Saturday, 14 May 2016

कौन है निराकार !?

जो है डरा हुआ
जो है कायर
जो है परदा 
जो है अभिनेता
जो है नाटकीय
जो है कर्मकांडी
जिसने ज़िंदगी को बना दिया है अभिनय

और आपको-मुझको भी लाश बना देना चाहता है सविनय


जिसे चाहिए सारे फ़ायदे
जिसने दूसरों के लिए रचे हैं सारे क़ायदे
जो दूसरों के दिमाग़ हथियाकर
उनपर लिख देता है अपना नाम
जो किसी नुक़सान की नहीं लेता ज़िम्मेदारी
छुप जाता है अपनी ही बनाई
महानता की अपनी इमेज के पिछवाड़े में
इसी ग़ैरज़िम्मेदार ने हड़प रखी है
दुनिया सारी

जो दाएं हाथ से मारता है हमें थप्पड़
और बाएं से सहलाता है
जो दुनियादारी को माफ़िया में बदलकर
समझदार कहलाता है

जो इंटरनेट पर दिखावे और मजबूरी में करता है आपसे बहस
दरअसल ठीक उसी वक्त
ऊंची-नीची होने लगती है आपकी बिजली की वोल्टेज
ख़राब होने लगते हैं आपके उपकरण
अचानक ग़ायब होने लगते हैं आपके चैक़, कोरियर और ऐसे ही कई सामान
आपके घर में घुसता है कोई लालच या आतंक लेकर निराकार का कोई एजेंट
जिसकी शक़्ल आपको कई बार देखी-भाली-सी लगती है
जिनसे पटाकर रखने की निराकार ने दी होती है आपको सलाह

वही फ़ेंकते हैं आपके आंगन में नियमित कचरा


जो दूसरों की तरलता में
ढूंढता है ठगी का रास्ता
और अपने बहुरुपिएपन को कहता है पानी
दूसरे उसे उघाड़ दें तो मरने लगती है इसकी नानी
अरे भाई तुलना तो ठीक से कर लिया करो
पानी कोई आदमी नहीं है
वह शोषित की तरह है, उसे पता भी नहीं 
कि उसे किसमें मिलाया जा रहा है
वह तो अकसर होता है शिकार
और आप बच निकलते हैं हर बार
निराकार


जो राजधानी में अपनी सौम्य कोठियों में
करता है विनम्र अय्याशी
जिसके एवज में दूसरे आए दिन देते हैं
अपने चेहरों की तलाशी
उनके चेहरों पर जैसे छप गए हैं तेज़ाब और पेशाब
जो ख़ुदको मिटाकर बनाए है बेशर्म की ख़ुशबू रंगो आब
अरे! ज़रा छः छः महीने के लिए
ड्यूटी ही बदल लिया करो उनकी अपनी
छः महीने राजधानी की कोठी में रहें वो 
और आप पिसें जंगल में जैसे पिसती है चटनी

निराकार के लोग घर-घर में
बच्चों में डालते हैं
ग़ुलामी के संस्कार
चढ़ा देते हैं चश्मे अपने
कर देते हैं उनकी आंखों को बेकार
उनका रिमोट रहता है निराकार के हाथ में
ख़ुश होता है बंधुआ परिवार

निराकार ही तो है अंधविश्वासियों का चश्मा 
वही तो है उनकी साकार मूर्खताओं की प्रेरणा और शक्ति
देखो, कैसे ख़ुद ही बेवक़ूफ़ियां सिखाकर
ख़ुद ही डांट रहा है उनको
और वे सर झुकाकर सुन रहे हैं आज्ञाकारी
क्या ग़ज़ब है भक्ति
         
निराकार ठीक आपके सामने है
मगर नहीं है, कहीं नहीं है
क्योंकि आपके पास समझने की दृष्टि
और पकड़ने का साहस नहीं है


-संजय ग्रोवर
14-05-2016


Wednesday, 27 April 2016

क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है !?

सरल मेरा दोस्त है। अपनी सरलता की ही वजह से मेरा दुश्मन भी है। मौलिक है, नास्तिक है, विद्रोही है। जाहिर है ऐसे आदमी के रिश्ते सहज ही किसी से नहीं बनते। बनते हैं तो तकरार, वाद-विवाद, तूतू मैंमैं भी लगातार बीच में बने रहते हैं। यानि कि रिश्ता टूटने का डर लगातार सिर पर लटकता रहता है।

अभी हाल ही में सरल के दो बहनोईयों का निधन 6-8 महीनों के अंतराल में हो गया। कुछेक मित्रों की प्रतिक्रिया थोड़ी दिल को लगने वाली तो थी पर सरल को वह स्वाभाविक भी लगी। संस्कारित सोच के अपने दायरे होते हैं। मित्रों का इशारा था कि अब भी तुम्हारी समझ में नहीं आया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते, इसलिए यह सब हुआ ?

यह सोच सरल के साथ मुझे भी बहुत अजीब लगी।

पहली अजीब बात तो यह थी कि सरल माने न माने पर उसके दोनों बहनोई ईश्वर में पूरा विश्वास रखते थे। फिर ईश्वर ने सरल के किए का बदला उसके बहनोईयों और बहिन-बच्चों से क्यों लिया ?

दूसरी अजीब बात मुझे यह लगी कि अगर ईश्वर को न मानने से आदमी इस तरह मर जाता है तो फिर ईश्वर को मानने वाले को तो कभी मरना ही नहीं चाहिए ! वैसे अगर सब कुछ ईश्वर के ही हाथ में है तो ईश्वर नास्तिकों को बनाता ही क्यों है !? पहले बनाता है फिर मारता है ! ऐसे ठलुओं-वेल्लों की तरह टाइम-पास जैसी हरकतें कम-अज़-कम ईश्वर जैसे हाई-प्रोफाइल आदमी (मेरा मतलब है ईश्वर) को तो शोभा नहीं देतीं।

इससे भी अजीब बात यह है कि ईश्वर क्या किसी मोहल्ले के दादा की तरह अहंकारी और ठस-बुद्धि है जो कहता है कि सालो अगर मुझे सलाम नहीं बजाओगे तो जीने नहीं दूंगा ! मार ही डालूंगा ! क्या ईश्वर किसी सतही स्टंट फिल्म का माफिया डान है कि तुम्हारे किए का बदला मैं तुम्हारे पूरे खानदान से लूंगा !

क्या ईश्वर को ऐसा होना चाहिए ?

ईश्वर को मानने वालों की सतही सोच ने उसे किस स्तर पर ला खड़ा किया है!

वैसे अगर ईश्वर वाकई है तो क्या उसे यह अच्छा लगता होगा !?


-संजय ग्रोवर

16 जून 2009 को ‘संवादघर’ पर प्रकाशित
6 फ़रवरी 2011 को ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर प्रकाशित