करना है तो कुछ त्याग के लिए हमें यानि जनता को भी तैयार रहना चाहिए। मगर दुकान मंज़ूर हो ही गईं तो मैंने ख़ुद ही पूरी भाग-दौड़ करके रजिस्ट्री करा ली थी। क़तार में लगे-लगे धक्का-मुक्की में मेरा एकमात्र प्रिय चश्मा कुर्ते की जेब में ही चूर-चूर हो गया था। फिर भी दुकान का रजिस्ट्रेशन हो जाने की खुशी में मैं उसको भूल गया था। लेकिन सबके भले को ध्यान में रखकर ईमानदारी से जीने के लिए जो योजना बनाई थी वह किसी वजह से खटाई में पड़ गई थी। इस देश में पुरानी और रुढ़िवादी सोच से लड़ना कितना मुश्क़िल है, यह किन-किन रुपों में बार-बार सामने आ खड़ी होती है और आपको हर बार कितना अकेला और असहाय छोड़ जाती है, जो करता और झेलता है वही जानता है।

सबसे बड़ा डर यही था कि किसीके सामने हाथ फैलाने की नौबत न आ जाए। मेरे लिए यह मुश्क़ि़ल नहीं असंभव जैसा काम था। मुझे याद है एक बार एक रिश्तेदार ज़बरदस्ती अपने साथ अपने घर ले गए थे। मैं आसानी से कहीं जाता नहीं था। एक हफ़्ता वहां जैसे-तैसे बिताया और कहा कि बस अब मुझे वापिस जाना है। उन्होंने रात को मुझे 50 रुपए का नोट दिया। मुझे ये चीज़ें कभी समझ में नहीं आईं। मैं लेने को तैयार न हुआ तो उन्होंने ज़बरदस्ती मेरी छोटी-सी अटैची में डाल दिए। लेकिन थोड़ी और देर बाद मैंने उनके स्टोरनुमां कमरे में रखे दाल के डोंगों में अपने नाम की पर्ची के साथ वह नोट वापिस डाल दिया। फिर भी मैं डरता रहा कि सुबह मेरे निकलने से पहले इनको कहीं वह नोट दिख न जाए वरना फिर वही सब लेना-देना और लिफ़ाफ़ेबाज़ी.......। 

मेरे पिताजी के एक दोस्त थे जो उम्र में उनसे ख़ासे बड़े थे। अमीर आदमी थे। मैं बुज़ुर्गों से बात करने से, बल्कि उनके सामने पड़ने से भी बचता था। लेकिन जब कभी मैं उनके सामने दो-चार मिनट के लिए भी पड़ जाता, वे अकसर एक बात करके मुझे हैरानी में छोड़ जाते। वह बात थी कि ‘तेरे पिताजी का जो कुछ भी है सब तेरा ही तो है, फिर तू ऐसा क्यों सोचता है.....।’ मैं हैरान होता कि यह आदमी जो न तो बहुत पढ़ा-लिखा है, न मनोविज्ञान का जानकार है, न कभी मेरे से बातचीत हुई है फिर भी उस बात को कैसे जानता है जो मेरे साथ, आस-पास रहनेवाला किसी भी तरह का कोई व्यक्ति भांप तक न पाया!! 

यह बात बिलकुल सही थी कि ठीक होश संभालते से मैं अपने पिताजी से उस अधिकार-भाव से पैसे कभी नहीं ले पाया जैसे दूसरे बच्चे लेते हैं। ठीक बचपन से मेरे मन में एक अपराध-बोध बना रहता था। सही बात तो यह है कि बहुत कम अवसरों पर अपने मुंह से मैंने उनसे पैसे या कोई सामान मांगा। वे जो भी दे देते थे, मैं ले लेता था। भले, ईमानदार और मेहनती आदमी थे, शायद इसलिए भी मुझे संकोच होता हो। मुझे आज तक नहीं मालूम कि किस वक़्त में उनके पास कितना पैसा था। उन्होंने कभी बताया नहीं, मैंने कभी पूछा नहीं।

मेरी नज़र में एक और बहुत क़ाबिले-ज़िक़्र बात यह है कि दिल्ली में इसबार मैं पूरी तरह अपने दम पर जमा था। पिताजी ने फ़्लैट के लिए पैसे दिए थे। लेकिन माता-पिता के तमाम रिश्तेदार, जानकार, अमीर और ग़रीब, मेरे ख़ुदके पुराने मित्र...किसीके पास भी मुझे नहीं जाना पड़ा था। सब कुछ मेरे नये बने उन जानकारों ने कराया जो मुझे सिर्फ़ मेरी वजह से जानते थे। यू ंतो मैं दिल्ली में साहित्य, कला, टीवी डिबेट, मुशायरे....आदि-आदि को ध्यान में रखकर आया था मगर चूंकि किसी वजह से यह काम ठीक से शुरु ही न हो पाया तो ख़र्चापानी चलाने के लिए अगला काम मैंने पीसीओ खोलने का सोचा। मुझे लगा कि लोग आएंगे, फ़ोन करेंगे और तयशुदा दर से पैसे दे जाएंगे ; न कोई बेईमानी, न कोई झंझट ; साथ में अपना लिखने-पढ़ने का काम भी आराम से करते रहो। मुझे क्या मालूम था कि ईमानदारी से तो यहां किसी काम की शुरुआत तक नहीं हो सकती। बहरहाल, पीसीओ के दरवाज़े पर ही लिखे अब्राहम लिंकन के संदेश और मेरे व्यवहार ने ईमानदारी के लिए अच्छा-ख़ासा माहौल तैयार कर दिया। सुबह पांच बजे से रात को कम-अज़-कम बारह-एक बजे तक दुकान भरी रहती। जो लोग पहले कहते कि यहा अंदर फ़ोन करने कौन आएगा, उनकी दुकानों को भी अब मेरी दुकान की वजह से किराएदार आसानी से मिलने लगे।

बहरहाल, ज़िंदगी में पहली बार मेरे खर्चे यूं आसानी से निकलने लगे जैसा मैंने भी न सोचा था। दुकान की बक़ाया क़िश्तें, खाना-पीना, आना-जाना, रिश्तेदारियां-दुनियादारियां, अन्य खर्चे मज़े-मज़े में हो जाते। दिलचस्प बात यह है कि जब तक दिल्ली में सीलिंग ड्राइव शुरु नहीं हो गई, कभी स्पष्ट नहीं हो पाया था कि यह दुकानें वैध हैं या अवैध !!

