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Saturday, 20 August 2016

असलियत से भागने के सम्मानित उपाय-2


(असलियत से भागने के सम्मानित उपाय-1)

कल सुबह तीन-चार बजे के बीच नींद खुल गई। एफ़एम सुनने लगा। एक कार्यक्रम में कृष्ण और ‘कर्म करो, फल की इच्छा छोड़ दो’ का ज़िक्र आया तो दूसरे में गीता की तारीफ़ सुनने को मिल गई। जब भी सुनता हूं कि कई बड़े(!), मशहूर और बुद्विमान(!) लोग गीता के उपदेश को पसंद करते रहे हैं, हैरानी में पड़ जाता हूं। मैंने गीता नहीं पढ़ी, लेकिन कुछ वाक्य/उपदेश जगह-जगह दुकानों/दीवारों पर लिखे देखे हैं या लोगों से सुने हैं जो निम्न आशय के हैं-

⃝    शरीर के मरने से आत्मा नहीं मरती।

⃝    हम तो कठपुतलियां हैं, हमारे करने से कुछ नहीं होता, जो वह चाहता है वही हमसे/सबसे करवा लेता है। जो वह चाहता है वही होता है।

⃝    जीवन तो अभिनय है, नाटक है, हमें तो एक पात्र की तरह अपना ‘रोल’ ‘प्ले’ करना होता है।

एक ईमानदार और संवेदनशील इंसान की दृष्टि से मुझे उक्त सभी बातें चकित करतीं हैं।

04-08-2016 

कभी कहीं मैंने सुना या पढ़ा, शेक्यपियर ने भी कहा है कि ‘शो मस्ट गो ऑन...’; मैंने इंटरनेट पर थोड़ी देर ढूंढा, स्पष्ट नहीं हो सका कि उन्होंने यह ख़ुद कहा या यह उनका पसंदीदा जुमला था। बहरहाल, ओशो को कहीं पढ़ा, उन्होंने कहा है, ‘जिओ ऐसे, जैसे अभिनय कर रहे हो और अभिनय ऐसे करो जैसे जी रहे हो।’ निश्चय ही, अभिनय कोई ऐसे कर पाए जैसे जी रहा हो तो इससे ज़्यादा ख़ूबसूरत और यथार्थवादी अभिनय क्या हो सकता है लेकिन जियो ऐसे जैसे अभिनय कर रहे हो, यह बात पल्ले नहीं पड़ती।

इस तरह तो अफ़वाहबाज़ों, बलात्कारियों, पाखंडियों, धूर्त्तों, बेईमानों और मौक़ापरस्तों के लिए बड़ी आसानी हो रहेगी। वे कहेंगे ज़रा बलात्कार का अभिनय ही तो किया है, इतना शोर क्यों मचा रहे हो ?  यह तो गंदा-सा काम करने के लिए ‘अच्छा-सा’(!) बहाना ढूंढ लेने जैसा है। और कौन तय करेगा कि किस बात का अभिनय ठीक है और किस बात का ग़लत ? और इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक़ सच यह है कि यह कौन तय करेगा कि कौन अभिनय करेगा और कौन अभिनय करवाएगा ? कौन रोल लिखेगा और देगा और कौन खोपड़ी गिरवी रखकर चुपचाप रोल करता चला जाएगा ? मेरी समझ में इंसान के द्वारा इंसान का इससे ज़्यादा शर्मनाक़ इस्तेमाल कोई हो नहीं सकता। अगर दूूसरे के कहने पर रोल ही करना है तो फ़िर अपने दिमाग़ का रोल तो ख़त्म ही समझिए। फिर व्यक्ति की आज़ादी का अर्थ भी ख़त्म समझिए। हां, कायरों और कमज़ोरों के लिए जो बहादुर और महान भी दिखना चाहते हैं, यह बहुत अच्छा बहाना है। 

