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Thursday, 1 December 2022

‘होना’ और ‘दिखना’

लक्षणों को लेकर एक अजीब-सी घबराहट मैंने लोगों में देखी. एक मित्रनुमा महिला कई साल बाद फिर मिली. फ़ोन पर बात होने लगी. एक दिन पूछने लगीं कि कैसे रहते, क्या करते हो ? मैंने बताया कि अकेला रहता हूं, चाय-वाय बना लेता हूं, कभी-कभी कम्प्यूटर पर कुछ काम कर लेता हूं, फ़िल्म देख लेता हूं. पूछा कि कहीं आते-जाते नहीं हो ? मैंने कहा कि बहुत कम, जब बहुत ज़रुरी हो. बोलीं कि ये तो बिलकुल आतंकवादियों के लक्षण हैं. समझदार थीं और फ़िल्में भी बहुत देखतीं थीं. मैं थोड़ा हैरान हुआ, कहा कि जब मुझे पता है कि मैं क्या हूं तो लक्षणों के आधार पर ख़ुदको क्यों आंकता फिरुं ?

ऐसे ही कई लोगों को मैंने सांप्रदायिक न होने के लक्षण बताते भी देखा. कई लोग बताते रहते हैं कि हम त्यौहारों पर किस तरह हिंदु-मुस्लिमों आदि से मिलते हैं, फ़ोटो खिंचवाते हैं ! मुझे ये बातें बहुत अजीब लगतीं हैं. याद आता है कि जब हमारी कोई गर्ल-फ़्रेंड नहीं होती थी तो हम बहुत डरते थे कि कोई पूछ न ले कि कोई है या नहीं ? अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता, है तो भी दूसरे से क्या मतलब और नहीं है तो भी. समझ में नहीं आता कि लोग मूल भावना से ज़्यादा प्रदर्शन को ज़रुरी क्यों मानते हैं ? अगर हमारा कोई हिंदू या मुस्लिम मित्र नहीं भी है तो भी इसका मतलब यह कैसे हो गया कि हम उनके विरोधी हैं ? क्या हम एक-एक हिंदू, मुस्लिम, क्रिश्चियन, पारसी वगैरह को ढूंढ-ढूंढकर इसलिए दोस्त बनाते रहें कि कोई हमें उनका दुश्मन न बता दे ? क्या यह दोस्ती स्वाभाविक होगी ?

मैं तो इतनी कृत्रिम ज़िंदगी नहीं जी सकता. न जीता हूं.

-संजय ग्रोवर


Thursday, 18 April 2019

दुष्प्रचारवादियों को इतना ही बताना चाहता हूं

कई बार सोचता हूं कि अगर मैं भी कभी जातिवादी, संप्रदायवादी, अंथ-पंथवादी, अगड़मवादी, बगड़मवादी होना चाहूं तो मेरे पास भी कोई ‘ढंग की उपलब्धियां’ हैं क्या! दूर-दूर तक कुछ नज़र नहीं आता। न कभी किसीको इसलिए फ़्रेंड-रिक्वेस्ट भेजी कि वो ग्रोवर है, न बाक़ी ज़िंदग़ी में किसीसे इसलिए संबंध बनाए। संबंध क्या यह ख़्याल तक नहीं आया कि ऐसा भी सोचना चाहिए। इंटरनेट पर आए तो यह ज़रुर सोचा कि कुछ प्रगतिशील और नास्तिक मित्र ढूंढे जाएं, ग्रोवर का तो कहीं सपना तक नहीं आया। अब जो प्रगतिशील और नास्तिक दरअसल वेदवादी, क़ुरानवादी, गीतावादी ब्राहमणवादी, अगड़म-बगड़मवादी निकले तो यह उनकी समस्या है, इसके लिए मैं क्यों परेशान होता फिरुं !? अपने तो भेजे में कभी यह ख़्याल तक नहीं आया कि पता किया जाए कि ग्रोवर या पंजाबी होते कौन हैं। इस पहचान का तोहफ़ा भी जब दिया, दूसरों ने ही दिया। अपने लिए तो साफ़ है कि जिन शब्दों का मतलब अपने लिए औपचारिकता से ज़्यादा है ही नहीं, उसमें ढूंढने को बचता ही क्या है!? कोई ग्रुप बनाते समय भी यह ख़्याल फटका तक नहीं कि इनमें ढूंढ-ढूंढकर ग्रोवरों और पंजाबियों को शामिल किया जाए। न हीं कुछ लिखते या करते समय यह जताने का पवित्र विचार आया कि देखो, यह मैंने इसलिए अच्छा या बुरा किया, कर दिखाया कि मैं ग्रोवर या पंजाबी हूं।