और अब जब रजिस्ट्रेशन हो गया, मैंने दुकान बेचने का मन बना लिया था। सही बात यह है कि ज़िंदगी में कभी दुकानदार बनने का नहीं सोचा था पर फिर भी कई बार दुकानें खोली, अपनी तरह से, बिना पूजा-पाठ-अगरबत्ती के चलाई और अच्छी-खासी चलती हुई बंद कर दीं।

इधर बहुत दिनों से किसी मित्र से भी बात नहीं हुई थी। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करुं, एक मित्र का फ़ोन आ गया। यूं ही हाल-चाल पूछना-पाछना चल रहा था कि मेरी आवाज़ डूबने-भीगने लगी। कुछ थोड़ा-बहुत मैंने बताया भी, उसे पता नहीं कितना समझ में आया पर कहा कि कोई ज़रुरत हो तो बता देना। उस दिन मैं नहीं बता पाया। पर दूसरा रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा था, दोबारा एक दिन फ़ोन करके डरते-डरते बताया कि बहुत थोड़े समय के लिए, जब तक दुकान बिक जाए, थोड़े-से पैसे, बस दस-बीस हज़ार रुपए चाहिए। डर यह भी था कि डीलरों को पता चल गया कि मेरी आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब है तो दुकान के आधे पैसे लगाने लगेंगे। मित्र ने कहा कि मैं ज़रुर प्रबंध करुंगा। कुछ दिन निकलने के बाद एक दिन सुबह मित्र का फ़ोन आया कि आज मैं पैसे ले आया हूं, शाम तक ले जाना। मैं पूरे दिन दुकान पर बैठा सोचता रहा, जाने की हिम्मत नहीं हुई। रात के नौ बज गए। अब क्या जाना था ? लेकिन क्या देखता हूं कि हल्की-हल्की बूंदा-बांदी में मित्र सर पर ब्रीफ़केस रखे ख़ुद चले आ रहे हैं। वे मेट्रो से आए थे। बीस हज़ार रुपए देके और यह कहके कि और ज़्यादा चाहिएं तो बता देना, वे निकल गए। इन मित्र ने पहले भी एक-दो बार मुझे चमत्कृत/हैरान किया था जब अपने माता-पिता की मृत्यु की सूचना सारे कर्मकांड पूरे हो जाने के बाद दूसरे दिन दी थी। फिर भी मैं नहीं गया तो रत्ती-भर बुरा नहीं माना था। इस समाज में जहां मौत में न आने पर लोग इतना बुरा मानते हैं, इन मित्र ने दोबारा कभी इस बात का ज़िक्र तक न किया।

जैसे भारत में आम-तौर पर सभी रखते हैं, मेरे माता-पिता ने भी मेरी शादी के लिए कुछ सामान रख छोड़ा था। मैंने सूझ-बूझ से काम लिया, शादी में मेरी वैसे भी हमेशा से बहुत कम दिलचस्पी रही है, मैंने अगले पंद्रह दिन में वह सामान उन्हीं मित्र के ज़रिए बेच दिया और बहुत-बहुत आभार के साथ उनके बीस हज़ार, उनके मना करते रहने के बावजूद, वापिस कर दिए। 

अब मैं कुछ राहत महसूस कर रहा था। जानकार प्रोपर्टी डीलर से मैंने कहा कि भले रेट कम मिलें पर मुझे ग्राहक व्हाइटमनी वाला चाहिए। मुझे किस तरफ़ जाना है, मैं तय कर चुका था। थोड़े दिन बाद ऐसा ग्राहक भी मिल गया। भले आदमी का व्यवहार भी भला था। मुझे थोड़ी और राहत मिली। मैं रोज सुबह 4-5 बजे दुकान पर जाता, सामान पैक करता, दो-तीन रिक्शे पकड़ता, उनके साथ सामान लदवाता, छै-सात बजे तक घर में उतरवा देता। दस-पंद्रह दिनों में यूं ही सारा सामान मैंने शिफ़्ट कर लिया। गाड़ीवाला एकमुश्त जो पैसे मांग रहा था, उसकी तुलना में काफ़ी पैसे मैंने बचा लिए थे।

माताजी कई महीनों से बीमार थे, ज़्यादा कुछ तो संभव नहीं था पर डॉक्टर ने जो कुछ भी खर्चा बताया, कर दिया। जहां मौतें हुईं थी वहां जाकर जितनी संभव थी, आर्थिक मदद की, मित्र के ही ज़रिए उस साल ढाई लाख रुपए इनकमटैक्स दिया। न भी देता तो कोई पूछनेवाला भी नहीं था। बाक़ी लगभग पैसा डाकखाने की मंथली इनकम स्कीम और स्टेट बैंक सेविंग्स बांड में लगा दिया। इस बीच भी तबियत लगातार ख़राब चलती रही। फ़्लैट की रजिस्ट्री के लिए जो ताज़ा फ़ोटो खिंचाया था, वह किसी 60-70 साल के आदमी का लगता था। हड्डियों की तीन गंभीर बीमारियों के नब्बे प्रतिशत लक्षणों के बीच सस्ती होम्योपैथिक दवाओं पर वक़्त गुज़ारता रहा। दो-तीन साल और निकाले। बिस्तर-कपड़े सब काले पड़ गए थे। कई बार बेहोश हुआ, गिरा, उठ गया, आवाज़ नहीं दी कभी किसीको। शुक्र है इतने पैसे थे कि बीच-बीच में रात को जाके कच्छे-बनियान के सेट ख़रीद लाता, कुछ दिन और निकल जाते। पूरे शरीर के जोड़ जैसे जाम हो गए थे, कभी-कभी लगता कि सिर्फ़ फ्रूट और सलाद खाने से शायद कुछ फ़ायदा हो और पैसे बच जाएं। घर के बिलकुल बराबर वाले सब्ज़ी के ठेलों तक जाने में 15-20 मिनट लग जाते। इतने तरह का दर्द होता कि डर लगता कि सभी दर्दों के लिए टैस्ट कराए तो लाखों रुपए लग जाएंगे और सड़क पर आ जाऊंगा। जिस आदमी ने सारी ज़िंदगी में कुल दो-तीन बार बीपी चैक कराया हो बल्कि डॉक्टर ने ज़बरदस्ती चैक किया हो वह आदमी इस-उस लफ़ड़े में ख़ामख़्वाह क्यों फंसना चाहेगा ! सब्ज़ीवालों से दो थैले फ़ूट-सलाद के भरकर रिक्शा में बैठकर पकड़ाने के लिए कहता तो वे मज़ाक़ में कहते कि ये सब आप ही खाओगे। मैं भी हंसकर कहता कि भैया, आता भी तो दो-दो महीने बाद हूं।

माताजी की मृत्यु पर घर में आखि़री बार पंडित आया था। मैंने निर्णय ले लिया था, अब और एक मिनट भी यह नपुंसकता का जीवन नहीं बिताना।

कई बार लगता कि पड़े-पड़े ही मर जाऊंगा। इस बीच अवैद्य मकान बनानेवालों के झंझट, हमले, बदकारियां, गंदे-कीचड़ जैसे पानी की समस्याएं, पुलिस केस, ईमानदारी के लिए अकेले अपनी जान दांव पर लगा देने के बावजूद ‘पागलपन बढ़ते जाने’ का खि़ताब, नाजायज़ मकान बनानेवालों से ‘कोई ईमान-धरम न होने’ का खि़ताब, बार-बार पेन कार्ड, आधार कार्ड, फ़ॉर्म 15 जी देने और करयोग्य आय न होने पर भी बार-बार इनकमटैक्स कट जाने का उपहार, ‘हंस’ जैसी पत्रिका का आजीवन चंदा देने के बावजूद कई सालों से (लगभग) एक भी प्रति न आने का ईनाम...ऊपर से नास्तिकता/तार्किकता/सच्चाई के साहस से चिढ़े साजिशकर्ताओं के प्रतीकात्मक इल्ज़ाम.....क्या-क्या नहीं झेला और झेल रहा।

