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Thursday, 20 April 2017

कौन अल्ला! कौन ईश्वर! किसने है देखा कभी

ग़ज़ल

दौर कुछ ऐसा चला है धर्म की अभिव्यक्ति का
एकता ने खून पी डाला अकेले व्यक्ति का

लूट, दंगे, अंधश्रद्धा, आपसी रिश्तों में फूट
कौन सा चेहरा है बाक़ी अब तुम्हारी भक्ति का

कौन अल्ला! कौन ईश्वर! किसने है देखा कभी
भीतरी चेहरा तो ढूंढो इस अजब आसक्ति का

आदमी बिलकुल अकेला, फिर भी ज़िंदा बाजुनून
से बेहतर और क्या परिचय मिलेगा शक्ति का

आसमां का ख़्वाब देकर कुंए में बिठला दिया
वाह क्या तुमने दिखाया रास्ता ये मुक्ति का

पत्थरों की आड़ में इतने भी मत पत्थर बनो
सच नही तो काम छोड़ो बेतुकी पुनरुक्ति का

सुनने में अच्छी लगे पर काम कुछ आती न हो
खुद बताओ यार फिर हम क्या करें उस उक्ति का

पुनरुक्ति = repetition


-संजय ग्रोवर