इसके विपरीत दुष्प्रचारवादियों के मानसिक हालात उनके एक-एक क़रतब में दिखाई पड़ते हैं। उनकी मित्रता-सूचियां, उनके ग्रुप, उनको लाइक करनेवाले, त्यौहारों-रीति-रिवाजों-प्रतीकों, खिलाड़ियों-आयकनों-महापुरुषों-अभिनेताओं की सफ़लता(!) आदि-आदि के नाम पर अपनी पहचान और गर्व जताने की उनकी ललक.....सब कुछ इतना स्पष्ट होता है कि ज़्यादा बताने की ज़रुरत ही नहीं है। यहां तक कि वे दूसरे ग्रुपों में भी अपने गुट बनाकर अपनी मानसिकता बता देते हैं, छुपा नहीं पाते। भले वे ये सब परंपरा के नाम पर करें या प्रगतिशीलता के नाम पर, आजकल लोग तुरंत पहचान भी जाते हैं।

मैं तो दुष्प्रचारवादियों को इतना ही बताना चाहता हूं कि दुष्प्रचार वे चाहे जितना करें, यह उनका स्वभाव ही है, इसी हेतु उनका जन्म हुआ है मगर वे मुझे सचमुच ही अपने जैसा जातिवादी, संप्रदायवादी, वर्णवादी, अगड़म-बगड़मवादी कभी बना पाएंगे, यह ख़्याल दिमाग़ से निकाल कर फेंक दें।

मेरे लिए नास्तिकता का क्या मतलब है, मैं इसी तरह बताता रहूंगा।


-संजय ग्रोवर
(December10, 2014 on facebook)

Monday, 31 December 2018

बच्चे के पक्ष में नास्तिकता

नास्तिकता पर बात करते हुए हिंदू-मुस्लिम की बात क्यों आ जाती है? और यह एकतरफ़ा नहीं है, कथित मुस्लिम कट्टरता पर कोई कुछ कहे तो कुछ लोग संघी घोषित करने लगते हैं, कथित हिंदू रीति-रिवाजों पर कहे तो कुछ दूसरे आरोप और आक्षेप लगने लगते हैं। 

दूसरों के बारे में दूसरे बताएंगे, मैं तो अपने बारे में बता सकता हूं कि मेरी नास्तिकता किसी धर्म के भीतर से नहीं आई। ईश्वर मेरे लिए निहायत अजीब-सी चीज़ है, इसके होने का कोई भी मतलब मेरी समझ में नहीं आता। और मैं देखता हूं कि ईश्वर, धर्म और उससे जुड़ी अनेकानेक धारणाएं और मान्यताएं, कर्मकांड, रीति-रिवाज मेरे जैसे लोगों पर, किसी न किसी रुप में, जबरन थोपे जाते हैं या ऐसी कोशिश की जाती है। मुझे यह कष्टप्रद, अन्यायपूर्ण, अतार्किक और तानाशाहीपूर्ण लगता है। इसीलिए मैं कथित ईश्वर और कथित धर्म के इस रुप का विरोध करता हूं।

मेरे लिए यह अत्यंत आश्चर्य की बात है कि किस तरह एक मासूम बच्चे को दुनिया में ले आया जाता है, बिना उससे कुछ पूछे और बताए, और बाद में उसपर तरह-तरह की चीज़ें थोपने की कोशिश की जाती है, जैसे उसे पैदा करके उसपे अहसान किया गया हो। जबकि उसके पैदा होने में उसके सिवाय बाक़ी सभी संबद्ध लोगों की सहमति होती है, बस उसीकी नहीं होती। मेरी समझ में तो यह आपराधिक कृत्य है और इसके खि़लाफ़ क़ानून बनना चाहिए। 


