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Saturday, 16 March 2019

पाखंड की विविधता-1,2

सलीम उस लड़के का नाम था जिसने मुझसे कहा कि ‘पैसे की तो कोई बात नहीं, आपकी जींस पर दो सुईयां टूट गईं हैं, उनके दो रुपए दे दो’। मुझे बात बहुत अच्छी लगी। जींस बहुत मोटे कपड़े की थी। सलीम उस वक़्त लड़का-सा ही था। छोटी-सी दुकान में दो मशीन लेकर बैठता था। उससे दोस्ती हो गई। फ़ैशन-डिज़ाइनिंग का शौक़ भी शुरु ही हुआ था। मैं अपने जानकारों-दोस्तों को वहीं ले जाने लगा। मैं स्केच बनाता और सलीम कमोबेश वैसा ही सिल देता। धीरे-धीरे अच्छी ट्यूनिंग हो गई। मैं और सलीम दोनों ही स्थानीय स्तर पर ख़ासे प्रसिद्ध हो गए। याद आता है कि सलीम ने मेरी फ़रमाइश पर दो बार ईद की दावत पर मुझे मेरे दोस्तों समेत बुलाया। इफ़्तार शब्द उस वक़्त मेरी जानकारी में नहीं आया था। न ही मुझे ये मालूम था कि ऐसी घटनाओं के फ़ोटो खींच लेने चाहिए ताकि वक़्त पड़ने पर इस्तेमाल किए जा सकें। बाद में हमारी अनबन हो गई। मैं चाहता था कि वो एक लेबल मेरे नाम का भी बनवाए और उसे मेरे डिज़ाइन किए हुए कपड़ों पर लगाए। सलीम को मेरी वजह से बहुत फ़ायदा होता था और मुझे पढ़ा-लिखा होते हुए भी फ़ालतू घूमने का तमग़ा मिल जाता था। लेकिन, सलीम की हिचक भी समझ में आती है, वह मुझे क्रेडिट देता तो उसकी दुकान पर असर पड़ सकता था। बाद में एक नया ख़तरा उठाते हुए मैंने अपनी दुकान खोल ली। बल्कि मैंने दो ख़तरे उठाए-एक तो क़रीबियों को नाराज़ करते हुए तथाकथित छोटा काम कर लिया, दूसरे, कटिंग-टेलरिंग न आते हुए भी मामूली पूंजी के साथ काम शुरु कर दिया। दुकान अच्छी चल गई लेकिन एक तो मैं पैसे वसूलने, कारीगरों से काम कराने के मामले में दूसरों की तरह क्रूर नहीं था (अभी भी नहीं हूं), दूसरे, काम के तकनीक़ी पक्ष में कमज़ोर था, तीसरे, लल्लो-चप्पो, छल-कपट, अभिनय आदि मेरे स्वभाव में नहीं हैं सो अंततः दुकान बंद करनी पड़ी। उस वक़्त भी मैंने एक माकेट के ऊपर खाली पड़ी दुकानों में से सबसे पीछे की दुकान लेने का साहस किया था और अच्छा-खासा चला भी लिया था। बाद में सलीम ने भी वहीं दुकान ले ली थी। बाद में ऊपर का तक़रीबन आधा मार्केट दर्ज़ियों से भर गया। ख़ैर, मैं दुकान बंद करके दूसरी चीज़ों में लग गया। उसके बाद वक़्त खिसकने लगा। अंततः मैंने सलीम के बारे में पता करना छोड़ दिया। मुझे नहीं पता कि आजकल वो कहां है।