इस सबके साथ यह भी समझना ज़रुरी है कि जो किसीको रोल दे रहा है, उस अहंकारी को इसके लिए चुना किसने है !? यह सिवाय अहंकार और मक्कारी के और क्या है कि आप ख़ुद ही ख़ुदको ऐसे काम के लिए श्रेष्ठ मान लें जिसमें आपका तो फ़ायदा ही फ़ायदा होगा मगर दूसरे कईयों का जीवन दांव पर लग जाएगा या बर्बाद हो जाएगा ? और ऐसी बातें कहनेवाले इन्हें कहने से पहले पर्याप्त समझदारी से इन्हें समझे हों या उनकी नीयत बिलकुल ठीक हो, यह पता कैसे लगाईएगा ? अभी दो-तीन दिन पहले ही मैंने एक नवोदित कलाकार का इंटरव्यू देखा ; वे कह रहे थे कि ज़िंदग़ी को ज़्यादा गंभीरता से मत लो, बस मौज-मज़ा लो, छोटी-सी तो ज़िंदगी है। मैंने सोचा कि फ़िर आप भी अपने कैरियर को हंसी-मज़ाक़ में उड़ा दो, यह भी तो अगंभीर ज़िंदगी का मामूली-सा हिस्सा है, मज़ाकिया-सा क़िस्सा है। मुझे लगता है उन्होंने हाल ही में कहीं पढ़ा या सुना होगा, अपने मतलब का लगा होगा सो बोल दिया होगा।  

कल्पना कीजिए कि ईमानदारी बेईमानों के हाथ लग जाए, प्रगतिशीलता मौक़ापरस्तों के हाथ लग जाए,  तो क्या-क्या संभव है! और यह बहुत आसान है अगर ज़िंदगी के सारे मूल्य, मान्यताएं और जीवनशैली बनाने का काम बेईमानों, पाखंडियों, खोखलों और कायरों के हाथ लग जाए तो वे कुछ भी कर सकते हैं। और ये काम क्या-क्या हो सकते हैं ? ये काम हो सकते हैं क़िताबें लिखना, फ़िल्में बनाना, आंदोलन करना, वक्त्व्य देना, भाषण देना, शिक्षा देना, संपादन करना....। इन सबके सहारे एक पूरे समाज को चंद व्यक्तियों की सहूलियत के अनुसार गढ़ना और गढ़ते चले जाना कोई बहुत मुश्क़िल काम नहीं है।

ज़िंदगी को अभिनय मानने के कई ख़तरे हैं ; अभिनय करनेवाला झूठी माफ़ी मांग सकता है, झूठी दोस्ती कर सकता है, झूठा प्रेम कर सकता है, सही बात तो यह है कि इस बहाने से वह गंदी से गंदी हरक़त पर उतर सकता है। कोई अपनी ज़िंदगी को अभिनय मान भी ले मगर दूसरे की ज़िंदगी को अपने द्वारा किए जा रहे नाटक का हिस्सा कैसे मान सकता है !? जबकि दूसरे को इस बात का अंदाज़ा तक नहीं है, उसके लिए ज़िंदगी बिलकुल वास्तविक और गंभीर कृत्य है। मुझे नहीं समझ में आता कि धर्म, आध्यात्मिकता या सामाजिकता के नाम पर इस तरह की क्रूरता कोई समझदार या संवेदनशील व्यक्ति सोच भी कैसे सकता है!?

लोग राष्ट्रप्रेम और ज्ञान के विस्तार जैसे मूल्यों का, झंडा लगाने या दिए जलाने जैसे कर्मकांडों के ज़रिए, अभिनय करते हैं लेकिन इमारतों में रेत और घटिया सामान लगाकर पैसे कमाने(!) जैसे कामों को असलियत में करते हैं। प्रतीकात्मकता, कर्मकांडों और रिवाजों से हमें क्या मिला, इसीसे पता लगता है। पाखंडियों ने धर्म, भगवान, ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, जाति, सफ़लता जैसी नक़ली और गढ़ी गई चीज़ों को वास्तविक ज़रुरत की तरह स्थापित कर दिया और भूख, प्रेम, सैक्स, इंसानियत जैसी वास्तविक चीज़ों को पीछे धकेल दिया।

