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Monday, 31 August 2015

भगवान है तो उसके पास जाते क्यों नहीं !?

व्यंग्य

मेरे लिए यह मानना मुश्क़िल है कि लोग भगवान और स्वर्ग इत्यादि में विश्वास करते हैं। 

लगभग हर तथाकथित धार्मिक आदमी कहता है कि आखि़रकार तो हमें भगवान के पास जाना है। हर कोई बताता है कि स्वर्ग में बढ़िया शराब है, जिसे सुंदर महिलाएं सर्व करतीं हैं। वहां कोई जादुई पेड़ है जो इच्छाएं पूरी करता है। वहां रहने का कोई किराया नहीं लगता, मकान या प्लॉट नहीं ख़रीदना पड़ता, वहां जाने तक के सफ़र में भी कोई पैसे नहीं लगते। इसके अलावा मैं देखता हूं, आप भी देखते होंगे कि तथाकथित धार्मिक आदमी जो भी करता है, स्वर्ग और भगवान को ध्यान में रखकर करता है।

लेकिन मुझे एक बात क़तई समझ में नहीं आती, जो आपकी निगाह में दुनिया की सबसे सुंदर जगह है, जहां जाने के लिए ही आप सब कुछ कर रहे हैं, वहां जाने की जल्दी किसीको भी नहीं है!? क्यों !? इतनी अच्छी जगह को छोड़कर आप इस सड़ी-गली-पापी दुनिया में क्यों रह रहे हैं !? क्या मजबूरी है !? भगवान के पास जाना तो बहुत ही आसान है। कोई किराया भी नहीं लगता। थोड़ी-सी नींद की गोलियां, एक रस्सी का फंदा, एक माचिस की तीली, एक ऊंची छत......ऐसा कोई एक विकल्प चाहिए बस। और तो कुछ करना नहीं है।

स्वर्ग से अच्छी कॉलोनी कहां मिलेगी ?भगवान जैसा सर्वगुणसंपन्न, सर्वशक्तिमान पड़ोसी भी कहां मिलेगा ? मगर किसीको जल्दी नहीं है !? आदमी को जनता फ्लैट छोड़कर एल आई जी लेने का मन आ जाए, तब तो वह उधार ले-लेकर भी वहां पहुंच जाता है। मगर जो फ़ाइनल डेस्टीनेशन है, वहां पहुंचने की कोई जल्दी नहीं !? अस्सी-अस्सी साल तक यहीं पड़े हैं !! दवाईयां खा-खाके खाट से चिपटे हैं !! टट्टी-पेशाब भी बिस्तर में ही किए जा रहे हैं। दूसरे साफ़ कर रहे हैं। इंजेक्शन और ड्रिप घुसा-घुसाके किसी तरह ज़िंदा हैं। मगर दुनिया छोड़ने को राजी नहीं है !! अरे भई, जाओ अपनी पसंदीदा जगह, जल्दी से जल्दी जाओ। कौन रोक रहा है ? कोई रोके तो शिकायत करो। तमाम एन जी ओ हैं, समाजसेवी संस्थाएं हैं, दानी सज्जन हैं.....सब आपकी मदद करेंगे। वे भी तो वहीं जाना चाहते हैं। सब पीछे-पीछे आएंगे। आप शुरुआत तो करो अच्छे काम की।

क्यों दोस्तों की, परिचितों की, रिश्तेदारों की चिंता करते हो ? एक बार ख़ुद पहुंच जाओ, फिर उन्हें भी बुला लेना। इतनी अच्छी जगह हर किसीको जाना चाहिए, जल्दी से जल्दी जाना चाहिए। 

मगर ये तथाकथित धार्मिक लोग ख़ुद तो जाते नहीं, दूसरों को भेजना चाहते हैं। वो भी उनको जो भगवान-स्वर्ग-नरक को मानते ही नहीं। अरे भाई अगर तुम्हे वाक़ई भगवान और स्वर्ग में विश्वास है तो पहले ख़ुद जाना चाहिए। तभी तो लोगों को विश्वास आएगा। तब वे ख़ुद ही पीछे-पीछे आएंगे।

जिस दिन मैं तथाकथित धार्मिक लोगों को किरोसिन तेल, नींद की गोलियों, रस्सी के फंदे, चाकू या ब्लेड वगैरह के साथ एडवांस में डैथ सर्टीफिकेट के लिए एप्लाई करते देखूंगा, मुझे भी थोड़ा-थोड़ा विश्वास आएगा कि वाक़ई तथाकथित धार्मिक लोग स्वर्ग और भगवान इत्यादि में विश्वास करते हैं।