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इसी दौरान हमारे पड़ोस में दो डॉक्टर रहने लगे थे। एक हिंदू, एक मुस्लिम-दोनों लगभग युवा। हिंदू से तो थे ही, मुस्लिम से भी खाने-पीने, आने-जाने के जैसे संबंध हमारे परिवार के थे, वैसे मोहल्ले में किसीके नहीं थे। हालांकि मेरे उनसे कोई क़ाबिले-ज़िक़्र ताल्लुक़ात नहीं थे। पर मुझे अच्छा लगता था कि वे दोनों छोटे-से किराए के मकान में साथ-साथ रहते थे। ऐसा अब तक मैंने सिर्फ़ फ़िल्मों में देखा था या कहानियों में पढ़ा था। उनमें से एक तो इतना भला था कि कई बार ग़रीब मरीज़ों के पैसे छोड़ देता था। दूसरे कुछ भी कहें पर मेरी नज़र में इंसानियत के लिहाज़ से यह उस बंदे का प्लस-प्वॉइंट था। पॉज़ीटिव थिंकिंग।

फिर दिल्ली में मुझे हसनैन मिले-हसनैन रज़ा। हसनैन उस समय एक प्रॉपर्टी डीलर ऑफ़िस में बैठते थे। वे अकसर फ़ोन करके मुझे बुला लेते थे। मैं भी किसी वजह से उस वक़्त ख़ाली घूमता था। अच्छी छनने लगी। हसनैन के साथ वक़्त अच्छा बीत जाता था। कभी-कभी हसनैन मेरे लिए अपने हाथों से बनाया खाना लेकर आते थे। वे जिस भाव से लाते थे, देते थे, उसमें मुझे इंसानियत की एक अलग ही गंध महसूस होती थी। मैं भी उस वक़्त कुछ बनाना-करना जानता नहीं था, संकोची था, दिलशाद गार्डन में ढाबे वगैरह भी मेरी पसंद के थे नहीं, सो उस खाने को उपहार और प्रेम समझकर ग्रहण कर लेता था। एक दो-दिन मुझे चीनी के सफ़ेद बर्तन में खाना कुछ अजीब-सा लगा फिर आदत हो गई। साधारण आर्थिक स्थिति में भी हसनैन अपने घर और अपने कपड़ों की जैसी सफ़ाई रखते थे, मैं काफ़ी प्रभावित होता था। 

मेरे पिताजी की मृत्यु के समय हसनैन ने कहा कि मैं भी शॉल चढ़ाना चाहता हूं, कोई ऐतराज़ तो नहीं करेगा। मैंने कहा कि ऐसा तो कोई यहां है नहीं। मुझे याद है कि उस वक़्त मैंने हसनैन से कही थी कि मेरा-तुम्हारा कभी झगड़ा हुआ भी तो किसी दूसरे मसले पर हो सकता है, हिंदू-मुसलमान के मसले पर नहीं हो सकता। मैं रीति-रिवाज, कर्मकांड को नहीं मानता मगर दूसरे करना चाहें तो रोकता भी नहीं। मैं इस तरह की चीज़ों में मन से शामिल नहीं हो पाता।

हसनैन बीच-बीच में दो-चार साल के लिए ग़ायब भी हो जाते हैं, पर किसी न किसी तरह से बीच-बीच में संपर्क बना भी लेते हैं। आजकल फ़ेसबुक पर बने हुए हैं।