जो लोग ज़िंदगी को अभिनय मानते हैं, उन्हें मकान छोड़ देने चाहिए और पेड़ के नीचे जाकर मकान में रहने का अभिनय करना चाहिए। क्यों नहीं वे खाना-पीना छोड़कर खाने-पीने का अभिनय करके काम चलाते ? क्यों नहीं वे अपने कपड़े ग़रीबों को देकर ख़ुद कपड़े पहनने के अभिनय भर से काम चलाते ? क्यों वे दूसरों से सचमुच के पैसे ले लेते हैं, जबकि पैसे ले लेने के अभिनय से भी तो काम चल सकता है!

यह सब लिखना इसलिए भी ज़रुरी है कि जब तक हम असफ़लता को सफ़लता, कमज़ोर को शक्तिशाली, कायर को साहसी कहते रहेंगे, ऐसे लोगों का फ़ायदा कराते रहेंगे। दरअसल ‘ज़िंदगी अभिनय है’ जैसी बातें करनेवाले लोग ख़ुद ही बता रहे होते हैं कि वे असली ज़िंदगी का सामना करने में असफ़ल हो गए हैं, घबरा गए हैं इसलिए उन्होंने ‘दिलके ख़ुश रखने को....’ यह ’अच्छा ख़्याल’ ढूंढ लिया है।  

ऐसी क़िताबें जो लोगों को समझातीं हों कि तुम कठपुतली हो, तुम अभिनेता हो, करनेवाला तो कोई और है, से आज़ादी, लोकतंत्र, उदारता, अहिंसा आदि को समझने की उम्मीद सिवाय नासमझी के क्या हो सकती है ?


-संजय ग्रोवर
20-08-2016

Saturday, 12 March 2016

लड़कियां

लड़कियों को लेकर भारतीय समाज में अकसर एक ऊहापोह सा बना रहता है। लड़कियां क्या खाती हैं, क्या पीती हैं, क्या सोचतीं हैं आदि-आदि से लेकर ‘लड़कियां किस तरह के पुरुषों को पसंद करतीं हैं’ जैसे विस्फ़ोटक मसलों में कई मर्दों की जान और ज़िंदगी अटकी रहती है। मज़े की बात यह है कि कट्टरपंथी परंपरावादी राजा-महाराजाओं से लेकर तथाकथित प्रगतिशीलों तक सभी अपने आसपास रहनेवाली लड़कियों या महिलाओं की संख्या से अपनी महानता नापने की कोशिश में लगे पाए गए हैं। ऐसा लगता है कि जैसे लड़कियां पुरुषों की छाती पर टांगे जाने वाले मैडल/तमग़े हैं, जैसे लड़कियां पुरुषों को मिलनेवाले पुरस्कार हैं, जैसे वे सत्संग के बाद बंटनेवाला प्रसाद हैं, जैसे वे मर्दों को देखकर गश खाने और क्रश आने के लिए ही पैदा हुई हैं। एक पुरानी और प्रसिद्ध कहानी में कृष्ण नामक एक नायक का ज़िक्र मैंने सुना है जो नदी-किनारे से नहाती हुई लड़कियों के कपड़े वगैरह चुराकर पेड़ पर चढ़ जाते थे और तिसपर भी लड़कियां आ-आकर उनकी गोपियां हुई जातीं थीं। और कहानी के यह कृष्ण शादीशुदा भी हैं और इनकी पत्नियों की भी अच्छी-ख़ासी संख्या गिनाई जाती है।

