Monday 8 June 2015

मुहावरे, कहावतें और अंधविश्वास

मुहावरे और कहावतें भी कई तरह के अंधविश्वासों का प्रचार-प्रसार करते हैं।

जैसे एक मुहावरा है-‘ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर होता है।’ सोचने की बात है कि आखि़र ख़ाली दिमाग़ का पता कैसे लगता है !? एक आदमी पूरे दिन लगा हो काम में मगर रुपए, महीने में 500 ही लेके आए, तो पूरी संभावना है कि उसके घर के लोग ही उसे ख़ाली घोषित कर दें। या कोई आदमी चिंतन आठ घंटे करे, क़िताबें पांच घंटे पढ़े और लिखने में एक घंटा लगाए तो लोग कह सकते हैं कि यह आदमी आठ घंटे ख़ाली रहता है। जो सिर्फ़ दूसरों को पढ़कर नहीं लिखते, अपना भी सोचते हैं, वे जानते हैं कि चिंतन या ‘सोचना’ कोई पार्ट टाइम जॉब नहीं है। दिन में चौबीस घंटे भी कम हैं। ‘ख़ाली’ रहने के ऐसे और भी उदाहरण आपको मिल जाएंगे, ये मेरे अनुभव और आसपास से आते हैं तो मैंने ये बता दिए।

दूसरी तरफ़ जिन्हें हम लोग बिज़ी कहते हैं, उनमें तरह-तरह के लोग हैं। मुझे याद है जब मैं किशोर था और किसी दफ़तर में काम कराने जाता था तो लोग अकसर अपनी सीटों पर नहीं मिलते थे। जो मिलते थे, काम नहीं करके देते थे, किन्हीं और ही चीज़ों में व्यस्त होते थे। ज़ाहिर है कि वे तनख़्वाह तो अच्छी-ख़ासी लेकर जाते होंगे घरों में, तो घर वाले, दोस्त-यार, परिचित, रिश्तेदार, काहे को कहेंगे कि हमारा आदमी पूरे दिन ख़ाली रहता है।

दरअसल ख़ाली का कुछ पता नहीं। ऐसे दुकानदार होते हैं कि अपनी दुकान से ग्राहक हटा नहीं कि इधर-उधर झांकने पहुंचे नहीं कि क्या चल रहा है। कहने को वे यह भी कह सकते हैं कि भाई हम तो जिसको झांक रहे थे वह ख़ाली रहता है, इसलिए झांकना ज़रुरी था। लेकिन तय कैसे हो कि ख़ाली कौन है!?

और जिसके दिमाग़ में शैतानी भरी हो वह क्या बिज़ी होते ही एकदम संत बन जाएगा !? पहले तो वह उसी काम में कुछ गड़बड़ करेगा जिसमें बिज़ी है। फ़िर ख़ाली होगा तो फ़िर तो जो करना है करेगा ही।

ऐसे ही मुहावरा है-‘बेपैंदी का लोटा।’ मुहावरे कुलजमा एक पंक्ति के तो होते हैं, उसमें बात को कितना समेटा जा सकता है ! कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि हिंदू-मुसलमान से ऊपर उठो। पूछो कैसे उठो !? वे कहेंगे कि हमारी धारा, हमारा वाद पकड़ लो ; उठ जाओगे। उनका वाद पकड़े-पकड़े एक दिन किसीको लगा कि यार यहां भी वही सब हो रहा है, जो हिंदू-मुस्लिम में हो रहा था, तो वो सोचेगा ही कि यार, अब इससे भी ऊपर उठना चाहिए। अब ये वाद वाले लोग कहेंगे कि भई तुम तो ‘बेपैंदी के लोटे’ बनने जा रहे हो, न इधर के रहोगे, न उधर के'। तो इनसे पूछना बनता है कि पुरानी दुनिया और पुराने लोगों के हिसाब से तो हम ‘बेपैंदी के’ तब ही हो गए थे जब हमने हिंदू-मुसलमान होना छोड़ा था। अब हम इस मुहावरे को कहां सही लागू हुआ मानें !? 

फिर और कुछ लोग हैं ; उन्होंने वाद और धारा भी छोड़ दी। छोड़ दी, अच्छी बात है। मगर इन्होंने अपने गुट बना लिए। अब ये वही हरकतें कर रहें हैं जिन्हें वाद और धारा में छोड़कर आए थे। बल्कि वहां कोई कसर शेष थी तो इन्होंने उसे भी ख़त्म कर दिया। ये कहते हैं कि कोई आदमी अगर हमारे गुट का है तो उसने जो भी तर्क दिया, उसे चुपचाप मान लो, वरना हम हो-हुल्लड़ करेंगे, आक्षेप लगाएंगे, तरह-तरह से परेशान करेंगे।

यह लो जी ! ऐसे लोटे पैंदी के हों कि बेपैंदी के, फ़र्क क्या पड़ता है? जो समर्थ आदमी है, जिसके पीछे कोई गुट है, धारा है, भीड़ं है, अर्थतंत्र है ; उसका क्या !? वो चाहे तो रोज़ नई पैंदी लगवा सकता है।

मुहावरे बेचारे छोटे हैं और पूर्वाग्रहों, मान्यताओं, धारणाओं, अंधविश्वासों की भीड़ बहुत बड़ी है। मुहावरे इनके आगे क्या हैसियत रखते हैं (एक मुहावरा और ज़हन में घूम रहा था विश्लेषण समेत, मगर ऐन वक्त पर धोखा दे गया याद्दाश्त को! चलिए उसे अगली दफ़ा जोड़ लेंगे स्टेटस में)।

तो अंधाविश्वास तो गड़बड़ करेगा ही। और मुहावरे, लोकोक्तियां और कहावतें भी इसकी चपेट में आ ही जाते हैं।

-संजय ग्रोवर
21-08-2013

(on FaceBook)

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