जब मेरे एक पड़ोसी मेरे मना करने के बावजूद अपनी अवैद्य बालकनी बना रहे थे और इसका ज़िक़्र मैंने फ़ेसबुक पर किया तो सबसे ज़्यादा फ़ोन मेरे पास सैयद ख़ालिद महफ़ूज़ के आए। मैं उन्हें पहले से नहीं जानता था मगर उन्होंने जिस तरह बार-बार अनुरोध किया, मैं उनसे मिलने को उत्सुक हो गया। पुलिस के मामले में कुछ मदद मेरी शफ़ीक़ ने की थी। बालकनी जितनी बनी थी उतने तक रुक गई थी। सैयद ख़ालिद महफ़ूज़ के बार-बार अनुरोध पर मैंने झिझकते हुए कहा कि घर बहुत गंदा पड़ा है, इसमें आप कुछ मदद कर सकें तो कर दें। मेरी तबियत उस समय बहुत ज़्यादा ख़राब थी। सैयद सफ़ाई के लिए 4-5 बार आए। काफ़ी मेहनत भी उन्होंने की। एक बार तो रसोई के छोटे-छोटे प्लास्टिक और स्टील के बर्तन जिस लगन और करीने से साफ़ किए कि मैं थोड़ा हैरान भी हो गया। सफ़ाई के दौरान एक दिन तो उन्होंने मेरे नहाने का पानी गर्म करनेवाले पतीले में चावल(संभवत लिट्टी-चोखा) बना दिए। उस दिन मैंने, लगभग तीन-चार साल के बाद एक पुरानी बची वोदका की बोतल भी निकाल ली थी। महफ़ूज़ ने पीछेवाला कमरा लगभग पूरा साफ़ कर दिया था, रात के एक-दो बजे हम पंखा चलाकर चटाई-वटाई बिछाकर बैठ गए। उस दिन भी मैं शायद कई महीने बाद नहाया था। सैयद की भावना देखते हुए मैंने चावल, भी खाए और उबले अंडे और कच्चा पनीर भी मंगाकर खाए। अंजुले कुछ-कुछ पंडितों की तरह व्यवहार करता लगा। महफ़ूज़ ने भी दारु पी या नहीं पी, पी तो कितनी पी, मैंने नहीं देखा। अंजुले शाम को कहीं चला गया था, महफ़ूज़ से पूछा तो पता चला कि गुटखा खाने गया है। मैंने कहा कि मेरे सामने ही खा लेता, मुझे तो कोई दिक्क़त नहीं थी। ख़ैर, महफ़ूज़ के व्यवहार में मुझे यह अच्छा लगा कि मैंने उन्हें जो भी देना चाहा, उन्होंने पसंद और ज़रुरत के हिसाब से ले लिया। जहां तक मुझे मालूम है उन्होंने फ़ेसबुक पर इस बात का कभी ज़िक़्र भी नहीं किया कि उन्होंने मेरा कोई काम/अहसान किया। मैं इस बात का क़ायल हूं कि आप किसीका कोई काम करें और बदला चाहें तो सीधे और तुरंत मांग या ले लेना चाहिए बजाय इसके कि पहले आप ख़ुदको सामाजिक/मसीहा की तरह पेश करें बाद में बदला भी चाहें और बदला भी ऐसा कि दूसरे के लिए मुश्क़िल या असंभव हो जाए। 

इन सब घटनाओं और संबंधों का ज़िर्क़ मैंने एक विशेष संदर्भ में किया है। इन सब संबंधों में किसी-गंगा जमुनी संस्कृति या धर्मनिरपेक्षता का हाथ नहीं था, मेरे लिए यह मेरे सहज स्वभाव का परिणाम था, ठीक वैसे ही जैसे मेरी नास्तिकता और उदारता का किसी पार्टी या विचारधारा से कोई संबंध नहीं था, नहीं है।   

इन्हीं सब बातों को मैं इस लेख के अगले हिस्से में स्पष्ट करुंगा।

(जारी)