अभी एक विश्वविद्यालय में कथित रुप से पाए जानेवाले कंडोमों की संख्या किसीने गिनाई तो कुछ लोग उसपर गर्व करते दिखे तो उन्हीं में से कुछ लोग इस चिंता में परेशान दिखे कि वहां पढ़नेवाली लड़कियों के मां-बाप क्या सोचेंगे ? वहां पढ़नेवाले लड़कों के मां-बाप क्या सोचेंगे, इसकी चिंता किसीको भी नहीं हुई। साफ़ है कि इस समाज में अभी लड़कियों की वह स्थिति नहीं बन पाई कि आप उनके साथ अपने संबंधों को जैसे हैं वैसे बता भी सकें। मेरी समझ में पत्नी, प्रेमिका, गोपिकाएं और श्रद्धालु प्रशंसिकाएं एक साथ रखने के लिए इस तरह की विरोधाभासी बातों के पाखंड के अलावा और कोई चारा भी नहीं है। इसको प्रगतिशीलता तो कतई नहीं माना जा सकता। प्रगतिशीलता के लिए बहुत साहस चाहिए जो कि लोगों में अकसर नहीं होता, इसलिए यहां प्रगतिशील कहे जानेवाले या ख़ुदको प्रगतिशील समझने का भ्रम पालनेवाले लोग भी चार तरह की बातें एक साथ कह देते हैं। पाखंडी संस्कृति में लड़कियों को भी ऐसे ही लोग सूट करते हैं जो दिखाने और करने के फ़र्क़ की तथाकथित सभ्यता को बड़ी होशियारी और चालाक़ी से बरतने के आदी हों। अब या तो आप लड़कियों/लड़कों से स्पष्ट संबंध रख लीजिए या फिर यह चिंता कर लीजिए कि उनके घरवाले क्या सोचेंगे। दोनों चीज़ें एक साथ साधेंगे तो झूठ और अभिनय के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। फिर अपनेआप को कट्टरपंथियों और पाखंडियों से अलग और प्रगतिशील समझना एक झूठी तसल्ली से ज़्यादा कुछ नहीं है।

कोई हैरान हो सकता है कि लड़कियां, वो भी प्रगतिशील लड़कियां, कैसे किसी शादीशुदा की गोपियां बनने को तैयार हो जातीं हैं ? सीधा कारण समझ में आता है कि बचपन से रटाई सामाजिक मान्यताएं इसमें बड़ा काम करतीं हैं। उसके बाद का काम हमारा साहित्य और फ़िल्में पूरा करते आए हैं।
प्रगतिशील लड़कियां कैसे किसी प्रगतिशील लड़के पर मरनेवाली लड़कियों की गिनती बढ़ाकर अपने जीवन को सार्थक मान सकतीं हैं ? कोई प्रगतिशील मर्द कैसे महिलाओं को मैडल की तरह अपनी छाती पर टांक कर ख़ुश हो सकता है !? यह मानसिकता किसी नेता की रैली में आई या  जैसे-तैसे-कैसे भी जुटाई भीड़ को देखकर ख़ुश होने की मानसिकता से कैसे अलग है ? कैसे कोई शादीशुदा कृष्णकन्हैया इतनी स्त्रियों के प्रेमनिवेदन से ख़ुश हो सकता है जबकि उसके अपने घर में उसकी कई रानिया-महारानियां क़ैदी की तरह रह रहीं हों। कल्पना कीजिए कि उन रानियों के पास भी इतनी-इतनी संख्या में प्रेमनिवेदन और फिर प्रेमनिवेदन की स्वीकृति के बाद पुरुष-गोपक दिन-रात प्रेमलीला रचाते-मचाते नज़र आने लगें तो इन तथाकथित प्रगतिशील महाराज की क्या स्थिति हो रहेगी ? उसके बाद फिर बच्चे भी यही लीला करने लगें तो एक यमुना तट तो घर में बनाना पड़ जाएगा। ऊपर से एक समस्या यह भी रहेगी किन लोगों को इन संबंधों को गर्व की तरह दिखाना है और किन लोगों से इसलिए छुपाना है कि उनके घरवाले क्या सोचेंगे, इसका भी पूरा हिसाब-क़िताब रखना पड़ेगा। सही बात यह है कि ऐसे संबंध आसानी से वही लोग निभा सकते हैं जो रात-दिन पाखंड के आदी हों। दूसरा तरीक़ा है कि इन संबंधों को जैसे हैं वैसा ही बताओ, किसीके घरवाले क्या सोचेंगे इसकी चिंता छोड़ दो। मगर उसके लिए साहस चाहिए, कई तरह के नुकसान उठाने की तैयारी चाहिए, पहलक़दमी की हिम्मत चाहिए, जिसकी हमारे समाज को आदत नहीं है, इसलिए उसमें अभी भी वक़्त लगनेवाला है।