दो-तीन साल में समझ में आ पाया कि ब्याज़ में खर्चा चल पाएगा या नहीं। शुरु में नौ-दस हज़ार रु महीने में काम चलाया, लैपटॉप और वॉशिंग मशीन ख़रीदे। अब लगभग चौदह हज़ार महीने में काम चला रहा हूं। बचत में से भी थोड़ी-बहुत बचत कर ली। सुबह एक टाइम नाश्ता करता हूं- अकसर कच्ची ब्राउन ब्रैड साथ में थोड़ी रोस्टेड नमकीन या बटर से सेंक लेता हूं। चार-से छै स्लाइस। शाम को खाना-अकसर दो-या तीन तंदूरी रोटी और एक सब्ज़ी जो कि कई बार बच भी जाती है। कभी-कभी थोड़ी मिठाई या एक लीटरवाला रियल जूस मंगा लेता हूं। अपनी पसंद की दारु भी लाकर रखता हूं, पर असलियत में पीता बहुत ही कम हूं। इस पूरी सर्दी में सिर्फ़ एक पेग पिया है।

एक मित्र(वही) और एक रिश्तेदार से एक-एक बार बीस हज़ार उधार लिए जो पंद्रह-पंद्रह दिन में वापिस कर दिए। सामूहिक-पारिवारिक कारणों से दो बार बड़ी राशियां जो लीं वो भी 4-6 महीनों में लौटा दीं। 

पिताजी की मृत्यु के बाद एक गैस कनेक्शन फ़ालतू हो गया था। डिलीवरी बॉय ने बताया कि बाज़ार में डेढ़-दो हज़ार में बिक जाएगा। मगर मैंने 900 रु में गैस एजेंसी को वापिस कर दिया क्योंकि मेरा रास्ता संभवतम ईमानदारी के साथ जीवन बिताने का था/है।  

14000 ब्याज के बदले में पूरे दिन लिखता हूं, कई विधाओं में लिखता हूं, नया, मौलिक, सच और तार्किक लिखने की कोशिश करता हूं, ‘नास्तिक’ और ’पागलखाना’ जैसे ग्रुप शुरु करके नास्तिकता और नयेपन को सहज-स्वीकार्य बनाने का काम करता हूं, टाइप करता हूं, ड्रॉइंग बनाता हूं, फ़ोटो खींचता हूं, नाश्ता बनाता हूं, कपड़े धोता हूं, कई बार कम्प्यूटर-प्रिंटर आदि ख़ुद ही ठीक कर लेता हूं, समाज और संचार माध्यमों में घुसे बैठे बेईमानों से निपटता हूं.....

घर साफ़ करने में जिन मित्रों ने भी वास्तविक मदद की उनका हर तरह से आभार व्यक्त करने के बाद अब मैं अकेला यह काम कर रहा हूं, आधे-से ज़्यादा कर चुका हूं, उम्मीद है बाक़ी भी जल्दी हो जाएगा। उसके बाद मरम्मत वगैरह का काम ही रह जाएगा।

जो लोग कहते हैं कि नास्तिक कर्ज़ लेकर घी पीते हैं उनको मैं बाक़ी नास्तिकों का तो नहीं पर अपना ज़रुर बता सकता हूं कि यह है मेरी ज़िंदगी।

न मैंने कभी बैंक से लोन लिया, न पुरस्कार का सोचा, न अपने या अपने किसी रिश्तेदार के लिए किसी सरकार से अस्पताल में बैड/वार्ड चाहा, न कभी किसी हिंदी-उर्दू अकादमी से सहायता मांगी, न देश-विदेश घूमने के लिए किसी नेता की कृपा चाही, साइकिल से ज़्यादा कभी कुछ चलाया नहीं, सेठों के मुशायरों या कवि-सम्मेलनों में जाने का जुगाड़ नहीं किया, नास्तिकता और मौलिकता के लिए की गई दूसरे की मेहनत हथियाने की नहीं सोची, न क़िताबों से रटा हुआ तर्क उल्टी की तरह उलटा.......

चाहता तो बेईमानों की बात मानकर उन्हींके खर्चे पर तीन अतिरिक्त नाजायज़ कमरे बनाता और किराए पर उठा देता पर यह भी नहीं किया। चाहता तो समाज की सबसे टटपूंजिया परंपरा अपनाकर शादी करता और ससुराल, साले-सालियों और अपने बच्चों पर शासन करता, माल खींचता, दहेज लेता, छेड़खानियां करता, बेईमानियां करता। 

ज़रा सोचो कि कौन है जो इस देश में जो परजीवियों, भिखारियों और बेरोज़गारों जैसा जीवन बिता रहा है। कौन है जो सरकारें बदलने का दावा करता है पर ख़ुद नहीं बदलता--

मैं इसी तरह लिखता रहूंगा।


-संजय ग्रोवर
29-03-2018


Tuesday, 16 January 2018

बहुत दिन हुए ढंग का कुछ लिखा नहीं-1

पहला ग्रुप बनाया था ‘पागलखाना’। दूसरों को उनकी मर्ज़ी के बिना शामिल करते हिचक होती थी, तक़रीबन 20-25 लोगों को लिया होगा। एक महिला मित्र ने मैसेज-बॉक्स में कहा कि हमें निकाल दीजिए, तुरंत उन्हें निकाल भी दिया। लंबे अर्से तक संख्या 20-25 ही रही। शुरु में नहीं समझ में आता था कि क्या लिखें, कैसा लिखें ? यही सोचा था कि जो बातें और कहीं कहनी मुश्क़िल लगतीं हैं मगर ज़रुरी हैं, यहां कहेंगे ? सदस्यों की संख्या बढ़ने के साथ अजीब-अजीब चीज़ें भी शुरु हो गईं। ब्राहमणवाद, अंधविश्वास, रीति-रिवाजों के खि़लाफ़ बीच-बीच में कुछ लिख देता था। एक मज़ेदार चीज़ देखी, बीच-बीच में लोग ख़ुद ही आपस में लड़ने लगते, अपशब्द कहते, फिर यह भी कहते कि इस ग्रुप में ग़ाली-ग़लौच बहुत होती है, हम यह ग्रुप छोड़ देंगे। तिसपर और दिलचस्प यह कि छोड़ते भी नहीं थे। ज़्यादा हुआ तो तंग आकर मैंने ख़ुद ही निकालना शुरु कर दिया। और देखता कि आपस में ग़ाली-ग़लौच करनेवालों की दोस्ती बाहर जाकर वैसी की वैसी है। कई लोग बीच-बीच में ग्रुप की सेटिंग्स क्लोज़ करने की मांग उठाने लगे। महिलाएं भी आने-जाने लगीं। एक ने कहा कि ग्रुप की सेटिंग्स् इसलिए क्लोज़ कर दीजिए कि शाम को मैं थकी हुई आतीं हूं यहां थोड़ा लुत्फ़ आता है मगर नहीं चाहती कि कोई देखे। मैंने कहा कि एक तो आप प्रगतिशील हैं, दूसरे यहां ऐसी कौन-सी बात हो रही है जो छुपाकर की जाए! एक प्रगतिशील महिला ने छूटते ही प्रश्न दाग़ा, ‘आप रिवाइटल खाते हैं क्या ?‘ जवाब तो कई सूझ रहे थे मगर सोचा कि मामला छेड़खानी का बन जाएगा, पहले किसने शुरु किया, कोई देखेगा नहीं, सो टालने जैसा जवाब दे दिया।