-संजय ग्रोवर
16-03-2019

अब सवाल यह है कि मैंने इन सभी लोगों(मुस्लिमों-हालांकि किसी दोस्त/इंसान को मैं हिंदू, मुसलमान, क्रिश्चियन कहकर परिचित कराऊं, मुझे थोड़ा शर्मनाक़ ही लगता है) से मित्रता क्या किसी योजना के तहत की थी, किसी सिद्धांत के डर से की थी, किसी कोर्स को पढ़कर की थी!? बिलकुल भी नहीं। क्या आपने किन्हीं स्कूली पाठ्य-पुस्तकों में ऐसे चैप्टर देखें हैं ? छिटपुट कहानियां ज़रुर देखी होंगी। मैंने कुछ और ज़रुर देखा, कुछ भिन्न। मैंने देखा कि पिताजी किसीसे काम करवाते थे तो एक तो वे उनके चाय और कुछ न कुछ नाश्ता ज़रुर देते थे, कभी-कभी वे उनको ‘बाबूजी’ भी कहते थे। बाबूजी से उनका अभिप्राय होता था-सरजी, साहबजी, शाहजी आदि। कोई कामवाला बेईमान निकलता तो मुझे ग़ुस्सा भी आता कि पिताजी इसको बाबूजी क्यों कहते हैं। मेरी माताजी जमादार का कप तो अलग रखता थी मगर उससे बात करने का उनका अंदाज़ वो नहीं होता था जो दूसरों का होता था। मैं देखता था कि मेरी बहिनें गर्मियों में अगर कहीं से रिक्शे में आतीं थीं तो पहले रिक्शेवाले के लिए स्टील के गिलास और जग में ठंडा पानी ले जातीं थीं। कई बार बर्तन साफ़ करनेवाली महिला ऐसे बर्तनों को साफ़ करने से इंकार कर देती थी। दिल्ली में पहली बार पहले फ़्लैट में काम कराते हुए जब मैं मज़दूरों के साथ चाय पी रहा था तो पड़ोसिनें हंस रहीं थीं। उसके बाद दो-चार बार मैंने मज़दूरों के लिए चाय बनाई तो वे कहने लगे कि हम धोएंगे, मैंने कहा कि अपने के साथ तुम्हारे भी धो दूंगा, इसमें क्या ख़ास बात है !

मुझे समझ में यह नहीं आता कि कोई अच्छा काम किसी भी वजह से कर रहा हो, कुछ लोग उसपर अपने ब्राँड का ठप्पा क्यों लगाना चाहते हैं !? कि यह हिंदू होने की वजह से कर रहा है, यह मुस्लिम होने की वजह से कर रहा, यह धार्मिक होने की वजह से कर रहा है, यह धर्मनिरपेक्ष होने की वजह से कर रहा है, यह पंजाबी होने की वजह से कर रहा है, यह बंगाली होने की वजह से कर रहा है !

मैं बिलकुल स्पष्ट कर दूं मैं जब भी कोई ढंग का काम करता हूं तो उसकी उपरोक्त में से कोई वजह नहीं होती।
(जारी)

-संजय ग्रोवर
19-03-2019


Sunday, 19 February 2017

इतने फूल कहां से लाओगे, प्यारे बच्चों!

प्यारे बच्चो,

अंकल को फूल ज़रुर दो लेकिन याद रखो कि तुम्हारे पापा भी किसीके अंकल हैं। और अंकल भी किसीके पापा हैं। अपने पापा पर भी नज़र रखो, कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन कोई तुम्हारा दोस्त, कोई बच्चा तुम्हारे पापा को पूरा बग़ीचा दे जाए। ज़रा अपना घर देखो, क्या यह स्वीकृत नक़्शे के हिसाब से ही बना है ? इसकी बालकनी, इसके कमरे ज़रा ध्यान से देखो। अपने पानी-बिजली के मीटर देखो, क्या यह ठीक से चलते हैं ? उससे भी पहले यह देखो कि क्या यह चलते भी हैं ? उससे भी पहले ये देखो कि क्या ये लगे भी हैं ? अगर तुम्हारा ऐडमीशन किसी जुगाड़ या डोनेशन से हुआ है तो अपनेआप को भी सड़क पर फूल भेंट करो।

यह भी देखो कि तुम्हे फूल देना किसने सिखाया ? उसकी ख़ुदकी ज़िंदग़ी में कितनी ईमानदारी है ? कहीं कोई अपनी राजनीति के लिए तुम्हारा इस्तेमाल तो नहीं कर रहा ? अगर तुम्हे लगता है कि ऐसा हो रहा है तो सबसे पहले उन अंकल को फूल दो जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए तुम्हे मिस्यूज़ कर रहे हैं। ध्यान रहे कि राजनीति यहां सिर्फ़ राजनीति में नहीं होती, घर-घर में होती है। अगर अंदर तुम अपने पापा की बेईमानियां छुपा लेते हो और बाहर अंकलों को फूल देते हो तो तुम भी राजनीति कर रहे हो। राजनीति इसीको कहते हैं मेरे प्यारे बच्चो।