-संजय ग्रोवर
01-09-2015


Thursday, 20 August 2015

मां-बाप और पूजा

कभी कहीं कह दो कि पूजा ख़तरनाक़ है चाहे पत्थर की हो, चाहे गुरु की हो, चाहे मां-बाप की हो तो ज़ाहिर है कि कई तरह के लोगों को, कई तरह के आदियों-वादियों को बुरा लगता होगा। लेकिन यह भी तो समझना चाहिए कि पूजा आखि़र है क्या ? पूजा किसीको ख़ुश करने का सबसे आसान तरीक़ा है। पूजा एकतरफ़ा बातचीत है। मज़े की बात तो यह है कि जिसकी पूजा की जाती है उसकी तो स्वीकृति/अस्वीकृति भी नहीं पूछी जाती। पूजा एकतरफ़ा बातचीत है। जिसका आदर करने का दावा किया जा रहा है उसकी पसंद/नापसंद की भी चिंता नहीं की जाती। पूजा एक असमानता का संबंध है। कुछ कर्मकांड हैं जिन्हें करने में किसी तरह का कोई सामाजिक ख़तरा नहीं है। बल्कि मु्फ्त की तारीफ़ ज़रुर मिलती है।

और पूजा से मां-बाप की ज़रुरतें पूरी हो जाएंगी क्या !? करके देखना चाहिए। सुबह चार बजे उठकर मां-बाप की आरती वगैरह उतारें और दिन-भर उन्हें पूछें नहीं, न खाने को दें न पीने को, न बात करें, न पास बैठें। यही तो पूजा है। इससे मां-बाप का काम चल जाएगा क्या ?

आप पूरे देश में पूछते घूमिए, दस-पचास लोग भी मिल जाएं जो कहते हों कि मां-बाप की बात नहीं माननी चाहिए, मां-बाप महान नहीं होते, मां-बाप को घर से निकाल देना चाहिए........ऐसा कहता है क्या कोई ? उसके बाद सुबह-शाम आप ज़रा पार्कों में चले जाईए, वृद्धाश्रमों में चले जाईए-वहां बूढ़े-बूढ़ियां बैठे अपने बहू-बेटों को रो रहे होते हैं। ये कौन लोग हैं ? ये क्या स्विटज़रलैंड से आए हैं !? या फ्रांस ने हमारी संस्कृति को बदनाम करने को भेज दिए हैं !? भारत में तो कोई मां-बाप का अनादर करता नहीं। फिर ये बूढ़े-बूढ़ियां कहां से टपकते चले जाते हैं ? सही बात यह है कि हम लोग झूठा सम्मान करने में अति-ऐक्सपर्ट लोग हैं।

एक बात और समझ से बाहर है। एकाएक, बैठे-बिठाए किसी दिन आप मां-बाप बनते हैं और महान हो जाते हैं!! कैसे!? दुनिया-भर में गुंडे हैं, बदमाश हैं, स्मगलर हैं, दंगाई हैं, बलात्कारी हैं, आतंकवादी हैं और पता नहीं क्या-क्या हैं.........उनमें से भी ज़्यादातर लोग किसी न किसीके मां-बाप हैं। वे क्यों महान नहीं हैं ? अगर महानता की यही कसौटी है तो उनका भी आदर कीजिए। उन्हें तो आप ग़ालियां भी दे देते हैं!! वे तथाकथित ऊंची जातियां जिन्होंने किन्ही तथाकथित नीची जातियों को ग़ुलाम बनाया, वे भी तो किसीके मां-बाप हैं। वे महान क्यों नहीं हैं ? ये क्या कसौटी हुई कि सिर्फ़ आपके ही मां-बाप महान हैं !? समझ में नहीं आता कि आदमी में ऐसी कौन-सी प्रोग्रामिंग हो रखी है कि इधर उसका बच्चा पैदा होना शुरु होगा और उधर मम्मी-पापा महान होना शुरु हो जाएंगे !?

और हैरानी होती है कि ऐसी अतार्किक बातें वे लोग भी करते हैं जो अपना या अपने समाज का जीवन बदलने के लिए कुछ भी बदलने को तैयार हैं मगर मां-बाप की बात आते ही फिर परंपरा को पकड़कर लटक जाते हैं ? अगर तुम्हे परंपरा में इतनी दिलचस्पी है तो परंपरानुसार ग़ुलामों की तरह रहो फिर। यहां तो सब परंपराएं ग़ुलामी की ही परंपराएं हैं।

तो मैं यह कह रहा था कि पूजा में विचार का, बुद्धि का, सवाल उठाने का कोई स्थान नहीं है। पूजा न करने का यह मतलब नहीं है कि मां-बाप से बदतमीज़ी करें, उन्हें परेशान करें, उनका तिरस्कार करें, उन्हें खाने-पीने को न दें। वैसे यह सब तो पूजा के साथ-साथ भी किया जा सकता है। होता भी होगा। पूजा न करने का मतलब है बराबरी के स्तर पर बातचीत। न कोई छोटा है न बड़ा। न कोई ऊंचा है न नीचा। ऐसे संबंध में बात का और तर्क का महत्व है, व्यक्ति की हैसियत या उम्र का नहीं। जिसकी भी बात जायज़ है, मान ली जाएगी।