इधर एक मित्र ने ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ शुरु कर दिया। इससे पहले मैं अपने ब्लॉग ‘संवादघर’ पर यदा-कदा नास्तिकता पर बहस चलाता रहता था और उनका भी वहां आना-जाना था। उन्होंने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त रख दी थी सो आज तक गुप्त रखे हुए हूं। ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर सब तथाकथित रुप से वामपंथी और प्रगतिशील मित्र थे, संभवत दलित वगैरह कोई भी नहीं था। ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर शुरु होने के 9-10 दिन तक किसीने पोस्ट नहीं लिखी। अंततः मैंने ही पहली पोस्ट लिखी-‘नास्तिकता सहज है’। लोगों ने यह नयी बात काफ़ी पसंद भी की। बहस शुरु हो गयी और मैं दिन-रात, खाना-पीना, वक़्त-तबियत देखे बिना उसमें लगा रहा। ‘पागलखाना’ के दिनों से ही काफ़ी परेशानियों से गुज़र रहा था। जिस दौरान अन्ना आंदोलन शुरु हुआ, मेरे घर का पिछला कोर्टयार्ड 9-10 इंच कीचड़ से भरा हुआ था, गटर जाम तो अकसर देखा था, पर इस तरह का कीचड़ पहली बार देखा था। पूरे घर में भयानक बदबू आती थी। एक तो ऊपरवाले एक पड़ोसी सफ़ाई के पैसे नहीं देते थे, दूसरे, सफ़ाईकर्मी आसानी से नहीं मिलते थे। एक बार एक सफ़ाईकर्मी उनसे पैसा मांगने में डर रहा था और उनके पैसे भी मुझसे ही मांग रहा था तो मुझे ग़ुस्सा आ गया और मैंने अपने घर के सामने ही ऊंच-नीच, आरक्षण, भेदभाव, धौंसपट्टी आदि का हवाला देते हुए उससे उनका हिस्सा उन्हींसे मांगकर लाने के लिए कहा। वे भी ऊपर खड़े (और संभवतः कुछ और लोग भी) मेरी बातें सुन रहे थे। उस दिन पहली बार उन्होंने पैसे दिए।

भयानक बदबू से ध्यान हटाने के लिए मैंने तेज़ मसाले, चूरन-चटनी आदि खाना शुरु कर दिया। मैं पूरे दिन लिखता या पढ़ता रहता था, कभी-कभी शाम तीन बजे याद आता कि सुबह से कुछ खाया नहीं है और साढे तीन बजे के बाद कुछ मिलेगा नहीं। अपने बजट के हिसाब से कुछ ऑर्डर करता और ब्रश करके जैसे-तैसे एक कटोरी, एक चम्मच, एक प्लेट, एक गिलास मांजता। शरीर में जगह-जगह, तरह-तरह के भयानक दर्द होते रहते थे। डिलीवरी बॉय जब आता तो मैं बड़ी मुश्क़िल से टेबल से चार क़दम चलकर दरवाज़ा खोलता। रास्ते में मेरे पैरों से उलझ-उलझकर कई चीज़ें गिर जातीं, कई टूट भी जातीं। तमाम नुकसान होते रहते। तबियत बचपन से ही नाज़ुक थी। कई लोग तो तबियत की वजह से ही मुझे किसी अमीर आदमी का लड़का समझ लेते थे।

बहरहाल उन्हीं दिनों मेरे एक गायक मित्र भी कई सालों बाद अचानक लौटकर आ गए थे। पहले हमारी ख़ूब महफ़िलें जमा करतीं, घूमना फिरना, खाना-पीना चलता रहता था। लब्बो-लुआब यह कि गाढ़ी दोस्ती थी। संभवत़ वे मित्र अपने को दलित या मुख्यधारा से अलग किसी पहचान से पुकारा नहीं जाना चाहते थे, और मैं भी इन बातों में यक़ीन रखता नहीं था पर उनके घर उनके अंकल ने एक दिन अपने-आप यह ज़िक़्र किया था। बहरहाल, यहां चूंकि प्रासंगिक है इसलिए मैं ऐसा ज़िक्र कर रहा हूं। इस बीच मेरे एक अन्य मित्र बने थे जो मेरे पास काफ़ी आते-जाते थे। वे ब्राहमण थे। गायक मित्र से उनका परिचय मैंने ही कराया था। गायक मित्र ने मुझे बताया था कि पिछले सालों में वे मेरी कुछ ग़ज़लें भी कार्यक्रमों में गाया करते थे। उन्होंने कुछ ग़ज़लें सुनाई तो मुझे उनकी धुनें व अंदाज़ अच्छा लगा, मैंने सलाह दी कि तुम ग़ज़लें ही क्यों नहीं गाते, धुनें तो अच्छी बनाते हो। इधर मेरे ब्राहमण मित्र मेरे सामने अकसर एक अन्य गायक की प्रशंसा करते जिनसे भी मेरा परिचय था, पर मैं कहता कि मुझे यही बेहतर लगते हैं। दिलचस्प बात यहां यह है कि अन्ना आंदोलन से लगभग तीन दिन पहले वे मित्र आए तो कुछ ज़िक्र नहीं किया। अन्ना आंदोलन जिस दिन शुरु हुआ उस दिन दोनों साथ-साथ आए, उनके हाथ में एक सीडी थी। पता चला कि सीडी में ब्राहमण मित्र के लिखे और दलित मित्र के गाए गाने थे जो संभवतः किसी चैनल पर या घटनास्थल पर इस्तेमाल होने थे। मुझे यह जानकर थोड़ा धक्का लगा कि ब्राहमण मित्र जो दलित मित्र की गायन-प्रतिभा पर कुछ रिएक्शन भी नहीं देते थे, दूसरे गायक की तारीफ़ करते थे, फिर अचानक यह कैसे हुआ कि तीन दिन में गाना भी लिख गया, रिर्हसल भी हो गई, रिकॉर्डिंग भी हो गई, किसीने पैसे भी लगा दिए, चैनल पर व्यवस्था भी हो गई !! और इसमें भला मुझसे छुपाने की क्या बात थी !?