सभी बच्चे अपने मां-बाप को महान समझते हैं। तुम जिन अंकल को फूल दे रहे हो उनके बच्चे भी अपने पापा को महान समझते आए हैं। तुम्हारे फूल से वो अंकल चोर से दिखने लगेंगे। तब उनके बच्चों को कैसा लगेगा ? महान लोग ऐसे होते हैं ? वैसे तुम्हे सोचना चाहिए कि सभी मां-बाप महान होते हैं तो फिर चोरी कौन करता है, भ्रष्टाचार कौन करता है, बलात्कार कौन करता है, टैक्स कौन चुराता है, लूटमार कौन करता है, मकान में से दुकान कौन निकालता है, मकान में नाजायज़ कमरे और बालकनी कौन बनाता है ? अगर मां-बाप यह नहीं करते तो क्या बच्चे करते हैं ? फिर तो बात तुम पर आ जाएगी, प्यारे बच्चो!


कहीं तुम किसीको फूल इसलिए तो नहीं दे रहे कि किसी टीवी वाले अंकल ने तुमसे कहा है कि अगर फूल दो तो तुम्हें टीवी पर दिखाया जाएगा ? इसका मतलब है कि तुम बस थोड़ी देर के लिए अच्छा और साहसी दिखने का अभिनय कर रहे हो। यह राजनीति भी है, पाखंड भी है, मौक़ापरस्ती भी है और बेईमानी भी है। इसके लिए ख़ुदको भी फूल दो और टीवी वाले अंकल-आंटियों को भी फूल दो। वैसे इतने फूल तुम लाओगे कहां से, प्यारे बच्चो !? इस तरह तो देश के सारे बाग़-बग़ीचे उजड़ जाएंगे।


मैं तो कहता हूं कि फूलों का मिस्यूज़ किसी भी हालत में नहीं होना चाहिए। और तुम तो ख़ुद ही फूल जैसे हो। 


ज़रुरी हुआ तो फिर मिलेंगे-


तुम्हारा दोस्त,

-संजय ग्रोवर
20-02-2017

Friday, 16 October 2015

नास्तिकता और पुरस्कार से याद आया कि......


पिताजी सुबह चार बजे उठ जाते और किसी न किसी काम में लग जाते, कभी दरवाज़ों की चौखटों में तारपीन का तेल लगाते तो कभी बहियां लिखने बैठ जाते। वहां से उठते तो दूध लेने चले जाते और सब्ज़ी भी ले आते। बच्चों की क़िताबे, कपड़े लाने से लेकर लोगों के शादी समारोहों और शवयात्राओं में जाने तक बस वे काम, काम और काम ही करते रहते। न सिगरेट न शराब, न गाली न लड़ाई, न फ़िल्म न कोई और मनोरंजन। रात को भी कई बार ग्यारह-बारह बजे तक काम करते। लोग अकसर उनकी तारीफ़ करते कि कितने भले और नेक आदमी हैं ; कितने दुनियादार और कितने समझदार हैं। हम बच्चे भी बड़े ख़ुश होते और सोचते कि आदमी को ऐसा ही होना चाहिए।

