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Tuesday, 1 January 2019

धर्म+त्यौहार=?

आप भी देख ही रहे होंगे, एक न एक न्यूज़-चैनल दिखा रहा होगा कि किस तरह त्यौहारों पर हर जगह मिलावटी मिठाईयां मिलतीं हैं जो स्वास्थ्य के लिए बेहद ख़तरनाक़ होतीं हैं। यहां क़ाबिले-ग़ौर तथ्य यह है कि सभी त्यौहार धर्म से जुड़े हैं, दुकानदार और सप्लाईकर्त्ता भी धार्मिक ही होते होंगे। मैं सोचता हूं कि किसी दुकानदार का कोई रिश्तेदार/चाचा/मामा/भतीजा/दोस्त उसकी दुकान से मिठाई लेने आ जाए तो क्या वह यह कहेगा कि भई, तुम मेरे रिश्तेदार हो, दोस्त हो, मैं किसी भी हालत में तुम्हे यह मिठाई नहीं दे सकता, तुम किसी और दुकान से ले लो।

सवाल उठता है कि धर्म आदमी को आखि़र कैसे प्रभावित करता है!?

या क्या बनाके छोड़ देता है ?

और जो क़रीबियों की चिंता न कर पाए, आम ग्राहकों की चिंता कर पाएगा, मुमकिन नहीं लगता।

सवाल उठता है कि धर्म आदमी को आखि़र कैसे प्रभावित करता है!?

या क्या बनाके छोड़ देता है ?

-संजय ग्रोवर

(फ़ेसबुक, नास्तिक द अथीस्ट ग्रुप)
2 November 2013

Tuesday, 30 January 2018

शामिल सोच

मैं एक परिचित को बता रहा था कि सोशल मीडिया पर कोई नयी बात लिखो तो कैसे लोग पहले यह कहकर विरोध करते हैं कि ‘फ़लां आदमी बीमार मानसिकता रखता है’, ‘फ़लां आदमी ज़हर फैला रहा है’, ‘फ़लां आदमी निगेटिव सोच का है’. फिर उस आदमी को पर्याप्त बदनाम करके कुछ अरसे बाद वही बात अपने नाम से लिखके या बताके नये का क्रेडिट ले लेते हैं।

परिचित ने कहा कि आपको भी घर से निकलना चाहिए, घर से नहीं निकलोगे तो लोग तो यहीं करेंगे.....


मुझको यह तर्क/सोच बिलकुल ऐसे ही लगी जैसे लड़कियां छोटे कपड़े पहनेंगी तो बलात्कार तो होगा ही ; फ़लां लड़की तो पहले ही वेश्या है, मैंने ज़रा छेड़ दिया तो क्या हो गया ; लड़की सीधी है तो लोग तो छेड़ेंगे ; बलात्कार के बारे में बताओगे तो बदनामी तुम्हारी ही होगी ; सब नाजायज़ कमरे बना रहे हैं तो तुम कब तक नहीं बनाओगे.....

आपको क्या लगता है ?

-संजय ग्रोवर
30-01-2018

Tuesday, 4 July 2017

मेरे साथ कौन जाएगा ?

04-07-2017

मेरे पीछे का फ़्लैट(134-ए, पॉकेट-ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली) जो कई सालों से खाली पड़ा था, कुछ दिन पहले बिक गया है। कई दिनों से वहां से खटर-पटर, धूम-धड़ाम की आवाज़ें आ रहीं हैं। आज मैंने पिछले कई साल से बंद पड़ा अपने पिछले कोर्टयार्ड का दरवाज़ा खोला जो गंदगी से भरा मिल़ा। इस गंदगी में मेरा योगदान ज़रा भी नहीं है। ऊपर मजदूर काम करते दिखाई दिए, मैंने कहा यहां कमरा तो नहीं बना रहे? उन्होंने कहा कि बना तो रहे हैं। मैंने कहा कि यह नहीं हो सकता, यह ग़ैरक़ानूनी है, मैंने यह डीडीए फ़्लैट इसलिए ख़रीदा था कि आगे-पीछे ख़ुला था, मैं इसे बंद नहीं होने दूंगा। मजदूर बोले कि मालिक़ से बात करलो, मैंने कहा इसमें बात क्या करनी है, क़ानून स्पष्ट है। उन्होंने मालिक़ को फ़ोन मिलाकर मुझे पकड़ा दिया। मालिक़ कहने लगे कि मिल-बैठकर बात कर लेंगे। मैंने कहा इसमें बात क्या करनी है, पैसे मैंने लेने नहीं हैं, क़ानून मुझे तोड़ना नहीं है। फिर वे बोले कि चार-चार बच्चे हैं, जगह तो चाहिए। मैंने कहा कि इसमें मेरा कुछ भी लेना-देना नहीं है, मेरी कोई ग़लती नहीं है, मैं क्यों भुगतूं ? काफ़ी बातचीत के बाद उन्होंने कहा कि आपकी मर्ज़ी नहीं होगी तो नहीं बनाएंगे मगर साथ-साथ एक बार मिलने की बात भी कहे जा रहे थे। 