मेरे लिए यह अत्यंत आश्चर्य की बात है कि किस तरह एक मासूम बच्चे को दुनिया में ले आया जाता है, बिना उससे कुछ पूछे और बताए, और बाद में उसपर तरह-तरह की चीज़ें थोपने की कोशिश की जाती है, जैसे उसे पैदा करके उसपे अहसान किया गया हो। जबकि उसके पैदा होने में उसके सिवाय बाक़ी सभी संबद्ध लोगों की सहमति होती है, बस उसीकी नहीं होती। मेरी समझ में तो यह आपराधिक कृत्य है और इसके खि़लाफ़ क़ानून बनना चाहिए। 

मेरे जैसे कुछ दूसरे लोग भी होंगे, वे भी मेरी तरह परेशान होते होंगे, होते ही हैं, यह बात भी मुझे नास्तिकता के पक्ष में लिखने को प्रेरित करती है। इससे भी आगे, मैं यह मानता हूं कि अगर आप दुनिया में अपनी तरह के बिलकुल अकेले भी हैं और आपको लगता है कि आप तार्किक हैं, सही हैं, तो आपको अपनी बात रखते रहना चाहिए, इसमें मुझे कुछ भी ग़लत नहीं लगता।

अब बताईए, इसमें हिंदू-मुसलमान की बात कहां से आती है!?

आप चाहें तो आप भी नास्तिकता के अपने कारणों के साथ अपनी बात यहां रख सकते हैं।

-संजय ग्रोवर

(फ़ेसबुक, नास्तिक द अथीस्ट)
29 June 2013


Monday, 11 April 2016

नास्तिकता सहज है

|| नास्ति दतम् नास्ति हूतम् नास्ति परलोकम् || 


यह पंक्ति मैं पहली बार पढ़ रहा हूं।

जब मैं नास्तिक हुआ तो मैंने चार्वाक या मार्क्स का नाम तक नहीं सुना था। ऐसी कोई भारतीय या अन्य परंपरा है, इसकी मुझे हवा तक नहीं थी। कोई वामपंथी पार्टी भी है, यह भी मुझे बहुत बाद में जाकर पता चला। हां, बाद में सरिता-मुक्ता फ़िर हंस जैसी कुछ पत्रिकाओं से इस विचार को बल ज़रुर मिला। मेरा मानना है कि नास्तिकता सहज स्वाभाविक है, प्राकृतिक है। हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है। धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के कुछ लोगों द्वारा। कल्पना कीजिए कि इस पृथ्वी पर कोई ऐसी जगह है जहां ईश्वर का नामो-निशान तक नहीं है। ईश्वर की कोई ख़बर तक उस देश में कहीं से नहीं आती। कोई मां-बाप, रिश्तेदार, पड़ोसी, समाज, बड़े होते बच्चों को ईश्वर की कैसी भी जानकारी देने में असमर्थ हैं, क्योंकि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता। क़िस्सों और क़िताबों में ईश्वर का कोई ज़िक्र तक नहीं है। तब भी क्या वहां ईश्वर के अस्तित्व या जन्म की कोई संभावना हो सकती है !?

दूसरे, क्या नास्तिकता को किसी परंपरा की ज़रुरत है ? मेरी समझ में जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां कभी न कभी नास्तिकता आ ही जाएगी। चाहे ऐसी कोई परंपरा हो न हो। नास्तिकता तो ख़ुद ही परंपरा के खि़लाफ़ एक विचार है। यह तो प्रगतिशीलता, तर्कशीलता वैज्ञानिेकता और मानवता का मिश्रण है। परंपरा के नष्ट होने से नास्तिकता नष्ट हो जाएगी, ऐसा मुझे नहीं लगता। हो सकता है कि परंपरा के रहते नास्तिकों की संख्या कुछ ज़्यादा होती। पर ऐसे नास्तिक परंपरा से आए आस्तिकों की तरह ही रुढ़ और हठधर्मी होते। जिस तरह हम देखते हैं कि कई बार राजनीतिक पार्टियों के संपर्क में आने से नास्तिक हो गए लोग घटना-विशेष की प्रतिक्रिया में ठीक कट्टरपंथिओं जैसा ही आचरण करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि चूंकि हम यह आचरण घोषित कट्टरपंथियों के विरोध में कर रहे हैं इसलिए यह कट्टरपंथ नहीं, हमारी ‘वैचारिक प्रतिबद्धता’ है।