घर में कीचड़ भरा हुआ था, सारा शरीर दर्द से दुख रहा था, पड़ोसी ने मिस्त्री बुलाकर ज़बरदस्ती नाजायज़ बालकनी बनाना शुरु कर दिया था। मेरे गायक दोस्त ने कहा कि ‘संजय भाई, इतना बड़ा मौक़ा मुझे फिर नहीं मिलेगा’। मैं आंदोलन टीवी पर देख रहा था और मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मैंने कहा बिलकुल जाना चाहिए। मैं बताना नहीं चाहता था पर पड़ोसी का ज़िक्र कर बैठा और साथ ही पहली बार किसी मित्र के सामने फूट-फूटकर रोने लगा। मेरा गायक मित्र पहले भी मुझे लेकर भावुक हो जाता था। उसने कहा कि मैं अभी ऊपर जाता हूं और बताता हूं। मैंने मना किया कि हमें कोई झगड़ा या मारपीट नहीं करनी है, क़ानूनन जो ज़रुरी है वो करेंगे। वे दोनों चैनल पर या आंदोलन में, जहां भी जाना था चले गए। शाम को आए तो बोले कि हमने आपके लिए एक चैनल से बात कर ली है।

(जारी)

16-01-2018


पता चला कि यह आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध और ईमानदारी के समर्थन में है। मैंने अपने गायक दोस्त से अपनी तरफ़ इशारा करते हुए कहा था कि ‘ईमानदारों की तो ऐसी हालत होती है....’ शाम को जब वो लौटा तो मैंने कहा कि मुझे चैनल की मदद नहीं चाहिए। मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस देश का मीडिया इतना ईमानदार है तो देश में इतना भ्रष्टाचार फैल कैसे गया ? रातोंरात एक आदमी, बहुत सारी टोपियां, दुष्यंत के तराने, ‘स्वतःस्फूर्त‘ आंदोलनकारी एक स्थानविशेष पर जमा हो गए और सारे न्यूज़चैनल भी सही वक़्त पर पहुंच गए। अपने साथ पड़ोसी की नाजायज़ कमरा ज़बरदस्ती बनाने की बातचीत का वीडियो मैंने बना लिया था। अपने अलग स्वभाव और भीड़ का अतार्किक साथ न देने की आदत की वजह से मुसीबत में तो मैं बचपन से ही फंसता आया था, आज फिर फंस गया था। सोच ही रहा था क्या करुं कि मन में आया अच्छा मौक़ा है यह देखने का कि मीडिया एक साधारण आदमी का कितना साथ देता है। मैंने वीडियो और स्टेटस फ़ेसबुक पर लगाने शुरु कर दिए। मेरी फ्रेंडलिस्ट में उस समय मीडिया से काफ़ी मित्र थे(अभी भी होंगे)। लेकिन न किसीका फ़ोन आया न कोई प्रतिक्रिया। हां, दूसरे मित्रों के फ़ोन भी आए और प्रतिक्रिया भी।

(जारी)

20-01-2018


-संजय ग्रोवर


Friday, 12 February 2016

नास्तिकता पर गोलमोल बातें


4.17 मिनट का यह वीडियो है। फ़ेसबुक पर कुछ लोगों ने इस सलाह के साथ लगाया कि इसे देखकर आपकी आंखें खुल जाएंगी। मैंने, देखा तो मुझे इसमें कोई ख़ास या नई बात नज़र नहीं आई। मैंने पूरा वीडियो ढूंढने की कोशिश की, क़रीब आधा घंटा लगाया, नहीं मिला। एक अन्य वीडियो मिला जो तकरीबन दस मिनट का था।
बहरहाल, कहीं पूरा वीडियो मिल गया और उसमें कुछ अलग निष्कर्ष निकलता दिखाई दिया तो हम दोबारा बात कर लेंगे। अभी इसीपर करते हैं।

यहां यह समझना मुश्क़िल है कि जावेद अख़्तर क्यों यह सफ़ाई दे रहे हैं कि ‘मैंने तो हमेशा कहा आयम एन अथीस्ट.....’, मगर यह स्पष्ट है कि बात पीके की चल रही है और फ़िल्म के निर्देशक राजू हिरानी भी वहीं कुर्सी डाले बैठे हैं। सोचने की बात है कि इससे पहले कब किसीको यह सफ़ाई देनी पड़ती थी कि वह नास्तिक है। यह माहौल नास्तिकता के खि़लाफ़ माना जाए कि उसके पक्ष में माना जाए !? यहां जावेद अख़्तर सहिष्णुता की बात करते हुए 1975 में बनी अपनी ‘शोले’ के उस दृश्य का हवाला दे रहे हैं कि किस तरह नायक एक मंदिर में भगवान की मूर्ति के पीछे छुपकर भगवान बनकर बोल रहा है। वे कहते हैं कि शायद आज मैं इस दृश्य को न लिखता। अब सोचने की बात यह है कि क्या ‘शोले’ अंधविश्वास के खि़लाफ़ और नास्तिकता के पक्ष में बनी कोई फ़िल्म थी !? क़तई नहीं। यह फ़िल्म बदले पर आधारित, नाटकीय दृश्यों से भरी एक साधारण फ़िल्म थी। इसे भी छोड़िए। क्या नायक इस दृश्य में अंधविश्वास हटाने की कोशिश कर रहा है ? क्या वह भगवान का न होना साबित कर रहा है ? बिलकुल भी नहीं। वह तो उसके होने के अंधविश्वास का लाभ उठा रहा है। यह लाभ उसे मिल रहा है यह इसीसे पता चलता है कि नायिका तुरंत इस पर विश्वास कर लेती है। यह दृश्य अंधविश्वास और भगवान के होने के पक्ष में है, उसके खि़लाफ़ नहीं।  इसपर कोई भक्त क्यों ऐतराज़ करेगा ? वीडियो के इस टुकड़े से तो यही समझ में आता है कि वे ग़लत उदाहरण दे रहे हैं। वे और भी फ़िल्मों का उदाहरण देते हैं जिनमें से किसीमें कोई पात्र भगवान की मूर्ति उठाकर फ़ेंक देता है। ऐसी तो बहुत फ़िल्में बनी हैं। अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘नास्तिक’, 1954 में बनी ‘नास्तिक’, सुनील दत्त अभिनीत ‘रेलवे प्लेटफॉर्म’ ऐसी ही, या ऐसे ही कुछ दृश्यों वाली फ़िल्में हैं। मुद्दे की असली बात यह है कि ऐसी किसी फ़िल्म में भगवान के अस्तित्व से इंकार नहीं किया गया। 


जावेद अख़्तर किस तरह के नास्तिक हैं यह तो वही बताएंगे, लेकिन इस तरह की जितनी फ़िल्में बनी हैं, वे भगवान के होने की पुष्टि करतीं हैं, वे किसीकी आंखें नहीं खोलती बल्कि जागते हुए लोगों को भी सुलाने की कोशिश करती लगतीं हैं। आंखें क्या वे तो खुले हुए दिमाग़ों को भी बंद कर देतीं हैं। जावेद यहां कह रहे हैं कि वे भगवान में विश्वास नहीं करते जबकि उन्हींके बराबर में बैठे राजू हिरानी कह रहे हैं कि फ़िल्म दो तरह के भगवानों के बारे में बताती है-एक, जिसे हमने बनाया है ; दूसरा, जिसने हमें बनाया है। और जैसाकि फ़िल्म में भी दिखाया गया है कि दूसरा वाला भगवान असली है। अब जावेद अख़्तर का इसपर क्या मानना है यह तो, अगर उन्होंने इसपर कुछ कहा है तो, बाक़ी वीडियो से ही पता लग सकता है। मेरी समझ में, जावेद अख़्तर की नास्तिकता(अगर वे नास्तिकता का मतलब भगवान के वजूद से इंकार करना मानते हैं) और राजू हिरानी के अंधविश्वास-विरोध का अंतर तो यहीं साफ़ हो जाता है। 