अपने ऊपर मरनेवाली लड़कियों की संख्या गिन-गिनकर ख़ुश होना, दोस्तों-यारों को बताना....लड़कियों को सामान समझने की मानसिकता से क़तई अलग नहीं है। सिर्फ़ लड़कियों की ही संख्या गिनते रहना उन्हें बाक़ी समाज से अलग करके, असामान्य बनाकर देखना भी है जिसमें नुकसान अकसर लड़कियों का ही होता आया है। आखि़र उस संख्या की उपयोगिता क्या है ? क्या आप उनसे किसी विशेष प्रकार का संबंध रखते हैं ? अगर रखते हैं तो क्या उसे सार्वजनिक रुप से स्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं ? या वे लड़कियां आप पर ठीक वैसी ही श्रद्धा रखतीं हैं जैसी किसी गुरु के प्रति रखने की हमारी परंपरा रही है ? जिस श्रद्धा में एकलव्य ने अपना ही अंगूठा काट लिया था ! यह श्रद्धा कतई ख़तरनाक़ है। मगर इसके बड़े फ़ायदे हैं और इसीलिए मुझे लगता है कि तथाकथित प्रगतिशील कहे जानेवाले लोग किसी न किसी तरह से पुरानी परंपराओं को बनाए रखने के बहाने ढूंढते रहते हैं।

यहां यह क़ाबिले-ग़ौर है कि फ़ेसबुक पर मेरे साथ 3-4 बार ऐसा हुआ कि कोई लड़की ख़ुदही बात करने आई और सामान्य बातें ही कर रही थी कि एकाएक बीच में कोई तथाकथित प्रगतिशील शख़्स प्रकट भए और लड़की को इशारों-इशारों में सावधान करने लगे, मेरी उम्र वगैरह के बारे में हिंट देने लगे। बड़ी हैरानी हुई क्योंकि ये लोग एक तो ख़ुदको प्रगतिशील कहते थे, दूसरे ख़ुद शादीशुदा होते हुए भी ट्राई मारते फिरते थे। जबकि मैं एक बैचलर हूं। और उम्र क्या बता रहे हो, जब लड़की साक्षात मुझसे मिलेगी तो देख ही लेगी, सब कुछ फ़ेसबुक पर तो नहीं हो जानेवाला! राजेंद्र यादव के मामले में देख ही चुका था, समझने में देर नहीं लगी कि इन तथाकथित प्रगतिशीलों की भी अपनी वानर-सेनाएं हैं और ये भी किसीसे कम नहीं हैं। ये भी तरह-तरह के डरों और आशंकाओं से घबराए हुए हैं और स्त्रियों को उनके हाल पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। फिर एक-दो दूसरी घटनाएं हुईं जिनमें लड़कियों ने पहले ख़ुद ही कोई बोल्ड क़िस्म का मज़ाक़ किया, बाद में प्रत्युत्तर में मैंने कुछ कह दिया तो उन्होंने उसे ग़लत ढंग से पेश करना शुरु कर दिया। समझ में आया कि मनुवाद अभी कितने-कितने रुपों में मौजूद है।

बहरहाल मैं तो करना कुछ और दिखाना कुछ को न तो प्रगतिशीलता मान सकता हूं न साहस। न ही लड़कियों को तमग़ों की तरह टांगने में कोई दिलचस्पी(कभी हुआ करती थी) बची है। अगर ‘मरनेवाली’ लड़कियों की संख्या से ही किसीकी महानता नापनी हो तो विजय माल्या, रविशंकर, शाहरुख़ खान, आमिर ख़ान, सलमान, अक्षय कुमार, चार्ल्स शोभराज, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, इमरान ख़ान, उमर शरीफ़, ओशो रजनीश आदि-आदि को सर्वाधिक महान लोगों में गिना जाना चाहिए।