दोस्त लोग मानते हैं कि नास्तिकता किसी तरह घिसट-घिसट कर जीवित है। ऐसा शायद वे संख्या और सांसरिक/भौतिक सफ़लताओं के आधार पर तय कर लेते है। यही लोग ख़ुदको अघ्यात्मवादी भी मानते हैं। संख्या बल और भौतिक सफलता को मानक बनाएं तो इंसानियत भी एक अप्रासंगिक शय हो चुकी है और इसे भी दफ़ना देना चाहिए। और अगर आप सफ़लताओं की वजह से आस्तिकता के साथ हैं तो इसका एक मतलब यह भी है कि आप उस विचार और सही-ग़लत की वजह से कम और अपने फ़ायदे की वजह से उसके साथ ज़्यादा हैं। कलको आपको नास्तिकता में सांसरिक फ़ायदे दिखेंगे तो आप उसके गले में हाथ डाल देंगे। अगर नास्तिकता घिसटकर चल रही है और इस वजह से अप्रासंगिक है तो भैया सारी क्रांतियां और स्वतंत्रता आंदोलन भी कभी न कभी घिसटते ही हैं। घिसटने से इतना डरना या उसे हेय दृष्टि से क्यों देखना !? दलितों, अश्वेतों और महिलाओं के आंदोलन भी तो सैकड़ों सालों से घिसट ही रहे थे। आज किसी अंजाम पर पहुंचते भी तो दिख रहे हैं।

--संजय ग्रोवर
11-04-2016

24-04-2010 को ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर प्रकाशित
09-07-2010 को ‘संवादघर’ पर प्रकाशित
10-02-2014 को अंग्रेजी अनुवाद  '(W)hues Me ?'  पर प्रकाशित

Sunday, 15 November 2015

सांप्रदायिकता आखि़र है क्या ?

आपको अपने उस धर्म पर गर्व है जिसे चुनने में आपका कोई हाथ नहीं।

आप अपने उस इतिहास पर इतराते फिरते हैं जिसे बनाने में आपका कोई हाथ नहीं। बनाना तो छोड़िए, उसमें कितना सही है कितना ग़लत है, यह भी आप ठीक से पता नहीं लगा सकते।

आपको अपने पुरख़ों पर गर्व है जिन्हें भी आपने नहीं बनाया। न सिर्फ़ गर्व है, बल्कि बिना किसी डी एन ए टैस्ट के गर्व है।

आपको अपने माता-पिता पर गर्व है क्योंकि वे आपके माता-पिता हैं, भले आप यह पता नही लगा सकते कि उनके आपके माता-पिता होने में आपका भी कोई हाथ है या नहीं। 

आपको अपने देश/प्रांत/शहर पर अभिमान है जिनमें आप जब पैदा हुए तो आपको अपनी चड्ढी संभालना भी नहीं आता था, यानि यह सवाल ही नहीं पैदा होता था कि आप अपनी मर्ज़ी से उन्हें चुन सकें। 

यानि कि आपको उन सब चीज़ों/परंपराओं/रिश्तों/मूल्यों पर गर्व है जिन्हें बनाने में आपका रत्ती-भर भी हाथ नहीं है, जिनकी प्रामाणिकता का भी ठीक-ठाक पता नहीं है।

तो फिर आपको उन चीज़ों/मूल्यों/रिश्तों पर तो भयानक गर्व होगा जिन्हें बनाने या चुनने में आपका भी थोड़ा-सा या ज़्यादा-सा हाथ होगा! मसलन आपका स्कूल, आपका कॉलेज, आपका प्रेमी, आपकी प्रेमिका, आपका पति, आपकी पत्नी, आपके बच्चे, आपकी नौकरी, आपका मकान, आपकी दुकान, आपके.......