पहले तो इस देश के ज़िम्मेदार प्रगतिशीलों और अंधविश्वास-विरोधियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके नास्तिकता के अर्थ क्या हैं-भगवान को न मानना या मूर्ति और कर्मकांड को न मानना। अब जिन तालिबान की मूढ़ता का हवाला देकर जावेद प्रगतिशीलता का मतलब समझाने की कोशिश कर रहे हैं, मूर्तिपूजा तो वे भी नहीं करते। इससे उनको हासिल क्या हुआ ? असली समस्या सिर्फ़ मूर्तिपूजा नहीं है, असली समस्या 
है किसी निराकार, ग़ायब भगवान/ख़ुदा/शक्ति/गॉड के होने का समर्थन या फिर इसपर चुप्पी या गोलमोल बातें।

12-02-2016

असली समस्याएं हैं इस तरह की मान्यताएं कि कोई अदृश्य शक्ति या शक्तियां इस दुनिया को चलातीं हैं जो कि इंसान से कई गुना ज़्यादा ताक़तवर हैं, इंसान की उस/उनके सामने कोई औक़ात नहीं है, वह बेबस, मजबूर और कमज़ोर है, वह उनके हाथों की कठपुतली है, उसके बस का कुछ नहीं है जब तक कि वह उन तथाकथित शक्तिओं के आगे सिर न झुकाए, उनका अहसान न माने, उन अहसानों का बदला न चुकाए, उन तथाकथित शक्तिओं के होने को बेशर्त स्वीकार न कर ले। मूर्तियां, कर्मकांड, संस्कार, कलंडर, भजन, फ़िल्में, लेख आदि तो उन तथाकथित शक्तिओं के विज्ञापन या रीमाइंडर्स की तरह हैं। ‘भगवान सर्वशक्तिमान है’, ‘वह सर्वत्रविद्यमान है’, ‘उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती’, ‘उसके आगे किसीका बस नहीं चलता’, ‘उसकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं होता’, ‘उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता’, ‘जाको राखे साईयां’,.....जैसे प्रचलित और आम लोगों में स्वीकृत कहावतें और मुहावरे ही बताते हैं कि समस्या मूर्ति तक सीमित नहीं है। दूरदराज़ गांवों में ओझाओं द्वारा औरतों को उल्टा लटकाकर, आग में मिर्ची झोंककर उनका तथाकथित ‘भूत’ उतारना हो या ज्योतिषी द्वारा किसीका हाथ देखकर भविष्य बताते हुए पैसा झाड़ लेना हो, इन सबकी जड़ में मूर्ति नहीं बल्कि कुछ निराकार/ग़ायब/अदृश्य शक्तिओं पर आदमी का विश्वास है। उन तथाकथित निराकार शक्तियों पर स्पष्ट बातचीत के बिना हम काला जादू, मिडिलमैन और बाबावाद का कुछ कर पायेंगे, यह एक बचकाना ख़्याल ही लगता है। कट्टरपंथिओं को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप ऐसी या वैसी, कैसी शक्तियों को मानते हैं ; उनके लिए इतना काफ़ी है कि आप किसी अमानवीय यानि मानवता से इतर/ऊपर किसी रहस्यमय शक्ति में विश्वास करते हैं। तालिबान भी किसी मूर्ति की वजह से नहीं बल्कि किसी निराकार शक्ति में विश्वास की वजह से ही सब कुछ कर रहे हैं।

जावेद 1975 और आज के फ़र्क़ की बात कर रहे हैं। मेरे पास यह नापने का कोई तरीक़ा नहीं है कि आजकल असहिष्णुता की मात्रा क्या है। लेकिन मैं कह सकता हूं कि असहिष्णुता कि जड़ सिर्फ़ वहां नहीं है, जहां तयशुदा नतीजों के साथ ढूंढी जा रही है। कर्मकांडों और अंधविश्वासों के स्पष्ट विरोधी कहे जानेवाले कबीर की लाश में से फूल 1975 से पहले ही निकाले जा चुके थे। बिना शिक्षा दिए दक्षिणा में ‘शिष्य’ एकलव्य का अंगूठा काट लेनेवाले ‘गुरु’ द्रोणाचार्य के नाम पर पुरस्कार 1975 से पहले से चल रहे हैं। बाबरी मस्ज़िद कांड और दुग्धपान कांड के वक़्त सहिष्णुता थी या असहिष्णुता, कैसे पता लगाया जाए ? ‘जय संतोषी मां’ भी 1974-75 के आसपास ही सुपरहिट हो चुकी थी।

हालांकि उस वक़्त की स्टंट और कमर्शियल फ़िल्मों को हर समझदार दर्शक एक जैसी गंभीरता से लेता होगा, लगता तो नहीं है। फिर भी बात आई है तो ठीक से कर ही लेनी चाहिए कि मूर्ति के साथ भक्तों को इस तरह बातचीत करते शायद ही किसीने देखा होगा जैसा ‘शोले’ व अन्य फ़िल्मों में होता है। वे लोग भजन वग़ैरह गाते हैं, प्रसाद इत्यादि चढ़ाते हैं पर तेज़ आवाज़ में इस तरह बातचीत....! कुछ फ़िल्मों में तथाकथित नास्तिक नायक मंदिर में जाकर भगवान की मूर्ति से लड़ता है कि ‘मैं तुझे नहीं मानता, नहीं मानूंगा.....’ आदि-आदि। नास्तिकता का यह कांसेप्ट सिरे से ग़लत है। जो भगवान के अस्तित्व में ही विश्वास नहीं करता वह उससे लड़ने क्यों जाएगा !? यह तो फ़िल्मी नास्तिकता हुई। यहां यह ज़िक्र करना ज़रुरी है कि मैं 4-5 साल से यूट्यूब पर खोज रहा हूं, मुझे असली नास्तिकता पर आज तक न तो एक भी हिंदी गीत मिला है न एक भी हिंदी फ़िल्म। मेरी खोज में कमी हो सकती है पर यह अभी जारी है।  

यह अनुमान लगाना भी अजीब लगता है कि शोले का वह दृश्य आज स्वीकृत न हो पाता। ‘पीके’ 2015 की रिलीज़ है। 2012 में ‘ओह माय गॉड’ रिलीज़ हुई थी जिसमें नास्तिक शब्द का ख़ुला इस्तेमाल है और परेश रावल मूर्तियों और बाबाओं के साथ कई बार, कई तरह की छेड़खानियां करते हैं। ‘पीकू’ जैसी फ़िल्म भी आजकल में ही रिलीज़ हुई है जिसमें एक बाप अपनी बेटी के सामने उसके सैक्स-संबंधों की चर्चा करता है। ‘तेरे बिन लादेन’ नाम की फ़िल्म का अगला भाग तैयार है। जैसे बोल्ड विषयों पर और बोल्ड संवादों के साथ आजकल फ़िल्में बन रहीं हैं, 1975 में सोचना भी मुश्क़िल रहा होगा। और मैं यह क़तई नहीं कह रहा कि इसका श्रेय किसी सरकार या विचारधारा को जाता है। मेरी सीमित समझ के अनुसार इसका श्रेय टैक्नोलॉजी को जाता है जिसने इंटरनेट, वाई-फ़ाई, स्मार्टफ़ोन, लैपटॉप जैसे माध्यम और उपकरण देकर इंसान को इंसान के क़रीब आने, नये विचार बांटने और एक-दूसरे की संस्कृतियों को जानने में मदद की है, उसकी सोच-समझ के दायरे को बड़ा कर दिया है। 

