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Tuesday, 8 March 2016

आज़ाद ग़ुलामों की शर्मनाक़ मुश्क़िलें

जब आप किसीको ग़ुलाम बनाते हैं तो आपकी अपनी आज़ादी भी ख़तरे में पड़ जाती है। क्योंकि दूसरे को ग़ुलाम बनाने के लिए कुछ न कुछ झूठ बोलना पड़ता है, कोई न कोई षड्यंत्र रचना पड़ना है। बेवजह कोई क्यों आपकी ग़ुलामी करेगा, क्यों ख़ुदको आपसे छोटा मानेगा, क्यों आपसे दबेगा !? सो आपको झूठ बोलना पड़ता है, किसी जाति को बड़ा बनाना पड़ाता है, किसी पद-प्रतिष्ठा से डराना पड़ता है, मां-बापके नाम का, वंश का ख़ौफ़ दिखाना पड़ता है, किसी संस्था, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना पड़ता है, किसीको तथाकथित स्वर्ग में पहुंचा देने का झूठा भरोसा देना पड़ता है, ऐसे ही तरह-तरह के अन्य उपाय करने पड़ते हैं।

आज की बदलती परिस्थितियों में ज़्यादातर लोग जानते लगते हैं कि ये सब भद्दी तरक़ीबें काम भी करतीं हैं। स्त्रियां तो शारीरिक रुप से थोड़ी हल्की थीं भी लेकिन बनानेवालों ने लैंगिक विकलांगों जो कि शारीरिक बल में अकसर पुरुषों से मजबूत दिखाई पड़ते हैं, को भी मानसिक रुप से कमज़ोर करके या तो ग़ुलाम बनाया या हाशिए पर पहुंचा दिया।

लेकिन जब आप षड्यंत्र करके दूसरों को ग़ुलाम/हीन/छोटा/नीच ठहराते या बनाते हैं तो आपके लिए यह मुश्क़िल खड़ी हो जाती है कि आपको आगे के लिए इन झूठों/बेईमानियों को छुपाए रखने का भी इंतेज़ाम करना पड़ता है। आपको बारह महीने चौबीस घंटे डर लगा रहता है कि कहीं पोल खुल न जाए। जितने बड़े दायरे में आपने झूठ फ़ैलाया है उतने ही बड़े स्तर पर उसे छुपाए रखने के भी जुगाड़ करने पड़ेंगे, नेटवर्क बनाना पड़ेगा, आदमी लगाने पड़ेंगे। आपको लोगों में फूट डाले रखने के नये-नये तरीक़े ढूंढने पड़ते हैं, अफ़वाहें फ़ैलाने के लिए आदमी चाहिए पड़ेंगे। इससे भी बड़ी बात कि क़दम-क़दम पर सतर्क रहना पड़ेगा, लोगों की निगरानी करनी या करवानी पड़ेगी क्योंकि आपसे ज़्यादा कौन जानता है कि ज़रा भी कोई व्यक्ति मानसिक रुप से जागृत हुआ, उसमें आत्मविश्वास आया कि आपकी नक़ली महानता और श्रेष्ठता की चूलें हिल जाएंगीं। मैं समझता हूं कि षड्यंत्रकारी को दूसरों के मुक़ाबले अतिरिक्त रुप से ऐक्टिव रहना पड़ता होगा। उसका दिन का चैन और रात की नींद आसान नहीं हो सकती। एक आंदोलन का नक़लीपन छुपाने के लिए उसे हज़ार तरह के नये नक़ली आंदोलन खड़े करने पड़ सकते हैं।


इस सबके मुक़ाबले वह आदमी जो न तो किसीका ग़ुलाम है, न किसीको ग़ुलाम बनाने का ख़्वाहिशमंद है, बेहतर ज़िंदगी बिता सकता है बशर्ते वह मौत के डर से मुक्त हो जाए और हवाई मान्यताओं (जैसे प्रतिष्ठा, जाति, वंश, बदनामी, लोकप्रियता, इज़्ज़त....आदि-आदि) की चिंता करना छोड़ दे।


-संजय ग्रोवर
08-03-2016


Saturday, 15 August 2015

भगवान के होते देश आज़ाद कैसे !?

व्यंग्य

हैरानी होती है कि भगवान को माननेवाले बहुत सारे लोग भी आज़ादी का दिन मनाते हैं!!