यह स्टेटस मैंने किसी मदद के लिए नहीं बल्कि सूचनार्थ लिखा है। आज से कुछ चार-पांच साल पहले जब मैं चारों तरफ़ से घिरा हुआ था, कई तरह के प्रयत्न और तजुर्बे कर चुका था, उसी एक घड़ी में मैंने एक निर्णय ले लिया था-रोज़-रोज़ मरने से अच्छा है, एक ही दिन मर जाओ। वो दिन है और आज का दिन है मैंने किसीको मदद के लिए नहीं पुकारा। बड़ी से बड़ी परेशानी में एक ही चीज़ मुझे सहारा देती है-कि ज़्यादा से ज़्यादा कोई जान ले लेगा मगर मैं किसी ग़लत आदमी के दबाव में नहीं आऊंगा, मैं पाखंडियों को हीरो नहीं बनने दूंगा, मैं बेईमानों को सम्मान के साथ नहीं सुनूंगा, मैं कट्टरपंथियों से प्रगतिशीलता नहीं सीखूंगा, मैं वर्ण और श्रेष्ठतावादियों से समानता नहीं सीखूंगा, मैं मानवताविरोधी, वर्णसमर्थक पुरुषों/स्त्रियों से स्त्रीवाद नहीं सीखूंगा। तब तो बिलकुल भी नहीं जब मैं इनको भी अच्छी तरह जानता होऊं और ख़ुदको भी...... 



आज या आगे कभी भी, मुझे कुछ होता है तो मुझे कोई अफ़सोस नहीं होगा। पिछले 5-7 सालों में, मैंने अपनी पसंद की ज़िंदगी जी है, अपनी पसंद का लेखन किया है, अपनी तरह से क़िताबें छापीं हैं। कई-कई तरह के भयानक दर्दों के बीच खाना बनाना, कपड़े धोना, बर्तन धोना, वीडियो बनाना, ई-क़िताब छापना, बेईमानों से निपटना....सब कुछ अपने आप सीखा। अगर ज़िंदा रहा तो बचे हुए काम भी साल-दो-साल में पूरे हो जाएंगे।


अगर मुझे कुछ होता है तो इसके ज़िम्मेदार होंगे-धार्मिकता, धर्मनिरपेक्षता और ब्राहमणवाद क्योंकि ये सब ही इंसान को सिखाते हैं कि पहले नाजायज़ काम कर लो, बेईमानी और बलात्कार कर लो और बाद में डुबकी लगालो, चढ़ावा चढ़ा दो, भंडारा करा दो, कीर्तन-जागरन करा दो, पुरस्कार बांट दो और आराम से सो जाओ।
इसे विस्तार से अभी लिखना है। अभी तो सबसे ओपन नेटवर्क चलानेवालों के बारे में भी लिखना है कि वे पिछले कई सालों से बीच-बीच में क्या-क्या अजीब हरक़तें मेरे साथ करते रहते हैं। 

न तो मैं किसीका कोई काम पिछले रास्ते से या जुगाड़ से करा सकता हूं, न ही मैं किसी विचारधारा पर ज़बरदस्ती हामी भर सकता हूं, न ही किसी जाति-बिरादरी-धर्म-गुट-दल में शामिल हो सकता हूं, न किसीकी समीक्षा कर या करा सकता हूं, न किसीको अख़बार, सेमिनार या चैनल में जगह दिला सकता हूं, न किसीको नौकरी दिला सकता हूं, न समाज के मानवविरोधी कर्मकांडों, रीति-रिवाजों में शामिल हो सकता हूं....इसके बावजूद भी कोई अगर बात करना चाहे तो कर सकता है.... 