जावेद यहां यह भी कह रहे हैं कि आपको तालिबान जैसा क्यों बनना चाहिए, क्यों नहीं आप उन्हें अपने जैसा बनाएं। लेकिन भारत की तथाकथित उदारवादी या प्रगतिशील विचारधाराओं से जुड़ी संस्थाएं/पार्टियां क्यों नहीं आर एस एस/मुस्लिम लीग को अपने जैसा बना पाईं ? क्या इसलिए कि उनमें बस उतना ही अंतर है जितना कि साकार और निराकार या ग़ायब और हाज़िर में होता है ?


यानि कि न के बराबर !  

17-02-2016

-संजय ग्रोवर

(इस संदर्भ में ये लेख भी प्रासंगिक हैं- पहलादूसरा)

(‘ओह माई गॉड’ की समीक्षा और नास्तिकता पर बनी कुछ अन्य हिंदी फ़िल्मों पर बात जल्दी ही)









Monday, 14 December 2015

भगवान के दूत

व्यंग्य

राजधानी का एक संपन्न इलाक़ा जहां कुछ ग़रीबों को भी ‘बिज़नेस’ करने की अनुमति है। बिज़नेस मायने ग़ुब्बारे बेचना, मिट्टी के सस्ते खि़लौने बेचना, भीख मांगना या कुछ ऐसे ही और छोटे-मोटे काम करना।

एक बड़ी और सुंदर गाड़ी। एक हृष्ट-पुष्ट लड़का उतरता है। उसके हाथ में 500-500 रु. के कुछ नोट हैं। उतरकर फ़ुटपाथ पर जाता है जहां एक फ़टेहाल पगली खड़ी आसमान से बातें कर रही है।
‘आप भगवान को मानतीं हैं?’ हृष्ट-पुष्ट लड़का पूछता है।
‘.............’
‘‘मुझे भगवान ने भेजा है, यह लो‘‘, वह 500रु. का एक नोट पगली के हाथ में थमा देता है।
पगली ख़ुशी से नाचने लगती है। उसके कपड़े फ़टे हैं, फ़ुटपाथ पर, और उससे पहले न जाने क्या-क्या सहती आई है मगर नाच रही है। पगली जो है।
हृष्ट-पुष्ट लड़का मन ही मन नाच रहा है। इसने पगली जैसा कुछ नहीं सहा, यूं भी अकसर नाचता ही रहता है। दोनों भगवान को मानते हैं।

यह लड़का एक ग़रीब ग़ुब्बारेवाले के पास पहुंचता है-
‘‘आप भगवान को मानते हैं?’’
‘‘हां, मानता हूं, बहुत मानता हूं।’’
‘‘यह लो 500रु., मुझे भगवान ने भेजा है।’’
ग़ुब्बारेवाला पल-भर सकुचाता है, फिर स्वीकृति के भाव से नोट ग्रहण करता है।

हृष्ट-पुष्ट लड़का इसी तरह कुछ और नोट भगवान को माननेवाले ग़रीबों को बांटता है।

एक फ़टेहाल लड़का अख़बार बेच रहा है।
हृष्ट-लड़का उसके भी पास पहुंच गया है-
‘‘आप भगवान को मानते हैं?’’
अख़बारवाला लड़का उसका मुंह देखने लगता है।
हृष्ट-पुष्ट थोड़ी अड़चन में है। पहली बार उसे अपना सवाल दोहराना पड़ रहा है।
‘‘आप भगवान को मानते हैं ?’’
‘‘.....मानता हूं...तो ?’’
‘‘यह लीजिए, मुझे भगवान ने भेजा है।’’
‘‘ओह! अच्छा! भगवान ने आपको क्यों भेजा!? वह ख़ुद क्यों नहीं आया ?’’
‘‘.............’’
‘‘मुझे भगवान से मिलना है...सुनिए...रुकिए तो सही...मुझे भगवान से मिलना है..’’
‘‘भगवान हर जगह ख़ुद नहीं जा सकते, उन्होंने तुम्हारे लिए मुझे भेजा है।’’
‘‘क्यों, तुम्हारे पास आ सकते हैं तो मेरे पास क्यों नहीं आ सकते?’’
‘‘देखिए आप यह हज़ार रुपए रखिए, मुझे औरों के पास भी जाना है, मैं चलता हूं...’’
‘‘नहीं...मैं आपको ऐसे नहीं जाने दूंगा....यहां राजधानी में ऐसे भी फ्रॉड बहुत होते हैं...आपको सबूत देना होगा कि आपको भगवान ने भेजा है...’’
‘‘..........मगर मैं ऐसा क्यों करुंगा...मैं कुछ दे ही रहा हूं, कुछ ले तो नहीं रहा?’’
‘‘क्या पता तुमने कहीं छुपा कैमरा लगा रखा हो ? बाद में इसे इधर-उधर अपलोड करके हीरो बनते फिरोगे। अपने-आपको श्रेष्ठ साबित करोगे। लड़कियों को इम्प्रैस करोगे। पांच-दस हज़ार रुपए ख़र्च करना तुम जैसों के लिए मामूली बात है......’’
‘‘......................’’
‘‘तुम तो एकदम चुप हो गए?’’
‘‘आप मेरा हाथ छोड़िए....देखिए हम सब एक ही भगवान के बनाए हुए हैं.....उन्होंने मुझे देने के लिए चुना है और तुम्हे लेने के लिए......’’
‘‘पर मुझे तो भगवान बताने आया नहीं कि उसने मुझे पैसे लेने के लिए चुना है !?’’
‘‘...........’’
‘‘तुम जवाब क्यों नहीं दे रहे? ठहरो! तुम्हारी शक़्ल तो उस आदमी से मिलती है जो टीवी पर कह रहा था कि कोई नेता अगर ग़रीब जनता से रुपए या दारु देकर वोट मांगे तो बिलकुल मत देना......कमाल है! अगर तुम वही हो तो ख़ुद कितना गिरा हुआ काम कर रहे हो!?’’
‘‘देखिए......’’
‘‘मुझे भगवान से पूछना है कि इन हज़ार रुपयों से मेरा क्या काम हो सकता है, बाक़ी सारी ज़िंदगी मैं क्या करुंगा? सुनो, तुमने कहा हम दोनों तो एक ही भगवान के बनाए हुए हैं। ऐसा करो, तुम अपना गाड़ी और घर मुझे दे दो, मैं वहां रहूंगा, तुम यहां अख़बार बेचो......’’
‘‘नहीं, मैं अख़बार नहीं बेच सकता, मुझे अपना काम पूरा करना है......’’
‘‘लेकिन मुझसे भगवान ने कहा है कि जो लड़का तुम्हे पांच सौ रुपए देने आएगा उसके गाड़ी और घर तुम ले लेना, और उसे यहां अख़बार बेचने को खड़ा कर देना......’’
‘‘..........’’
‘‘कमाल है! तुम कुछ बोल ही नहीं रहे....मैं तो तुम्हारे भगवान की इच्छा मान रहा हूं, तुम मेरे भगवान की इच्छा क्यों नहीं मान रहे......मैं पुलिस को बुलाऊं क्या?’’
‘‘................................’’