हां, स्पष्टवादी और बेबाक़ व्यक्ति के प्रति, थोड़ी देर के लिए ही सही, एक आदर का भाव ज़रुर उठता है, चाहे वह व्यक्ति लड़का हो चाहे लड़की।


-संजय ग्रोवर

12-03-2016

Wednesday, 24 February 2016

भारतीय ‘प्रगतिशीलों’ का पसंदीदा संगठन आर एस एस एस-2

(भारतीय ‘प्रगतिशीलों’ का पसंदीदा संगठन आर एस एस एस-1)

अभी मैं इस लेख का अगला हिस्सा लिखने का मन बना ही रहा था कि ‘पाखंड वर्सेस पाखंड’ का नया उदाहरण सामने आ गया। किसीने आरोप लगाया कि जेएनयू में प्रतिदिन इतनी मात्रा में कंडोम, इतने ये, उतने वो आदि-आदि पाए जाते हैं। इसपर दूसरा पक्ष लगातार इस बात पर हंस रहा है कि देखो, अब कंडोम गिने जा रहे हैं.....


अगर कोई स्पष्टवादी, बेबाक़ और पारदर्शी सोचवाला समाज/गुट/व्यक्ति इसपर हंसता तो बात समझ में आती मगर क्या जेएनयू के लोगों की स्थिति वाक़ई ऐसी है कि वे इसपर हंस सकें ? वे उन कंडोमों की ‘उपयोगिता’, इस्तेमाल या मौजूदगी के बारे में कोई स्पष्ट बात नहीं बता रहे। इतना ही नहीं वे तो यह भी कह रहे हैं कि ऐसे आरोपों के बाद उन लड़कियों के घरवाले क्या सोचेंगे जो यहां पढ़ने आतीं हैं ?


सोचिए कि इसका क्या मतलब निकलता है ?


यानि कि वे कहना चाह रहे हैं कि वह सब यहां नहीं होता जो उन लड़कियों के घर वाले सोच बैठेंगे ? अगर नहीं होता तो आप कंडोम गिनने पर हंस क्यों रहे हैं ? फिर तो यह जानना बनता कि यहां कंडोम आते कहां से हैं ? क्या शहर के दूसरे लोग अपने कंडोम यहां फेंक जाते हैं ? क्या यहां कोई फ़ैक्टरी लगी है ? क्या यहां कंडोम का कोई पेड़ लगा है जिससे पतझर में कंडोम झर-झरके गिरते हैं ?


अगर यहां यह सब नहीं होता तो आप उनपर हंस किस बात पर रहे हैं ? आप तो ऐसे हंस रहे हैं जैसे कि आप प्रगतिशील हों और वे कट्टरपंथी हों !? जबकि आप लड़कियों के घरवालों के सामने एक परंपरावादी इमेज भी बनाए रखना चाहते हैं। यह तो सौ प्रतिशत पाखंड हुआ। अगर आपमें यह कहने का साहस नहीं है कि कंडोम का यहां पर क्या इस्तेमाल होता है तो कृपा करके अपने को बेबाक़, प्रगतिशील, साहसी वग़ैरह कहना बंद करें। आप और आर एस एस एस एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।


खिड़की से घुसकर, अलमारी में छुपकर, अंधेरे में घुसकर, खाट के नीचे बैठकर संबंध बनाना कोई आधुनिकता नहीं है ; यह पाखंडी, कायर और मौक़ापरस्त लोगों का पुराना क़रतब है।


और अगर आपमें स्पष्ट और पारदर्शी ज़िंदगी जीने की हिम्मत है तो आपको यह चिंता क्यों लगी है कि लड़कियों के घरवाले क्या सोचेंगे ? क्या यहां पढ़नेवाली लड़कियों में वह हिम्मत नहीं है कि अपने घरवालों को साफ़-साफ़ बता सकें !? तो फिर इसमें और दूसरे विश्वविद्यालयों में फ़र्क़ क्या हुआ ? छुपा-छुपी के क़िस्से किस विश्वविद्यालय में नहीं चलते ?