मगर एक हक़ीकत और भी थी। वे दूसरों के इतना ज़्यादा काम आते कि हम चिढ़ जाते। हमें लगता कि लोग उन्हें उल्लू बनाकर अपना काम निकाल लेते हैं। उनकी तमाम दुनियादार कुशलता और सफ़लता के बावज़ूद हमारे काम कहीं न कहीं अटके रहते। हमारी बिजली ख़राब होती तो कई बार एक-एक हफ़्ते तक ख़राब रहती। पिताजी को टाइम न मिलता और पैसे देकर या हाथ-पैर जोड़कर काम कराने के लिए ख़ुदको तैयार न कर पाता। आज तो मुझे इस बात का कोई अफ़सोस नहीं है मगर उस वक़्त अपराधबोध और तनाव से भरा बैठा रहता। हर तरफ़ से डांट पड़ती कि एक दूसरों के लड़के हैं और एक यह है, किस काम का है ? मैं सोचता कि पिताजी की इतनी दुनियादार सफ़लता आखि़र किस काम की है किवे सालों तक अपने घर तक चुंगी के नल की पाइप तक न डलवा सके! 


आज तो मैं जानता हूं कि पिताजी और हमारे जैसे लोगों को हमेशा मर-मर कर ही जीना होता है, कोई मौसम आए, कोई सरकार आए, हमारे जैसे लोगों के लिए कुछ भी नहीं होता। हमें हमेशा धक्के खाने होते हैं और ताने सुनने होते हैं।

बहुत शर्मीला, चुप्पा और डरपोक होने के बावजूद मैं कई बार ख़तरे उठा लेता। एक बार मेरे दो दोस्तों, जो आपस में चचेरे भाई थे, का आर एस एस के एक लड़के से परिचय हो गया। अब वो रोज़ सुबह-सुबह उन्हें बुलाने आ जाता। वे परेशान हो गए और वह उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं था। उन्होंने मुझे बताया। मैंने किसी झोंक में आकर कहा कि मुझे मिलवाओ मैं बात करता हूं। उन्होंने मिलवा दिया। उस वक्त जैसी भी मुझे समझ थी, जितनी भी हिम्मत थी, मैंने उससे बहस की। उसके बाद शायद दो-चार बार और वह उनके पास आया और अंततः उनका छुटकारा उससे हो गया।

अच्छा संयोग था कि पिताजी और माताजी, दोनों की ही पूजापाठ में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हां, त्यौहारों और दूसरे कर्मकांडों में आने-जाने की दुनियादारी दोनों ही पूरी निभाते। मेरी दिलचस्पी उसमें भी बहुत ज़्यादा नहीं थी। पिछले 5-7 सालों से तो मैंने इन सब चीज़ों से पूरी तरह छुटकारा पा लिया है और इस मामले में बहुत सुक़ून से हूं।

राजनीति में मेरी दिलचस्पी कभी नहीं रही, यहां तक कि आम लोग घरों, दुकानों, समारोहों में आपस में जो छोटी-बड़ी राजनीति करते हैं, मुझे उससे भी कोफ़्त होती है। मगर जब इंमरजेंसी हटी और अत्याचारों की कहानियां फैली तो मुझपर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा। मेरा सीधे-सीधे किसीसे कोई लेना-देना नहीं था मगर फिर भी मैंने अपने एक दोस्त की दुकान पर उपलब्ध बड़े-बड़े गत्ते लेकर अपने हाथों से जनता पार्टी के चुनावचिन्ह हलधर के कुछ कटआउट भी बनाए जिन्हें दोस्त की मदद से खंबों पर टंगवाया। इस चक्कर में एक-दो पारंपरिक कांग्रेसियों से छुटपुट झगड़े भी हुए। मैंने अपने दोस्तों के साथ आपस में चंदा भी किया और जनता पार्टी के स्थानीय दफ़तर में देने पहुंच गए। चूंकि मैं झिझकता था सो मैंने एक दोस्त को अंदर भेजा। दोस्त ने वापस आकर बताया कि वे कह रहे हैं कि इन पैसों के बिल्ले ख़रीद कर बांट दो। ज़ाहिर है कि बहुत छोटी राशि रही होगी।
कांग्रेस और जनता पार्टी के उस पूरे चुनावकाल के दौरान और उसके बाद भी मैं काफ़ी उद्वेलित रहा। फिर जनता पार्टी की सरकार भी बन गई। और प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में उसमें आए दिन झगड़े होने लगे। साल-दो साल में सरकार लुढ़क गई। उसके बाद राजनीति में मेरी जो रुचि ख़त्म हुई, आज तक नहीं बन पाई।   