5-7 साल पहले जब ऐसी परेशानी आई थी तो कुछ दोस्त मदद के लिए आए थे, उनमें से एक-दो ने काफ़ी काम भी किया। बाद में मैंने उन्हें भी मुक्त कर दिया....


05-07-2017


मैं यह बताना चाहता हूं कि लोग ख़ुलें में सिर्फ़ टट्टी नहीं करते, बल्कि और भी बहुत बड़े-बड़े काम करते हैं। और इन कामों में अकसर महिलाओं की भी पूरी सहमति रहती है। मुझे याद है पिछली बार जब मैंने ऐसे ही नाजायज़ कमरा बनानेवालों को रोका था और उन लोगों ने मुझे दाएं-बाएं, दोनों तरफ़ से पकड़ा हुआ था तो एक महिला मुंह पर चुन्नी डाले हंस रही थी। कल को इस औरत के साथ कुछ होगा तो क्या मेरे लिए इसकी मदद करना आसान होगा ?


पिछली बार ही फ़ेसबुक पर किन्हीं सज्जन ने सुझाव दिया था कि अपने पड़ोसियों को लेकर थाने जाओ। मैंने सोचा आधे पड़ोसियों ने ऐसे कमरे बना रखे हैं और कईयों ने बनाने हैं, मेरे साथ कौन जाएगा ?


बाद में यही हुआ भी, मेरे आसपास के कई घरों में कई कमरे और बन गए।


मेरा शक़ एक दिन यक़ीन में न बदल जाए कि धर्म और भगवान और कुछ नहीं सिर्फ़ बेईमानों का सुनियोजित गठजोड़ है, माफ़िया है  !! 


यह कमरा बनता है कि नहीं बनता, यह कुछ समय में सामने आ जाएगा मुझे ये बातें वैसे भी उठानी ही थी, आज ही सही।






(गाने भी मज़ेदार हैं-पहली पंक्ति में कहा है, ‘इंसाफ़ की डगर पे बच्चों दिखाओ चलके...’..अगली पंक्ति है-‘दुनिया के रंज सहना, और कुछ न मुंह से कहना...फिर अगली पंक्तिओं में कहा है-‘अपने हों या पराए, सबके लिए हो न्याय.....
गाया भी अच्छा है..... )

-संजय ग्रोवर
05-07-2017


Wednesday, 21 June 2017

असफ़ल लोगों का सफ़ल नाटक

एक बार मैंने फ़्लैट बेचने के लिए अख़बार में विज्ञापन दे दिया, बाद में उसे 4-5 बार रिपीट भी करवा दिया। एक सज्जन (लिखते समय थोड़ा शिल्प-शैली का ध्यान रखना पड़ता है वरना ‘श्रेष्ठजन’ उखड़ जाते हैं:-) जो प्रॉपर्टी का काम करते थे, मेरे पास चले आए कि हमारे होते अख़बार में विज्ञापन क्यों दे दिया ? उनका अंदाज़ ऐसा था जैसे मैंने कोई चोरी या बेईमानी कर ली हो। इसमें मुझे ज़्यादा हैरानी नहीं हुई क्योंकि ‘चोरी और सीनाज़ोरी’ या ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ के उदाहरण मैं यहां बचपन से ही देखता आया हूं। मुझे थोड़ी हैरानी इस बात पर ज़रुर हुई कि विज्ञापन मैंने अंग्रेज़ी के अख़बार में दिया था और मेरी जानकारी में वह सज्जन यह भाषा नहीं जानते लगते थे। इधर फ़ोन की घंटिया धकाधक बजने लगीं। एक महिला जो हमारे घर में काम करती थी, घंटी बजते ही किसी-न-किसी बहाने फ़ोन के पास दौड़ी चली आती। बाद में उसने बड़े अपनत्व भरे लहज़े में शिक़ायत भी की कि आपने अपने इस निर्णय में मुझे शामिल नहीं किया, मुझे नहीं बताया। ऐसी घटनाएं देखते-समझते धीरे-धीरे निराकार-साकार-भगवान, माफ़िया, सफ़लता आदि के सही मायने या रहस्य समझ में आने लगे। जिस दिन पहली बार गणेश की मूतियों के दूध पीने की अफ़वाह फैली थी, मुझे याद है कि एक आदमी हमारे घर इसकी सूचना देने आया था। उससे जब पूछा कि आपको कैसे पता चला तो उसने कहा कि कई लोगों के घर फ़ोन आए थे। हमारे यहां उस वक़्त फ़ोन नहीं था। हमें क्या मालूम था कि फ़ोन की सबसे ज़्यादा ज़रुरत ‘भगवानों’ को पड़ती है। इसके बिना बेचारे मुर्दा के मुर्दा पड़े रहते हैं। 