उनको भी लगता होगा कि देश कभी ग़ुलाम था। उनके भगवान के होते हुए भी देश ग़ुलाम था। जैसा कि धार्मिक लोग बार-बार घोषणा करते हैं कि भगवान की मर्ज़ी के बिना पट्ठा भी नहीं हिलता ; तो ज़ाहिर है कि भगवान की मर्ज़ी से ही देश ग़ुलाम हुआ होगा।


मगर मैंने कहीं नहीं पढ़ा कि भक्त लोग देश को आज़ाद कराने के लिए भगवान के पास गए। लेकिन अंग्रेज़ो से वे, जैसा कि इतिहास में लिखा बताते हैं, बहुत लड़े, लड़ते ही रहे। इससे कभी-कभी यह लगता है कि या तो वे अंग्रेजों को ही भगवान मानते थे या उन्हें भगवान से बड़ा मानते थे। वरना अंग्रेजो से लड़ने की क्या तुक थी ? जिस दर्ज़ी ने आपका पाजामा ख़राब सिल दिया हो आप लड़ने को सीधे उसके पास न जाकर उसके किसी कारीगर के पास पहुंच जाएं तो आप ख़ुद ही, ख़ुदको अजीब लगने लगेंगे। लेकिन भगवान के मामले में हम सारी हरक़तें अजीब-अजीब-सी करते हैं।


जब भगवान ने देश को ग़ुलाम बनाया या बनवाया तो कुछ सोचकर ही ऐसा किया होगा ! मगर भक्त लोग अजीब हैं, निकल पड़े देश को आज़ाद कराने। ये लोग दूसरों को हमेशा समझाते हैं कि भगवान की मर्ज़ी के खि़लाफ़ कुछ नहीं करना चाहिए मगर ख़ुद सारे काम उसकी मर्ज़ी के खि़लाफ़ करते हैं। 

भगवान कौन-सा कम है !? चलो, ग़ुलाम बनाया तो बनाया, जब लोगों को आदत पड़ ही गई थी, उन्हें मज़ा आने लगा ग़ुलामी में तो उसे आज़ादी सूझने लगी। तब उसने पत्ता हिलाया और आज़ादी की जंग छिड़वा दी ! पट्ठे भी तो भगवान के अपने ही हैं, जब चाहे हिला सकता है।


अब मुझे यह लगता है कि भगवान ने आदमी को मज़े लेने के लिए, अपना टाइम पास करने के लिए बनाया है तो क्या ग़लत लगता है ? 

मैं छोटा ही था और छत पर धूप सेंक रहा था कि पड़ोस की छत पर नज़र चली गई। वहां एक बिल्ली, चूहे से खेल रही थी। बार-बार उसे छोड़ देती। चूहा किसी सुरक्षित जगह की तलाश में भागता और जैसे ही वह उस जगह में प्रवेश करने को होता, ऐन उसी जगह जाकर वह उसे फिर दबोच लेती । चूहे का जो हुआ होगा सो हुआ होगा, मैं बुरी तरह घबरा गया। लेकिन धार्मिक दृष्टि से देखें तो बिल्ली चूहे के साथ इस बेदर्दी से खेल रही थी तो भगवान की मर्ज़ी से खेल रही थी। भगवान ख़ुद ही आदमी के साथ यही खेल कर रहा है। ख़ुद ही ग़ुलाम बनाता है, ख़ुद ही आज़ाद करा देता है। 


अब तो देश में मनोचिकित्सक भी भगवान की कृपा से अच्छी-ख़ासी मात्रा में हो गए हैं ; अपने ही बनाए मनोचिकित्सकों से कंसल्ट करने में दिक़्क़त क्या है !? या हो सकता है कि भगवान जानता ही हो कि मेरे बनाए लोग मुझसे अलग कैसे हो सकते हैं, इसलिए डरता हो !! 

लोग अभी भी आज़ादी की वार्षिक गांठे मनाते हैं!! बताओ, एक तो भगवान की मर्ज़ी के खि़लाफ़ आपने देश को आज़ाद कराया, अब त्यौहार भी मना रहे हो!! भगवान को चिढ़ा रहे हो क्या !?


न न, मैं भगवान को नहीं चिढ़ा रहा। मैं भगवान को मानता ही नहीं।


आपको ज़रुर मानता हूं।

-संजय ग्रोवर
15-08-2015