अभी थोड़ी ही देर बाद आपको उदारता, सहिष्णुता, ख़ुलेपन...आदि-आदि पर भाषण देने जाना है।

पर उस भाषण में आप किसे संबोधित करेंगे !? जितने भी लोग वहां बैठे हैं सबके मां-बाप महान हैं, सबके बच्चे महान हैं, सबके धर्म महान हैं, सबके इतिहास गौरवशाली हैं, सब दुनिया के बैस्ट स्कूल में पढ़े हैं, दुनिया के सबसे अच्छे दोस्त सबको मिले हैं.... और ठीक यही स्थिति आपकी भी है।

अगर सबका सब कुछ महान है तो फिर ख़राब कौन है ? बुरा कौन है ? दुष्ट कौन है ? आप लेक्चर किसको देने जा रहे हैं !? वे सब तो ऑलरेडी महान हैं! और आपका तो कहना ही क्या ?

क्या आपको यह बात कभी भी अजीब नहीं लगी कि दुनिया का हर आदमी, अंधों की तरह, बिना किसी तर्क और प्रमाण के, ख़ुदको और ख़ुदसे जुड़ी हर चीज़ को महान और श्रेष्ठ बताएगा और फिर भी वह दूसरों को नीची नज़र से नहीं देखेगा ?

आप हर किसी पर महानता और पवित्रता की झूठी चाशनी चढ़ाने से भी बाज़ नहीं आएंगे और दुनिया में असमानता, भेदभाव और ऊंच-नीच पर भाषण भी करेंगे !?

छोड़ क्यों नहीं देते इस पोपली पवित्रता और मज़ाक़िया महानता का ढोल पीटना !?

कब तक पैदा करते रहेंगे सीज़ोफ्रीनिक/विभाजित व्यक्तित्वों की पीढ़ियां दर पीढ़ियां !?

सही बात तो यह है कि अपने धर्म, अपने वर्ण, अपनी जाति, अपने इतिहास, अपने पुरख़ों, अपने वंश, अपने स्कूल, कॉलेज, शहर, यूनिवर्सिटी, प्रांत, देश, राष्ट्र, वाद, दल.....आदि-आदि पर अंधों की तरह, बिना किसी वजह, तर्क और प्रमाण के गर्व करनेवाला एक-एक आदमी सांप्रदायिक है। 

फ़र्क़ इतना ही है कि किसकी सांप्रदायिकता किस रुप में प्रकट होती/फूटती है? कौन सामने आकर हिंसा करता है और कौन छुपकर ? कौन अपने नाम से काम करता है और कौन दूसरों के कंधों पर रखकर बंदूक चलाता है ?

कम से कम मैं तो ऐसे लोगों में शामिल नहीं हो सकता।

मेरा न कोई इतिहास है, न वंश-परंपरा है, न ख़ानदान-पानदान है, न कोई जाति है, न धर्म है।

न मुझे किसीपर कोई गर्व है, न इनके न होने की कोई शर्म है।

-संजय ग्रोवर
15-11-2015

Sunday, 12 July 2015

नास्तिकता क्या है

अगर मैं कहीं रास्ते से निकल रहा होऊं और वहां कहीं कीर्तन-जागरन होता दिख जाए और मैं पता लगाना शुरु कर दूं कि यह व्यक्ति किस राजनीतिक दल से जुड़ा है ; अगर यह किसी वामपंथ से जुड़ा है तो यह प्रगतिशील जागरन है, अगर कांग्रेसी है तो यह मॉडरेट कट्टरपंथी है, अगर यह संघी वगैरह है तो यह पूरी तरह रुढ़िवादी जागरन-कीर्तन है।

क्या यही नास्तिकता है ?

मेरे लिए तो बिलकुल भी नहीं। अगर जागरन कराना मेरी नज़र में फ़ालतू के कर्मकांडों को ढोना है तो मुझे उसके लिए यह पता लगाने की बिलकुल भी ज़रुरत नहीं है कि करानेवाला किस दल, किस गुट, किस बिरादरी, किस जाति से जुड़ा है। जो बात साफ़ समझ में आ रही हो उसके लिए ख़ामख़्वाह दीवारों से टकराने की क्या ज़रुरत है भला !?