अख़बार वाले लड़के ने हृष्ट-पुष्ट लड़के का हाथ पकड़ा हुआ है और बात-चीत जारी है.......

(मजबूर लोगों में पैसे बांटकर भगवान को सिद्ध करने की चेष्टा करने का एक हास्यास्पद वीडियो देखने के बाद लिखा गया)

-संजय ग्रोवर
23-09-2014

('पागलख़ाना' से साभार)


Saturday, 11 July 2015

ग़ुम नास्तिक

व्यंग्य

समाज अकसर ग़ुम नास्तिकों को पसंद करता है।

किसी दुर्घटना के दौरान जब किसीको अंदरुनी चोट, जो कि बाहर से दिखाई नहीं देती, लग जाए तो कई लोग कहते हैं कि फ़लां व्यक्ति को गुम चोट पहुंची है। समानार्थी या निकटार्थी शब्दों में आप गुमसुम, लुल्ल, ग़ायब, ख़ामोश, अंतर्मुखी आदि शब्दों को शामिल कर सकते हैं।

गुम नास्तिक भी कुछ ऐसी ही चीज़ है। कई बार तो इसके अपने अलावा किसीको मालूम ही नहीं होता कि यह नास्तिक है।

पड़ोसी जागरन में बुलाए, यह बिलकुल दूसरों की तरह जाता है।

कोई दहेज़दार शादी में बुलाए, यह बिलकुल दूसरों की तरह मनोयोग के साथ लिफ़ाफ़ा तैयार करता है।

कोई इससे कहे कि धर्मस्थल में घुसने से पहले सर पर कपड़ा, रुमाल, तौलिया वगैरह डाल लो ; यह तत्परता से डाल लेता है।

कोई कुलबुलाहट, कोई ग़ुस्सा, कोई विरोध, कोई विद्रोह !? 

अजी, चेहरे पर एक चिन्ह तक दिखाई नहीं देता।

पूछो कि करवाचौथ की तैयारियां चल रहीं हैं, तुम कुछ बोलते क्यों नहीं !?

‘‘अरे, इतना तो चलता है,’’ यह कहता है।

कहो कि देखो उन्होंने कीर्तन के नाम पर रास्ता जाम कर दिया, हमें उन्हें समझाना चाहिए।

‘‘तो क्या सब तुम्हारी तरह जिएं ? ऐसे चलती है क्या ज़िंदग़ी ?’’ इसे ग़ुस्सा आने लगता है।

इससे कहो कि बच्चे की ख़ाल बहुत नाज़ुक है, उसे दर्द होगा, इन्फ़ेक्शन भी हो सकता है, मुंडन-वुंडन का लफ़ड़ा छोड़ क्यों नहीं देते ?

‘‘अरे बच्चे का मुंडन करा रहे हैं, तुम्हारा तो नहीं करा रहे, तुम्हारा क्यों ख़ून जल रहा है ?’’ इसके तर्क ‘प्रैक्टीकल’ होना शुरु हो जाते हैं। 

कहो कि आप श्राद्ध क्यों कर रहे हो, आप तो नास्तिक हो !?

‘‘ये प्रैक्टीकल लाइफ़ है। तुम्हे कुछ पता भी है!’’ यह डांटने पर उतर आता है। 

मगर जिन्हें डांटना चाहिए, उनके साथ खड़े होकर यह खी खी करेगा।

अब आप पूछेंगे कि यह नास्तिक किधर से है !?

मगर इनमें से कई होते हैं- किसी गोष्ठी में, किसी सेमिनार में, किसी मुशायरे में, किसी सम्मेलन में, दोस्तों के साथ किसी गपशप या बहस में, कभी-कभार होते हैं।

कभी-कभी किसी कविता में जिसमें ठीक-ठीक पता भी नहीं लगता कि यह कविता किसी ईश्वर के होने के संदर्भ में है या न होने के बारे में है, ये वहां नास्तिक होते हैं ; अगर आपको वह कविता ठीक से समझ में आ जाए। 

किसी मुशायरे में ग़ज़ल के पांचवे-छठे शेर में ये नास्तिक होते हैं जिसमें यह पता लगाना मुश्क़िल होता है कि ये ख़ुदा को डांट रहे हैं या उससे डांट खा रहे हैं। ये शेर* इस ‘कलात्मक’ ढंग से रचे गए होते हैं कि ख़ुदा के मानने वाले समझते हैं कि बंदा ख़ुदा की शान में क़सीदे पढ़ रहा है और न मानने वाले समझते हैं कि क्या हिम्मती आदमी है, सरे-आम ख़ुदा को नकार रहा है। 

जैसे कई लोग इंटरव्यू देते वक़्त पीछे दीवार पर भगतसिंह, विवेकानंद आदि का फ़ोटो टांग देते हैं। अच्छा है कि भगतसिंह ख़ुद मौजूद नहीं हैं वरना आप जानते ही हैं, टांगनेवाले कुछ भी टांग सकते हैं। भगतसिंह का फ़ोटो देखकर राष्ट्रवादी लोग समझते हैं कि इंटरव्यू देनेवाले सज्जन राष्ट्रवादी हैं और मानवतावादी नास्तिक समझते हैं कि बंदा नास्तिक है। अब भगतसिंह तो हैं नहीं जो आके बताएं कि वे क्या हैं और किस तरफ़ हैं। आकर करेंगे भी क्या ? आखि़र कितनी बार ख़ुदको टंगवाएंगे ? टांगनेवालों की तो टांगे भी नहीं थकती टांगते-टांगते!

तो ऐसा नास्तिक फिर भी न सिर्फ़ ख़ुदको नास्तिक मानता है बल्कि प्रगतिशील भी मानता है। और सिर्फ़ ख़ुद ही नहीं मानता, अगर मौक़ा और माहौल अनुकूल हों तो, दूसरों से भी मनवाता है।

कई ग़ुम नास्तिक नौकरी न लगने तक, कैरियर न बनने तक ग़ज़ब के बग़ावती, विद्रोही, रिबेल (तीनों का एक ही मतलब है) नास्तिक रहते हैं। नौकरी लगने या कैरियर बनने के बाद इनका पहला काम होता है 
नास्तिकता से पीछा छुड़ाना। उसके बाद इनमें से कई, ग़ुमों से भी ज़्यादा ग़ुम हो जाते हैं। 

पता ही नहीं लगता कि हैं या नहीं हैं।   

दुनियादार लोग ऐसे नास्तिकों को प्रेम से पास बिठाते हैं।


वे भी जानते हैं कि इनका होना न होना बराबर है।


-संजय ग्रोवर
11-07-2015


*ऐसे दो-चार शेर कभी इस ख़ाक़सार ने भी लिखे हैं।