यानि कि पकड़े गए तो प्रगतिशील वरना राष्ट्रप्रेमी और परंपरावादी ! 

क्या आपने कभी सोचा है कि आप जैसे कृत्रिम प्रगतिशीलों के बनाए समाज में उन लोगों के लिए कितनी समस्याएं और तक़लीफ़ें खड़ी हो जातीं हैं जो सचमुच अपने हर रिश्ते को साफ़गोई और ईमानदारी से जीना चाहते हैं ?

जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि यहां के ‘प्रगतिशीलों’ को एक भ्रम/ग़लतफ़हमी है कि वे आर एस एस एस से कुछ अलग हैं, दरअसल इनमें उन्नीस-बीस से ज़्यादा का अंतर नहीं है।


(जारी)

-संजय ग्रोवर
24-02-2016



 

Wednesday, 12 August 2015

तस्वीरों का मलबा, अंत में पूड़ी-हलवा

07-08-2015

स्पेन में एक खेल चलता रहा है-बुलफ़ाइट। जिसमें हज़ारों-लाखों दर्शकों के सामने एक सांड और एक आदमी की लड़ाई दिखाई जाती थी/है। इस ख़तरनाक़ खेल में सांड और आदमी दोनों बिलकुल असली होते थे/ हैं और इनमें से किसीकी भी जान जा सकती थी/है। मनोरंजन और कमाई के अलावा इस खेल की कोई तीसरी वजह समझ में नहीं आती। समझने को कोई इसे उत्सव समझ सकता है, आंदोलन समझ सकता है, तरह-तरह से महिमा-मंडित कर सकता है ; अपने-अपने शौक़ हैं, अपनी-अपनी समझ है, जीवन में ‘कुछ करने’ के अपने-अपने मतलब हैं। यहां भी, पढ़ा है कि (समर्थ !) लोग-बाग़ तीतर वग़ैरह लड़ाकर अपना टाइम पास करते रहे हैं। 

क्या इसे हम ‘कुछ करना’ कह सकते हैं ? मेहनत तो इन कामों में भी लगती ही है, कई बार जान का ख़तरा भी रहता है। क्या सिर्फ़ इन्हीं कारणों से इन गतिविधियों को महानताओं में शुमार कर लेना चाहिए !? कई लोग होते हैं जिन्हें शादियों में सबसे आगे, घुस-घुसकर फ़ोटो खिंचाने का शौक़ होता है। इसके लिए भी मेहनत तो लगती है। थोड़ा धक्का मारना पड़ता है, थोड़ा ‘ऐक्सक्यूज़ मी‘ वग़ैरह सीखना-बोलना पड़ता है, थोड़ा ‘जीजाजी’, ‘भाभीजी’ करना पड़ता है, ऐन फ़्लैश चमकने या कैमरा चालू होने के साथ ही एक ख़ास तरह की मुद्रा चेहरे पर सजा लेनी होती है। मगर जिसको यह शौक़ है, इतना तो उसे करना ही पड़ेगा।