जहां हर किसीके अपने बाबा हों, अपने भगवान हों, अपने कर्मकांड हों.....वहां किसी एक को निशाना बनाकर ख़ुदको नास्तिक और प्रगतिशील साबित करने की कोशिश मेरी समझ में  अजीबो-ग़रीब तो है ही, शायद कभी-कभार (या अकसर) एक सुविधा की स्थिति भी है। नास्तिकता को सिर्फ़ एक-दो समूहों या लोगों के विरोध तक संकुचित/रिड्यूस कर देने से नास्तिकता और इंसानियत का क्या भला हो सकता है ? यह तो जाने-अनजाने आप उन्हीं लोगों का काम कर रहे हैं जो नहीं चाहते कि लोग नास्तिकता को समझें। यह कुछ ऐसे ही हुआ कि बेईमानी के विरोध के नाम पर आप सिर्फ़ किसी तथाकथित ‘बेईमान दल’ को ग़ालियां देते रहें और समाज में चारों तरफ़ जो बेईमानियां चल रहीं है उनसे एडजस्ट किए चले जाएं! इस शौक़िया प्रगतिशीलता से कब तक काम चलेगा !?

मेरे लिए नास्तिकता सिर्फ़ भगवान और धर्म से जुड़ी चीज़ों को ही खोलना-परखना नहीं है। भगवान भी आखि़र एक मान्यता, विज्ञापन और धारणा से ज़्यादा क्या है ? भगवान और धर्म से जोड़कर या उन्हींकी तरह दुनिया-भर में कई उल्टी-सीधी कारग़ुज़ारियां चलती आ रही हैं जो कि इंसानियत के लिए कम नुकसानदेय नहीं हैं। इनमें सफ़लता है, पुरस्कार है, ट्रॉफ़ी है, प्रतिष्ठा है, रैंक है, नाम है, मशहूरी है.......। आदमी कुछ भी कहे मगर इन सबके पीछे दूसरों से ऊंचा होने का, दूसरों को डराने का, अपने काम प्रॉपर चैनल से करने में शरमाते हुए पिछली खिड़की से करवाकर गर्व करने का, विपरीत सैक्स के लोगों में लोकप्रियता हासिल कर उसका फ़ायदा उठाने का भाव या नीयत कहीं न कहीं रहते ही हैं। भगवान के पास भी आखि़र लोग और किन कारणों से जाते हैं !? अगर मैं किसी आदमी से इसलिए प्रभावित नहीं होता कि वह कुछ मूर्त्तियां सजाए बैठा है तो मैं किसी ऐसे आदमी से भी क्यों प्रभावित होऊं जो अपने ड्रॉइंगरुम में दस-बीस ट्रॉफ़ियां सजाए है ? मूर्त्ति सजानेवाला आदमी अगर बिना सोचे-समझे किसी व्यवस्था का हिस्सा बन गया है तो ट्रॉफ़ी सजानेवाले ने कब इस परंपरा को लेकर बहुत चिंतन-मनन किया है ? किन्हीं दस-बीस लोगों का पैनल किसीको महान और श्रेष्ठ बताता है और बाद में कुछ अख़बार और टीवी चैनल उसकी महिमा गाते हैं तो गाएं !! मेरी क्या मजबूरी है कि मैं यह मानूं कि यही देश और दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली लोग हैं!? ख़ासकर तब,जब मैंने होश संभालते से जोड़-जुगाड़-तिकड़म-मक्ख़नबाज़ी से मलाई खाते लोगों के झुंड के झुंड देखे हों !? मैं कैसे मान लूं कि इनकी नीयत और तौर-तरीक़े भगवान के विज्ञापनकर्त्ताओं और लाभार्थियों से अलग हैं ? आप मेरी कमी या ग़लती बताएं, मैं बहस के लिए तैयार हूं।

कोई भी चीज़ हम सिर्फ़ इसलिए करते चले जाएं कि वह होती चली आ रही है !? इसके अलावा हमें उसे करने का दूसरा कोई भी ढंग का कारण मालूम न हो, फिर भी हम ख़ुद तो करें ही करें, दूसरों को भी करने पर मजबूर करें! कितनी अजीब बात है!! वे सारे कर्मकांड जिनसे सिर्फ़ वक़्त की बर्बादी के अलावा जो भी होता हो वो सिर्फ़ हमारी ख़ामख़्याली और फ़ैंटसी के अलावा कुछ न हो, को सिरे से नकार देने में मैं तो कोई दिक़्क़त नहीं मानता।