इन्हीं किन्हीं दिनों के बीच, उन्हीं में से एक दोस्त शाखा में जाने लगा। सुबह कभी-कभी मैं भी घूमने जाता था, तो एक बार दोस्तों ने दूर से शाखा दिखाई थी कि देख, वह है शाखा जहां हमारा दोस्त जाता है। फिर एक दिन पता चला कि शाखा में किसी खेल के दौरान हुई छोटी-सी ग़लती की सज़ा के तौर पर उस दोस्त को दूसरे कई लड़कों से थप्पड़ पड़वाए गए और वह घंटो रोता रहा। बहुत दुख हुआ मगर करते क्या, हमारी हैसियत भी क्या थी!

शाखा से पहले हमने जिन लोगों का दबदबा देखा था, जिनके मारे हमारी जान निकली रहती थी, अकसर कांग्रेसी होते थे। उस वक़्त तो मैं जाति-वर्ण नहीं जानता था, पर आज जितना जानता हूं, उनमें दबंग कर्मकांडी ब्राहमण भी होते थे। इमर्जेंसी के बाद भी कांग्रेस कई साल वहां कथित उच्चवर्णीय आतंक की तरह स्थापित रही। 

ख़ैर! जिंदगी में वही एक-दो बार थी जब दूर से शाखा देखी थी। एक-दो बार संभवतः कोई कांग्रेस की एक-दो रुपए की रसीद काट गया। जब अख़बार में छपने लगा तो तरह-तरह की संस्थाओं की चिट्ठियां आ जातीं थीं। उनमें से किसीसे छोटा तो किसीसे लंबा पत्र-व्यवहार हो जाता। कई लोग लेख छापते तो पैसे के बदले प्रेसकार्ड बनाकर भेज देते जो कि कभी इस्तेमाल न होते। एक दो-बार दिल्ली में किन्हीं छोटे-मोटे कामों (जैसे कोई सर्टीफ़िकेट आदि बनवाना) से किसी तीसरे के साथ एक-दो छोटे-बड़े नेताओं के पास गया। एक बार किसीने शादी-वादी के चक्कर में किसी बिरादरी के किसी रजिस्टर में नाम लिखवा दिया। यानि सारी ज़िंदगी में दल, जाति, संस्था, वर्ण, बिरादरी, राजनीति वगैरह से कुल इतना ही संबंध रहा।

लिखने को चुना तो पाया कि छपने की दुनिया में भी पूरी तरह से वही सब गंदगी भरी है जिसे छोड़कर लिखना चुना है। बहरहाल, फिर भी, दिल्ली आने से पहले अच्छा-ख़ासा छप चुका था। दिल्ली आकर यथास्थिति को और क़रीब से देखा। धीरे-धीरे समझ में आया कि विचारधाराओं के फ़र्क़ कहने के लिए हैं, 'काम करने' के अंदाज़ सबके एक जैसे हैं। एक दिन किसीने बताया कि एक जगह कविसम्मेलन है, हज़ार रु का चैक़ मिलेगा लेकिन पहले पांच सौ रु. कैश देना होगा, चलोगे क्या? मैंने कहा चला तो जाऊंगा मगर बाक़ी पांच सौ रु भी वहीं घोषणा करके दान कर दूंगा। 

हालांकि वे सज्जन विश्वसनीय थे पर पता नहीं किस तरह, बात शायद वहां पहुंच गई और उसके बाद मेरे पास वह ‘ऐक्सचेंज ऑफ़र’ नहीं आया।
उसके बाद से आज तक मिले-जुले तमाशे आए दिन देखने को मिलते रहते हैं।


-संजय ग्रोवर
16-10-2015
(जारी)