इसी तरह देखने में आता है कि कुछ लोग आंदोलनों के बड़े शौक़ीन होते हैं। जब देखो आंदोलित-आंदोलित से रहते हैं। वे हरदम कुछ क्रांति टाइप करना चाहते हैं-इस क्रांति टाइप में भाषण देने, एनजीओ बनाने, फ़ोटो-वीडियो खिंचाने-बनाने, अख़बार-टीवी में आने से लेकर पूड़ी-हलवा खाने तक कई ख़तरनाक़ बाधाएं पार करनी पड़तीं हैं। लोग एक-दूसरे को माला वग़ैरह पहनाते हैं, बधाई देते हैं, शाबासी देते हैं, तालियां मारते हैं, चाय नाश्ता होता है। इसके बाद सबको लगता है कि मैंने कुछ किया, मैंने भी कुछ किया, मैंने तो काफ़ी कुछ किया और फ़िर हम सबने मिलकर बहुत कुछ किया। इन सबको लगता है कि इसीसे सब हो रहा है और बदल रहा है। सच अकसर यह होता है कि इस तरह के जमावड़ों में लोगों को व्यक्तिगत फ़ायदे ज़रुर होते हैं, प्रसिद्धि मिलती है, जान-पहचान बढ़ती है और आगे कुछ और कार्यक्रमों में आने का निमंत्रण या निमंत्रण की उम्मीद मिलती है। भारत में लोग इस जान-पहचान का उपयोग अकसर व्यक्तिगत फ़ायदों और कामों के लिए करते हैं, मगर उन्हें यह ग़लतफ़हमी भी रहती है कि उनमें ‘मैं’ बिलकुल नहीं है, वे बड़े निस्वार्थी और सामाजिक हैं। सामाजिक बदलावों के संदर्भों में इन समारोहों का असर ताली बजाती, गदगद दिखती भीड़ पर उतना ही होता है जितना धार्मिक सत्संगो में जानेवाली महिलायों व अन्यों पर बाबा के प्रवचन का होता है। ये लोग सत्संग के ठीक बाद भी बिलकुल वैसे के वैसे रहते हैं जैसे दो घंटे पहले सत्संग में जाते समय थे।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जो लोग ऐन वक़्त पर (अकसर) बदलाव के आगे खड़े दिखते हैं वे दरअसल भीड़ के पीछे, नज़र जमाए चल रहे होते हैं, जब भी इन्हें भीड़ का मूड बदलता दिखता है, ये भीड़ के आगे जा खड़े होते हैं। यह तथ्य ग़ौरतलब है कि ‘ओह माय गॉड’, ‘पीके’, ‘पीकू’, ‘क्वीन’ जैसी फ़िल्में भारत में तब देखने में आई हैं जब इंटरनेट का प्रसार बढ़ा और सभी विषयों पर खुली बहसें होने लगी, दूर-दूर देशों, शहरों, क़स्बों के लोग आपस में सीधी बात करने लगे। ‘पीकू’ से पहले कभी मैंने अमिताभ बच्चन को सैक्स शब्द का उच्चारण करते देखा हो, याद नहीं आता। अगर इस क़िस्म के आंदोलनों से वास्तविक बदलाव आता होता तो भारत शायद वह देश है जहां हर गली-मोहल्ले में दस-दस आंदोलनकारी बैठे हैं और दहेज, डायन, ज्योतिष, तांत्रिक, ओझा से लेकर अस्पृश्यता तक सब ज्यों का त्यों चलता चला जा रहा है।

पिछले तीन-चार सालों में हमने ऐसे आंदोलन ख़ूब देखे जिनका नब्बे-पिच्यानवें प्रतिशत हिस्सा टीवी पर विज़ुअल्स और पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया में तस्वीरों से बना था। ईमानदार से ईमानदार माने जानेवाले बुद्धिजीवी(!), एंकरादि कम-अज़-कम दो साल तक इन्हें स्वतःस्फ़ूर्त आंदोलन बताते रहे। इन आंदोलनों का चरित्र/मंतव्य इसीसे समझा जा सकता है कि एक तरफ़ इन आंदोलनों के प्रमुख वक्ता मंच पर ख़ुदको चमत्कारी और किसी तथाकथित भगवान के प्रतिनिधि की तरह बता रहे थे तो दूसरी तरफ़ इनके वॉलंटियर्स सोशल मीडिया पर, कई ग्रुपों में घुस-घुसकर ख़ुदको प्रगतिशील और नास्तिक की तरह पेश कर रहे थे।

ऐसे आंदोलनों से व्यक्तिगत फ़ायदों, लोकप्रियता और पूड़ी-हलवे के अलावा और कुछ भी निष्कर्ष निकलता होगा, समझ में आना मुश्क़िल है। 

शुक्र है कि तक़नीक और विज्ञान लगातार आगे बढ़ रहे हैं वरना क्या पता हम सतीप्रथा और वर्णव्यवस्था की तरफ़ लौट रहे होते!

-संजय ग्रोवर
12-08-2015