मेरे लिए नास्तिकता का मतलब हैं हम एक-एक बात का कारण जानने की कोशिश करें, जिसे समाज ने ‘कुछ होना’ कहा है, उसके बारे में हम ख़ुद पता लगाएं कि इसमें वाक़ई होने जैसा क्या है ; हमें उसमें कुछ होने जैसा लगे तभी उसमें शामिल हों। मसलन जैसे किसीको पुरस्कार मिलता है तो लोग मानते हैं कि कुछ हुआ। जिसे पुरस्कार मिला उसके लिए ज़रुर कुछ हुआ होगा, थोड़ी व्यक्तिगत उपलब्धि, संतुष्टि उसे लगी होगी लेकिन समाज का इसमें क्या फ़ायदा है ? मुझे तो लगता है कि अगर उस व्यक्ति ने पुरस्कार के लिए कुछ जोड़-तोड़, मक्खनबाज़ी, जातिबाज़ी की तो उसने समाज को नुकसान पहुंचाया। उसने समाज में पहले से व्याप्त इस धारणा को बल दिया कि बेटा, बिना जान-पहचान के कुछ नहीं होता, कहीं न कहीं एडजस्ट तो करना ही पड़ता है। तिसपर यह तो और भी शर्मनाक़ है कि ऐसे चार लोग बैठकर परस्पर ईमानदारी पर बहस करें और टीवी दर्शक उनसे ‘ईमानदारी’ और ‘त्याग’ वगैरह की ‘प्रेरणा’ लें।

नास्तिकता का मतलब है हम सारी मान्यताओं, धारणाओं, परंपराओं, इतिहास, मशहूरी, प्रतिष्ठा, नाम, सफ़लता.....एक-एक चीज़ के महत्व, प्रासंगिकता और नुकसान को अपनी आंख से देखें। जहां तक मेरी बात है, अपनी नास्तिकता के हवाले से मैं इस बात पर शक़ कर सकता हूं कि भगतसिंह के द्वारा दो छोटे-छोटे, सिर्फ़ धुंआ छोड़नेवाले बम फेंक देने से उस अंग्रेजी साम्राज्य की चूलें हिल सकतीं हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने सारी दुनिया पर राज किया! मैं पूछ सकता हूं वे किस तरह के धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील लोग थे जिन्होंने हमारी पाठ्य-पुस्तकों में स्पष्ट अंधविश्वासविरोधी कबीर की लाश में से फूल निकाल दिए !? मैं अपने इस आश्चर्य और संदेह को प्रकट करने में कोई बुराई नहीं मानता कि भगवान को नकारने के लिए अरबों-ख़रबों रुपए लगा कर किए गए प्रयोग का नाम ‘गॉड पार्टीकिल’ रखना क्यों ज़रुरी समझा गया ? अहिंसा के पुजारी कहे जानेवाले महात्मा गांधी की प्रिय पुस्तक वह कैसे हो सकती थी जिसमें हिंसा और मारकाट के अलावा और कुछ है ही नहीं !? छुआछूत जैसी व्यवस्था बनानेवालों को सिर्फ़ इसलिए ‘अहिंसक’ कैसे कहा जा सकता है कि वे अपने हाथों से किसीको नहीं पीटते !? दरअसल तो उन्होंने लोगों की पीढ़ियों की पीढ़ियों को जीतेजी मार डाला है। मैं आराम से कह सकता हूं कि हर बच्चा जन्म से नास्तिक ही होता है।

मेरे लिए यही नास्तिकता है।

इस लेख में कई बार ‘मैं’ या ‘मेरे’ शब्द आए हैं जिनके लिए, अगर वे आपको बुरे लगे तो, मैं माफ़ी चाहूंगा, मगर चूंकि मैं नास्तिकता पर ‘अपने’ विचार रख रहा हूं तो इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था।

-संजय ग्रोवर
12/13-07-2015