इन माफ़ियानुमां गठबंधनों के कई रुप देखने को मिलते हैं। कई दुकानदार पब्लिसिटी के लिए साइनबोर्ड सड़क पर रख देते हैं। दुकान खोलने के बाद मुझे यह पता चला कि जैसे ही बोर्ड हटानेवाली गाड़ी अपने दफ़्तर से चलती है, बाज़ार में सूचना आ जाती है कि अपने-अपने बोर्ड हटा लो, गाड़ी आ रही है। जब अपने मकान में कोई कुछ अवैद्य काम करवा रहा होता है तो ऐन वक़्त पर क्या होता है, आप जानते ही हैं। बड़ी हैरानी की बात है कि जब बाक़ी सब कामों के लिए इतने सुगठित, सुनियोजित माफ़िया काम करते हैं, चप्पे-चप्पे की ख़बर रखते-पहुंचाते हैं तो जब औरतों के साथ छेड़छाड़ या बलात्कार की घटनाएं होतीं हैं तब ये लोग क्यों सामने नहीं आते ? क्यों छुपकर भी कुछ नहीं करते ? क्या आपको मालूम है कि जाने-अनजाने इसमें औरतें भी शामिल होतीं हैं। इसमें प्रगतिशील और कट्टरपंथी, बंगाली और हैदराबादी,  अकेले और पारिवारिक...सभी लोग शामिल होते हैं। फिर यही लोग जंतर-मंतर और रामलीला ग्राउंड में जाकर रोना-पीटना मचा देते हैं। मैंने पिछले कुछ सालों में इंटरनेट पर कई लोगों को शराफ़त का मज़ाक़ उड़ाते देखा। इसमें सबसे मज़ेदार बात मुझे यह लगी कि यही लोग ईमानदारी के नाम पर चलाए गए सर्कसनुमां तथाकथित आंदोलनों का सबसे आगे बढ़कर समर्थन कर रहे थे।

आप ज़रा सोचिए कि अगर मुझे मकान बेचने में सफ़ल होना था तो मुझे क्या करना चाहिए था ? 

(जारी)

-संजय ग्रोवर
21-06-2017


Sunday, 20 November 2016

वाह रे मर्द!

व्यंग्य

अपने यहां मर्दानगी का शौक़ काफ़ी पुराना लगता है। यह बिलकुल असाध्य रोग की तरह लगता है क्योंकि 2011 से 2016 तक में भी मर्दानगी से संबंधित तरह-तरह की कहानियां, विज्ञापन, कविताएं आदि देखने को मिलते रहते हैं।

मैं अलग से किसी विज्ञापन या कविता (जहां तक तर्कहीनता की बात है कई बार ये दोनों  बिलकुल एक जैसे लगते हैं) का ज़िक़्र नहीं करना चाहता क्योंकि कई लोग इसमें भी अपनी प्रसिद्धि, महानता और शहादत आदि देखने या चाहने लगते हैं। कई लोग मर्दानगी की महानता का चर्चा अकसर औरतों और परिवार की सुरक्षा के संदर्भ में करते हैं। यह बात अलग है कि अपने यहां ऐसे मर्दों का आंकड़ा जुटाना मुश्क़िल है जो वास्तव में अपनी भी सुरक्षा ठीक से कर पाते हों। ज़्यादातर मर्द पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों के नाम पर जगह-जगह, तरह-तरह से एडजस्ट ही करते पकड़े जा सकते हैं।

