Saturday, 27 June 2015

कमज़ोर और दयनीय

सोचिए ज़रा-वह कैसा आदमी रहा होगा जिसने-

पहले आदमी को छोटा-बड़ा, ऊंचा-नीचा बनाया। और तय कर दिया कि ऊंचा मैं हूं।

फ़िर कहा कि चूंकि मैं बड़ा हूं इसलिए खेल के सारे नियम मैं तय करुंगा। फ़िर उसने कहा कि आसमान में कोई ऐसी शक्ति है जिसका धरती पर प्रतिनिधित्व मैं करता हूं। फ़िर उसने एक काल्पनिक शक्ति के आधार पर वास्तविक दुनिया के लिए नियम बना दिए। वे सारे नियम उसे फ़ायदा पहुंचाते थे, उसे कुछ भी करने की आज़ादी थी। वही काम जब वह ख़ुलेआम करता तो वह काम पवित्र कहलाता, दूसरा उस काम का नाम भी लेता तो भ्रष्टाचारी और अपराधी ठहरा दिया जाता।

उसके बनाए सारे नियम उसके बनाए छोटे या नीचे लोगों पर लागू होते थे, ख़ुद पर कोई नियम लागू नहीं होता था। जब-जब उसके बनाए छोटे या नीचे लोग शक़ करते कि यार हैं तो हम भी बिलकुल इसीके जैसे, बल्कि कई मामलों में इससे भी बेहतर हैं तो वह भांप जाता और नक़ली प्रतियोगिताएं खड़ी करता। उन प्रतियोगिताओं में सारे नियम-क़ानून उसके होते, जगह उसकी होती, दर्शक और अनुयाई उसके होते, तालियों से लेकर जैजैकार तक उसीके प्रभाव, दबाव और मान्यताओं के तहत होती, ईमानदारियों और बेईमानियों की परिभाषाएं उसीकी तय की हुई होतीं, प्रतियोगियों का खाना-पीना और ट्रेनिंग भी उसीकी सुविधानुसार होतीं, न्यायकर्त्ता, रैफ़्री या अम्पायर उसीके मनोनुकूल, उसीके द्वारा नियुक्त किए हुए होते, कई बार तो वह जिससे लड़ रहा होता वह भी उसीका आदमी होता। कई बार, जब वह ख़ुद मैदान में न उतरता, सभी प्रतियोगी उसीके तय किए होते.....

.....फ़िर भी कसर रह जाती तो आधी रात जाकर लड़ाई के मैदान के गड़ढों और उभारों को अपने अनुकूल कर या करवा लेता....

अंततः हर बार ‘जीत’ जाता.......


मेरे लिए इसमें सबसे हैरानी की बात यह है कि डरे हुए, उसकी मान्यताओं के मारे हुए, उसके भय से भकुआए हुए, उसके प्रभाव में पगलाए हुए, उसकी जोड़-गांठ से अनजान लोग उसे विजेता(!) मान लें, यह तो समझ में आता है मगर अपनी सारी असलियत जानने के बावजूद भी वह ख़ुद कैसे ख़ुदको विजेता(?) मान सकता था !!??

दरअसल कितना खोखला, पाखंडी, घटिया, कमज़ोर और दयनीय आदमी होगा यह !!

-संजय ग्रोवर
26-05-2014

(यह पोस्ट काल्पनिक है ठीक वैसे ही जैसे किसी तथाकथित दर्शन के मुताबिक जगत मिथ्या है)

Friday, 26 June 2015

उनका भागना प्रेरणास्पद तो इनका घृणास्पद क्यों !?

आप बचपन में स्कूल से भाग जाते थे!

यह अच्छी बात है या बुरी ?

यह कैसे तय होगा ?

लोग इसे कैसे तय करते हैं ?

एक आदमी भागता है और भागकर फ़िल्मनगरी पहुंच जाता है। न सिर्फ़ पहुंच जाता है बल्कि कामयाब हो जाता है, क़ामयाब नायक, नायिका, शायर, निर्देशक.......बन जाता है। अब देखिए ज़रा, उसके भागने को पत्र-पत्रिकाएं, टीवी चैनल किस तरह लगभग एक शौर्यगाथा या एक अनुकरणीय, उदाहरणीय घटना की तरह पेश करते हैं, वे कह सकते हैं कि इनमें बचपन से ख़तरे उठाने की, निर्णय लेने की, भीड़ के, मान्यताओं के खि़लाफ़ जाने की हिम्मत थी........

ज़रा सोचिए, यही आदमी या ऐसा ही कोई दूसरा आदमी भागता है और जाकर कहीं खो जाता है, नाकाम हो जाता है, स्मगलर बन जाता है, नाकाम होकर वापस लौट आता है। अब वही लोग इसके भागने को क्या कहेंगे !? साला बचपन से ही निकम्मा है, स्कूल से भी भागता था, यहां से भी भाग आया, हर जगह से भागेगा, बचपन से ही कमीना था, स्कूल से भागता था तो स्मगलर न बनता तो क्या बनता......

लोग परिणाम से साधनों या रास्तों का सही या ग़लत होना तय करते हैं......

क्योंकि मान्यताएं ऐसी ही हैं।

वरना इसके कुछ दूसरे मतलब भी हो सकते थे। सौ प्रतिशत तो नहीं मगर संभावना पूरी है कि जो आदमी स्कूल से भाग सकता है वह सफ़लता के दूसरे उल्टे-सीधे रास्ते क्यों नहीं अपना सकता ? एक मतलब यह भी होता है कि कथित सफ़लता ऐसे ही लोगों को मिलती है, ऐसे ही रास्तों से मिलती है....

मान्यताएं पुरानी हैं मगर मस्तिष्क हमारे पास है तो हमारी क्या मजबूरी है कि ख़ामख़्वाह उन्हें मानें !?

-संजय ग्रोवर
03-06-2014
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