वरना तो पूजा करने वाले यही करेंगे कि बाप कहेगा कि जाओ बेटा मां का सर काट लाओ, और ये चल पड़ेंगे सर काटने। लो श्रद्धेय पिताजी, श्रद्धेय माताजी का सर हाज़िर है।

और बाद में सर काटने वालों की भी पूजा होगी।


-संजय ग्रोवर
20-08-2015



Tuesday, 21 July 2015

वफ़ा और ग़ुलामी

नास्तिकों और प्रगतिशीलों ने ‘आस्था’ और ‘श्रद्धा’ की अच्छी-ख़ासी आलोचना की है। ऐसा ही एक और शब्द है-‪वफ़ादारी‬। ‪आस्था‬ और ‪श्रद्धा‬ शब्द किसी तथाकथित ऊपरी शक्ति से संबंध के संदर्भ में इस्तेमाल होते हैं तो ’वफ़ादारी’ पशु और इंसान या इंसान और इंसान के संबंधों के संदर्भ में। वफ़ादारी को क़िताबों और फ़िल्मों तक में बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है। पर मुझे लगता है कि एक हद के बाद वफ़ादारी भी (ख़ासकर इंसानी संबंधों में) आस्था और श्रद्धा की तरह मूढ़तापूर्ण हो जाती है और ‪‎ग़ुलामी‬ में बदल जाती है। एक मजबूर आदमी जिसने कई हफ्तों से कुछ नहीं खाया, आप उसे एक थाली भोजन भी दे देंगे तो वह ख़ुदको आपका अहसानमंद महसूस करेगा। एक आदमी जिसे समाज चारों चरफ़ से सता रहा है, आप उसके पास जाकर दो घड़ी बैठ भी जाएंगे तो वह कृतज्ञ महसूस करेगा। अब यह मदद करनेवाले के ऊपर है कि वह कब तक इस अहसान का बदला लेता रहगा!

कई बार तो लोग मदद भी बिना कहे या ज़बरदस्ती करते हैं। फिर भी बदला चाहते हैं! फ़िल्मों में तो ख़ूब दिखाया गया है कि मुसीबत का मारा आदमी किसी छोटी-सी मदद के एवज में अपनी पूरी ज़िंदगी गिरवी रख देता है। मैं इसे बिलकुल भी मानवीय नहीं मानता। यह तो एक तरह की ‪‎बंधुआ‬ मज़दूरी या दासत्व है। ख़ुदको चिंतक या बौद्धिक माननेवाले लोगों को तो इस तरह की कोशिशें बिलकुल शोभा नहीं देतीं कि किसीको अपनी वैचारिक बंधुआगिरी पर मजबूर करें।

पशुओं के बारे में तो जानना मुश्क़िल है कि वे वफ़ादारी पर क्या सोचते हैं मगर इंसानी संबंधों को हद से ज़्यादा वफ़ादारी, शायद दोनों ही पक्षों को, पशुता के ही स्तर पर ले जाती है। किसी संगठन के प्रति वफ़ादारी का तो सीधा मतलब ही यह है कि या तो आप सच बोल लें या वफ़ादारी निभा लें। वहां सच और झूठ का कोई महत्व नहीं होता, संगठन का पक्ष ही आपका पक्ष होता है। आपको सच के पक्ष में नहीं, संगठन के विचार/धारा/रुख़ के पक्ष में तर्क जुटाने होते हैं। यहां थोड़ा विषय से भटककर कहना चाहूंगा कि संगठनों के काम करने के तरीक़ों, सफ़लता के मानकों, संख्या बढ़ाने की कोशिशों, अपने संगठन के व्यक्ति को नायक की तरह स्थापित करने की तिकड़मों और विरोधी को गिराने के हथकंडों में उन्नीस-बीस से ज़्यादा का अंतर नहीं होता, उनके बैनरों में परस्पर चाहे जितना कड़ा विरोध दर्शाया जा रहा हो।

बहरहाल, वफ़ादारी जब इंसानियत के खि़लाफ़ जाती हुई दिखने लगे तो उसपर एक बार ज़रुर सोचना चाहिए।

‪-‎संजयग्रोवर‬
24-09-2014

(ये मेरे ‪व्यक्तिगत‬ ‎विचार‬ हैं, कोई इन्हें मानने को बाध्य नहीं है ; ठीक वैसे ही जैसे मैं अपनी बुद्धि, कार्यक्षेत्र और स्वतंत्रता के दायरे में किसीको मानने को बाध्य नहीं हूं।)