चलिए, हम थोड़ी देर को मान लेते हैं कि मर्द वह है जो परिवार की सुरक्षा करता है। अब सवाल यह है कि जिसका परिवार नहीं वो क्या ख़ाली अपनी मर्दानगी साबित करने के परिवार पैदा करे ? उसके परिवार का खर्चा कौन उठाएगा ? अगर वह परिवार की आड़ में बेईमानी से एडजस्ट न करना चाहे तो ? देश में ऐसे बहुत सारे मर्द मशहूर होते रहे हैं जिनके परिवार नहीं थे। उनका अब आप क्या करेंगे ? उनको क्या बोलेंगे ?

आप परिवार की रक्षा किससे करेंगे ? आप शरीफ़ हैं तो दूसरे क्या बदमाश हैं ? उनके भी तो परिवार हैं। वे भी अपने परिवार की रक्षा के लिए तरह-तरह के क़रतब कर रहे हैं। कौन तय करेगा कि किसके क़रतब जायज़ हैं, किसके नाजायज़ ? बलात्कार कांड हुआ और एक-एक आदमी बोला कि हम बलात्कार के खि़लाफ़ हैं, औरतों का सम्मान करते हैं। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चला, हर कोई समर्थन करने लगा। नोट बंद हुए, हर कोई बोला हम ब्लैक मनी के खि़लाफ़ हैं। यहां इतने तो अच्छे लोग रहते हैं, फिर रक्षा किससे करनी है ?

आप परिवार की रक्षा कितने वक़्त तक करेंगे ? आप कितने साल तक जिएंगे ? उसके बाद परिवार की रक्षा कौन करेगा ? आपके ‘परिवार की रक्षा’ के शौक़ के लिए परिवार के सभी सदस्यों का 60-60 साल तक बच्चा बना रहना ज़रुरी है क्या ? एक आपकी ईगो की ख़ातिर इतने-इतने लोग क़ुर्बान हो जाएं ? इससे मिलेगा क्या ?


अगर मर्द वह है जो परिवार और महिलाओं की रक्षा करता है तो स्पष्ट है कि परिवार का मुखिया, परिवार का बड़ा, परिवार में शासक भी वही है। यह किसका फ़ायदा है ? परिवार और महिलाओं का या स्वयं मर्द का ? नये डब्बे में पुराने कार्यक्रम कब तक चलाते रहोगे महा-पुरुष !?

आप अगर महिलाओं और परिवार की रक्षा करेंगे तो भगवान क्या करेगा ? यूं तो लोग कहते हैं कि सब कुछ वही करता है मगर आप जैसों की बातें पढ़ें-सुनें तो लगता है कि वह कुछ भी नहीं करता। अगर वह किसी परिवार की सुरक्षा नहीं करना चाहता तो आप क्या उसके खि़लाफ़ जाके रक्षा कर पाएंगे ?



क्यों न परिवार को और औरतों अपनी रक्षा ख़ुद करने दें क्योंकि जिनसे उनकी रक्षा आप करना चाहते हैं वे सब भी पारिवारिक लोग हैं। वे भी अपने:परिवार की सुरक्षा’ की ख़ातिर उन्हें आपसे दूर रखने में लग गए तो ?
 

बेईमानों से हमारा एडजस्टमेंट है, रिश्वतखोरों का हमारे घरों में आना-जाना है, छेड़नेवाले हमारे दूर-पास के संबंधी हैं, दहेजखोर कट्टरपंथी, प्रगतिशीलों-सा भेस बनाकर, हमारे दोस्त-यार हैं।  जिनसे रक्षा करनी है, सब तो हमारे चिर-परिचित हैं। फिर रक्षा किससे करनी है ?  फिर रक्षा बस विज्ञापन में, नाटक में, कविता में, कहानी में, फ़िल्म में, मंच पर ही संभव है।
 

वो तो कई सालों से चल रही है।

वैसे किसीकी रक्षा करने के लिए मर्द होना ज़रुरी क्यों है ? क्या इंसान किसीकी रक्षा नहीं कर सकता ?


-संजय ग्रोवर
20-11-2016